Thursday, 31 July 2025

ट्रम्प अमेरिका के राष्ट्रपति हैं दुनिया के मालिक नहीं



भारत के साथ व्यापार समझौते के लिए बातचीत अभी किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुंची लेकिन अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने 1 अगस्त से भारत पर 25 प्रतिशत आयात शुल्क ( टैरिफ) थोप दिया। इसके साथ ही ये धमकी भी दे डाली कि रूस से कच्चा तेल खऱीदने के कारण अर्थ दंड भी लगाया जाएगा। स्मरणीय है अमेरिकी दल 25 अगस्त को व्यापार समझौते  पर बात करने भारत आने वाला है। इकतरफा 25 फीसदी आयात शुल्क लगाने और रूस के साथ व्यापार पर अर्थ दंड लगाने की चेतावनी के बाद ट्रम्प का ये बयान भी आ गया कि  समझौते  के बाद शुल्क घटाया भी जा सकता है। जैसी चर्चा है उसके अनुसार  इस समझौते  में कृषि और डेरी उत्पादों के अलावा ऐसी ही अन्य वस्तुओं को न्यूनतम आयात शुल्क पर भारत के बाजारों में बेचने की अमेरिकी जिद आड़े आ रही है। भारत  सरकार यह स्पष्ट कर चुकी है कि वह अपने कृषि सेक्टर को नुकसान पहुंचाने वाले किसी भी प्रावधान को मंजूर नहीं करेगी। अमेरिका चाहता है उसकी खाद्य सामग्री पर लगी बंदिशें भी भारत में हटें। लेकिन कुल मिलाकर उसकी नाराजगी रूस से कच्चे तेल और उससे भी ज्यादा रक्षा सौदे करने पर है। दूसरी बार सत्ता में आने के बाद ट्रम्प भारत के साथ जो व्यवहार कर रहे हैं उससे कहीं भी नहीं लगता कि वे मित्र हैं। हालांकि आयात शुल्क बढ़ाने के बावजूद वे भारत को अपना दोस्त बताने का दिखावा करने से बाज नहीं आते। सत्ता में वापसी के बाद वे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से निकटता का इजहार करने के साथ ही ये भी कहते रहे कि वे बहुत कड़ी सौदेबाजी करते हैं। अभी दोनों देशों के बीच आपसी व्यापार की जो स्थिति है उसके अनुसार  अमेरिका घाटे में है क्योंकि भारत में आयात होने वाली वस्तुओं पर ज्यादा शुल्क है जबकि भारत से  अमेरिका द्वारा किये जाने वाले आयात पर काफी कम टैरिफ है। विश्व व्यापार संगठन में विकासशील देशों को इस तरह की सुविधा दी गई थी किंतु उस संगठन के जरिये समूची दुनिया को एक बाजार बनाने में अग्रणी अमेरिका अब खुद ही उन प्रावधानों से दूर भाग रहा है। इसका कारण ये है कि उसने कभी सोचा नहीं था कि भारत के साथ व्यापार संतुलन में उसका पलड़ा कमजोर पड़ने लगेगा। हालांकि ट्रम्प  अपने देश के आर्थिक हितों की सुरक्षा कर रहे हैं तो उसमें कुछ भी गलत नहीं है किंतु  उनका तरीका बेहूदा है । कोई देश आयात शुल्क की दरें कितनी रखे ये उसका अधिकार है। दो देशों के बीच व्यापार समझौते में भी द्विपक्षीय हितों का ध्यान रखा जाता है। अमेरिका के साथ भारत का व्यापार जिन शर्तों पर चला आ रहा था उनमें समयानुकूल संशोधन  होना वाजिब है और यदि दोनों में से किसी को नुकसान है तो वह दूसरे पक्ष से उसे कम करने पर बातचीत कर सकता है। लेकिन ट्रम्प जिस प्रकार से अपनी मर्जी थोपना चाहते हैं वह आज की दुनिया के हिसाब से स्वीकार्य नहीं है। वे भारत को इस बात के लिए आखिर कैसे बाध्य कर सकते हैं कि वह रूस या अन्य किसी ऐसे देश के साथ व्यापार न करे जिसे वे पसंद न करते हों। अमेरिका ने कश्मीर विवाद में सदैव पाकिस्तान का साथ दिया। बावजूद उसके भारत ने उसके साथ कूटनीतिक और व्यापारिक रिश्ते जारी रखे। अमेरिका में रह रहे लाखों भारतवंशी वहाँ के राजनीतिक, आर्थिक, वैज्ञानिक और सामाजिक परिदृश्य को प्रभावित करते हैं। ट्रम्प की जीत में भी भारतीय मूल के मतदाताओं का बड़ा योगदान है। और फिर ये सत्तर के दशक वाला भारत नहीं है जो अमेरिका के दोयम दर्जे के गेंहू पर निर्भर था। आज भारत अनाज से लेकर मिसाइलें तक निर्यात कर रहा है। दुनिया के सभी ताकतवर देशों से हमारे अच्छे रिश्ते हैं। जितने भी महत्वपूर्ण वैश्विक संगठन हैं उनमें भारत को आमंत्रित किया जाता है। हमारी अर्थव्यवस्था सबसे तेज गति से बढ़ रही है। तीसरी दुनिया के तमाम देश भारत से सहायता ले रहे हैं। ऐसे में यदि ट्रम्प सोचते हैं कि भारत को झुका लेंगे तो वे मुगालते में हैं। व्यापार समझौता होगा या नहीं और होगा तो उसकी शर्तें क्या होंगी ये आज कहना कठिन है किंतु ट्रम्प जैसा चाहते हैं वैसा होना मुश्किल है क्योंकि प्रधानमंत्री श्री मोदी भी परिस्थिति का आकलन कर रहे होंगे और सौदेबाजी में काफी पारंगत हैं। उनके हालिया विदेशी दौरों से जो संकेत मिले हैं उनके अनुसार भारत भी अमेरिका पर दबाव बनाने की रणनीति पर आगे बढ़ रहा है। ट्रम्प भले ही अमेरिका के राष्ट्रपति हों किंतु दुनिया के मालिक नहीं हैं। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Wednesday, 30 July 2025

विपक्ष अपनी गलतियों से सीख नहीं ले रहा


लोकसभा में ऑपरेशन सिंदूर पर 16 घंटे की बहस गत दिवस प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के 100 मिनट लंबे जवाब के बाद खत्म हो गई । विपक्ष ने पहलगाम में हुए आतंकवादी हमले और ऑपरेशन सिंदूर के बाद सरकार पर किये गए हमलों को ही दोहराया जबकि सत्ता पक्ष ने विपक्ष के आरोपों का सिलसिलेवार जवाब देकर हिसाब चुकता किया। लेकिन उस दौरान सत्ता पक्ष की ओर से किये गए पलटवार ने मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस को ही कटघरे में खड़ा कर दिया। भले ही नेता प्रतिपक्ष राहुल गाँधी गुस्से में टेबल पर हाथ पटकते दिखे किंतु उन्होंने और उनकी बहन प्रियंका वाड्रा सहित पार्टी के अन्य सांसदों द्वारा सरकार पर छोड़े गए तीर लौटकर उन्हीं पर गिरे। मसलन ऑपरेशन सिंदूर के दौरान जब पाकिस्तान के हौसले पस्त हो चुके थे तब युद्धविराम क्यों किया गया और पाक अधिकृत कश्मीर को हासिल करने का प्रयास क्यों नहीं हुआ , जैसे सवालों पर सरकार की ओर से स्पष्ट कर दिया गया कि इस सैन्य अभियान का उद्देश्य पहलगाम की घटना के बाद आतंकवादियों की कमर तोड़ना था और हमारी सेना ने यह लक्ष्य कुछ ही मिनटों में हासिल करते हुए पाकिस्तान  स्थित आतंकवादियों के अनेक अड्डों को तबाह कर दिया। असैनिक प्रतिष्ठानों को भारत ने किसी भी प्रकार  से निशाना नहीं बनाया। जहाँ तक बात पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर के हिस्से पर हमला कर उसे हासिल करने की है तो कांग्रेस नेताओं से जब ये सवाल पूछा गया कि 1971 में बांग्लादेश बनने के बाद हमारे कब्जे में आये 90 हजार से ज्यादा पाकिस्तानी युद्धबंदियों को छोड़ने के एवज में  शिमला समझौते में स्व. इंदिरा गाँधी ने पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर के हिस्से को वापस लेने का दबाव क्यों नहीं बनाया तब उनके पास सिवाय बगलें झांकने के और कोई विकल्प नहीं था। राहुल गाँधी लगातार ये आरोप दोहरा रहे हैं कि आपरेशन सिंदूर को अचानक  रोककर जो युद्धविराम किया गया वह अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के दबाव में हुआ। चूंकि ट्रम्प आये दिन ये दावा करते हैं कि युद्धविराम उनके प्रयासों से हुआ इसलिए श्री गाँधी को  आरोप दोहराने का अवसर मिलता रहा। यद्यपि सरकार ने आधिकारिक तौर पर इसका खंडन किया किंतु विपक्ष संतुष्ट नहीं हुआ और प्रधानमंत्री से लगातार स्पष्टीकरण की मांग कर रहा था। लोकसभा में उनसे पहले विदेश मंत्री एस. जयशंकर हालांकि साफ कर चुके थे कि युद्धविराम किसी भी देश के दबाव या मध्यस्थता से नहीं हुआ किंतु गत दिवस श्री मोदी ने इस बारे में स्थिति पूरी तरह स्पष्ट करते हुए कहा कि भारतीय सेनाओं के प्रहार से घबराकर पाकिस्तान की ओर से भारतीय सैन्य अधिकारी को फोन पर हमले रोकने की गुहार लगाई गई। चूंकि हमारी सेना ने अपने लक्ष्य हासिल कर लिए थे इसलिए जंग रोकने का निर्णय लिया गया। इस बारे में सरकार पहले भी बता चुकी थी । सवाल ये है कि विपक्ष ने ऐसा कौन सा मुद्दा उठाया जिसमें कुछ भी नया हो। लेकिन सत्ता पक्ष ने अपने पुराने जवाबों को ज्यादा मुस्तैदी  से सदन में रखने के साथ ही कांग्रेस शासन में देश की जमीन पाकिस्तान, चीन और श्रीलंका को सौंपे जाने की जानकारी दी तब कांग्रेस का कोई नेता उसका खंडन नहीं कर सका। इस प्रकार महीनों से पहलगाम हमले और ऑपरेशन सिंदूर को लेकर नकारात्मक वातावरण बना रही कांग्रेस को खुद रक्षात्मक होना पड़ा। पहलगाम हमले के कसूरवार आतंकवादियों को सुरक्षा बलों द्वारा मार गिराए जाने की खबर ने भी विपक्ष के हौसले ठंडे कर दिये। आज राज्यसभा में भी चर्चा हो रही है। वहाँ भी विपक्ष के हाथ कुछ नहीं लगने वाला। इसका कारण मुद्दों का गलत चयन है। ये देश सेना के पराक्रम पर  संदेह करने वालों को पसंद नहीं करता। पुलवामा हमले के बाद की गई सर्जिकल स्ट्राइक का सबूत मांगने वालों को जनता ने धूल चटा दी थी। लेकिन उससे सबक नहीं लिया गया। इसी तरह रफैल विमानों की खरीद पर सवाल उठाने का खामियाजा भी श्री गाँधी भुगत चुके हैं। आश्चर्य की बात है विपक्ष अपनी गलतियों से कोई सीख नहीं ले रहा जिससे भाजपा को मज़बूती मिल रही है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Tuesday, 29 July 2025

चिदंबरम का बयान पाकिस्तान को बेगुनाही का प्रमाणपत्र

 

लोकसभा में  गत दिवस ऑपरेशन सिंदूर पर चर्चा प्रारंभ होने के पहले वरिष्ट कांग्रेस नेता पी. चिदंबरम के बयान ने कांग्रेस के लिए मुसीबत खड़ी कर दी।  पिछले दिनों एक न्यूज पोर्टल  से बातचीत में उन्होंने पहलगाम हमले को लेकर कहा  कि सरकार यह बताने को तैयार नहीं हैं कि पिछले कुछ हफ्तों में एनआईए ने क्या किया? क्या उन्होंने आंतकियों की पहचान कर ली है, वे कहां से आए थे, क्या पता वो देश के भीतर ही तैयार किए गए होम ग्रोन आतंकी हों।आपने क्यों यह मान लिया वो पाकिस्तान से आए थे, इसका कोई सबूत नहीं है। उल्लेखनीय है श्री चिदंबरम देश के पूर्व गृह मंत्री होने के साथ ही सर्वोच्च न्यायालय के वरिष्ट अधिवक्ता भी हैं। उनके उक्त बयान से पाकिस्तान को क्लीन चिट मिल गई । स्मरणीय है पहलगाम में हुए आतंकवादी हमले के बाद भारत ने आरोप लगाया था कि उसमें पाकिस्तान  का हाथ था और वारदात को अंजाम देने वाले आतंकवादी वहीं से आये थे। ऑपरेशन सिंदूर का आधार ही यही था।  पहलगाम की घटना के बाद जब केन्द्र सरकार ने सर्वदलीय बैठक बुलाकर विपक्षी नेताओं को जानकारी दी तब सभी ने सरकार को पूरी छूट देते हुए किसी भी कार्रवाई के साथ खड़े रहने की प्रतिबद्धता व्यक्त कर दुनिया को भारत की एकता का संदेश दिया। उस बैठक में हालांकि पहलगाम में सुरक्षा प्रबंधों की कमी का मुद्दा तो उठा किंतु किसी ने भी आतंकवादियों की पहिचान का सवाल नहीं उठाया। पाकिस्तान पर  ऑपरेशन सिंदूर नामक सैन्य कार्रवाई का भी पूरे देश ने समर्थन किया। भारत ने सं. रा. संघ सहित सभी वैश्विक मंचों पर पहलगाम हमले के लिए पाकिस्तान को जिम्मेदार ठहराते हुए आरोप लगाया था कि उस हत्याकांड को अंजाम देने वाले वहीं से आये थे। एक आतँकवादी संगठन टी.आर.एफ ( द रेजिस्टेंस फ्रंट ) ने इसकी जिम्मेदारी भी ली जिसे लश्कर ए तैयबा का संरक्षण बताया जाता है। हाल ही में अमेरिका ने भी इसे प्रतिबंधित किया है। इसी के बाद भारत सरकार ने पाकिस्तान स्थित आतंकवादियों के अड्डे और प्रशिक्षण केंद्र नष्ट करने के लिए ऑपरेशन सिंदूर  शुरू करते हुए आतंकवादियों के ठिकानों पर मिसाइलें दागकर उन्हें जमींदोज किया गया । बड़ी संख्या में आतँकवादी और उनके परिवार के सदस्य मारे गए।  कुल चार दिनों तक चले इस सैन्य अभियान ने पूरे विश्व में भारतीय सेना के रण कौशल और तकनीकी श्रेष्ठता का डंका पीट दिया। लेकिन उसके बाद से ही विपक्ष लगातार ऐसे सवाल उठा रहा है जिनसे पाकिस्तान खुद को निर्दोष साबित कर सके। श्री चिदंबरम का ताजा बयान उसी की कड़ी है। उनके ये कहने से  कि पहलगाम में आतंकी हमला करने वाले पाकिस्तान से आये इसका कोई सबूत नहीं है और ये हो सकता है वे देश में ही तैयार किये गए आतंकी हों, ऐसा प्रतीत होता है मानो वे पाकिस्तान के वकील की हैसियत से किसी अदालत में जिरह कर रहे हों। भाजपा द्वारा उनके बयान पर जो आपत्ति की जा रही है उसे राजनीतिक पैंतरा मानकर दरकिनार कर भी दें किंतु जिस आरोप को कारण बताकर भारत ने पाकिस्तान के विरुद्ध ऑपरेशन सिंदूर किया गया, उसी पर संदेह व्यक्त कर श्री चिदंबरम ने शत्रु राष्ट्र को बचाव का अवसर दे दिया। अब वे कितना भी कहें कि उनकी बात का गलत अर्थ निकाला गया किंतु जुबान से निकले शब्द उस तीर की तरह होते हैं जो वापस नहीं आते। हो सकता है कांग्रेस उनके इस बयान को उनकी निजी राय बताकर पिंड छुड़ा ले किंतु पहलगाम हमले और उसके बाद ऑपरेशन सिंदूर को लेकर विपक्ष , विशेष तौर पर कांग्रेस के नेता जिस तरह के बयान दे रहे हैं उनसे उनकी छवि तो खराब हो ही रही है लेकिन उससे बड़ा नुकसान ये है कि पाकिस्तान को बेगुनाही का प्रमाणपत्र मिल रहा है। राजनीतिक नफे - नुकसान अपनी जगह है। विपक्ष का सरकार को घेरना भी लोकतंत्र में अस्वाभाविक नहीं है। गत दिवस लोकसभा में कांग्रेस के कुछ युवा सांसदों ने भी ऑपरेशन सिंदूर के बारे में  गैर जिम्मेदाराना बातें कहीं किंतु श्री चिदंबरम के सुदीर्घ राजनीतिक अनुभव को देखते हुए उनसे ऐसे बयान की अपेक्षा नहीं की जाती जिससे शत्रु देश को अपना बचाव करने का मौका मिल जाए।  वे संसद के उच्च सदन के वरिष्ट सदस्य भी  हैं । बेहतर होगा वहाँ वे अपनी भूल सुधारते हुए दायित्वबोध का परिचय दें क्योंकि पहलगाम में हुआ आतंकी हमला समूचे  देश पर था जिससे वे अलग नहीं हैं। और ऑपरेशन सिंदूर हमारे पुश्तैनी दुश्मन की कमर तोड़ने के लिए उठाया गया कदम था जिसकी सफलता पर संदेह करना सेना के मनोबल को गिराने का कारण बने बिना नहीं रहेगा। हमारे देश में सरकार  किसी की भी रही हो किंतु जब- जब  देश की सुरक्षा और सम्मान पर संकट उत्पन्न हुआ तब - तब सत्ता और विपक्ष  एक ही स्वर में बोले । चाहे पराजय मिली हो या विजय लेकिन सेना के शौर्य पर कभी शंका व्यक्त नहीं की  गयी । लेकिन अब राजनीति , राष्ट्रनीति पर भारी पड़ती लग रही है जो कि अच्छा संकेत नहीं हैं।


