Tuesday, 20 May 2025

शरणार्थियों पर सर्वोच्च न्यायालय की टिप्पणी स्वागतयोग्य

बांग्ला देशी, रोहिंग्या और पाकिस्तान से आकर अवैध रूप से बसे लोगों को उनके देश वापस भेजने के किसी भी प्रस्ताव का विरोध घुसपैठियों से अधिक हमारे देश  के कतिपय राजनीतिक दलों द्वारा किया जाता है । ममता बैनर्जी तो घुसपैठियों को निकाल बाहर करने की बात उठते ही आग बबूला हो जाती हैं। गत दिवस  इस वर्ग को बिना नाम लिए लताड़ते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने श्रीलंका के एक नागरिक द्वारा  भारत में शरण दिये जाने की याचिका पर साफ शब्दों में कहा कि भारत कोई धर्मशाला नहीं है जो यहाँ हर किसी को शरण दे। इसके पूर्व  मद्रास उच्च न्यायालय ने 2018  उसे 7 वर्ष की सजा सुनाते हुए आदेश दिया था कि वह देश छोड़ दे। साथ ही ये टिप्पणी  की थी कि क्या भारत दुनिया भर से आये शरणार्थियों की आव - भगत करेगा। उक्त श्रीलंकाई ने सर्वोच्च न्यायालय में श्रीलंका जाने के आदेश के विरुद्ध प्रस्तुत  याचिका में कहा कि उसकी पत्नी और बच्चा भारत में है। चूंकि वह श्रीलंका में  लिट्टे नामक आतँकवादी संगठन से जुड़ा रहा इसलिए उसे वहाँ लौटते ही गिरफ्तार कर किया जाएगा? सर्वोच्च न्यायालय ने उसकी दलीलों को सिरे से खारिज करते हुए कह दिया कि वह दूसरे देश में चला जाए क्योंकि भारत में बसने का अधिकार केवल यहाँ के मूल निवासियों को है। उल्लेखनीय है रोहिंग्या शरणार्थियों को भारत से निकाले जाने के विरोध में प्रस्तुत याचिका पर भी न्यायालय ऐसी ही टिप्पणी कर चुका है। दुर्भाग्य से देश में एक वर्ग विशेष ऐसा है जो मानवीयता के नाम पर घुसपैठियों को वापस भेजने का विरोध करता आया है। जम्मू कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री फारुख अब्दुल्ला तो रोहिंग्या मुस्लिम शरणार्थियों को अपने राज्य के सीमावर्ती इलाकों से हटाये जाने का विरोध करने से भी बाज नहीं आये। आज स्थिति ये है कि बांग्लादेशी घुसपैठियों की संख्या करोड़ों में जा पहुंची है जो अवैध तरीकों से आधार कार्ड जैसी जरूरतों को पूरा करने के बाद सभी सरकारी सुविधाओं का लाभ ले रहे हैं। मुस्लिम तुष्टीकरण की राजनीति करने वाले नेता इनको संरक्षण प्रदान करते हैं जिससे बिहार, असम और प. बंगाल सहित देश के अनेक हिस्सों में जनसंख्या संतुलन गड़बड़ा चुका है और इन क्षेत्रों में सिवाय मुस्लिमों के दूसरा कोई चुनाव नहीं जीत सकता। इस कारण ये इलाके घुसपैठियों के आश्रय स्थल बन चुके हैं। नागरिकता संशोधन और राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर का देश के तमाम राजनीतिक दलों ने जिस प्रकार विरोध किया उसके पीछे दरअसल घुसपैठियों को संरक्षण देने की मानसिकता ही थी। गत माह पहलगाम में आतंकवादियों द्वारा किये गए नरसंहार के बाद जब भारत सरकार द्वारा सभी पाकिस्तानी नागरिकों को  देश छोड़ने का आदेश देते हुए उनके वीजा रद्द किये तब ये खुलासा हुआ कि लाखों महिलाएं और पुरुष भारत में वीजा समाप्त होने के बाद भी अवैध तरीके से रह रहे थे। हजारों महिलाओं  ने ये कहते हुए अपना दुखड़ा रोया कि उनके पति पाकिस्तान में हैं जबकि वे बच्चों सहित भारत में। इसी तरह कुछ पत्नियाँ भी पाकिस्तानी होने के बावजूद भारत में पति के साथ बसर कर रही थीं। सरकारी फरमान जारी होते ही मानवीयता के ठेकेदारों ने छाती पीटना शुरू कर दिया। लेकिन सर्वोच्च न्यायालय की ताजा टिप्पणियों ने सरकार के रुख को सही साबित कर दिया। भारत एक विशाल देश है जो अपने अतिथि सत्कार और मानवीय दृष्टिकोण के लिए जाना जाता है। विदेशी आक्रान्ताओं तक ने इस देश  में आकर अपनी जड़ें जमा लीं। इस्लाम और ईसाइयत दोनों ने विदेशी सत्ता के रूप में यहाँ पाँव जमाये जबकि पारसी यहाँ जान बचाकर आये। लेकिन आजादी के बाद भी पड़ोसी देशों से अवैध आवक होती रही। विशेष रूप से सीमावर्ती राज्यों में ये समस्या बढ़ती चली गई। 1970 में पूर्वी पाकिस्तान से शरणार्थियों के जत्थे आने शुरू हुए जिसके कारण युद्ध की स्थिति निर्मित हुई और बांग्लादेश के रूप में नया देश अस्तित्व में आया। 90 हजार पाकिस्तानी सैनिकों ने आत्म समर्पण किया जिनको शिमला समझौते के बाद वापस लौटा दिया गया किंतु 1 करोड़ से ज्यादा जो शरणार्थी आये उनमें से इक्का - दुक्का छोड़ वापस नहीं लौटा। इसके बाद श्रीलंका में चले गृहयुद्ध के दौरान हजारों तमिल भाषी श्रीलंकाई नागरिक समुद्री मार्ग से तमिलनाडु में आ गए जिन्हें  करुणानिधि जैसे नेताओं ने अवैध रूप से बसा लिया। म्यांमार से जब रोहिंग्या मुस्लिमों को खदेड़ा गया तब वे भी भागकर भारत में घुस आये। अब ये समस्या विकराल हो चुकी है। सर्वोच्च न्यायालय ने धर्मशाला शब्द का जो उपयोग किया वह पूरी तरह सही है। भारत सरकार को चाहिये वह इस बारे में कठोर होकर कार्रवाई करे। शरणार्थियों को मानवीय आधार पर पनाह देना अलग बात है किंतु वे यहाँ आकर मालिकाना हक जताने लगें ये देशहित में नहीं है। सर्वोच्च न्यायालय की टिप्पणी के परिप्रेक्ष्य में ये बात स्मरणीय है कि धर्मशाला में भी किसी को दो - चार दिन से अधिक ठहरने की अनुमति नहीं मिलती। अपने देश में तो शरणार्थी पीढ़ियों से बसे हुए हैं। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

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