भारत द्वारा पाकिस्तान स्थित आतंकवादियों के अड्डों पर ऑपरेशन सिंदूर के अंतर्गत किये गए हमलों के बाद पाकिस्तान ने भी जम्मू कश्मीर के पुंछ इलाके में बमबारी करते हुए 15 नागरिकों को मार दिया। उल्लेखनीय है ऑपरेशन सिंदूर में केवल आतंकवादियों के अड्डों को ही निशाना बनाया गया तथा सैन्य ठिकानों पर कोई कार्रवाई नहीं की गई। लेकिन पाकिस्तान द्वारा लगातार गोलाबारी करते हुए युद्धविराम का उल्लंघन किया जा रहा है जो भारत को युद्ध में घसीटने की चाल है। स्मरणीय है भारत युद्ध की स्थिति को टालता आ रहा था क्योंकि उसके दूरगामी परिणाम नुकसानदेह होते हैं। और फिर आज के जमाने की जंग तकनीक आधारित होने से काफी खर्चीली हो गई है। उदाहरण के लिए ऑपरेशन सिंदूर के दौरान भारतीय वायु सेना के विमानों ने पाकिस्तान की सीमा में प्रविष्ट हुए बिना ही मिसाइलों और ड्रोन की मदद से आतंकवादियों के प्रशिक्षण और आश्रय स्थलों को खंडहरों में बदल डाला । इस ऑपरेशन को पहलगाम में हुए आतंकवादी हमले के बदले तक ही सीमित माना जा सकता है किंतु पाकिस्तान ने बौखलाहट में पुंछ क्षेत्र में नागरिकों को निशाना बनाकर भारत को युद्ध के लिए ललकारने का जो दुस्साहस किया वह उसे बहुत महंगा पड़ेगा ये तय है। दरअसल उसके साथ दिक्कत ये है कि वह सेना और आतंकवाद रूपी दो पाटों के बीच फंसा हुआ है। कहने को तो वह लोकतांत्रिक देश है किंतु उससे जुड़ी सोच और सिद्धांतों का पालन नहीं करने की वजह से वहाँ राजनीतिक अस्थिरता ने अपने पैर मजबूती से जमा लिए। अस्तित्व में आने के कुछ सालों बाद से ही पाकिस्तान में नेताओं की हत्या और फ़ौज द्वारा तख्ता पलट का जो सिलसिला शुरू हुआ वह आज भी जारी है। अपने विरोधी को जेल भेजना आम बात है। सत्ता से हटने या हटाये जाने के बाद पूर्व सत्ताधारी या तो कैदखाने में होता है या फिर देश के बाहर जाकर शरण लेने बाध्य किया जाता है। पूर्व प्रधानमंत्री इमरान खान इस समय जेल में हैं। उनके साथ जिस तरह का अमानुषिक व्यवहार हो रहा है वह किसी भी देश के लिए शर्मनाक है। पूर्व राष्ट्रपति जनरल परवेज मुशर्रफ देश से बाहर रहते हुए दुनिया से रुखसत हो गए। इसी तरह मौजूदा प्रधानमंत्री शाहबाज के भाई और दो बार निर्वाचित प्रधानमंत्री रहे नवाज शरीफ का हश्र भी किसी से छिपा नहीं है। हालांकि मुस्लिम देशों में सत्ता पलट का ये खेल बहुत आम है किंतु पाकिस्तान के संस्थापक मो. अली जिन्ना ने देश को लोकतांत्रिक बनाने का जो सपना देखा था वह बहुत जल्दी मिट्टी में मिल गया। वहाँ के जितने भी सत्ताधीश हुए उन्होंने मुल्क की बेहतरी के बजाय कुर्सी बचाये रखने के लिए भारत विरोधी रुख अपनाया। सेना के जनरल भी अपनी राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं को पूरा करने के लिए भारत विरोधी रवैया अपनाकर सरकार पर दबाव बनाते रहे। ये कहना गलत नहीं होगा कि पाकिस्तान में चुनी हुई सरकार जनता की मर्जी के बजाय सेनाध्यक्षों की दया पर निर्भर रहती है। वर्तमान प्रधानमंत्री शाहबाज भी इसी स्थिति में जी रहे हैं। उनके बड़े भाई नवाज शरीफ ने भारत के साथ रिश्ते सुधारने के प्रयास किये थे किंतु उनको सत्ता गंवानी पड़ी। शाहबाज राजनीतिक तौर पर वैसे भी उतने मजबूत नहीं हैं इसीलिए फौजी जनरल मुनीर खुद को प्रधानमंत्री से ज्यादा ताकतवर मानते हैं। पहलगाम में आतंकी हमले के पहले दिये उनके एक भाषण में हिंदुओं और मुसलमानों के बीच जिस प्रकार की जन्मजात नफ़रत की बात की गई उसकी काफी चर्चा हुई। कहा जाता है पहलगाम की घटना का वह पूर्व संकेत थी क्योंकि उसके पहले आतंकवादियों ने कभी भी धर्म पूछकर लोगों को नहीं मारा था। भारत ने ऑपरेशन सिंदूर के जरिये उस हत्याकांड का बदला ही लिया किंतु जनरल मुनीर पूरी तरह से जंग छेड़ना चाहते हैं क्योंकि हर युद्ध के बाद पाकिस्तान में तख्ता पलट की परंपरा रही है। जैसी खबरें आ रही हैं उनके अनुसार वहाँ की चुनी हुई सरकार पूरी तरह सेना की मुट्ठी में आ चुकी है। जनरल मुनीर सत्ता हथियाने के लिए पाकिस्तान को युद्ध में झोंकना चाह रहे हैं। यदि पहलगाम की घटना के बाद पाकिस्तान आतंकवाद पर नकेल कसने की पहल करता तब शायद उस पर ये मुसीबत नहीं आती। लेकिन उसने भारत के अंधविरोध में आतंकवादियों के रूप में जिन नागों को दूध पिलाया वे ही उसकी बर्बादी का सबब बन रहे हैं। उसका ये कहना कि वह खुद आतंकवाद से जूझ रहा है सिवाय झूठ के और कुछ नहीं है। ऐसे में जनरल मुनीर का युद्धोन्माद पाकिस्तान के लिए एक और विभाजन का कारण बन जाए तो आश्चर्य नहीं होगा क्योंकि भारत भी इस बार उसे कड़ी सजा देने के लिए तैयार दिख रहा है।
- रवीन्द्र वाजपेयी
No comments:
Post a Comment