- रवीन्द्र वाजपेयी

Monday, 28 July 2025

आस्था के साथ अनुशासन का पालन भी जरूरी

गत दिवस हरिद्वार के प्रसिद्ध मनसा देवी मंदिर में हुई   भगदड़ में आधा दर्जन से अधिक श्रद्धालुओं की मृत्यु हो गई। हादसे के कारणों को लेकर तरह - तरह की बातें सामने आ रहीं हैं। जिला प्रशासन कुछ कह रहा है जबकि घटना के चश्मदीदों का कहना है कि बिजली के तारों में करंट आने के कारण भगदड़ की स्थिति बनी। सच्चाई तो जाँच के बाद भी सामने नहीं आयेगी क्योंकि जिन पर इसका दायित्व रहेगा वे उसी व्यवस्था के हिस्से होते हैं जिसकी लापरवाही ऐसी दुर्घटनाओं का कारण बनती है। त्यौहारों के अवसर पर प्रसिद्ध धार्मिक स्थलों पर श्रद्धालुओं की भीड़ निरंतर बढ़ते जाने से इंतजाम या तो कम पड़ जाते हैं या फिर गड़बड़ा जाते हैं। ऐसी घटनाएं तेजी से बढ़ने से ये सवाल उठने लगा है कि क्या इनको रोकने का कोई तरीका है या नहीं? हर घटना के बाद शासन - प्रशासन अपनी चिरपरिचित कार्यशैली का परिचय देता है। मरने वालों के परिजनों को मुआवजा और घायलों के  इलाज सहित सहायता राशि का कर्मकांड  कर फुर्सत पा ली जाती है। लेकिन हादसों की पुनरावृत्ति न हो इस दिशा में शायद ही कोई प्रयास किया जाता है। कुछ समय पूर्व बागेश्वर धाम में भी गुरु पूर्णिमा के अवसर पर कुछ श्रद्धालुओं की मौत हुई। सीहोर जिले में एक धार्मिक आयोजन में रुद्राक्ष वितरण में हुई धक्का - मुक्की में अनेक लोग मारे गए थे। देश के जितने भी प्रसिद्ध धर्मस्थल हैं वहाँ आस्था का अतिरेक जानलेवा दुर्घटनाओं का कारण बनता जा रहा है। सही बात ये है कि धार्मिक आयोजन अब ईवेंट और तीर्थ यात्राएं पर्यटन में बदल गईं हैं। मनसा देवी का मंदिर हरिद्वार में एक पहाड़ी पर स्थित है। पहले श्रद्धालुओं को पैदल चढ़कर वहाँ जाना होता था किंतु अब रोप वे की सुविधा उपलब्ध होने से ऊपर जाना आसान हो गया जिससे वहाँ क्षमता से अधिक श्रद्धालुओं का जमावड़ा होने है। त्यौहारों पर भीड़ और भी बढ़ जाती है किंतु स्थानीय प्रशासन तदनुसार व्यवस्थाएं नहीं कर पाता जिससे  धक्का - मुक्की और भगदड़ जैसी घटनाएं हो जाती हैं। मंदिर का प्रबंध देखने वालों की रुचि श्रद्धालुओं से मिलने वाले चढ़ावे में ही ज्यादा होती है किंतु भीड़ के लिहाज से समुचित व्यवस्थाएं करने के प्रति वे उदासीन बने रहते हैं जिसका दुष्परिणाम जानलेवा दुर्घटनाओं के रूप में देखने मिलता है। बीते कुछ दशकों में धर्मस्थलों को जिस तरह से पर्यटन केंद्र का रूप दिया गया उसके कारण वहाँ आने वालों  का उद्देश्य केवल श्रद्धा - भक्ति नहीं रह गया है। अवकाश वाले दिन वृंदावन में दिल्ली सहित निकटवर्ती शहरों से  हजारों वाहन आ जाते हैं। इस कारण  यातायात की समस्या उत्पन्न हो जाती है। बांके बिहारी मंदिर जैसे आस्था केंद्र में दर्शनार्थियों की भीड़ के अनियंत्रित होने की घटना आम हो चली है। इस स्थिति के लिए शासन - प्रशासन और धर्म स्थल के प्रबंधन तो जिम्मेदार हैं ही किंतु जो श्रद्धालु भीड़ के हिस्से बनते हैं उनका दोष भी कम नहीं है। स्थान और व्यवस्थाएं कम होने के बावजूद भी जो लोग भीड़ में घुसने का दुस्साहस करते हैं वे खुद तो खतरे में पड़ते ही हैं , वहाँ उपस्थित अन्य लोगों की जान भी जोखिम में डाल देते हैं । सावन के महीने में जहाँ - जहाँ  ज्योतिर्लिंग हैं, वहाँ बड़ी संख्या में शिवभक्त जमा होते हैं। विशेष रूप से सोमवार को जनसैलाब उमड़ता है। जनसंख्या में वृद्धि के अलावा आवागमन के बढ़ते साधन और मध्यमवर्ग में सैर - सपाटे की बढती रुचि से धर्मस्थलों की भीड़ जिस प्रकार नये कीर्तिमान बना रही है उसके कारण स्थानीय  लोग तो अच्छी कमाई कर लेते हैं लेकिन व्यवस्थाएं कम पड़ने से दुर्घटनाओं की आशंका बढ़ती जा रही है। ये देखते हुए जो लोग इन स्थानों पर जाते हैं उन्हें इस बात के प्रति सजग रहना चाहिए कि वे अपनी और दूसरों की जान खतरे में न डालें। आस्था का अपना महत्व है किंतु उनके साथ अनुशासन का पालन न हो तो वह हादसों का कारण बन जाता है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी


Saturday, 26 July 2025

मोदी के झटके से मालदीव की अक्ल ठिकाने आ गई

ब्रिटेन के साथ मुक्त व्यापार संधि करने के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी हिंद महासागर में स्थित मालदीव जा पहुंचे। दुनिया के इस सबसे छोटे मुस्लिम देश की मुख्य आय का स्रोत पर्यटन है जिसमें भारत की हिस्सेदारी बेहद महत्वपूर्ण है। भारत के साथ इसके रिश्ते हमेशा से आत्मीयतापूर्ण रहे। यहाँ तक कि इसकी रक्षा के लिए भारतीय नौसेना और वायुसेना की टुकड़ियां भी तैनात रहीं। 1988 में श्रीलंका में सक्रिय लिट्टे नामक आतंकवादी संगठन ने मालदीव में सत्ता परिवर्तन हेतु हमला किया जिसमें वहीं के अब्दुल्ला लुत्फी नामक विद्रोही का हाथ था किंतु भारत के सैन्य हस्तक्षेप ने उस षडयंत्र को विफल कर दिया जिसके बाद दोनों देशों के रिश्ते काफी मधुर बने रहे। लेकिन बीते कुछ वर्षों में चीन ने श्री लंका की तरह से ही मालदीव में भी अपना प्रभाव बढ़ाते हुए भारत विरोधी भावना को भड़काया और उसमें उसका मोहरा बने राष्ट्रपति उम्मीदवार  मोहम्मद मुइज्जू । 2023 में हुए चुनाव में मुइज्जू ने भारत विरोधी अभियान चलाकर चुनाव जीत लिया और गद्दी संभालते ही इंडिया आउट के नारे को अमली जामा पहिनाते हुए भारत से जुड़ी हर चीज का विरोध शुरू कर दिया। यहाँ तक कि भारतीय वायुसेना के जो हेलीकाप्टर बचाव कार्यों के लिए दिये गए  थे उनके पायलटों तक को देश छोड़ने मजबूर कर दिया। उन पर भारत विरोध का भूत इस बुरी तरह सवार था कि वे तत्काल चीन जा पहुंचे जिसने उन्हें हरसंभव सहायता देने का भरोसा तो दे दिया किंतु दोनों के बीच भौगोलिक  दूरी काफी होने से व्यवहारिक परेशानियां आने लगीं। मुइज्जू सरकार का चीन के पाले में खड़े होना मोदी सरकार की कूटनीतिक विफलता मानी गई । इस बात की आशंका भी पैदा हो गई कि चीन मालदीव में अपना सैन्य  अड्डा बनाकर भारत की सुरक्षा के लिए खतरा बनेगा। लेकिन प्रधानमंत्री ने बिना कोई प्रतिक्रिया व्यक्त किये जनवरी 2024 में लक्षद्वीप की यात्रा की और समुद्र तट पर बैठकर वहाँ के नैसर्गिक सौंदर्य की तारीफ करते हुए भारतीय पर्यटकों से लक्षद्वीप आने का आह्वान कर दिया। उस  दांव का चमत्कारिक असर हुआ। भारतीय पर्यटकों ने धड़ाधड़ मालदीव की यात्रा रद्द कर दी। इसके अलावा भारतीय पर्यटन उद्योग ने लक्षद्वीप में मूलभूत संरचना के विकास में निवेश शुरू कर दिया। मालदीव की अर्थव्यवस्था इस छोटे से झटके से लड़खड़ा गई। वहाँ की पर्यटन एजेंसियां भारत सरकार से गुहार लगाने लगीं। दूसरी तरफ मुइज्जू जिस चीन के दम पर भारत को अकड़ दिखा रहे थे वह भी  उसकी  मदद नहीं कर सका। इससे मालदीव की अक्ल ठिकाने आने लगी और तब मुइज्जू ने भारत के साथ रिश्ते सुधारने के लिए हाथ - पाँव मारे और अक्टूबर 2024 में भारत यात्रा पर आये। हालांकि उनके देश के मुस्लिम कट्टरपंथी इसे बर्दाश्त नहीं कर पा रहे। बीच में पाकिस्तान ने भी मालदीव में अपने पैर जमाने की कोशिश की किंतु अपनी आंतरिक समस्या में उलझे होने से वह सफल नहीं हो सका। भारत ने इसका लाभ उठाया जिसका सुपरिणाम प्रधानमंत्री श्री मोदी की दो दिवसीय यात्रा है। वे मालदीव के 60 वें राष्ट्रीय दिवस पर बतौर मुख्य अतिथि वहाँ गए हैं। मालदीव के सुरक्षा मंत्रालय के भवन का शुभारंभ उनके हाथों से होना बड़ा कूटनीतिक संकेत है। प्रधानमंत्री ने मालदीव को बड़ी आर्थिक सहायता की घोषणा के साथ ही उसके विकास के लिए अनेक समझौते किये। इस यात्रा की सबसे बड़ी बात राष्ट्रपति मुइज्जू द्वारा भारत और श्री मोदी के प्रति आभार जताते हुए तारीफ के पुल बांधना है। इंडिया आउट के नारे के बल पर सत्ता में आये मुइज्जू को जल्द ही समझ आ गया कि बिना भारत के उनकी गाड़ी नहीं चलने वाली। एक समय ऐसा भी आया जब उनके पास 45 दिनों तक के लिए   विदेशी मुद्रा बची थी। हालांकि वे चीन और टर्की दोनों का दौरा कर आये किंतु अंततः भारत ने ही हाथ आगे बढ़ाया। उसी के बाद उनका झुकाव भारत की तरफ हुआ। उनकी  सरकार बनने के बाद  प्रधानमंत्री श्री मोदी पहले विदेशी नेता हैं जो मालदीव की यात्रा पर आये हैं। श्रीलंका के बाद मालदीव द्वारा भी हमारे साथ रिश्ते सुधारने की पहल भारत के बढ़ते महत्व का परिचायक है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Friday, 25 July 2025

