पाकिस्तान के हालात गंभीर हैं। बलूचिस्तान में विद्रोही सेना पर भारी पड़ रहे हैं। सिंध तो दशकों से अलगाव की मांग कर रहा है। लेकिन पश्चिमी सीमा पर खैबर पख्तूनवा इलाके में अलग देश के लिए संघर्ष नई समस्या है। विभाजन के समय स्व. खान अब्दुल गफ्फार खान ने पृथक पख्तूनिस्तान की मांग की थी । बलूचिस्तान ने भी अलग देश माँगा था किंतु ब्रिटिश सरकार ने दोनों मांगों को ठुकरा दिया। पाकिस्तान की सत्ता पर ज्यादातर पंजाब प्रांत के नेताओं का कब्जा रहा। सेना के उच्च पदों पर भी पंजाबी ही रहे। उस क्षेत्रीय असंतुलन की परिणिती बलूचिस्तान, खैबर पख्तूनवा और सिंध में बगावत के रूप में हो रही है। दरअसल पाकिस्तान ने 1971 में बांग्लादेश बनने से कोई सबक नहीं सीखा। इसलिए वह दोबारा खंडित होने के कगार पर है तो इसके लिए उसकी जन्मजात भारत विरोधी सोच ही जिम्मेदार है। बजाय विकास के उसने अनाप - शनाप धन भारत से लड़ने के लिए सेना पर खर्च किया। जब सीधे तौर पर नहीं जीत पाया तब आतंकवाद की शक्ल में छद्म युद्ध शुरू किया जो उसी के गले का फँदा बन गया क्योंकि जैसा सेना , सत्ताधीशों पर दबाव बनाती है वही आतंकवादियों के मुखिया करने लगे । पाकिस्तान के हुक्मरान जिस तरह सेना की अनुचित मांगों के सामने नत मस्तक रहा करते हैं वही स्थिति आतंकवादी संगठनों के नेताओं ने बना रखी है। उनको ठिकाने बनाने हेतु जगह देने के अलावा आर्थिक संसाधन भी उपलब्ध करवाये जाते हैं। सेना उनके लिए प्रशिक्षण और हथियारों की व्यवस्था कर उन्हें जम्मू - कश्मीर में गड़बड़ी फैलाने हेतु भेजती है। एक माह पूर्व पहलगाम में हुआ हमला ताजा उदाहरण है किंतु इसका जो करारा जवाब भारत ने दिया उसने पाकिस्तान की कमर तोड़कर रख दी। आर्थिक दृष्टि से कंगाली से गुजर रहे इस देश के सामने अपनी अखंडता की रक्षा करने की जो समस्या आ खड़ी हुई उसके लिए वह स्वयं दोषी है जो कभी अमेरिका और ब्रिटेन के उकसावे में भारत विरोधी नीतियों में उलझकर तबाह होता रहा और अब चीन उसे भारत से भिड़वा रहा है। इस देश का दुर्भाग्य ही है कि उसे उन्हीं हालातों से आज भी रूबरू होना पड़ रहा है जो मो. अली जिन्ना ने 1947 के पहले मुस्लिमों का अलग देश बनवाने उत्पन्न किये थे। लेकिन 25 साल पूरे होने के पहले ही पूर्वी पाकिस्तान नामक हिस्सा अलग होकर बांग्लादेश बन गया। वह शुरुआत में तो सही रास्ते पर चलता दिखा किंतु चार साल के भीतर ही उसके राष्ट्रपिता शेख मुजीब की हत्या कर सेना प्रमुख जिया उर रहमान ने सत्ता हथियाकर साबित कर दिया कि भारत विरोध का भाव इस देश के खून में भी समाया है। मुजीब को सत्ता में लाने में भारत का बड़ा हाथ था इसलिए वे हमारे साथ मधुर संबंधों के पक्षधर रहे किंतु सत्ता संभालते ही जिया ने पाकिस्तान जैसी भारत विरोधी मानसिकता को अपना लिया। धीरे - धीरे हिंदुओं पर अत्याचार होने लगे और उनके धर्मस्थलों को तोड़ने का सिलसिला चल पड़ा । हिंदुओं की जनसंख्या में लगातार कमी आना ये जताता है कि बांग्लादेश पाकिस्तान से होने के बाद भी हिन्दू विरोधी भावना से बाहर नहीं आ सका। मुजीब की बेटी शेख हसीना के शासन में हालांकि दोनों के बीच कूटनीतिक और आर्थिक संबंध सुधरने के अलावा अन्य विवादों का भी हल हुआ किंतु बीते साल वहाँ हसीना सरकार के विरुद्ध छात्र आंदोलन ने हिंसक रूप ले लिया जिसके कारण उनको देश छोड़कर भारत आना पड़ा और सेना की मदद से बनी अंतरिम सरकार का मुखिया अमेरिका में बैठे नोबल पुरस्कार से सम्मानित मो. युनुस को बना दिया गया जो वामपंथी सोच के माने जाते हैं। उनको जल्द चुनाव करवाकर नई सरकार को सत्ता सौंपना था किंतु वे चीन और पाकिस्तान के साथ मिलकर भारत को घेरने का षडयंत्र बनाने लगे। जिस पाकिस्तान के अत्याचार के कारण ये देश बना आज वह उसी के साथ खड़ा नजर आ रहा है। खबर तो यहाँ तक भी है कि दोनों को दोबारा एक करने के लिए चीन कोशिश में है। लेकिन भारत विरोधी मुहिम में युनुस असली समस्या से मुँह चुराते गए। इसकी वजह से अर्थव्यवस्था की तेज गति रुक गई। उत्पादन घटने से बेरोजगारी बढ़ने लगी और तब जिन छात्रों ने हसीना की सत्ता को उखाड़ फेंका वही युनुस के खिलाफ सड़कों पर उतर आये। उनके साथ ही सेना प्रमुख ने भी युनुस को धमकी दे दी कि वे दिसम्बर तक चुनाव करवाकर चुनी हुई सरकार के हवाले सत्ता कर दें। अन्यथा सेना उन्हें हटाकर खुद देश की कमान संभाल लेगी। सेनाध्यक्ष की चेतावनी के बाद युनुस ने त्यागपत्र की पेशकश की है। उधर बीएनपी नामक पार्टी भी चुनाव के लिए दबाव बना रही है। छात्र संगठन और सेना की दोहरी धमकी के बाद युनुस घिर गए हैं। जिन हालातों में उन्होंने सत्ता संभाली थी आज स्थिति उससे कई गुना खराब हो चुकी है। भारत ने जो प्रतिबन्ध बांग्लादेश पर लगाए उनसे जबरदस्त नुकसान हो रहा है किंतु उसके बाद भी युनुस का भारत विरोधी रवैया जारी है। ये देखते हुए लगता है यह देश भी पाकिस्तान की तरह से ही बर्बादी और बदहाली की ओर बढ़ता जा रहा है। बड़ी बात नहीं सेना युनुस को बेदखल करते हुए सत्ता पर काबिज हो जाए। ऐसी स्थिति में वहाँ पाकिस्तान जैसे ही गृहयुद्ध के आसार बने बिना नहीं रहेंगे। भारत को इससे सतर्क रहना होगा क्योंकि इसके कारण शरणार्थियों का सैलाब भारत आ सकता है।
- रवीन्द्र वाजपेयी
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