Saturday, 24 May 2025

न्यायमूर्ति श्री ओक की टिप्पणी पर गंभीरता से विचार जरूरी


किसी और ने ये कहा होता तब शायद उस पर ध्यान नहीं जाता किंतु गत दिवस सेवा निवृत्त हुए  सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश अभय. एस. ओक ने विदाई भाषण में जो टिप्पणियां कीं वे न्यायपालिका की कार्यप्रणाली और छवि को लेकर जारी विमर्श में एक नया आयाम जोड़ सकती है। उन्होंने  प्रधान न्यायाधीश की उपस्थिति में कहा  कि सर्वोच्च न्यायालय से  ज्यादा लोकतांत्रिक तरीके से उच्च न्यायालयों में काम होता है क्योंकि वे कमेटियों के जरिए कार्य करते हैं जबकि सर्वोच्च न्यायालय प्रधान न्यायाधीश केंद्रित है। उन्होंने मामलों में ऑटो लिस्टिंग की जरूरत पर बल देते हुए स्पष्ट किया कि उच्च न्यायालय  में एक निश्चित रोस्टर होता है। इसमें प्रधान न्यायाधीश  को भी विवेकाधिकार नहीं मिलता। इसलिए जब तक हम मानवीय हस्तक्षेप को  कम कम नहीं कर देते, तब तक हम बेहतर लिस्टिंग नहीं कर सकते। न्यायामूर्ति श्री ओक की उक्त टिप्पणी  सर्वोच्च न्यायालय के  उन तमाम न्यायाधीशों की पीड़ा की अभिव्यक्ति है जो इस बात से नाराज रहते हैं कि  कि कौन सा मामला किस न्यायाधीश को सौंपा जाए ये प्रधान न्यायाधीश की मर्जी पर निर्भर है। जनवरी 2018 में सर्वोच्च न्यायालय के 4 वरिष्ट न्यायाधीशों ने उसी  परिसर में पत्रकार वार्ता के जरिये तत्कालीन प्रधान न्यायाधीश दीपक मिश्रा पर प्रशासनिक अनियमितताओं के जो आरोप लगाए थे उनके मूल में भी वही भाव थे जो श्री ओक द्वारा विदाई समारोह में व्यक्त किये। उनका ये कथन भी बेहद तीखा था कि सर्वोच्च न्यायालय उम्मीदों को पूरा नहीं कर सका।  श्री ओक ने जाते - जाते अपनी कर्तव्यपरायणता का परिचय देते हुए आखिरी कार्यदिवस पर  11 फैसले लिखे।एक दिन पहले ही उनकी माँ का निधन हुआ था जिनके अंतिम संस्कार में भाग लेने के बाद वे दिल्ली लौट आये। हालांकि एक बात ये खटकती है कि उच्च पदों पर विराजमान महानुभाव अपने कार्यकाल के दौरान तो प्रचलित व्यवस्था के साथ जुड़कर काम करते रहते हैं और सेवानिवृत्त होने वाले दिन या उसके बाद वे उस उसके विरोध में मुँह खोलते हैं । आजकल भूतपूर्व होने के बाद किताबें लिखकर चर्चा में आने का चलन भी है। ये बात सही है कि पद पर रहते हुए उससे जुड़ी सेवा शर्तों की मर्यादा का पालन करना पड़ता है लेकिन किसी भी विवेकशील व्यक्ति से सदैव अपेक्षा रहती है कि वह सेवाकाल में भी गलत  बातों का विरोध करने का साहस दिखाये ।  पद से हटने के बाद ऐसी बातों को सम्बन्धित व्यक्ति के मन में असंतोष अथवा कुंठा से जोड़कर देखा जाता है। फिर भी  श्री ओक ने  विदाई भाषण में  सर्वोच्च न्यायालय के बारे में जो कुछ भी कहा  और सुझाव दिये वे निश्चित रूप से विचारणीय हैं। न्यायापालिका के बारे  में ये चर्चा आम है कि सुनवाई हेतु प्रकरणों के आवंटन में पक्षपात होता है। इसे न्यायपालिका में व्याप्त गुटबाजी के रूप में भी देखा जाता है।  सामान्य तौर पर  न्यायपालिका में व्याप्त बुराइयों की जो चर्चा होती है वह अपनी जगह है किंतु जब सर्वोच्च न्यायालय के किसी न्यायाधीश द्वारा प्रधान न्यायाधीश के सामने ही ये कहा जाए कि देश की सबसे बड़ी अदालत में शक्तियों का केंद्रीकरण उसके सबसे बड़े ओहदेदार के पास है तो ये बड़ी बात है। वैसे  न्यायपालिका पर भ्रष्टाचार के आरोप अब चौंकाते नहीं हैं। किसी अधिकारी या राजनेता पर मामला दर्ज करने के लिए कुछ घंटों का समय देने और फिर लगाई गई धाराओं को कमजोर बताने वाली न्यायपालिका उच्च न्यायालय के एक न्यायाधीश के  यहाँ करोड़ों रूपये नगद जप्त होने के बाद भी अब तक पुख्ता कारवाई नहीं कर पाई। इसीलिए न्यायमूर्ति श्री ओक का ये कहना उचित प्रतीत होता है कि सर्वोच्च न्यायालय अपने आपको उम्मीदों पर खरा साबित नहीं कर सका। देखना ये है कि  मामलों के आवंटन में प्रधान न्यायाधीश की मनमर्जी का जो मुद्दा श्री ओक ने जाते - जाते छेड़ दिया उस पर प्रधान न्यायाधीश श्री गवई क्या कदम उठाते हैं या फिर रात गई, बात गई की तर्ज पर इस विषय को भी उन प्रकरणों की तरह ठंडे बस्तों में डाल दिया जाएगा जो दशकों से लंबित पड़े हुए है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

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