ब्रिटेन के साथ मुक्त व्यापार संधि भारत की बड़ी सफलता


संसद के मानसून सत्र के बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ब्रिटेन यात्रा पर विपक्ष काफी हमलावर रहा तथा इसे संसद की उपेक्षा बताया। ऑपरेशन सिंदूर और पहलगाम में आतंकी हमले पर वह सत्र की शुरुआत में ही चर्चा के साथ ये मांग भी कर रहा था कि उसे प्रधानमंत्री से ही जवाब चाहिए। सरकार ने चर्चा की बात तो मान ली किंतु उसकी तारीख आगे बढ़ाई जिससे श्री मोदी  उस दौरान उपस्थित रह सकें। प्रधानमंत्री की विदेश यात्राओं को लेकर वैसे भी विपक्षी खेमा सदैव तंज कसते हुए उसे सरकारी खर्च पर सैर सपाटे का नाम देता रहा है। लेकिन बारीकी से देखें तो इन विदेश यात्राओं में से कुछ तो अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलनों आदि के लिए होती  हैं किंतु बाकी कूटनीतिक सम्बन्ध मजबूत करने के साथ ही व्यवसाय पर केंद्रित रहती हैं।  हाल ही में संपन्न उनकी विदेश यात्राओं को तो पूरी तरह व्यापार से जुड़ी ही कहा जाएगा। ये इसलिए भी आवश्यक हो गया क्योंकि डोनाल्ड ट्रम्प के दोबारा राष्ट्रपति बनने के बाद अमेरिका जिस तरह से मनमाने आयात शुल्क थोपने पर आमादा है उससे भारत की अर्थव्यवस्था विशेष रूप से निर्यात पर बुरा असर पड़ने की आशंका बढ़ रही है। ट्रम्प का रवैया इतना अनिश्चित और अव्यवहारिक है कि उनकी किसी बात पर भरोसा कर निश्चिंत हो जाना बड़े धोखे का कारण बन सकता है। रूस से कच्चे तेल का आयात करने पर 300 फीसदी टैरिफ लगाने की धमकी इसका उदाहरण है। इसके अलावा भी वैश्विक परिस्थितियाँ जिस प्रकार उलट - पुलट हो रही हैं उन्हें देखते हुए भारत को किसी एक या कुछ देशों पर निर्भरता खत्म करते हुए आयात और निर्यात के क्षेत्र में पूर्ण स्वायत्तता हासिल करना समय की मांग है। आयात के मामले में चीन के दबाव से भी बाहर आना देश के दूरगामी हित में है। ब्रिक्स की बैठक में ब्राजील जाते और आते समय श्री मोदी ने कुछ अफ्रीकी और कैरिबियन देशों की यात्रा के दौरान जो व्यापार समझौते किये वे अमेरिका और चीन दोनों के लिए इशारा थे। लेकिन गत दिवस ब्रिटेन के साथ प्रधानमंत्री ने जिस मुक्त व्यापार संधि पर हस्ताक्षर किये वह अमेरिका के गाल पर तमाचा है। इस संधि से भारत को एक बड़ा बाजार उपलब्ध होगा। हालांकि ब्रिटेन को भी इसका लाभ बराबरी से मिलेगा किंतु जो विवरण आया उसके अनुसार आने वाले सालों में ब्रिटेन को भारत का निर्यात कई गुना बढ़ेगा। चूंकि ब्रिटेन में भारतीय मूल के लाखों लोगों के अलावा एशियाई देशों के भी नागरिक बड़ी संख्या में रहते हैं। ऐसे में भारतीय वस्तुओं की मांग काफी है। मुक्त व्यापार संधि से चूंकि ये चीजें सस्ती हो जाएंगी इसलिए इनका निर्यात मौजूदा स्थिति से कई गुना बढ़ जाएगा। इस संधि के लिए बीते अनेक सालों से कूटनीतिक प्रयास चल रहे थे। प्रधानमंत्री ने इस संधि को जिस प्राथमिकता के साथ अंजाम तक पहुंचाया वह उनकी कूटनीतिक कार्यकुशलता का ताजा प्रमाण है। इस संधि से यूरोप के अन्य देशों के साथ भी इसी तरह के समझौते का रास्ता खुल गया है। सबसे बड़ी बात ये है कि अमेरिका को इस संधि से झटका लगा है क्योंकि ब्रिटेन उसका सबसे करीबी देश है। ऐसा लगता है ट्रम्प यूरोपीय देशों पर भी जिस तरह का दबाव बना रहे हैं उसे देखते हुए भारत - ब्रिटेन के बीच हुई मुक्त व्यापार संधि विश्व व्यापार में एक बड़े कदम के रूप में देखी जाएगी। इसके कारण भारत पर आयात कर बढ़ाने के बारे में अमेरिका का रुख बदलेगा या नहीं ये तो फिलहाल पक्के तौर पर नहीं कहा जा सकता। हो सकता है ट्रम्प इससे नाराज होकर ब्रिटेन पर ही दबाव बनाने लगें किंतु  उनकी हालिया नीतियों से ब्रिटेन भी क्षुब्ध है। यूक्रेन को लेकर ट्रम्प ने जो दोगलापन दिखाया उसके कारण प्रमुख  यूरोपीय देश उनसे चिढ़कर अपनी सैन्य और आर्थिक रणनीति में बड़ा बदलाव करने में जुटे हैं। भारत - ब्रिटेन मुक्त व्यापार संधि ने उन सबको ये सिखा दिया है कि अमेरिका के बिना भी दुनिया का काम चल सकता है। वैसे भी आज की दुनिया अब दो ध्रुवीय नहीं रह गई है। और भारत भी अब विश्व की बड़ी शक्तियों की कतार में शामिल हो चुका है। ब्रिटेन के साथ मुक्त व्यापार संधि ने इस पर मोहर लगा दी है। 

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 रवीन्द्र वाजपेयी

Thursday, 24 July 2025

विदेशियों को मतदाता सूची से बाहर करने का विरोध देशहित में नहीं


बिहार में मतदाता सूचियों की सघन जाँच को लेकर राज्य विधानसभा से संसद तक में विपक्ष का  हंगामा जारी है। लालू प्रसाद यादव के बेटे और महागठबंधन के मुख्यमंत्री उम्मीदवार तेजस्वी यादव ने तो चुनाव के बहिष्कार तक की धमकी दे डाली । हालांकि सब जानते हैं कि वह बंदर घुड़की ही है। इधर राहुल गाँधी  अब तक महाराष्ट्र चुनाव में हुई करारी हार से नहीं उबर पा रहे और आये दिन भाजपा पर चुनाव चुराने का आरोप लगाने के साथ ही चुनाव आयोग को कठघरे में खड़ा करते हैं। उनका कहना है कि भाजपा  को महाराष्ट्र में मिली जबरदस्त सफलता का कारण लाखों नये मतदाताओं के नाम जोड़ना था। यद्यपि वे हरियाणा में कांग्रेस की हार पर कुछ नहीं बोलते क्योंकि वहाँ पार्टी की गुटबाजी सतह पर थी। दरअसल बिहार में चुनाव आयोग द्वारा मतदाता सूचियों की बारीकी से जाँच करने के कारण बड़ी संख्या में उन मतदाताओं के नाम सूचियों से बाहर होने के आसार बढ़ गए हैं जो निर्धारित  मापदंडों के अनुसार जरूरी दस्तावेज उपलब्ध नहीं करवा पा रहे।  विपक्ष को आयोग के इस फैसले पर घोर आपत्ति है। इसके विरुद्ध सर्वोच्च न्यायालय में भी याचिकाएं भी विचाराधीन हैं जिसने आधार सहित कुछ दस्तावेजों को मान्य करने के निर्देश आयोग को दिये। अंतिम निर्णय अभी आना शेष है। लेकिन विपक्ष किसी भी तरह मतदाता सूचियों का पुनरीक्षण रुकवाने पर आमादा है। उसका आरोप है कि इस प्रक्रिया में जिन मतदाताओं के नाम कटेंगे वे उसके समर्थक हैं।उधर आयोग लगातार आश्वासन देता आ रहा है कि नाम कटने पर मतदाता अपील कर सकेगा किंतु विपक्ष कुछ भी सुनने राजी नहीं हैं। वैसे भी ये दावा सही नहीं है कि जिन लोगों के नाम मतदाता सूचियों से अलग किये जा रहे हैं वे सभी गैर भाजपाई दलों के समर्थक हैं । असलियत ये है कि इस मुहिम का उद्देश्य उन लोगों को मताधिकार से वंचित करना है जो भारत के नागरिक नहीं होने पर भी अवैध तरीके से मतदाता बन बैठे।  इनमें बड़ी संख्या बांग्लादेशी और रोहिंग्या घुसपैठियों की है इसलिए तेजस्वी और राहुल चिंता में डूबे हुए हैं। इन घुसपैठियों में ज्यादातर मुसलमान हैं जिन्हें राजद और कांग्रेस सहित कुछ विपक्षी दल अपना प्रतिबद्ध मतदाता मानते हैं। चुनाव आयोग इस बात को जानता है कि उसे किन - किन मुसीबतों से गुजरना होगा। इसीलिए उसने पूरी कोशिश की है कि प्रक्रिया में किसी प्रकार की कमी न रहे और सूची से बाहर होने वाले मतदाताओं को अपना पक्ष रखने का समुचित अवसर भी मिले । विपक्ष इस मुहिम का विरोध इसलिए कर रहा है कि  मतदाता बने बांग्लादेशी और रोहिंग्या घुसपैठिये जाहिर तौर पर भाजपा के विरोधी हैं क्योंकि वह उन्हें निकाल बाहर करने की पक्षधर है। खबर है चुनाव आयोग बिहार से फुरसत पाते ही प. बंगाल में भी मतदाता सूचियों के सघन पुनरीक्षण का अभियान शुरू करने वाला है जहाँ 2026 में  विधानसभा चुनाव होंगे। इसीलिए ममता बैनर्जी ने अभी से पुनरीक्षण के विरोध में मोर्चा खोल दिया है। लेकिन इससे ये स्पष्ट है कि तेजस्वी, राहुल और ममता जैसे राजनेताओं के कारण ही पड़ोसी देशों से आये घुसपैठियों को देश में न सिर्फ रहने का अवसर मिला बल्कि अवैध तरीके से उन्होंने भारतीय नागरिकों को उपलब्ध सुविधाएं भी हासिल कर लीं । जाहिर है ऐसा राजनीतिक संरक्षण और नौकरशाही में व्याप्त भ्रष्टाचार के कारण ही संभव हो सका। देशहित में सोचें तो मतदाता सूचियों के पुनरीक्षण की इस मुहिम से अवैध तरीकों से देश में बस गए विदेशी नागरिकों का पर्दाफाश हो सकेगा। यदि सर्वोच्च न्यायालय ने कोई रोक नहीं लगाई तब चुनाव आयोग का हौसला और बढ़ जाएगा। वैसे तो बांग्लादेशी और रोहिंग्या पूरे देश में फैले हुए हैं लेकिन बिहार, प. बंगाल, असम  त्रिपुरा सहित बाकी पूर्वोत्तर राज्यों में उनकी वजह से जनसंख्या संतुलन बिगड़ने के कारण राजनीति भी प्रभावित होने लगी है। इसीलिए इस मुहिम का इतना विरोध हो रहा है। जबकि होना तो ये चाहिए कि विदेशी नागरिकों के नाम मतदाता सूची से अलग करने की मुहिम का सभी राजनीतिक दल  समर्थन करें। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Wednesday, 23 July 2025

दो अदालतों के विपरीत फैसलों से उठ खड़े हुए कई सवाल


11 जुलाई 2006 को शाम के समय  मुंबई की जीवन रेखा कही जाने वाली  सात लोकल ट्रेनों में बम धमाके हुए। कुछ ही मिनटों में उस आतंकवादी घटना  में 189 लोगों की मौत हो गई जबकि 800 से अधिक घायल हुए। 1992  के बाद वह मुंबई पर सबसे बड़ा हमला माना जाता है। जांच दलों ने 13 लोगों को उन धमाकों के लिए जिम्मेदार मानते हुए गिरफ्तार किया । 2015 में मकोका अदालत ने एक को बरी करते हुए शेष 12 आरोपियों को दोषी करार दिया। उनमें से 5  को फांसी और  7 को उम्रकैद की सजा दी गई। आरोपियों ने उस फैसले के विरुद्ध उच्च न्यायालय में अपील की। उधर राज्य  सरकार ने भी फांसी  पर मुहर लगवाने के लिए उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया।  बीते सोमवार को पूरा देश ये जानकर सदमे में आ गया कि उच्च न्यायालय ने सभी 12 आरोपियों को निर्दोष मानते हुए बरी कर दिया।  उच्च न्यायालय ने अपने फैसले में अभियोजन पक्ष द्वारा पेश किये सबूतों और गवाहियों को विश्वसनीय न मानते हुए निचली अदालत के निर्णय को पूरे तौर पर खारिज कर दिया। इस प्रकार 19 साल पुराने जघन्य अपराध के बारे में  दो अदालतों ने एक दूसरे के विपरीत निर्णय देकर न्यायपालिका को भी कठघरे में खड़ा कर दिया। न्यायशास्त्र का मौलिक सिद्धांत है कि भले ही सौ गुनाहगार छूट जाएं किंतु किसी बेगुनाह को दंड नहीं मिलना चाहिए। ये बात भी गौर तलब है कि अदालत सबूतों और गवाहों  के आधार पर अपना फैसला तय करती है। संदर्भित प्रकरण में उच्च न्यायालय ने अभियोजन पक्ष पर ही निशाना साधते  हुए साफ - साफ कहा कि उसने जो सबूत पेश किये वे पर्याप्त नहीं थे और जो साक्ष्य पेश किये उन पर भी भरोसा नहीं किया जा सकता। इस फैसले  के विरुद्ध महाराष्ट्र सरकार ने सर्वोच्च न्यायालय में अपील कर दी है।  यदि सर्वोच्च न्यायालय मकोका अदालत का फैसला बहाल करते हुए सजाएं बरकरार रखता है तब फांसी के विरुद्ध दया याचिका राष्ट्रपति के पास जायेगी। कुल मिलाकर  मामले का अंत कहाँ जाकर होगा ये कोई नहीं बता सकता। लेकिन 2015 में निचली अदालत ने जिन सबूतों और गवाहों के आधार पर 5 आरोपियों को फांसी और 7 को आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी , 2025 में उच्च न्यायालय को वही सबूत और गवाह विश्वासयोग्य क्यों नहीं लगे ये गंभीर प्रश्न है। मकोका अदालत तो थी ही ऐसे प्रकरणों की सुनवाई के लिए । ऐसे में पूरी तरह ये मान लेना कठिन है कि उसने अभियोजन पक्ष द्वारा पेश किये गए सबूतों और गवाहों पर आँख मूँदकर भरोसा करते हुए  सजाएं सुना दी थीं। प्रकरण चूंकि सर्वोच्च न्यायालय के पास चला गया है इसलिए उसके निर्णय तक प्रतीक्षा करने के सिवाय दूसरा कोई रास्ता नहीं है । लेकिन दो अदालतों के दो सर्वथा विपरीत फैसलों से न्यायपालिका की कार्यप्रणाली पर भी सवालिया निशान लगते हैं। दूसरी तरफ ये भी विचारणीय है कि इस तरह के तमाम प्रकरणों में अभियोजन पक्ष आरोपियों के विरुद्ध ठोस सबूत रखने में अक्षम साबित होता है जिससे वे बरी हो जाते हैं। 2006 में हुए धमाकों में मारे गए लोगों के परिजनों को उच्च न्यायालय के फैसले से कितनी मानसिक पीड़ा हुई होगी इसका अनुमान लगाया जा सकता है। चूंकि घटना आतंकवाद से जुड़ी हुई थी इसलिए जिन गवाहों ने आरोपियों के विरुद्ध अदालत में मुँह खोलने का  साहस दिखाया वे भी उनके बरी हो जाने के बाद खुद को असुरक्षित महसूस कर रहे होंगे। लगभग दो दशक में भी प्रकरण का अंतिम निपटारा न होने से इस तरह का अपराध करने वालों का हौसला बुलंद होता है।  इसलिए ऐसे प्रकरणों में जल्द फैसले की व्यवस्था बनाई जानी चाहिए वरना सैकड़ों लोगों की हत्या करने वाले इसी तरह बरी होते  रहेंगे। इस मामले में अब जाँच एजेंसियां, मकोका अदालत और मुंबई उच्च न्यायालय तीनों की भूमिका का परीक्षण होना चाहिए क्योंकि आरोपी कसूरवार हैं तो छोड़े क्यों गए और निर्दोष थे तो इतने सालों तक प्रताड़ित क्यों हुए ? और कहीं  इन 12 आरोपियों को सर्वोच्च न्यायालय ने भी बरी कर दिया तब  ये सवाल हमेशा के लिए अनुत्तरित ही रह जाएगा कि 189 बेकसूर लोगों को मौत के मुँह में धकेलने वाले हैवान आखिर थे कौन ? 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Tuesday, 22 July 2025

