मेरिका के पिछले राष्ट्रपति जो बाइडेन का मुख्य सलाहकार जॉर्ज सोरोस था जिनकी छवि तो सटोरिया, निवेशक और सामाजिक कार्यकर्ता क थी किंतु असलियत में वह एक षडयंत्रकारी था जिसकी रुचि विश्व राजनीति में हलचल पैदा करने में थी। चूंकि बाइडेन में वह क्षमता नहीं थी जो अमेरिका के राष्ट्रपति से अपेक्षित है इसलिए वे सोरोस के चंगुल में फंसते गए। यूक्रेन , गाजा और बांग्लादेश आज जिस हालात से गुजर रहे हैं उनके लिए बाइडेन को ही कसूरवार माना जाता है। लेकिन परदे के पीछे पूरा कुचक्र सोरोस ने ही रचा था। भारत के लोकसभा चुनाव को प्रभावित करने के लिए भी उसने व्यूहरचना की । हिंडनबर्ग नामक संस्थान द्वारा उद्योगपति गौतम अडानी के विरुद्ध रिपोर्ट प्रकाशित कर भारतीय शेयर बाजार को तहस - नहस करने का जाल बुना ताकि विदेशी निवेशक भारत से बिदकने लगें। लेकिन वह गुब्बारा फूट गया। बाइडेन के हटते ही हिंडनबर्ग ने बोरिया बिस्तर समेट लिया । नरेंद्र मोदी को सत्ता से हटाने के लिए बाइडेन और सोरोस ने काफी प्रयास किये लेकिन श्री मोदी तीसरी बार प्रधानमंत्री बन गए। अमेरिका के राष्ट्रपति चुनाव की शुरुआत में बाइडेन समर्थित कमला हैरिस मजबूत नजर आ रही थीं किंतु धीरे - धीरे डोनाल्ड ट्रम्प ने रफ्तार पकड़ी और अमेरिकी राष्ट्रवाद का मुद्दा उछालकर बाजी अपने पक्ष में कर ली। रोचक बात ये रही कि ट्रम्प के पक्ष में अमेरिका के चर्चित धनकुबेर एलन मस्क खुलकर खड़े हो गए। चुनाव जीतते ही अपनी प्रशासनिक जमावट के लिए ट्रम्प ने जिस तरह से मस्क को खुला हाथ दिया उसकी पूरी दुनिया में चर्चा होने लगी। महत्वपूर्ण नियुक्तियों में उनकी निर्णायक भूमिका रही। इसके कारण कहा जाने लगा कि जिस तरह बाइडेन को सोरोस ने अपने चंगुल में फंसा रखा था ठीक वैसे ही ट्रम्प पर मस्क का शिकंजा कस चुका है। जब अमेरिका ने विभिन्न देशों के साथ टैरिफ युद्ध शुरू किया तब उसे भी मस्क के दिमाग की उपज बताया गया। भारत में टेस्ला वाहनों के आयात पर कम शुल्क लगाए जाने के लिए ट्रम्प ने भारत पर जो दबाव बनाया उसके पीछे भी मस्क को उपकृत करना ही था। लेकिन धीरे - धीरे ट्रम्प ने जिस सनकीपने का प्रदर्शन किया उसकी वजह से पूरी दुनिया में वे हंसी का पात्र बनने लगे। युक्रेन - रूस का युद्ध रुकवाने के उनके दावे फुस्स हो गए। जब यूक्रेन के राष्ट्रपति जेलेंस्की मिलने गए तब ट्रम्प ने उनको अपमानित कर बाहर जाने कह दिया क्योंकि उन्होंने इकतरफा युद्धविराम करने से मना कर दिया। तब लगा था वे रूसी राष्ट्रपति पुतिन के साथ हैं किंतु हाल ही में उन्होंने उनके बारे में भी हल्की टिप्पणियां कर डालीं। चीन पर अनाप शनाप टैरिफ थोपने के बाद वे राष्ट्रपति जिनपिंग को दोस्त बताने लगे और चीन से समझौते में टैरिफ 145 से घटाकर 30 प्रतिशत पर ले आये। इसी तरह वे श्री मोदी से अपनी निकटता का ढोल पीटते हैं किंतु भारत पर भी बढ़े हुए टैरिफ थोपने की धौंस देने से बाज नहीं आते। हाल ही में भारत और पाकिस्तान के बीच हुए सैन्य टकराव में ट्रम्प ने जिस तरह का जोकरपना दिखाया उससे अमेरिका के राष्ट्रपति पद की गरिमा तार - तार हो गई। युद्धविराम करवाने का श्रेय लूटने के बारे में उन्होंने बदल - बदलकर जो बयान दिये उससे उनकी तो किरकिरी हुई ही अमेरिका की भी साख गिरी। अपने पड़ोसी कैनेडा को वे अमेरिका का राज्य बनने धमका रहे हैं। ग्रीनलैंड हथियाने के उनके इरादे से पूरा यूरोप दहशत में है। दरअसल विश्व की अर्थव्यवस्था को हिलाने के फेर में वे अपने देश की माली हालत खराब कर रहे हैं। एपल फोन बनाने वाली कंपनी को भारत के बजाय अमेरिका में उत्पादन करने की सलाह के साथ वे धमकी दे बैठे कि भारत में बने फोन पर अमेरिका 25 फीसदी अतिरिक्त शुल्क लगा देगा। दक्षिण अफ्रीका के राष्ट्रपति को व्हाइट हाउस बुलाकर उनके साथ जो व्यवहार ट्रम्प ने किया वह राजनायिक शिष्टाचार का तो खुला उल्लंघन था ही , मेजबानी के लिहाज से भी बेहूदगी थी। इन हरकतों से पूरी दुनिया में उनकी थू - थू होने के साथ ही अमेरिका की छवि को भी क्षति पहुंची है। उसके परंपरागत मित्र भी किनारा करते जा रहे हैं। यूरोप ने अपनी सैन्य और आर्थिक सुरक्षा के लिए अमेरिका पर अपनी निर्भरता खत्म करने के लिए कदम बढ़ा दिये हैं। अब ताजा खबर ये है कि एलन मस्क ने भी ट्रम्प का साथ छोड़ने का ऐलान कर दिया है। वे उनके नीतिगत निर्णयों से असहज अनुभव करने लगे हैं। ऐसा लगता है ज्यादा होशियारी दिखाने के फेर में ट्रम्प मूर्खता पर मूर्खता करते गए जिनकी वजह से अमेरिका दुनिया में अलग - थलग पड़ता जा रहा है। घरेलू मोर्चे पर भी वे लगातार आलोचनाओं का शिकार हो रहे हैं। उनकी सनक हार्वर्ड जैसे विश्वविद्यालय पर भी भारी पड़ रही है। वीजा नीतियों के कारण अमेरिका में रह रहे प्रवासियों की धड़कनें तेज हैं। भले ही वे दावा करें कि उनकी आर्थिक नीतियाँ और कूटनीतिक निर्णय अमेरिका और उसकी जनता के हित में हैं किंतु उनका दुष्परिणाम दुनिया के इस चौधरी की चौधराहट खत्म होने के रूप में सामने आ रहा है।
- रवीन्द्र वाजपेयी
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