पहलगाम में आतंकवादी हमले के बाद भारत ने ऑपरेशन सिंदूर के रूप में पाकिस्तान में आतंकवादियों के अनेक अड्डे ध्वस्त करने के अलावा सैन्य प्रतिष्ठानों पर मिसाइलें दागकर अपनी ताकत दिखा दी। उससे घबराकर पाकिस्तान ने युद्ध विराम का प्रस्ताव रखा जिसे मंजूर कर लिया गया क्योंकि पहलगाम हत्याकांड की सजा उसको मिल गई थी। उसके बाद केंद्र सरकार ने उसके आतंकवादी चेहरे को अनावृत करने के लिए कूटनीतिक घेराबंदी करने हेतु सांसदों के सर्वदलीय प्रतिनिधिमंडल विभिन्न देशों में भेजने का ऐलान किया । हालांकि पहलगाम हमले के बाद से ही कुछ राजनीतिक दलों ने सरकार विरोधी मोर्चा खोल दिया था और अभी तक उनकी कोशिशें जारी हैं। पाकिस्तान द्वारा भारत के लड़ाकू विमान गिराए जाने के दुष्प्रचार को सही मानते हुए कांग्रेस नेता राहुल गाँधी आरोप लगा रहे हैं कि पाकिस्तान ने हमारे अनेक रफाल लड़ाकू विमान मार गिराए । दरअसल इसके पीछे रफाल सौदे के विवाद को ताजा करने की मंशा है। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने भी ऑपरेशन सिंदूर को छिटपुट बताकर भारतीय सैन्य कौशल का अपमान किया। वहीं युद्धविराम के बारे में भी सेना और सरकार द्वारा प्रदत्त जानकारी पर संशय किया जाता रहा। इसके बाद भी सरकार ने जब सांसदों के प्रतिनिधिमण्डल विभिन्न देशों में भेजने का फैसला किया तब उसमें सभी प्रमुख दलों के सांसदों को शामिल किये जाने के साथ ही क्षेत्रीय संतुलन का भी ध्यान रखा । पहलगाम हमले के बाद पाकिस्तान पर कार्रवाई के लिए समूचे विपक्ष ने सरकार को समर्थन देकर जिस दायित्वबोध का परिचय दिया उसका सम्मान करते हुए इन प्रतिनिधिमंडलों को आकार दिया गया। लेकिन पहले कांग्रेस और फिर तृणमूल कांग्रेस ने विरोध के लिए विरोध करने की नीति अपनाई। कांग्रेस को आपत्ति है कि उसके द्वारा दिये नामों में शशि थरूर का नाम नहीं होने के बाद भी उनको एक प्रतिनिधिमंडल का नेता बनाया गया। इसी तरह तृणमूल कांग्रेस के सांसद क्रिकेटर युसुफ पठान को प्रतिनिधिमंडल में शामिल किया गया किंतु पार्टी के दबाव में उन्होंने इंकार कर दिया और उनकी जगह ममता बैनर्जी के भतीजे अभिषेक बैनर्जी को भेजा जा रहा है। सभी सात दलों में मुस्लिम सांसदों के अलावा गुलाम नबी आजाद , सलमान खुर्शीद , एम.जे.अकबर और आनंद शर्मा जैसे पूर्व सांसद भी हैं जिन्हें अनुभव के कारण चुना गया। ईसाई और सिख प्रतिनिधियों के होने से यह भारत की सर्व धर्म समभाव की नीति का प्रतिबिंब है वहीं राष्ट्रीय के साथ ही क्षेत्रीय दलों के सांसद होने से राष्ट्रीय एकता भी परिलक्षित होती है। असदुद्दीन ओवैसी के साथ मुस्लिम लीग के सदस्य को प्रतिनिधिमंडल में शामिल करना इस मिशन की पारदर्शिता का प्रतीक है। लेकिन कांग्रेस प्रवक्ता और राहुल गाँधी के बेहद करीबी जयराम रमेश इन प्रतिनिधिमंडलों को उन सवालों से ध्यान भटकाने का प्रयास बता रहे हैं जो श्री मोदी से पूछे जा रहे हैं। उधर उद्धव ठाकरे के खासमखास संजय राउत ने प्रतिनिधिमंडलों को बारात नाम देकर उन्हें भेजे जाने पर प्रश्न उठाया। लेकिन शरद पवार ने उनको लताड़ते हुए घटिया सोच से बचने की नसीहत देते हुए याद दिलाया कि शिवसेना ( उद्धव) की सांसद प्रियंका चतुर्वेदी भी प्रतिनिधिमंडल में शामिल की गई हैं। श्री पवार की बेटी सुप्रिया भी एक दल की नेता बनाई गईं हैं। वरिष्ट कांग्रेस नेता सलमान खुर्शीद ने ये कहते हुए कांग्रेस के लिए मुसीबत खड़ी कर दी कि जो युद्धविराम हुआ वह भारत और पाकिस्तान दोनों का आपसी फैसला था जिसमें किसी तीसरे के हस्तक्षेप की बात गलत है। मोदी सरकार के सबसे कटु आलोचक असदुद्दीन ओवैसी तथा उमर अब्दुल्ला सहित अन्य दलों ने भी राजनीतिक विरोध को राष्ट्रीय संकट के समय दरकिनार कर दिया किंतु कांग्रेस अपनी कुंठा से उबर नहीं पा रही जबकि ये मौका था जब पार्टी और राहुल दोनों अपनी छवि सुधार सकते थे। प्रतिनिधिमंडल में श्री थरूर के चयन पर नाराज होते समय कांग्रेस ये भूल गई कि वे विदेशी मामलों की संसदीय सलाहकार समिति के अध्यक्ष हैं। मोदी सरकार को मुस्लिम विरोधी बताने वाले अनेक मुस्लिम सांसद और नेताओं ने सहर्ष प्रतिनिधिमंडल का सदस्य बनना स्वीकार किया सिवाय युसुफ पठान के । भारत के इस कूटनीतिक दाँव से पाकिस्तान हतप्रभ है। उसके कुछ सांसद और राजनीतिक विश्लेषक ये कहते आ रहे हैं कि भारत में मोदी सरकार का बहुत विरोध है। इसके लिए वे अनेक नेताओं और व्यक्तियों के बयानों का हवाला देना नहीं भूलते किंतु इन सात प्रतिनिधिमंडलों के जरिये भारत सरकार ने उस पर जबरदस्त मनोवैज्ञानिक दबाव बना दिया। आम आदमी पार्टी और सीपीएम जैसे दलों के सांसद भी विदेश जा रही टीमों का हिस्सा हैं। रही बात किसी दल से पूछकर उसके सांसद का चयन की तो अटल जी को जिनेवा जाने वाले प्रतिनिधिमंडल का नेता बनाने से पहले स्व.पी.वी.नरसिम्हा राव ने क्या भाजपा से औपचारिक स्वीकृति ली थी?
- रवीन्द्र वाजपेयी
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