धनखड़ का त्यागपत्र अनेक सवाल छोड़ गया

उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ द्वारा गत रात्रि दिये गए त्यागपत्र की खबर जिसने भी सुनी सन्न रह गया। कल उन्होंने मानसून सत्र  के पहले दिन राज्यसभा की अध्यक्षता की। तब तक वे पूरी तरह  स्वस्थ और सामान्य  थे। शाम को विपक्ष के सांसदों के साथ बैठक भी की किंतु रात को स्वास्थ्य संबंधी कारणों से त्यागपत्र भेजकर सार्वजनिक कर दिया। उनका त्यागपत्र राष्ट्रपति द्वारा स्वीकार कर लिए जाने के बाद अब वे भूतपूर्व हो गए हैं।चूंकि उनके स्वास्थ्य संबंधी किसी गंभीर समस्या की कोई जानकारी अब तक नहीं थी लिहाजा  जो  कारण उन्होंने बताया उस पर सहसा किसी को विश्वास नहीं हुआ। हाल ही में एक दो बार उनकी तबियत खराब हुई  किंतु  किसी बड़ी बीमारी का पता नहीं चला। 74 वर्ष की आयु में स्वास्थ्य खराब होना अस्वाभाविक नहीं है किंतु  उच्च सदन के  सभापति पर मानसिक दबाव काफी रहता है। और फिर उनके विरुद्ध विपक्ष सदैव हमलावर रहा है। उनकी  कटाक्षों से भरी टिप्पणियों से सदन का वातावरण अक्सर तनावपूर्ण हो जाता था। यहाँ तक कि उनके विरुद्ध महाभियोग लाने तक की तैयारी विपक्ष ने कर ली जो तकनीकी कारणों से आगे नहीं बढ़ सकी। उन पर सत्ता पक्ष की जुबान में बोलने का आरोप भी खुलकर लगता रहा। न्यायपालिका संबंधी  उनकी टिप्पणियों पर तो सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों तक ने ऐतराज जताया । स्मरणीय है वे खुद भी सर्वोच्च न्यायालय में वकालत कर चुके थे। उनके केंद्र सरकार से भी अच्छे रिश्ते रहे। प. बंगाल में ममता बैनर्जी पर लगाम कसने का काम उन्होंने जिस खूबी से किया उसका पुरस्कार उपराष्ट्रपति बनाकर उन्हें दिया गया। एक कारण उनका जाट होना भी रहा। किसान आंदोलन के कारण जाट समुदाय की नाराजगी से बचने भाजपा ने ये दाँव खेला था। राजस्थान विधानसभा चुनाव पर भी उसका असर हुआ। चुनाव के दौरान श्री धनखड़ के राजस्थान दौरों पर विपक्ष ने जमकर आपतियाँ व्यक्त कीं । उपराष्ट्रपति और सरकार के बीच तनाव का वैसे कोई कारण सामान्यतः नहीं पैदा होता। अतीत में जितने भी उपराष्ट्रपति हुए उन सभी पर राज्यसभा के संचालन में सत्ता पक्ष की तरफदारी करने के आरोप से लगते रहे। उस दृष्टि से श्री धनखड़ ने ऐसा कुछ नहीं किया जिसे हटकर कहा जाता। लेकिन सर्वोच्च न्यायालय द्वारा न्यायिक नियुक्ति आयोग को रद्द करने के फैसले के विरुद्ध उनकी सार्वजनिक बयानबाजी ने उन्हें औरों से अलग कर दिया। हाल ही में दिल्ली उच्च न्यायालय के न्यायाधीश यशवंत वर्मा के यहाँ करोड़ों रुपये बरामद होने के मामले में श्री धनखड़ ने सदन के भीतर जिस प्रकार की टिप्पणियां कीं और न्यायपालिका में व्याप्त विसंगतियों के बारे में समिति बनाने की पेशकश की उससे सरकार के साथ ही न्यायपालिका भी चौकन्ना हुई। लेकिन इस सबको उनके त्यागपत्र से जोड़ना उचित नहीं लगता। ऐसे में अचानक उनका त्यागपत्र आने और स्वीकार हो जाने को गत दिवस सदन में हुए घटनाक्रम का परिणाम माना जा रहा है। विपक्ष के अनेक बड़े नेता त्यागपत्र को लेकर तरह - तरह की बातें कर रहे हैं। कल न्यायाधीश वर्मा के विरुद्ध विपक्ष के महाभियोग प्रस्ताव को स्वीकार करने के अलावा राज्यसभा में नेता प्रतिपक्ष मल्लिकार्जुन खरगे को ऑपरेशन सिंदूर पर बोलने की अनुमति दिये जाने के श्री धनखड़ के फैसले को भी इसकी पृष्ठभूमि माना जा रहा है क्योंकि सत्ता पक्ष इस विषय पर बाद में चर्चा पर अड़ा था। शाम को उपराष्ट्रपति द्वारा सदन की कार्य मंत्रणा समिति की बैठक में सदन के नेता जगत प्रकाश नड्डा और संसदीय कार्य मंत्री किरण रिजजू की गैर मौजूदगी को भी तनाव बढ़ने की वजह माना जा रहा है। यद्यपि  उन जैसा धाकड़ और स्पष्ट बोलने वाला व्यक्ति ज्यादा समय चुप रहेगा ये मान लेना कठिन है। लेकिन अचानक दिये  त्यागपत्र का कारण वाकई स्वास्थ्य से संबंधित है तब ये किसी गंभीर बीमारी की ओर इशारा कर रहा है जो उन्हें कल ही ज्ञात हुई किंतु  कुछ और कारण है तब उसका खुलासा भी होना चाहिए जिससे बेसिरपैर की बातों को बल न मिले? क्योंकि एक दिन पहले तक जो विपक्ष श्री धनखड़ पर पक्षपात और दुर्व्यवहार का आरोप लगाया करता था वह अचानक उनकी प्रशंसा करने लग गया जो चौंकाने वाला है। यदि श्री धनखड़  विदाई समारोह में उपस्थित नहीं होते तो फिर चर्चाओं का सिलसिला जारी रहेगा। संसद का सत्र कल ही शुरू हुआ और पहले ही दिन उपराष्ट्रपति द्वारा रहस्यमय तरीके से  त्यागपत्र देना सरकार की मुसीबत बढ़ाने वाला है  क्योंकि मौजूदा उपसभापति हरिवंश अनुभवी जरूर हैं किंतु उनमें श्री धनखड़ जैसी दबंगी नहीं है। हालांकि मौजूदा संसद के सत्र में ही उपराष्ट्रपति का चुनाव करवाया जा सकता है किंतु  उसके बाद भी इस त्यागपत्र को लेकर सवाल उठते रहेंगे क्योंकि ये भी नहीं पता चला कि उन्हें मनाने की कोशिश की गई हो। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Monday, 21 July 2025

संसद नहीं चलने में विपक्ष का ही नुकसान


आज से प्रारंभ हुए संसद के मानसून सत्र में विपक्ष सामयिक मुद्दों पर चर्चा चाहता है। जिसके लिए सत्ता  पक्ष ने अपनी सहमति दिखाई किंतु दोनों सदनों की बैठक शुरू होते ही हंगामा होने लगा और सदन दोपहर 2 बजे तक स्थगित हो गया। इस प्रकार वर्षाकालीन सत्र की शुरुआत ही अच्छी नहीं रही। बजट सत्र के बाद देश और दुनिया में बहुत कुछ ऐसा घट चुका है जिस पर संसद के दोनों सदनों  में सार्थक चर्चा की अपेक्षा पूरा देश कर रहा है। अनेक महत्वपूर्ण विधायी कार्य  निपटाने  के अलावा कुछ रिपोर्टों को भी सदन के पटल पर रखा जाना है। विपक्ष द्वारा सरकार से अपने सवालों के जवाब की अपेक्षा पूरी तरह सही है। दूसरी तरफ सत्ता पक्ष का भी दायित्व है कि वह बहुमत के जोर पर सदन को चलाने के बजाय सामंजस्य बनाकर चले। लेकिन दुर्भाग्य से  संसद में अर्थपूर्ण विचार - विमर्श होने के बजाय समय की बर्बादी होती है। जनता के धन से चलने वाली  बैठक पर प्रतिदिन करोड़ों रु. खर्च होते हैं। देश ही नहीं बल्कि विदेशों तक में इस पर नजर रखी जाती है क्योंकि भारत अब विश्व में होने वाली किसी भी गतिविधि को प्रभावित करने में सक्षम हो चुका है। ये देखते हुए राजनीतिक दलों को चाहिए वे संसद के सत्र का इस्तेमाल  केवल अपने राजनीतिक स्वार्थों के लिए करने के बजाय देश के हित में करने पर ध्यान दें। ऐसा नहीं है कि दोनों सदनों में सुयोग्य और गंभीर किस्म के सांसदों का सर्वथा अभाव हो। लोकसभा और राज्यसभा में अनेक ऐसे सदस्य हैं जिनकी प्रतिभा का सभी लोहा मानते हैं। ये लोग सदन की कार्यवाही में भाग लेने हेतु पूरी तैयारी से आते हैं। लेकिन उन्हीं की पार्टी के हंगामे से सदन स्थगित हो जाने पर वे मन - मसोसकर रह जाते हैं। छोटे - छोटे दलों को भी सदन नहीं चलने से अपनी बात कहने का अवसर नहीं मिलता। इसीलिए पिछले एक सत्र में सपा और तृणमूल कांग्रेस ने कांग्रेस द्वारा सदन को बाधित किये जाने से  खुद को दूर कर लिया था। अखिलेश यादव ने कहा भी था कि कांग्रेस अपनी नीति को समूचे विपक्ष पर लादना चाहती है जो अनुचित है। हालांकि संसद नहीं चलने देने के लिए विपक्षी दलों पर ही पूरा दोष मढ़ना गलत होगा। जो नई संसदीय संस्कृति बीते कुछ दशकों में पनपी उसमें सदन को नहीं चलने देने में सत्ता पक्ष को अपना फ़ायदा नजर आता है । उसकी ओर से पेश किये जाने वाले विधेयक और अन्य सभी प्रस्ताव तो शोर - शराबे के बीच भी सदन से मंजूर  करवा लिए जाते हैं किंतु विपक्ष उसके जाल में फंसकर अपने अवसर गँवा देता है। हर सत्र के पहले सदन के अध्यक्ष सर्वदलीय बैठक बुलाकर सदन के सुचारु संचालन हेतु सभी दलों से सहयोग की अपेक्षा करते हैं। उस बैठक में सत्ता पक्ष और विपक्ष  सुलझी हुई बातें करते हैं। लेकिन सत्र शुरू होते ही उनका रंग -  ढंग बदल जाता है। ये कहना बिल्कुल भी गलत नहीं होगा कि संसद के भीतर राजनीतिक पार्टियों के अशोभनीय आचरण से संसद और सांसदों की छवि और प्रतिष्ठा दोनों को अकल्पनीय क्षति हुई है। ऐसा नहीं है कि सांसद इसे  जानते नहीं हों किंतु पार्टी का दबाव उनको मजबूर कर देता है। इस बारे में विपक्ष को ये समझना चाहिए कि संसद ही वह मंच है जहाँ वह सत्ता पक्ष की जो  घेराबंदी करता है उसका प्रभाव जनता पर भी होता है। सांसदों की संख्या के अनुसार सभी दलों को चर्चा में भाग लेने का समय निर्धारित किया जाता है। यदि विपक्ष इस समय का सही तरीके से उपयोग कर सके तब उसके मुद्दे देश और दुनिया के सामने बेहतर तरीके से आ सकेंगे । बीते कुछ वर्षों से देखने मिल रहा है कि संसद का सत्र अपनी तय अवधि से पूर्व ही समाप्त हो जाता है। इसका कारण सरकार तो अपने सारे काम पूरे करवा लेती है किंतु विपक्ष खाली हाथ बना रहता है। ये देखते हुए उसको चाहिए वह चर्चा के अनुकूल वातावरण बनाने आगे आये। सत्ता पक्ष के पास तो बहुमत की शक्ति होने से वह सदन को अपनी सुविधानुसार चला लेता है लेकिन हंगामे से विपक्ष    बिना लड़े ही हारने की स्थिति में आ जाता है। संसद के इस सत्र में अनेक ऐसे विषय हैं जो विपक्ष के लिए लाभप्रद हो सकते हैं बशर्ते उन पर ठीक तरह से चर्चा हो जाए। जाहिर है सत्ता पक्ष  उसको ऐसा कोई मौका नहीं देगा जिसका उपयोग उसकी खिंचाई के लिए किया जा सके । हालांकि  ऐसा अतीत में भी होता रहा किंतु तत्कालीन विपक्ष में इतना दम था कि सरकार के न चाहने पर भी वह चर्चा का अवसर हासिल कर ही लेता था। उस लिहाज से वर्तमान विपक्ष में दूरदर्शिता का अभाव है जिसका लाभ सरकार उठा लेती है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Saturday, 19 July 2025

