जम्मू कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने विधानसभा में पहलगाम की घटना पर भावुक होते हुए कहा कि मृतक पर्यटकों की सुरक्षित वापसी नहीं हो पाने के लिए वे खुद को भी जिम्मेदार मानते हैं। सिंधु नदी जल संधि निलंबित किये जाने का भी समर्थन किया। आजकल उमर और उनकी पार्टी पूर्ण राज्य के दर्जे जैसी माँग उठाने से परहेज कर रही है। पहलगाम की घटना से कोई वास्ता न होने की बात साबित करने के लिए घाटी में बंद भी रखा गया। पर्यटकों को आश्वस्त किया गया कि वे निडर होकर कश्मीर आएं उनकी सुरक्षा और सुविधा का पूरा ध्यान रखा जाएगा। पहलगाम हादसे के बाद इस तरह के समाचार भी प्रायोजित किये गए कि स्थानीय लोगों ने पर्यटकों की हरसंभव सहायता की। इस कथित सौजन्यता का कारण कश्मीर घाटी से पर्यटकों के लौटने के साथ ही आने वाले सैलानियों द्वारा बुकिंग रद्द करने से घाटी के होटल, हाउसबोट, टैक्सी, शिकारा, घोड़े - खच्चर वाले और गाइड अपनी रोजी - रोटी के लिए चिंतित हो उठे। उल्लेखनीय है धारा 370 हटाये जाने के बाद से पर्यटकों की संख्या में अकल्पनीय वृद्धि हुई जिससे वहाँ अर्थव्यवस्था को पंख लग गए। ऐसे में पहलगाम हत्याकांड से उनके व्यवसाय के चौपट होने का खतरा पैदा हो गया क्योंकि अपनी जान जोखिम में डालकर शायद ही कोई सैर - सपाटे पर आना चाहेगा। तुष्टीकरण करने वाले नेताओं और उनके प्रचारतंत्र ने कश्मीरियों की मेहमान नवाजी और इंसानी भावनाओं का जमकर ढिंढोरा पीटकर साबित करना चाहा कि आतंकवाद से आम कश्मीरी का कोई संबंध नहीं है। ये इसलिए किया गया क्योंकि पहलगाम में जिस जगह आतंकियों ने हत्याकांड किया वहाँ के कई निजी प्रतिष्ठान उस दिन बंद थे । घटना के फ़ौरन बाद खाद्य सामग्री बेचने वाले अनेक खोमचे वाले फरार हो गए। जाँच एजेंसियों का ध्यान भटकाने के लिए ये हवा उड़ाई गई कि आतंकवादी बाहर से आये और कश्मीरियों का उनसे कोई संबंध नहीं था। लेकिन हाल ही में राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री फ़ारुख अब्दुल्ला ने ये कहकर सनसनी फैला दी कि इतनी बड़ी आतंकवादी आतंकवादी घटना बिना स्थानीय सहयोग के संभव नहीं थी। उन्होंने कहा कि निश्चित रूप से आतंकवादी बाहर से आये किंतु उन्हें वहाँ तक ले जाने वाले स्थानीय लोग ही थे। इस बयान ने उन समस्त शिगूफेबाजों के मुँह बंद कर दिये जो कश्मीरियों को दूध का धुला साबित करने में दिन - रात एक किये हुए थे। फारुख के बयान पर तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए पूर्व मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती ने कहा कि डाॅ. अब्दुल्ला के बयान ने आम कश्मीरी को मुसीबत में डाल दिया है क्योंकि अब जांच एजेंसियां कश्मीर के नागरिकों को संदेह के नाम पर पकड़ेंगी। और उनकी बात सच भी निकली क्योंकि पहलगाम हत्याकांड के मुख्य आरोपियों को संरक्षण और सहयोग देने वाले संदेहास्पद तमाम लोगों को गिरफ्तार किया गया । महबूबा ने दोबारा फारुख के बयान का उल्लेख करते हुए कहा कि उनके बयान से देश के बाकी हिस्सों में कश्मीरी मुसीबत में आ गए। उन्होंने पहलगाम की आतंकी घटना में पाकिस्तान का हाथ होने के सवाल को ये कहते हुए घुमा दिया कि जाँच के चलते किसी को दोषी मान लेना गलत है। उक्त बातों से साबित हो जाता है कि घाटी के राजनीतिक नेता देश को गुमराह करने की परंपरा का ही निर्वहन कर रहे हैं। भले ही वे चुनाव प्रक्रिया का पालन करते हों किंतु भारत के प्रति उनकी निष्ठा जितनी पहले संदिग्ध रही उतनी ही आज भी है। काफी पहले दिया फारुख का वह बयान काफी चर्चित हुआ था कि धारा 370 नहीं हट सकती चाहे नरेंद्र मोदी 10 बार प्रधानमंत्री बन जाएं। महबूबा ने यहाँ तक धमकी दी थी कि 370 हटाये जाने की स्थिति में घाटी में कोई तिरंगा उठाने वाला नहीं मिलेगा। उमर ने भी मुख्यमंत्री बनते ही 370 की वापसी का मुद्दा उठाने की डींग हाँकी थी। आजादी के पहले से ही कश्मीर घाटी के नेताओं का दोगलापन सामने आता रहा किंतु उनकी हरकतों को जानते हुए भी उन्हें गले लगाने की मूर्खता की गई। धारा 370 जैसे अस्थायी प्रावधान को लगभग 70 साल तक क्यों ढोया गया जबकि उसकी वजह से देश की आंतरिक और बाह्य सुरक्षा के साथ ही राष्ट्रीय एकता के लिए भी बड़ा खतरा पैदा हो गया। यदि ये धारा न होती तब वहाँ अलगाववाद के बीज ही नहीं पनपते। अब्दुल्ला और मुफ्ती परिवार सत्ता की राजनीति के चलते भारत के प्रति दिखावटी नरमी भले ही दिखाता रहा किंतु इनके मन कभी भी साफ नहीं रहे। हालांकि मुख्यधारा की राष्ट्रीय राजनीति ने इन्हें सदैव जोड़ने का प्रयास किया किंतु इनकी तासीर नहीं बदली और भारत में रहकर भी ये पाकिस्तान की हिमायत करने से बाज नहीं आये। कश्मीर घाटी को हिन्दू विहीन कर वहाँ के लोगों में कश्मीरियत के नाम पर भारत से अलग पहिचान बनाने का भाव भरने में इन परिवारों की मुख्य भूमिका रही है और वही ये अब भी निभा रहे हैं। ये तो अच्छा है केन्द्र सरकार ने इनके घमंड को काफी हद तक तोड़ दिया। बेहतर है विपक्षी पार्टियां भी अब्दुल्ला और मुफ्ती नामक परिवारों को किनारे करें क्योंकि ये कश्मीर को समस्याग्रस्त बनाये रखकर ही अपनी अहमियत बनाये रखते हैं।
- रवीन्द्र वाजपेयी
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