नीति आयोग की बैठक में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सभी राज्यों को सुझाव दिया कि वे कम से कम एक वैश्विक स्तर का पर्यटन स्थल विकसित करें । ऐसा होने पर विदेशी पर्यटक आकर्षित होंगे तथा स्थानीय अर्थव्यवस्था को संबल मिलेगा। कुछ वर्ष पूर्व प्रधानमंत्री ने घरेलू पर्यटकों को भारत दर्शन हेतु प्रेरित किया था। ये संयोग ही है कि नीति आयोग की उक्त बैठक के साथ ही ये जानकारी भी आ गई कि भारत , जापान को पीछे छोड़कर विश्व की चौथी अर्थव्यवस्था बन गया। अब उससे आगे जर्मनी, चीन और अमेरिका ही हैं । वार्षिक विकास दर जिस गति से बढ़ रही है उसे देखते हुए जल्द ही हम जर्मनी से आगे निकलकर तीसरे स्थान पर आ जाएंगे जो बड़ी उपलब्धि होगी। प्रधानमंत्री ने नीति आयोग में आर्थिक नीतियों से जुड़ी चर्चा करने के साथ हर राज्य में एक वैश्विक स्तर का पर्यटन स्थल विकसित करने की जो बात कही वह चौंकाने वाली हो सकती है किंतु उसके निहितार्थ को समझने पर उसका महत्व स्पष्ट हो जाता है। मसलन जब गुजरात में दुनिया की सबसे ऊँची सरदार पटेल की मूर्ति स्थापित की गई तब उसे पैसे की बर्बादी बताते हुए उतना धन अन्य विकास कार्यों में लगाए जाने बात भी उठी। लेकिन ज्योंही वह मूर्ति स्थापित हुई , देखते - देखते वह पूरा इलाका विकसित होने लगा। अब वहाँ हजारों सैलानी प्रतिदिन आते हैं। जिससे प्रतिमा पर व्यय की गई राशि से अधिक सरकार के पास लौट आई है। साथ ही उस उपेक्षित क्षेत्र के निवासियों को अकल्पनीय आर्थिक लाभ सैलानियों से होने लगा है। उसके बाद प्रधानमंत्री की पहल पर बनारस के ऐतिहासिक विश्वनाथ मन्दिर परिसर का सौंदर्यीकरण जब हुआ तब बनारस में ही उसका पुरजोर विरोध हुआ। लेकिन जब वह नये स्वरूप में सामने आया तो पर्यटकों की संख्या में कल्पनातीत वृद्धि हुई जिससे स्थानीय अर्थव्यवस्था में भी जबरदस्त उछाल आया। उसके बाद अयोध्या में राम मंदिर के निर्माण पर भी विघ्नसंतोषी तत्वों ने अनर्गल प्रलाप किया। लेकिन निर्माण के एक वर्ष बाद ही अयोध्या वैश्विक आकर्षण का केंद्र बन गयी। प्रयागराज में संपन्न महाकुंभ के दौरान जितने श्रृद्धालु आये उनमें से ज्यादातर ने अयोध्या और बनारस के साथ ही चित्रकूट की यात्रा भी की। मोटे अनुमान के अनुसार महाकुंभ को वैश्विक स्तर पर प्रचारित करने के कारण विदेशी पर्यटकों के अलावा दुनिया के विभिन्न हिस्सों में बसे भारतवंशी हिन्दू भी लाखों की संख्या में आये। इससे हर व्यवसाय को जबरदस्त कमाई हुई जिसका लाभ राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था को स्वाभाविक रूप से मिला। म.प्र में उज्जैन स्थित महाकाल मंदिर परिसर का भी बनारस के विश्वनाथ मंदिर जैसा विकास किये जाने का सुपरिणाम वहाँ आने वाले दर्शनार्थियों की संख्या में आशातीत वृद्धि के तौर पर देखने मिल रहा है। निकटवर्ती ओंकारेश्वर भी ऐसे ही परिणाम दे रहा है। इस सबसे उत्साहित होकर वृंदावन के प्रसिद्ध बिहारी जी के मंदिर और गुवाहाटी की कामाख्या शक्तिपीठ को भी विकसित करने का कार्य शुरू हुआ है। प्रधानमंत्री की सोच ये है कि भारत की सांस्कृतिक विविधता पूरे विश्व में अनोखी है। इसलिए प्रत्येक राज्य यदि अपने यहाँ कोई बड़ा पर्यटन केंद्र विकसित करे तो उसमें वहाँ की झलक होगी। बीते दो - तीन दशक में भारत में मध्यमवर्गीय परिवारों में भी पर्यटन के प्रति ललक पैदा हुई है। धार्मिक यात्राओं की तो परंपरा सदियों पुरानी है किंतु उसका स्वरूप बदला है। सड़कों के साथ ही अन्य सुविधाओं के विकास के कारण उत्तराखंड की चार धाम यात्रा उस पिछड़े राज्य के विकास में उल्लेखनीय योगदान दे रही है। राजस्थान के अलावा जिन राज्यों में पहाड़ी पर्यटन स्थल हैं वहाँ पर्यटकों का आना होता है किंतु आज भी ऐसे अनेक अछूते स्थान हैं जिनमें मूलभूत सुविधाएं उपलब्ध हों तो सैलानियों की आवाजाही में वृद्धि हो सकती है। उदाहरण के लिए प्रधानमंत्री ने उत्तराखंड के पिथौरागढ़ जिले में आदि कैलाश नामक स्थान पर जाकर उसका प्रचार किया जहाँ से छोटे कैलाश नामक पर्वत के दर्शन होते हैं। उसके बाद से ही वह स्थल तेजी से लोकप्रिय हो गया। कहने का आशय ये है कि पर्यटन आधुनिक अर्थव्यवस्था में काफी महत्वपूर्ण हो गया है। विदेशी सैलानियों को आकर्षित करने के अलावा उन भारतीय पर्यटकों को विदेश जाने से रोकने के लिए भी जरूरी है कि भारत के पर्यटन उद्योग को वैश्विक स्तर पर विकसित किया जाए। आज भी भारत दुनिया के लिए आकर्षण का केंद्र है किंतु आवश्यक सुविधाओं और पेशेवर कार्यशैली के अभाव में जितने सैलानी आने चाहिए उतने नहीं आते। दुनिया की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन जाने के बाद पर्यटन उद्योग को वैश्विक स्वरूप देना भी समय की मांग है क्योंकि इससे आर्थिक प्रगति को मजबूत आधार मिलता है। मालदीव, मॉरीशस, थाईलैंड, मलेशिया, सिंगापुर और दुबई इसके ज्वलंत उदाहरण हैं। और अब तो सऊदी अरब भी इस बारे में सोचने लगा है।
- रवीन्द्र वाजपेयी
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