आम आदमी पार्टी और बाकी में केवल नाम का फर्क रह गया


आम आदमी पार्टी के सर्वोच्च नेता अरविंद केजरीवाल कुछ समय पहले ही ये घोषणा कर चुके थे कि उनकी पार्टी इंडिया गठबंधन से अलग रहकर बिहार में चुनाव लड़ेगी। हालांकि इसके पहले  हरियाणा और दिल्ली के  विधानसभा चुनाव में भी आम आदमी पार्टी ने  कांग्रेस से गठबंधन नहीं किया था। वैसे भी लोकसभा चुनाव के बाद इंडिया गठबंधन केवल कागजों पर ही सिमटा हुआ है। उसकी कोई औपचारिक बैठक या अन्य गतिविधियां भी सार्वजनिक तौर पर सुनने नहीं मिलीं। हाल ही में विभिन्न राज्यों में हुए विधानसभा उपचुनावों में भी गठबंधन के घटक दलों में कोई तालमेल नजर नहीं आया।  अगले साल प. बंगाल और केरल में होने वाले विधानसभा चुनाव में भी इंडिया गठबंधन की फूट खुलकर उजागर होगी क्योंकि तृणमूल के विरुद्ध जहाँ कांग्रेस और वामपंथी मिलकर लड़ेंगे वहीं केरल में वामपंथियों की सत्ता को उखाड़ फेंकने के लिए कांग्रेस मोर्चा संभालेगी। बिहार के चुनाव में लालू यादव गठबंधन के  घटकों को कितनी सीटें देंगे ये स्पष्ट नहीं है। इसीलिए जब संसद के मानसून सत्र में सरकार को घेरने की रणनीति बनाने के लिए कांग्रेस ने इंडिया गठबंधन की बैठक बुलाने की पहल की तो आम आदमी पार्टी द्वारा उससे दूर रहने की  घोषणा से किसी को अचंभा  नहीं हुआ। दरअसल कांग्रेस और  आम आदमी पार्टी के रिश्ते हरियाणा चुनाव के  दौरान ही बिगड़ चुके थे जब सीटों के बंटवारे का मुद्दा नहीं सुलझने पर दोनों ने सभी सीटों पर उम्मीदवार उतारे। दिल्ली का चुनाव आते तक दूरी और बढ़ चुकी थी जहाँ  राहुल गाँधी और अरविंद केजरीवाल ने एक दूसरे के विरुद्ध बोलने में कोई लिहाज नहीं किया। उस चुनाव ने आम आदमी पार्टी की साख और धाक दोनों को जबर्दस्त नुकसान पहुंचाया जिससे उसकी सौदेबाजी की क्षमता भी कमजोर पड़ गई। सही बात ये है कि इंडिया गठबंधन में कांग्रेस को छोड़कर शेष सभी का दायरा सीमित है क्योंकि वे क्षेत्रीय दल ही हैं। वामपंथी भी अब केवल केरल में सिमट चुके हैं। लेकिन आम आदमी पार्टी  को दिल्ली में  पहले चुनाव से  जो सफलता मिली उससे श्री केजरीवाल की महत्वाकांक्षाएं सातवें आसमान पर जा पहुंची और वे प्रधानमंत्री बनने का सपना देखने लगे। पार्टी को अखिल भारतीय स्वरूप देने की उनकी सोच में गलत कुछ भी नहीं था किंतु वे भूल गए कि आंदोलन से निकले राजनीतिक दल ज्यादा टिकते नहीं हैं क्योंकि उनका जन्म तात्कालिक मुद्दों और भावनाओं के ज्वार से होता है। सबसे बड़ी गलती श्री केजरीवाल ये कर बैठे कि उन्होंने भ्रष्ट नेताओं की सूची जारी कर खुद को दूध का धुला साबित करने की कोशिश की किंतु धीरे - धीरे वे खुद भी भ्रष्टाचार के मकड़जाल में फंसकर अपना दामन दागदार कर बैठे। और जब उनके चारों तरफ शिकंजा कसा तब इंडिया गठबंधन में शामिल होकर उन्हीं नेताओं के साथ गलबहियां करने लगे जो उनकी नजर में भ्रष्ट थे। पंजाब में  दिल्ली जैसी सफलता मिलने से आम आदमी पार्टी का आत्मविश्वास जाहिर तौर पर बढ़ा किंतु लोकसभा चुनाव में प्रदर्शन चूंकि उम्मीद के मुताबिक नहीं रहा इसलिए राष्ट्रीय पार्टी का दर्जा हासिल करने के बाद भी वह कांग्रेस को धकियाकर भाजपा का विकल्प नहीं बन पाई। आम आदमी पार्टी ने इंडिया गठबंधन छोड़ने का निर्णय इसलिए किया क्योंकि उसे ये लगने लगा था कि अनेक दलों की भीड़ में वह अपनी पहिचान खोती जा रही थी। लेकिन सच्चाई ये है कि यह पार्टी भी अन्य  दलों की तरह ही चुनावी राजनीति में उलझकर भटकाव का शिकार होकर रह गई। इसे दुर्भाग्य ही कहा जाएगा कि जन आंदोलन से निकली पार्टियां अपनी छवि को बनाये  रखने में विफल रहती हैं क्योंकि सत्ता की चाहत में वे अपने आदर्शों और सिद्धांतों की बलि चढ़ा बैठती हैं। आम आदमी पार्टी भले ही किसी से गठबंधन न करे किंतु इसकी उसकी साख वापिस नहीं लौट सकती । जनता समझ गई है कि उसमें और अन्य पार्टियों में केवल नाम का फर्क है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी


Friday, 18 July 2025

स्वच्छता पुरस्कार की बजाय संस्कार से जुड़े



राष्ट्रीय स्वच्छ सर्वेक्षण के अंतर्गत गत दिवस विभिन्न श्रेणियों में अनेक शहरों को पुरस्कृत किया गया। म.प्र के  इंदौर ने जहाँ लगातार आठवें वर्ष  सबसे स्वच्छ शहर का खिताब हासिल किया वहीं जबलपुर ने भी पांचवा स्थान अर्जित किया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सत्ता संभालने के बाद पूरे देश में स्वच्छता का अभियान चलाया और खुद भी झाड़ू उठाकर लोगों को प्रेरित किया तो उसका सकारात्मक असर पूरे देश में हुआ। सरकारी अमला तो जुटा ही स्वयंसेवी संस्थाओं ने भी उसमें बढ़ - चढ़कर हिस्सा लिया तथा  आम जनता भी आगे आई। घरों से कचरा उठाने की व्यवस्था ने भी स्वच्छता की स्थिति में सुधार किया। यद्यपि ये दावा नहीं किया जा सकता कि भारत ने वैश्विक स्तर को छू लिया है और वह सिंगापुर सरीखा साफ - सुथरा हो गया किंतु इतना तो कहा ही जा सकता है कि बीते 11 सालों में स्वच्छता के प्रति जागरूकता में वृद्धि हुई है और समाज ने इस मिशन के प्रति अपना समर्थन और सहयोग प्रदान किया। विशेष रूप से शालेय विद्यार्थियों में भी स्वच्छता एक आदत के तौर पर देखी जा सकती है जो इस अभियान के उज्ज्वल भविष्य  की गारंटी है। उल्लेखनीय है जब प्रधानमंत्री के आग्रह पर स्वच्छता अभियान से बड़ी संख्या में युवा जुड़े तब कांग्रेस नेता राहुल गाँधी ने कटाक्ष किया था कि बजाय रोजगार के श्री मोदी ने उनके हाथ में झाड़ू थमा दी। कुछ लोगों को स्वच्छता अभियान और उसकी प्रतियोगिता व्यर्थ की कवायद लगी और इसे मूल समस्याओं से लोगों का ध्यान भटकाने का दाँव कहकर  मजाक भी बनाया गया।  ऐसा ही रवैया शौचालय को लेकर प्रधानमंत्री द्वारा प्रारंभ की गई योजना देखने मिला। लेकिन कुछ सालों बाद देश ने ये अनुभव किया कि स्वच्छता और शौचालय जैसे विषयों पर  आजादी के बाद ही जोर दिया गया होता तब भारत की तस्वीर कहीं बेहतर होती। उस दृष्टि से  2014 के बाद स्वच्छता और शौचालय पर ध्यान देना किसी सामाजिक क्रांति से कम नहीं है। प्रधानमंत्री के आलोचक भी उनकी जिन बातों के लिए प्रशंसा करने  में नहीं हिचकिचाते  उनमें स्वच्छता सबसे प्रमुख है। ये बात सही है कि स्वच्छ सर्वेक्षण के अंतर्गत दिये जाने वाले पुरस्कारों के लालच में नगरीय निकाय साफ - सफाई की तरफ अधिक ध्यान देने लगे हैं , लेकिन आम जनता में भी अपने शहर को स्वच्छता  पुरस्कार मिले इसकी ललक पैदा हुई है। इंदौर यदि लगातार देश का सबसे स्वच्छ शहर बना हुआ है तो इसका जितना श्रेय वहाँ की नगरनिगम को है उससे अधिक इंदौर के नागरिकों को दिया जाना चाहिए जिन्होंने स्वच्छता को अपना स्वभाव बना लिया। हालांकि कुछ शहरों में स्वच्छता का अभियान स्वच्छ सर्वेक्षण के पहले ही शुरू होता है जबकि कुछ ने इसे स्थायी तौर पर अपना लिया। भारत विश्व की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने की तरफ अग्रसर है। हमारे यहाँ विदेशी पर्यटकों का आना - जाना भी बढ़ता जा रहा है। जी- 20 जैसे विश्वस्तरीय आयोजन भी होने लगे हैं। आईपीएल की सफलता के बाद अब देश ओलंपिक की मेजबानी के लिए दावेदारी कर रहा है। ऐसे में  आवश्यक है कि भारत साफ -  सफाई में भी दुनिया के संपन्न देशों की बराबरी से खड़ा हो। जिन शहरों ने स्वच्छता में पुरस्कार अर्जित किया और बीते वर्षों की अपेक्षा अपनी स्थिति में सुधार किया वे बधाई के पात्र हैं और उनके वाशिंदे प्रशंसा के।   बेहतर होगा केंद्र के अलावा राज्य सरकारें भी स्वच्छता  प्रतियोगिता आयोजित करें जिससे  इस दिशा में किये जाने वाले प्रयास और भी ज्यादा प्रभावशाली हों। लोगों को ये समझाने की आवश्यकता है कि स्वच्छता पुरस्कार से  प्रेरित न होकर संस्कारों से जुड़ी होना चाहिए।

- रवीन्द्र वाजपेयी

Thursday, 17 July 2025

जनरल चौहान की सलाह भारत के महाशक्ति बनने में सहायक


सीडीएस ( चीफ ऑफ आर्मी स्टाफ) जनरल अनिल चौहान का ये कहना सौ फीसदी सत्य है कि आज के दौर में होने वाले युद्धों को जीतने के लिए पुरानी तकनीक कारगर नहीं हो सकती। उनकी इस चेतावनी से भी हर कोई सहमत होगा कि यदि ज़रूरी मिशनों के लिए विदेशों पर निर्भरता बनी रही तो हमारी तैयारियां कमज़ोर पड़ सकती हैं। इसीलिए हमें अपनी तकनीक खुद विकसित करनी होगी ताकि  युद्ध के दौरान किसी चीज की कमी न हो। एक कार्यक्रम में दिया उनका उक्त भाषण ऑपरेशन सिंदूर के दौरान सेना को मिले अनुभवों से प्रेरित और प्रभावित था। उन्होंने पाकिस्तान के हमले को निष्प्रभावी करने वाली भारतीय रक्षा प्रणाली की प्रशंसा करते हुए बताया कि किस तरह छोटे - छोटे ड्रोन बाजी पलट सकते हैं। कुल मिलाकर जनरल चौहान का वक्तव्य युद्ध के परंपरागत तौर - तरीकों से आगे आकर आधुनिक तकनीक को अपनाने पर केंद्रित था जिसका सार ये है कि ऐसा करते हुए हमें विदेशी तकनीक और अस्त्र - शस्त्रों पर अपनी निर्भरता खत्म  करनी होगी। इसका कारण बताते हुए  उन्होंने कहा कि विदेशी युद्ध सामग्री में  गोपनीयता नहीं रहती क्योंकि उसे बनाने वाले देश वही अस्त्र - शस्त्र अनेक देशों को भी बेचते हैं। ऑपरेशन सिंदूर में हमारी सेना ने आक्रमण और सुरक्षा दोनों में स्वदेश निर्मित अस्त्र - शस्त्र और रक्षा प्रणाली का जिस सफलता के साथ प्रयोग किया उसने दुनिया की  महाशक्तियों को भी चौंका दिया। हालांकि उनके निर्माण में एक सीमा तक विदेशी सहयोग और तकनीक का सहारा लिया गया था किंतु पाकिस्तान के साथ संक्षिप्त लड़ाई में भारतीय सेना ने स्वदेश में बने अस्त्र - शस्त्रों से जिस तरह का युद्ध कौशल दिखाया उसके कारण भारत में निर्मित हथियारों के साथ ही मिसाइलों के काफी खरीददार देश सामने आ रहे हैं। इस संबंध में जो ताजा आंकड़े जानकारी में हैं उनके अनुसार केन्द्र में मोदी सरकार ने सत्ता में आने के बाद एक तरफ तो सेना को अस्त्र- शस्त्रों से सुसज्जित करने के लिए बड़े पैमाने पर विदेशों से खरीदी की जो पूर्ववर्ती यूपीए सरकार के शासनकाल में रुकी होने से सेना खुद को किसी आपातकालीन स्थिति से निपटने में असहाय अनुभव करने लगी थी। रक्षा सौदों की प्रक्रिया को डाॅ. मनमोहन सिंह गति प्रदान क्यों नहीं कर सके ये रहस्यमय है। कहा जाता है इस मामले में उन्हें निर्णय करने की आजादी नहीं थी। लेकिन घरेलू रक्षा उत्पादन में भी भारी कमी आई जिसका वाजिब कारण कोई नहीं बता सका। बहरहाल, बीते 11 वर्षों में रक्षा सामग्री का घरेलू उत्पादन कई  गुना बढ़ा किंतु रक्षा सामग्री के निर्यात का आंकड़ा जिस ऊंचाई पर पहुंचा वह बेहद उत्साहजनक है। जनरल चौहान ने रक्षा उत्पादन के स्वदेशीकरण की जो जरूरत बताई उस दिशा में देश तेजी से बढ़ता नज़र आ रहा है। मौजूदा वैश्विक हालात में किसी भी देश की रक्षा सम्बन्धी आत्मनिर्भरता निहायत जरूरी है। यूक्रेन और रूस के बीच चल रही जंग में ये बात उभरकर आई है। यदि अमेरिका  सहित अन्य पश्चिमी देश हथियारों की आपूर्ति न करते  तो यूक्रेन पर पुतिन की फ़ौजें अब तक कब्जा कर चुकी होतीं। सीडीएस जनरल चौहान ने रक्षा मामलों में घरेलू उत्पादन क्षमता बढ़ाने के साथ ही आधुनिक तकनीक अपनाने की जो अहमियत बताई वह देश की सुरक्षा के लिहाज से तो आवश्यक है ही लेकिन  एक महाशक्ति के तौर पर अपना दबदबा स्थापित करने के लिए भी उसकी उपयोगिता है। भारत की अर्थव्यवस्था जिस तेजी से बढ़ रही है उसमें रक्षा उत्पादन भी बड़ा योगदान दे सकते हैं। निजी क्षेत्र को रक्षा सामग्री बनाने की अनुमति देना बड़ा रणनीतिक कदम है क्योंकि इस व्यवसाय में बड़े पैमाने पर पूंजी की जरूरत होती है। उल्लेखनीय है विकसित देशों में तोप, मिसाइल, ड्रोन और लड़ाकू विमान आदि निजी क्षेत्र ही उत्पादित करता है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Wednesday, 16 July 2025

