Friday, 30 May 2025

बंगाल के मुस्लिम बहुल जिले कश्मीर बनने की ओर: हिंदू आबादी असुरक्षित


प. बंगाल के दौरे में  प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गत दिवस मुर्शिदाबाद में हुए सांप्रदायिक उपद्रव की चर्चा की। उस दौरान वहाँ के अल्पसंख्यक हिंदुओं पर हुआ अत्याचार राष्ट्रीय चिंता का विषय बन गया था। उच्च और सर्वोच्च न्यायालय तक को कहना पड़ा कि वे चुपचाप नहीं रह सकते। साथ ही उन्होंने केंद्रीय सुरक्षा बल दंगा प्रभावित क्षेत्रों में तैनात करने का आदेश दिया क्योंकि राज्य की पुलिस मुस्लिम दंगाइयों को नियंत्रित करने में न केवल विफल रही बल्कि कहीं - कहीं तो  उसने उपद्रवियों को खुली छूट दी। मुर्शिदाबाद का जनसंख्या संतुलन पूरी तरह से इकतरफा हो चुका है। निकटवर्ती मालदा के भी यही हाल हैं। इन इलाकों में मुस्लिम आबादी इस हद तक बढ़ी कि लगता है बांग्लादेश में खड़े हों। और ये सही भी है क्योंकि 1971 से बांग्लादेशी घुसपैठियों कारण पूर्वोत्तर राज्यों में मुस्लिम आबादी बेतहाशा बढ़ी जिनमें  असम और प. बंगाल मुख्य हैं।  प. बंगाल में तो कुल 30 फीसदी आबादी मुसलमानों की हो चुकी है और इसीलिए  सत्ता की चाबी उनके हाथ में है। उदाहरण के लिए मुर्शिदाबाद जिले की बहरामपुर लोकसभा सीट से पिछ्ली लोकसभा में  कांग्रेस संसदीय दल के नेता अधीर रंजन चौधरी कई चुनावों से लगातार जीतते आ रहे थे किंतु 2024 में ममता बैनर्जी ने विशुद्ध सांप्रदायिक दाँव चलते हुए  एक मुस्लिम उम्मीदवार  उतार दिया और वह भी गुजरात के क्रिकेटर युसुफ पठान को। पठान इस क्षेत्र के लिए पूरी तरह अपरिचित थे जबकि अधीर रंजन जमीनी नेता माने जाते थे । लेकिन ज्योंही तृणमूल ने उनके मुकाबले एक बाहरी  मुस्लिम उम्मीदवार उतारा चौधरी साहेब का जनाधार धराशायी हो गया और  वे बुरी तरह हार गए। बहरामपुर मुस्लिम बहुल होते हुए भी गैर मुस्लिम अधीर रंजन को चुनता रहा क्योंकि वे बतौर कांग्रेसी हिंदुवादी भाजपा के विरोधी माने जाते थे। लेकिन ज्योंही उनके सामने मुस्लिम उम्मीदवार आया उनकी धर्मनिरपेक्ष छवि एक झटके में खत्म हो गई। ये स्थिति प. बंगाल के अलावा असम, बिहार , उ.प्र और केरल सहित देश के अनेक हिस्सों में उत्पन्न हो चुकी है। जाति और धर्म के आधार पर चुनावी समीकरण बनना - बिगड़ना  राजनीति में सामान्य बात है। लेकिन प. बंगाल के मुस्लिम बाहुल्य  जिले राजनीतिक दृष्टि से ही नहीं राष्ट्रीय सुरक्षा के लिहाज से भी  संवेदनशील हो उठे हैं। ये कहना भी गलत नहीं होगा कि जिस तरह कश्मीर घाटी में रहने वालों पर सदैव ये आरोप लगता है कि वे पाकिस्तान से आने वाले आतंकवादियों को सहयोग और संरक्षण प्रदान करते हैं वही हाल प. बंगाल के उन मुस्लिम बहुल इलाकों का है जो बांग्लादेश की सीमा से सटे हैं। कश्मीर घाटी में आने वाले घुसपैठिये  वेशभूषा, खानपान , बोली और  रहन - सहन में चूंकि स्थानीय वाशिंदों जैसे होते हैं इसलिए उनको अलग से पहचान पाना कठिन हो जाता है। बिलकुल यही स्थिति प. बंगाल के मुर्शिदाबाद और मालदा तथा असम के मुस्लिम बहुल क्षेत्रों की है जिनमें अवैध रूप से आने वाले बांग्लादेशी आसानी से स्थानीय लोगों में घुल - मिल जाते हैं। वैसे तो ये सिलसिला आजादी के बाद ही शुरू हो गया था । पूर्वोत्तर राज्यों के सीमावर्ती क्षेत्रों की सुरक्षा की अनदेखी और अलगाववादी संगठनों की गतिविधियां भी इसमें सहायक हुईं किंतु 1970 में बांग्लादेश के अंदरूनी हालात बिगड़ने के बाद आये घुसपैठिये शरणार्थी की हैसियत पाने के बाद यहीं बस गए। उनको वापस भेजने की बात स्वयं  इंदिरा गाँधी ने कही थी किंतु वोट बैंक की राजनीति ने देश हित को ठेंगा दिखा दिया। ममता बैनर्जी की पूर्ववर्ती वामपंथी सरकारों ने भी यही पाप किया था जो चीन समर्थक मानी जाती थीं। लेकिन गत वर्ष बांग्लादेश में  भारत विरोधी सत्ता विराजमान होने  के बाद  हिंदुओं पर जिस तरह के अमानुषिक अत्याचार हुए उन्हीं की हूबहू नकल मुर्शिदाबाद में देखने मिली। हिंदुओं के घरों और व्यवसायिक प्रतिष्ठानों में लूटपाट, आगजनी और महिलाओं के साथ बलात्कार के रूप में आतंक का नंगानाच करते हुए उन्हें इलाका छोड़ने को बाध्य किया गया। पूरे घटनाक्रम के वीडियो सार्वजनिक हो चुके हैं । लेकिन राहुल गाँधी मणिपुर और कश्मीर घाटी के लोगों का दर्द जानने तो गए किंतु आज तक मुर्शिदाबाद का नाम तक नहीं लिया। अखिलेश, तेजस्वी, केजरीवाल, ओवैसी, उद्धव, पवार, स्टालिन और वामपंथी नेताओं को भी वहाँ आने की फुर्सत नहीं मिली क्योंकि मारने वाले मुस्लिम थे।  प. बंगाल में हालात जिस तरह बिगड़े उनको देखते हुए केंद्र सरकार को प्रभावी कदम उठाना होंगे। ममता बैनर्जी तो मुस्लिम प्रेम में अंधी हो चुकी हैं इसलिए उनसे कोई अपेक्षा व्यर्थ है। इस बारे में ये आशंका गलत नहीं है कि यदि मौजूदा स्थिति बनी रही तो प. बंगाल के सीमावर्ती जिले भी कश्मीर घाटी जैसे हो जायेंगे जहाँ हिंदुओं का रहना असंभव होगा। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

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