अंतरिक्ष यात्री की जाति का मुद्दा छेड़ना बेहद निंदनीय

छ समय पहले कांग्रेस नेता राहुल गाँधी सौंदर्य प्रतियोगिताओं में किसी दलित या ओबीसी युवती के विजेता न बनने का मुद्दा उठाकर हंसी का पात्र बने थे। उसके पहले  केंद्रीय बजट बनाने वाले अधिकारियों के दल में जातियों के प्रतिनिधित्व का सवाल भी उन्होंने लोकसभा में उठाया था। उन बातों से जनता कितनी प्रभावित हुई इसका मोटा - मोटा अंदाज तो हरियाणा, महाराष्ट्र और दिल्ली विधानसभा चुनाव में कांग्रेस की करारी पराजय से मिल गया। लेकिन  पार्टी के एक नेता उदित राज जरूर श्री गाँधी  का अनुसरण करते हुए इस तरह के बयान देकर सुर्खियों में आते रहते हैं। ऑपरेशन सिंदूर पर उन्होंने ये कहकर विवाद पैदा किया कि इसका नाम कुछ और रखा जाना चाहिए था क्योंकि सिंदूर एक खास धर्म से जुड़ा नाम है। इसी क्रम में उन्होंने  गत दिवस अंतर्राष्ट्रीय  अंतरिक्ष स्टेशन से अंतरिक्ष यात्रा पर गए भारतीय अंतरिक्ष यात्री शुभांशु शुक्ला के चयन पर ऐतराज जताते हुए कहा कि उनकी जगह किसी दलित अथवा ओबीसी को  भेजा जाना चाहिए था। उल्लेखनीय है शुभांशु  मिशन पूरा कर अंतर्राष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन से गत दिवस वापस लौट आए । उनकी सकुशल वापसी पर पूरा देश खुश है। लेकिन श्री राज ने अपने बयान में कहा कि जब  राकेश शर्मा अंतरिक्ष भेजे गए थे,  उस समय  दलित और ओबीसी समाज के लोग उतना पढ़े-लिखे नहीं थे । इसलिए  इस बार शुभांशु की जगह किसी दलित या ओबीसी व्यक्ति को अंतरिक्ष में भेजना चाहिए था। उदित राज   भारतीय राजस्व सेवा में अधिकारी रहने के बाद  राजनीति में आये और अपनी पार्टी बनाई।  2014 में भाजपा में शामिल होने के बाद दिल्ली की सुरक्षित सीट से लोकसभा के लिए चुने गए। लेकिन दोबारा टिकिट नहीं मिलने पर पार्टी छोड़ दी और आजकल कांग्रेस में हैं। केन्द्र सरकार की नीतियों की आलोचना करते - करते अनेक अवसरों पर वे अवांछित टिप्पणी करने के कारण विवादास्पद होते रहे हैं। भाजपा यदि उनको सांसद बनाती रहती तब शायद वे प्रधानमंत्री का गुणगान करते घूमते। कांग्रेस में भी एक किनारे पड़े है इसलिए बयानों के जरिये अपनी कुंठा व्यक्त करना उनका काम रह गया है। अंतरिक्ष में शुभांशु शुक्ला  के बजाय किसी दलित अथवा ओबीसी को भेजे भेजे जाने जैसा सवाल उठाकर उन्होंने कांग्रेस नेता राहुल गाँधी द्वारा खींची गई लकीर को ही आगे बढ़ाया है । लेकिन  ऑपरेशन सिंदूर जैसे राष्ट्रीय सम्मान से जुड़े विषय में भी जिस इंसान को धर्म विशेष नजर आया  उसकी मानसिकता का अनुमान लगाना मुश्किल नहीं है। अंतरिक्ष के अभियान पूरी तरह वैज्ञानिक और तकनीकी दक्षता से जुड़े होते हैं। इससे जुड़े किसी भी व्यक्ति का चयन जाति या धर्म के आधार पर करने की बात सोचना ही हास्यास्पद है। और फिर शुभांशु जिस मिशन पर गए थे वह अंतर्राष्ट्रीय था जिसमें भारत की हिस्सेदारी महज अंतरिक्ष यात्री भेजने तक सीमित थी। निकट भविष्य में जिस महत्वाकांक्षी  गगन यान परियोजना पर इसरो काम कर रहा है उसके लिए शुभांशु द्वारा अंतरिक्ष में किये गए प्रयोग बेहद उपयोगी होंगे। और उनकी यह यात्रा मुफ्त में नहीं हुई। उस पर भारत ने अरबों रुपए का शुल्क चुकाया है। अच्छा होता शुभांशु की उपलब्धियों और उनसे भविष्य में भारतीय अंतरिक्ष कार्यक्रम को मिलने वाले लाभ की चर्चा हो जिससे अधिकतम युवा इस क्षेत्र की ओर आकर्षित हों। यदि अंतरिक्ष कार्यक्रम जैसे अति तकनीकी क्षेत्र को भी जाति जैसे विवादों में उलझाया जाएगा तब उसकी दुर्गति को कोई नहीं रोक पाएगा। आज भी इसरो में तमाम ऐसे वैज्ञानिक और  तकनीशियन कार्यरत हैं जो ऊँची जाति के नहीं हैं किंतु उनकी पहिचान और प्रतिष्ठा उनकी जाति से नहीं अपितु उनके काम पर आधारित है। उदित राज जैसे और भी लोग सार्वजनिक जीवन में हैं जो दलितों  और पिछड़ों की आड़ लेकर अपना महत्व बढ़ाने में लगे हुए हैं। हालांकि श्री राज ने शुभांशु को शुभकामना तो दी किंतु उनकी जाति का विवाद पैदा कर दूध में नींबू निचोड़ने की हरकत भी  कर डाली। बेहतर तो यही होता कि कांग्रेस उनके बयान की निंदा करते हुए  हिदायत देती कि वे भविष्य में इस तरह के बयानों और टिप्पणियों से परहेज करें। लेकिन सवाल ये है कि जब  श्री गाँधी खुद ही जाति को लेकर ऊलजलूल बयानबाजी किया करते हैं तब बाकी पार्टी जनों को भला कौन रोक सकेगा? 

Tuesday, 15 July 2025

अन्य पार्टियों से आये लोगों से निपटना खंडेलवाल के लिए चुनौती

म.प्र भाजपा का सबसे पुराना गढ़ है। आज भी जिन राज्यों में पार्टी का जनाधार कमजोर है वहाँ के नेताओं को इस प्रदेश से राज्यसभा में भेजा जाता रहा। ये सिलसिला आज भी जारी है। तमिलनाडु और केरल के कुछ ऐसे नेता भी म.प्र से संसद के उच्च सदन में भेजे गए जिनका नाम भी कम ही लोगों को याद होगा। डा. वसंत कुमार पंडित, कर्नाटक केसरी जगन्नाथ  राव जोशी, उद्योगपति रामनाथ गोयनका और सुषमा स्वराज तो अन्य राज्यों से आकर यहाँ लोकसभा चुनाव तक जीतकर गईं। केरल के  ओ. राजगोपाल राज्यसभा पहुंचकर केन्द्र में मंत्री तक बने। अटलबिहारी वाजपेयी, लालकृष्ण आडवाणी और भैरोसिंह शेखावत ने भी म.प्र के रास्ते राज्यसभा की सदस्यता हासिल की। जब लोकसभा में जनसंघ के मुट्ठी भर सांसद होते थे तब भी म.प्र की हिस्सेदारी  सर्वाधिक थी। 2019  और 2024 के लोकसभा चुनाव में भाजपा  ने ऐतिहासिक प्रदर्शन कर पूरे देश को चौंका दिया। 2003 से केवल 15 माह की कमलनाथ सरकार को छोड़कर लगातार भाजपा प्रदेश की सत्ता पर काबिज है। स्थानीय निकायों में भी ज्यादातर में उसका ही राज है। जाहिर है ये स्थिति इसलिए बन सकी क्योंकि पार्टी का संगठन बेहद मजबूत है। सत्ता में लंबे समय तक बने रहने के बाद कोई भी पार्टी अलोकप्रिय होने लगती है। 2018 में प्रदेश की जनता ने भाजपा को भी झटका दे दिया था। हालांकि 2020 में ही पार्टी ने कांग्रेस से सत्ता छीन ली किंतु उसका श्रेय ज्योतिरादित्य सिंधिया को मिला जिन्होंने दो दर्जन विधायकों के साथ कांग्रेस छोड़ दी। लेकिन 2023 के विधानसभा चुनाव में पार्टी ने शानदार प्रदर्शन करते हुए सत्ता पर कब्जा बरकरार रखा और उसके कुछ महीनों बाद हुए लोकसभा चुनाव में तो सभी 29 सीटें जीतकर इतिहास रच दिया। इन परिस्थितियों में पार्टी संगठन के मुखिया का दायित्व जिन हेमंत खंडेलवाल के कंधों पर आया उनके शुरुआती तेवरों से ये लग रहा है कि वे संगठन में किसी भी प्रकार की सुस्ती को सहन नहीं करेंगे । गत दिवस भोपाल में पार्टी के दायित्ववान नेताओं और कार्यकर्ताओं के साथ परिचयात्मक सम्मेलन के दौरान उनकी हिदायतें किसी चेतावनी से कम नहीं थीं। इसे संगठन का नया ढांचा खड़ा करने की कवायद भी कहा जा सकता है। उल्लेखनीय है श्री खंडेलवाल का ये कहना भी महत्वपूर्ण है कि उनके परिवार में अकेले वही राजनीति में हैं लिहाजा उनके परिजनों के किसी दबाव में न आयें। दरअसल ऐसा कहकर उन्होंने पार्टी के नेताओं विशेष रूप से जनप्रतिनिधियों को ये संदेश दे दिया कि वे अपने परिवार वालों को शासन और संगठन के काम में अनुचित दखल देने से रोकें। आजकल पूरे प्रदेश से इस प्रकार की खबरें आ रही हैं कि भाजपा नेताओं के रिश्तेदार चाहे जहाँ रौब झाड़ते रहते हैं। मारपीट भी आम हो चली है। सरकारी दफ्तरों में आये दिन भाजपा नेताओं के नाते - रिश्तेदार अभद्रता करते देखे जाते हैं। इसके कारण सरकार और संगठन दोनों की छवि खराब हो रही है। नये प्रदेश अध्यक्ष ने ऐसे लोगों को चेतावनी दी है। लेकिन भाजपा अब जनसंघ वाले दौर से बाहर आ चुकी है। उसमें अन्य पार्टियों से भी बड़ी संख्या में लोगों की आवक हुई है। उनमें से अनेक लोगों को सत्ता और संगठन दोनों में जगह दी गई। ये लोग भाजपा की संस्कृति में रचे - बसे नहीं होने से पार्टी के लिए असहज स्थिति पैदा कर देते हैं। इन लोगों से निपटना  श्री खंडेलवाल के लिए बड़ी चुनौती होगी। हालांकि अब तक उन्होंने जो  संकेत दिये उनसे लगता है कि वे सख्ती से पेश आयेंगे। यदि वे जनसंघ के समय का अनुशासन लागू कर सके तो इससे कुछ लोगों को तकलीफ भले हो किंतु पार्टी के भविष्य के लिए शुभ होगा। श्री खंडेलवाल को विरासत में उपलब्धियाँ और चुनौतियाँ दोनों मिली हैं। अब तक वे परदे के पीछे रहकर काम करते रहे किंतु अब संगठन के शीर्ष पद पर बैठने का अवसर उन्हें मिला है । इसका वे कैसे उपयोग करते हैं इस पर उनका और प्रदेश में  पार्टी दोनों का भविष्य निर्भर करेगा। 


- रवीन्द्र वाजपेयी


Monday, 14 July 2025

मानसून की मेहरबानी बनी परेशानी

पूरे देश में इन दिनों अच्छी बरसात होने से मौसम खुशनुमा हो गया है। जिन इलाकों में अमूमन कम वर्षा होती थी वहाँ भी इस साल मानसून मेहरबान है। जल ही जीवन है इसलिए बरसात का सभी स्वागत करते हैं। भारत में मानसूनी बरसात न सिर्फ कृषि अपितु अगले साल बरसात आने तक पेय जल की आपूर्ति को सुनिश्चित करता है। नदियों के अलावा कुए, तालाब आदि भी मानसून के भरोसे ही रहते हैं। आजकल ट्यूब वेल का जमाना है जिसके लिए भूजल का स्तर बेहद आवश्यक होता है और वह भी अच्छी बरसात पर ही निर्भर है। बरसाती पानी को सहेजने के लिए छत के पानी का संचयन ( रूफ टॉप वाटर हार्वेस्टिंग) का प्रचलन भी बढ़ा है किंतु इसका प्रतिशत जरूरत से बहुत कम है। दूसरी तरफ बढ़ता शहरीकरण  पुराने तालाब, कुए, बाग - बगीचों की बलि लेता जा रहा है। कच्ची जगहें कम होने से धरती की पानी सोखने की मात्रा भी निरंतर कम होती जा रही है। शहरों और गाँवों के बीच की दूरी घटते जाने से प्राकृतिक जंगलों की जगह कांक्रीट के विशालकाय ढांचे उग आए हैं। शहरों के साथ ही गाँव में  भी घनी बसाहट दिखाई देने लगी है। इसका परिणाम अब वहाँ का खुलापन खत्म होने के कगार पर है। शहरी रहन - सहन अपनाने के कारण ग्रामीण समाज भी उन सभी बुराइयों को अपनाता जा  रहा है। यही वजह है कि बरसात के आंकड़ों के साथ ही ये खबरें भी लगातार आ रही हैं कि सब दूर पानी भर रहा है। नदियों में बाढ़ है। पुल डूब रहे हैं, सड़कों पर पानी भरा होने से आवागमन बाधित हो रहा है। घरों और बस्तियों में पानी भरना आम हो गया है। पानी की निकासी के सारे प्रबंध दम तोड़ चुके हैं । ग्रामीण और कस्बों को छोड़ भी दें किंतु जिन शहरों को विकास का प्रतीक माना जाता है वे भी घंटे भर की बरसात में लबालब हो जाते हैं। देश की राजधानी दिल्ली हो या आर्थिक राजधानी मुंबई सभी में बरसात बड़ी समस्या बन जाती है। गुड़गांव और बेंगुलूरु  सायबर सिटी के रूप में भले ही दुनिया भर में प्रसिद्ध हों किंतु बरसात में इन दोनों की दुर्गति हो जाती है। इस साल जो खबरें आ रही हैं उनके अनुसार तो पूरे देश की स्थिति एक जैसी है। ये देखते हुए कहा जा सकता है कि विकास की अंधी दौड़ में जल निकासी के बारे में समुचित ध्यान नहीं दिया गया। नगरीय निकायों में व्याप्त भ्रष्टाचार और भूमाफिया के साथ संगामित्ति ने स्थितियाँ चिंताजनक   बना दी हैं। इस हालत के लिए राजनेताओं को भी जिम्मेदार मानना होगा क्योंकि भूमाफिया को संरक्षण के अलावा विकास कार्यों में होने वाले भ्रष्टाचार को बजाय रोकने के उल्टे वे उसे प्रोत्साहित करते हैं। आज शहरों का जो अनियोजित विकास हुआ उसमें बड़ी भूमिका राजनीतिक नेताओं की है। इस सबके कारण बरसात मुसीबत बन जाती है। इसमें कमी या विलंब जहाँ चिंता उत्पन्न करता है वहीं भरपूर बरसात भी परेशानी का सबब बन जाती है। इस वर्ष मानसून ने पूरे देश पर मेहरबानी की है। अब तक के आंकड़े दर्शाते हैं कि इस साल औसत से अधिक पानी बरसेगा जिससे जल स्रोत लबालब हो जाएंगे किंतु बाढ़ और जल प्लावन ने सोचने बाध्य कर दिया है।  शहरों के साथ ही ग्रामीण विकास पर प्रति वर्ष अरबों - खरबों  खर्च होते हैं। बिजली ,पानी ,सड़क जैसी सुविधाएं सुदूर क्षेत्रों तक पहुंचाने का काम हो रहा है। लेकिन बरसात में उत्पन्न होने वाली इस समस्या के निदान के बारे में सोचने की फुर्सत किसी को नहीं है। जल प्लावन से जन हानि भी होती है। देश में सैकड़ों लोग डूबकर मर गए, पानी भरने से लोगों का जो नुकसान हुआ उसका अनुमान कोई नहीं लगा सकता। इससे बढ़कर सड़कों आदि को जो क्षति पहुंचती है वह विकास के पहिये को उल्टी दिशा में घुमा देती है। हमारे देश में आग लगने पर कुआ खोदने की सुध आने की उक्ति काफी प्रचलित है । इसी तरह जब जल प्लावन होता है तब कुछ दिन आपदा प्रबंधन नजर आता है और बाद में सब भुला दिया जाता है। इस साल की हालत से सबक लेकर भविष्य के लिए यदि समुचित व्यवस्थाएँ की जाएं तो देश को बड़े नुकसान से बचाया जा सकता है। साथ ही डूबने से होने वाली मौतें भी रोकी जा सकती हैं।  


-रवीन्द्र वाजपेयी

Saturday, 12 July 2025

डोभाल की चुनौती एक तीर से दो निशाने

राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल राजनीतिक व्यक्ति  नहीं हैं। एक शासकीय अधिकारी के तौर पर उन्होंने विभिन्न दायित्वों का निर्वहन अत्यंत कुशलता के साथ किया। पाकिस्तान में राॅ के एजेंट के तौर पर भी रहे। उत्तर पूर्वी  राज्यों में उग्रवादी संगठनों को शांति के रास्ते पर लाने में भी उनकी भूमिका सराहनीय रही। आम तौर पर वे बयानबाजी से दूर ही रहते हैं। जम्मू - कश्मीर से धारा 370 हटाने में उन्होंने जो जमीनी काम किया वह ऐतिहासिक कहा जाएगा। जब पूरी कश्मीर घाटी में जबरदस्त तनाव था तब वे लोगों के बीच घूमकर उस निर्णय के फायदों से  लोगों को अवगत कराने का साहसिक प्रयास कर रहे थे। बीते 10 वर्षों में भारतीय सुरक्षा तंत्र जिस तरह मजबूत हुआ उसमें बतौर राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार उन्होंने उल्लेखनीय योगदान दिया। अनेक महत्वपूर्ण कूटनीतिक मिशनों पर प्रधानमंत्री के साथ उनकी उपस्थिति काफी कुछ कह जाती है। यही वजह है कि चाहे बाह्य सुरक्षा हो या आंतरिक, श्री डोभाल उससे प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष तौर पर जुड़े रहते हैं। इसलिए उनकी किसी भी बात में वजन होता है। गत दिवस उन्होंने चेन्नई में एक कार्यक्रम के दौरान विदेशी मीडिया को चुनौती दी कि ऑपरेशन सिंदूर के दौरान भारत की किसी भी संरचना को हुए नुकसान का एक भी चित्र दिखाएं। साथ ही उन्होंने इस दावे को दोहराया कि भारत ने पाकिस्तान में जितने भी ठिकानों पर हमला किया उनमें से एक भी निशाना नहीं चूका। श्री डोभाल के अनुसार 7 मई की  रात मात्र 23 मिनिट में ही हमारी सेना  अपना काम पूरा कर चुकी थी। आई.आई.टी चेन्नई के दीक्षा समारोह में दिये गये भाषण में श्री डोभाल द्वारा कही गईं उक्त बातों से पाकिस्तान को मिर्ची लग गई। उसके एक सरकारी प्रवक्ता ने संघर्ष के महिमामंडन की आलोचना भी कर डाली। दरअसल सुरक्षा सलाहकार ने उन विदेशी समाचार माध्यमों को कटघरे में खड़ा किया जिन्होंने आपरेशन सिंदूर के दौरान  पाकिस्तान द्वारा भारत को नुकसान पहुंचाए जाने के दावों को बढ़ा - चढ़ाकर  प्रचारित किया। लेकिन दुख इस बात का है कि हमारे देश में ही विपक्ष के अनेक नेता और मोदी विरोध में लिप्त कतिपय यू ट्यूबर इस बात की रट लगाए रहे कि पाकिस्तान की जवाबी कारवाई में भारत को बहुत नुकसान हुआ। ऐसे समय जब सेना का मनोबल बढ़ाने की जरूरत थी तब ये वर्ग सरकार से ऐसे सवाल पूछने में लगा रहा जो न सिर्फ अनावश्यक अपितु आपत्तिजनक भी थे। विदेशी समाचार माध्यमों की पाकिस्तान समर्थक खबरों को सही मानकर सेना और सरकार दोनों को घेरने का प्रयास अभी भी चला आ रहा है। ये देखते हुए श्री डोभाल ने विदेशी समाचार माध्यमों को जो चुनौती दी है उसका निशाना भारत में ऑपरेशन सिंदूर की सफलता के बजाय पाकिस्तान के झूठे दावों को सही मानने वाले उन लोगों पर भी है जिनका काम देश का मनोबल तोड़कर अपना उल्लू सीधा करना मात्र रह गया है। उनसे ये अपेक्षा कोई नहीं करता कि वे सरकार के सभी कार्यों और फैसलों का समर्थन करें किंतु जब हमारी सेना ने दुश्मन की कमर तोड़कर रख दी तब बजाय उसके पराक्रम की प्रशंसा करने के  दुश्मन देश द्वारा हाँकी जा रही डीगों को सही मानकर अपनी सेना की वीरता को कमतर आंकना बेहद गैर जिम्मेदाराना है। सरकार ने ऐसे सवालों का जवाब न देकर ठीक किया क्योंकि सेना से जुड़े मामलों में सार्वजनिक चर्चा करना उचित नहीं होता। श्री डोभाल  ने विदेशी समाचार माध्यमों को चुनौती देने का जो साहस दिखाया उससे पाकिस्तान का भड़कना साबित करता है कि उनकी चुनौती में दम है। लेकिन अपने देश में बैठे उस तबके पर इसका कोई असर होगा ये कहना मुश्किल है क्योंकि जो लोग सेना से सर्जिकल स्ट्राइक का सबूत मांग सकते हैं उनसे किसी परिपक्वता की उम्मीद करना व्यर्थ है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Friday, 11 July 2025

विदेशी नागरिकों को मतदाता बनने से रोकना राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए जरूरी



सर्वोच्च न्यायालय ने बिहार में मतदाता सूचियों के पुनरीक्षण पर रोक लगाने से इंकार करते हुए चुनाव आयोग को मतदाताओं की पहिचान साबित करने के लिए आधार और राशन कार्ड  के अलावा मतदाता पहचान पत्र को भी स्वीकार करने का सुझाव देकर अपेक्षा की है कि किसी वैध मतदाता का नाम सूची में शामिल होने से रह न जाए। लेकिन उन सुझावों को मानने के लिए आयोग को बाध्य भी नहीं किया।और भी कुछ सवालों पर पर आयोग से जवाब तलब किये गए हैं साथ ही  इस अभियान के समय को लेकर भी   टिप्पणियां कीं। विपक्ष द्वारा प्रस्तुत याचिकाओं के पक्ष में दिग्गज अधिवक्ताओं द्वारा मुख्य रूप से तर्क  दिया कि नागरिकता का सत्यापन चुनाव आयोग के अधिकार में नहीं आता। उल्लेखनीय है चुनाव आयोग ने बिहार के करोड़ों मतदाताओं से जो दस्तावेज मांगे हैं उनका उद्देश्य ये सुनिश्चित करना है कि कोई विदेशी नागरिक मतदाता न बन जाए। ये बात  सही है कि देश में अवैध रूप से रह रहे अनगिनत बांग्लादेशियों और रोहिंग्या मुसलमानों के आधार और राशन कार्ड बन चुके हैं जिसके आधार पर उनके नाम मतदाता सूचियों में भी दर्ज हो गए। वोट बैंक के सौदागरों ने भी देशहित को ताक पर रखते हुए अपने राजनीतिक स्वार्थ की खातिर विदेशी नागरिकों को मताधिकार दिलवा दिया। ये स्थिति वैसे तो कमोबेश सभी राज्यों में है लेकिन  बिहार, प. बंगाल और असम में ये काम बड़े पैमाने पर हुआ। ये विदेशी किन पार्टियों के पक्ष में मतदान करते होंगे ये बात सभी जानते हैं। बांग्लादेशियों को देश से बाहर निकालने के किसी भी प्रस्ताव पर प. बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बैनर्जी की बेहद रोषपूर्ण प्रतिक्रिया सामने आती रही है। बिहार में लालू प्रसाद यादव भी इसी अभिमत के हैं। जाहिर है  बांग्लादेशी और रोहिंग्या मुसलमान पूरी तरह भाजपा विरोधी हैं। स्मरणीय है जब विदेशी नागरिकों की पहिचान सुनिश्चित करने के लिए नागरिकता संशोधन कानून और नागरिकता रजिस्टर बनाने का फैसला किया गया तब भी वही  राजनीतिक ताकतें उसके विरोध में खड़ी नजर आईं जो बिहार में मतदाता पुनरीक्षण को रुकवाने सर्वोच्च न्यायालय की चौखट पर खड़ी हैं। किसी की नागरिकता का प्रमाणीकरण करना निश्चित रूप से गृह मंत्रालय का काम है किंतु कोई विदेशी अवैध  रूप से मतदाता न बन जाए इसकी फिक्र करना चुनाव आयोग का भी दायित्व है। मतदाता सूचियाँ तैयार करने का काम चुनाव आयोग के निर्देश पर जो शासकीय कर्मी करते हैं उनके साथ मान्यता प्राप्त राजनीतिक दलों के कार्यकर्ता भी रहते हैं जिससे समूची प्रक्रिया पारदर्शी रहे। बिहार में भी इसका पालन किया जा रहा है। चुनाव आयोग ने मतदाताओं को एक प्रपत्र भरकर कुछ दस्तावेज संलग्न करने कहा। अधिकांश लोगों ने वे प्रपत्र भरकर लौटा दिये। आयोग का कहना है कि मतदाता सूची को अंतिम रूप देने के पहले लोगों को अपना नाम जुडवाने के समुचित अवसर दिये जाएंगे। जिनके नाम छूटेंगे वे भी आपत्ति  और अपील कर सकेंगे।  हो सकता है कि इस प्रक्रिया में कुछ व्यवहारिक परेशानियाँ मतदाताओं के लिए उत्पन्न हो रही हों जिन्हें दूर किया जा सकता है।  आयोग की ओर से ये संकेत भी दे दिया गया है कि पूरे देश में मतदाता सूचियों का पुनरीक्षण करने के लिए इसी तरीके को अपनाया जायेगा। अतीत में सर्वोच्च न्यायालय भी इस बात पर चिंता जता चुका है कि  विदेशी नागरिक व्यवस्था में व्याप्त खामियों का लाभ उठाकर न सिर्फ समस्त कल्याणकारी योजनाओं का लाभ उठा रहे हैं बल्कि मतदाता बनकर जनादेश को भी प्रभावित करते हैं। निश्चित रूप से ये स्थिति देश की सुरक्षा और अखंडता के लिए घातक है। विदेशी घुसपैठियों को मानवीय आधार पर शरण देने का दंड यूरोपीय देश किस प्रकार भोग रहे हैं ये किसी से छिपा नहीं हैं। नागरिकता संशोधन कानून के विरोध में शाहीन बाग जैसे जो आंदोलन देश के अनेक हिस्सों में हुए वे देश में आंतरिक सुरक्षा के लिए खतरा उत्पन्न करने का पूर्वाभ्यास ही था जो सरकार की सजगता और सख्ती से टल गया किंतु शाहीन बाग वाली मानसिकता बरकरार है जिसे अल्पसंख्यक वोटों  के लालच में बढ़ावा दिया जा रहा है। बिहार में मतदाता सूचियों के पुनरीक्षण का मकसद विदेशी नागरिकों को मतदाता बनने से रोकना मात्र  है। इसका विरोध करने वाले भी वही तत्व हैं जो विदेशी घुसपैठियों को भारत का नागरिक बनवाकर अपनी राजनीतिक जमीन मजबूत करना चाहते हैं। 

Thursday, 10 July 2025

पुराने पुलों की मजबूती और भार क्षमता की जाँच जरूरी


गुजरात में बड़ौदा और आणंद को जोड़ने वाला चार दशक पुराना गंभीरा पुल ढह जाने से उस पर चल रहे कुछ वाहन नीचे बह रही नदी में गिर गए। अब तक 15 शव निकाले जा चुके हैं जबकि बाकी की तलाश जारी है। बरसात के कारण नदी में बहाव काफी तेज होने से बचाव दलों को काफी मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है। जो जानकारी मिली उसके अनुसार इस पुराने पुल की गत वर्ष  मरम्मत होने के बाद इंजीनियरों द्वारा  तकनीकी तौर पर इसे पूरी तरह से दुरुस्त मान लेने  पर ही दोबारा यातायात के लिए खोला गया। क्षेत्रीय विधायक के अनुसार तो पुल की मरम्मत के उपरांत उसका उपयोग शुरू करने संबंधी अनुपति बाकायदा मुख्यमंत्री कार्यालय से मिली थी। एक साल के भीतर ही पुल के बीच से टूट जाने से ये आशंका उत्पन्न हुई है कि मरम्मत का काम स्तरहीन था और जिस ठेकेदार ने वह काम किया उसकी उन इंजीनियरों से सांठगांठ थी जिन्होंने उसके काम को सही होने का प्रमाणपत्र दिया। जाँच का मुद्दा ये भी है कि चालीस साल पुराना वह पुल दोबारा उपयोग करने  योग्य था भी या नहीं? बढ़ते यातायात को देखते हुए उसकी क्षमता का परीक्षण हुआ या नहीं , ये भी बड़ा सवाल है। एक - दो वर्ष पूर्व भी गुजरात के एक पर्यटन स्थल पर मरम्मत के बाद खोले गए पुल पर भीड़ बढ़ जाने से वह गिर गया जिसमें दर्जनों लोग मारे गए थे। हालांकि इस तरह के हादसे पूरे देश में होते हैं। बिहार में तो हालिया वर्षों में अनेक निर्माणाधीन पुल टूटकर गिर गए। इन घटनाओं में इक्का - दुक्का के पीछे तकनीकी या प्राकृतिक कारण हो सकता है किंतु अधिकांश में भ्रष्टाचार ही मुख्य रूप से  होता है। इंजीनियरों के साथ मिलीभगत  से घटिया निर्माण सामग्री का उपयोग होने के अलावा डिजाइन संबंधी खामियां भी वजह बनती है।  संबंधित शासकीय विभागों के अमले द्वारा बरती जाने वाली लापरवाही का उदाहरण हाल ही में भोपाल में बने एक पुल से मिला जिसमें 90 अंश का मोड़ बना दिया गया। गुजरात के ताजा हादसे के बाद हालांकि सरकारी निर्माणों में होने वाला भ्रष्टाचार रुक जाएगा इसकी उम्मीद करना अपने आप को धोखे में रखना है क्योंकि राज्य कोई भी हो और सत्ता किसी भी पार्टी की हो , सरकार द्वारा करवाये जाने वाले निर्माण में गुणवत्ता का 100 फीसदी पालन होना असंभव है जिसका एकमात्र कारण है भ्रष्टाचार । सरकारी अमला और ठेकेदार की संगमित्ती को  सत्ताधीशों का संरक्षण मिलता है । इसीलिए ऐसी घटनाओं के लिए दोषी करार दिये गए लोग या तो बच निकलते हैं या उन्हें दी जाने वाली सजा उनके अपराध की तुलना में बेहद मामूली होती है। इसीलिए भ्रष्टाचार में लिप्त सरकारी तंत्र और ठेकेदार रूपी व्यवस्था के मन में कोई खौफ नहीं रहता। हर वर्ष इस तरह के हादसों में अरबों - खरबों की आर्थिक क्षति होने के साथ ही दर्जनों  लोगों को बिना किसी कसूर के जान गंवानी पड़ती है जिसकी क्षतिपूर्ति सरकार द्वारा दिये जाने वाले मुआवजे से नहीं हो सकती। गुजरात में गंभीरा पुल गिरने की जांच से दुर्घटना का सही कारण सामने आना मुश्किल है क्योंकि जाँच करने वाले  दूध के धुले होंगे इसमें संदेह बना रहेगा। एक और सवाल इस हादसे के संदर्भ में उठना स्वाभाविक है कि समय - समय पर  पुराने हो चुके पुलों की क्षमता का सही आकलन क्यों नहीं होता?  गंभीरा पुल कहने को तो महज चार दशक पुराना बताया जा रहा है किंतु ऐसा लगता है उसकी मूल डिजाइन और मजबूती आज के यातायात का  दबाव सहने में सक्षम नहीं है। ऐसे में उसकी मरम्मत होने के बाद दोबारा आवागमन के लिए खोलने से पूर्व जो जाँच हुई उसमें बेईमानी की किये जाने की आशंका  है। इसलिए इस हादसे की जाँच किसी ऐसी एजेंसी से करवाया जाना  चाहिए जिसकी पेशेवर ईमानदारी पर उंगली न उठ सके। केन्द्र सरकार को इस मामले में पहल करनी चाहिए। इस दुर्घटना से सबक लेकर देश भर में उन छोटे -  बड़े पुलों की जाँच करवाई जाए जो दो - तीन दशक पुराने हो चले हैं और बढ़ते यातायात का बोझ सहने में अक्षम प्रतीत होते हैं। 


- रवीन्द्र वाजपेयी


Wednesday, 9 July 2025

छांगुर बाबा का विदेशी जुड़ाव देश के लिए खतरा




उ.प्र के बलरामपुर जिले में छांगुर बाबा ( असली नाम जमालुद्दीन) नामक एक व्यक्ति की गिरफ्तारी के बाद जो खुलासे हो रहे हैं वे चौंकाने वाले हैं। छांगुर बाबा पर हिन्दू लड़कियों को पैसे का लालच देकर मुस्लिम धर्म स्वीकार करवाने का आरोप है। गत दिवस उसके 40 कमरे वाले अड्डे पर बुलडोजर चला दिया गया। छांगुर बाबा का गिरोह जाति के हिसाब से धर्मान्तरण की कीमत अदा करता था उदाहरण के लिए अगड़ी जाति के लिए 15 से 16  लाख दिये जाते, वहीं पिछड़ी जाति के लिए 10 से 12 और अन्य को 8 से 10 लाख देकर मुस्लिम बनाया जाता था। बाबा खुद को सूफी संत के तौर पर पेश करता रहा। उसने अब तक 50 बार मुस्लिम देशों की यात्राएं कीं।  गिरफ्तारी के बाद पता चला है कि उसे विदेशों से 100 करोड़ रु. मिले जिनका उपयोग धर्मांतरण के लिए किया जाता रहा। चूंकि मामला विदेशी फंडिंग से जुड़ा है इसलिए जाँच में ईडी को भी शामिल किया जा सकता है। बहरहाल छांगुर बाबा के पकड़े जाने के बाद अब ये बात साफ हो गई है कि भारत के इस्लामीकरण का षडयंत्र कितना गहरा है। उ.प्र के जिस इलाके में छांगुर बाबा का अड्डा था वह नेपाल से सटा तराई का इलाका है। इसके बारे में कहा जाता है कि यहाँ बड़े पैमाने पर मुस्लिमों को बसाया जा रहा है। ये स्थिति बिहार तक देखी जा सकती है जहाँ पिछले विधानसभा चुनाव में असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी के 5 विधायक जीतने से बिहार की राजनीति में बड़े बदलाव की आहट महसूस की जाने लगी। नेपाल से सटे इलाकों में मुस्लिम आबादी का लगातार बढ़ना कई आशंकाओं को जन्म देता है। उल्लेखनीय है बिहार , असम और प. बंगाल के अनेक जिलों में जनसंख्या संतुलन पूरी तरह से मुसलमानों के पक्ष में झुक जाने से राजनीतिक स्थितियाँ भी इकतरफा होती जा रही हैं। मुस्लिम बहुल इलाकों में बांग्ला देशी और रोहिंग्या मुस्लिम घुसपैठियों को भी आसानी से पनाह मिल जाती है। इसी तरह की चिंताजनक खबरें पंजाब के उन सीमावर्ती जिलों से आ रही हैं जहाँ बड़ी संख्या में सिख आबादी ईसाइयत में ढलती जा रही है। अमृतसर जैसे जिले में भी जहाँ सिखों को अत्यन्त पवित्र अकाल तख्त स्थित है, बड़े पैमाने पर सिखों का धर्मांतरण करवाकर उन्हें ईसाई बनाया गया है और ये सिलसिला बेरोकटोक जारी है। इस समस्या के प्रति लोगों के कान उस समय खड़े हुए जब कांग्रेस  द्वारा चरनजीत सिंह चन्नी को मुख्यमंत्री बनाया जिनके बारे में प्रचारित हुआ कि वे ईसाई बन चुके थे। हालांकि बाद में इसका खंडन हुआ जिसमें बताया  गया वे रामदासिया समुदाय से हैं जिसे दलित माना जाता है। लेकिन देखने वाली बात ये है कि सामाजिक भेदभाव और छुआछूत से ऊपर उठ चुके प्रगतिशील सिख समुदाय का दलित वर्ग ईसाइयत की तरफ झुकता जा रहा है जिसे रोकने में सिखों की धार्मिक संस्थाएं विफल साबित हो रही हैं। इस बारे में चिंता का विषय ये है कि कैनेडा जैसा ईसाई बहुल देश खालिस्तानी आतंकवादियों को भारत विरोधी गतिविधियां संचालित करने के लिए मदद करता आया है। उस कारण से कैनेडा खालिस्तानियों का गढ़ बन चुका है। ये देखते हुए पाकिस्तान की सीमा से लगे पंजाब के जिलों का ईसाईकरण देश की सुरक्षा के लिए बड़ा खतरा बन सकता है। पूर्वोत्तर से पंजाब तक सीमावर्ती जिलों में अल्पसंख्यकों की बढ़ती आबादी देश की एकता और अखंडता के लिए बड़ा खतरा बनती जा रही है। ये कहना गलत नहीं होगा कि देश के जिस भी क्षेत्र में हिन्दू अल्पसंख्यक होते हैं वहाँ अलगाववादी गतिविधियां बढ़ने लगती हैं। उस दृष्टि से चाहे छांगुर बाबा हों या पंजाब में सक्रिय ईसाई  मिशनरियों की गतिविधियां, इन सभी के विदेशी जुड़ाव का खुलासा जरूरी है। दुख की बात है कि वोट बैंक के लालच में विभिन्न राजनीतिक दल लोभ, लालच और धोखा देकर हिंदुओं को मुस्लिम और ईसाई बनाये जाने पर मुँह में दही जमाये बैठे रहते हैं।

- रवीन्द्र वाजपेयी

Tuesday, 8 July 2025

ट्रम्प पूरी दुनिया से बैर भाव बढ़ाने की मूर्खता दोहरा रहे


अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प जिस प्रकार से अन्य देशों के साथ पेश आ रहे हैं वह हास्यापद  है। अपने परंपरागत मित्र देशों पर भी  बेरहमी से आयात शुल्क (टैरिफ) थोपना मनमानी ही कही जाएगी। अमेरिकी  गुट में माने जाने वाले यूरोपीय देश भी उनके सनकीपन से त्रस्त होकर वैकल्पिक संरक्षण  की तलाश में हैं। चीन और रूस पर तो उनका रौब नहीं चल पा रहा किंतु बाकी देशों पर मनमर्जी का आयात शुल्क लगाकर वे खुद को दुनिया का भाग्यविधाता मान बैठे हैं।  गत दिवस उन्होंने ब्रिक्स नामक संगठन को भी धमकाया कि यदि वह उनके हिसाब से नहीं चला तो उसमें शामिल देशों पर 10 प्रतिशत अतिरिक्त आयात शुल्क लगा दिया जायेगा। उधर जापान पर 10 फीसदी टैरिफ का बोझ बढ़ाते हुए अमेरिकी राष्ट्रपति ने ये प्रस्ताव भी दिया कि यदि वह अपनी कारों का उत्पादन अमेरिका में करे तब उसे इस टैरिफ से मुक्ति दे दी जाएगी। ऐसा ही दबाव उन्होंने एपल फोन बनाने वाली कंपनी पर डालते हुए उसे भारत के बजाय अमेरिका में उत्पादन करने का प्रस्ताव दिया जिसे नहीं मानने पर अतिरिक्त टैरिफ लगाकर फोन महंगा करने की चेतावनी दे डाली। ब्रिक्स से ट्रम्प इसलिए खफा हैं क्योंकि उसमें शामिल देश अपनी साझा मुद्रा में आपसी व्यापार करने पर विचार कर रहे हैं। और ऐसा होने पर अमेरिकी डॉलर का प्रभुत्व खतरे में पड़ जाएगा। सही बात ये है कि बड़ी चीजों का उत्पादन करने में भले ही अमेरिका विश्व में अग्रणी हो किंतु दैनिक उपयोग में आने वाली सैकड़ों वस्तुओं का उसे आयात करना होता है। इस वजह से उसका व्यापार घाटा बढ़ता गया। चीन और भारत जैसे देशों में ही ऐसी तमाम अमेरिकी कंपनियां हैं जो यहाँ अपना उत्पादन करने के बाद अमेरिका में बेचती हैं। ट्रम्प इसी स्थिति को बदलना चाह रहे हैं। दूसरा दबाव उनका भारत सहित अनेक देशों पर अमेरिका में बने हथियार, लड़ाकू विमान, मिसाइलें, ड्रोन जैसी युद्ध सामग्री खरीदने का है। लेकिन  आज के विश्व में किसी एक देश का  चौधरी बना रहना मुमकिन नहीं है। ब्रिक्स और शंघाई सहयोग जैसे अंतर्राष्ट्रीय संगठन विश्व की बड़ी आबादी और अर्थव्यवस्थाओं का प्रतिनिधित्व करते हैं। इनके बीच  समन्वय से अमेरिकी सर्वोच्चता को चुनौती मिल रही है। हालांकि इनमें शामिल सभी देश आर्थिक और सामरिक तौर पर भले ही बहुत ताकतवर न हों किंतु  आपसी व्यापार के जरिये वे एक दूसरे का सहारा बनते हैं। दुनिया का बड़ा बाजार भी इन देशों में होने से अमेरिका को भविष्य में अपने लिए खतरा महसूस होने लगा है। लेकिन ट्रम्प एक साथ पूरी दुनिया से टकराने की जो गलती कर रहे हैं उसकी वजह से अमेरिका की विश्वसनीयता में लगातार कमी आती जा रही है। अचानक महंगाई बढ़ने से आम अमेरिकी नागरिक नाराज हो चला है। घरेलू मोर्चे पर भी उथल - पुथल है। अप्रवासियों को थोक के भाव निकाल बाहर करने  की  मुहिम के कारण कानून व्यवस्था के लिए संकट उत्पन्न होने लगा है। राज्यों के साथ भी उनके रिश्ते तनावपूर्ण हो रहे हैं। छोटी - छोटी बातों में  हस्तक्षेप से ट्रम्प की अपनी पार्टी में ही उनका विरोध शुरू हो चुका है। इलान मस्क जैसे नजदीकी सिपहसालार का साथ छोड़ जाना उनके दबदबे पर सवालिया निशान लगाने काफी है। भारत - पाकिस्तान और ईरान- इसराइल युद्ध के दौरान ट्रम्प का व्यवहार अजीबोगरीब रहा। विशेष रूप से युद्धविराम का श्रेय लूटने की आपाधापी से उनकी  छवि एक विदूषक की बन गई। लेकिन उन पर इस सबका कोई भी असर नहीं पड़ रहा। इसलिए अब पूरी दुनिया उनसे छिटकने लगी है। अमेरिका के सभी राष्ट्रापति सुलझे और समझदार रहे हों ये कहना तो सत्य को नकारना होगा किंतु बीते अनेक दशकों में जितने भी व्यक्ति व्हाइट हाउस में बैठे उनमें डोनाल्ड ट्रम्प से हल्का और अस्थिर मस्तिष्क वाला राष्ट्रपति शायद ही दूसरा रहा होगा। अपने पिछले कार्यकाल में भी उन्होंने कुछ ऊलजलूल काम किये जिसकी वजह से उन्हें जनता ने लगातार दूसरा अवसर नहीं दिया। लेकिन उनके उत्तराधिकारी जो बाइडेन का प्रदर्शन और भी गया - गुजरा  होने से उनकी वापसी हो गई। अमेरिका के हितों की रक्षा करना बेशक उनका दायित्व है किंतु इसके लिए वे पूरी दुनिया से बैर भाव बढ़ा लें ये सिवाय मूर्खता के और कुछ भी नहीं जिसे वे आये दिन दोहराने में लगे हैं। उनकी ये सनक कहां जाकर रुकेगी ये तो वही जानते हैं किंतु इसकी वजह से अमेरिका की साख और धाक दोनों को जबरदस्त नुकसान हो रहा है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी


Monday, 7 July 2025

दांव उल्टा पड़ते ही बचाव करने में जुटे उद्धव


मुंबई में राज ठाकरे  और उद्धव ठाकरे द्वारा प्राथमिक कक्षाओं में तीसरी भाषा के रूप में हिन्दी की अनिवार्यता खत्म करने के फड़नवीस सरकार के निर्णय को अपनी विजय मानते हुए बीते सप्ताह एक मंच पर आकर जो शक्ति प्रदर्शन किया उसे एक बड़े राजनीतिक परिवर्तन के तौर पर देखा गया। भले ही  दोनों भाईयों ने अपने दलों के एकीकरण का कोई संकेत नहीं दिया किंतु मुंबई महानगरपालिका के आगामी चुनाव के मद्देनजर दोनों के गठबंधन का संकेत इससे अवश्य मिला। इस पुनर्मिलन पर इंडिया गठबंधन के शेष घटक तो शांत रहे किंतु  दक्षिण में बैठी द्रमुक को मुँह मांगी मुराद मिल गई जिसका प्रमाण तमिलनाडु के मुख्यमंत्री स्टालिन के उस बयान से मिला जिसमें उन्होंने उद्धव ठाकरे को बधाई देते हुए इस बात पर हर्ष व्यक्त किया कि हिन्दी विरोधी लड़ाई अब तमिलनाडु से बाहर पहुँच गई है । इसके साथ ही स्टालिन ने हिन्दी विरोधी लड़ाई मिलकर लड़ने की पेशकश कर डाली। लेकिन इस बिन मांगे समर्थन से खुश होने के बजाय उद्धव ठाकरे गुट रक्षात्मक हो गया। पार्टी के प्रवक्ता संजय राउत ने पत्रकारों से चर्चा करते हुए स्पष्ट किया कि उनकी पार्टी हिन्दी की विरोधी नहीं अपितु उसे लादे जाने के विरुद्ध है। स्टालिन द्वारा की गई पेशकश से कन्नी काटते हुए उन्होंने कहा कि द्रमुक के लोग हिन्दी बोलते ही नहीं  हैं जबकि हम लोग हिन्दी का प्रयोग बोलचाल में किये जाने के विरोधी नहीं हैं। इसके अलावा भी उन्होंने कई ऐसी बातें कीं जो विजय रैली में राज और उद्धव द्वारा कहीं गई बातों से अलग थीं। उल्लेखनीय है उस रैली में उद्धव यहाँ तक बोल गए थे कि यदि मराठी के लिए लड़ना गुंडागर्दी है तो हम गुंडे हैं। सही बात ये है कि राज और उद्धव को उस रैली के बाद जिस प्रकार के समर्थन की उम्मीद रही वह नजर नहीं आया। इंडिया गठबंधन के मुख्य घटक कांग्रेस के अलावा महाराष्ट्र के बड़े नेता शरद पवार ने भी ठाकरे बंधुओं की हिन्दी विरोधी मुहिम को पूरी तरह उपेक्षित कर दिया। अन्य राज्यों में बसे मराठीभाषियों की ओर से कोई प्रतिक्रिया नहीं आई। लेकिन स्टालिन के अप्रत्याशित समर्थन ने ठाकरे बंधुओं की चिंता बढ़ा दी क्योंकि शिवसेना का जन्म ही मुंबई में  दक्षिण भारतीयों के विरोध से हुआ था। हालांकि राज को तो इससे ज्यादा फर्क नहीं पड़ेगा क्योंकि उनका जनाधार काफी सिमट चुका है किंतु उद्धव के लिए चेन्नई से आई बधाई परेशान करने वाली रही। चूंकि विजय रैली में वे कुछ ज्यादा ही हाँक चुके थे इसलिए पीछे हटने की शर्मिंदगी से बचने अपने प्रवक्ता संजय राउत को आगे कर दिया जो मराठी अस्मिता के नाम पर दहाड़ने के बजाय मिमियाते नजर आये। असल में उद्धव को ये एहसास हो गया कि मराठी की रक्षा के लिए हुई रैली से यदि कोई लाभ होगा तो उसका बड़ा हिस्सा राज को मिलेगा क्योंकि मराठी को लेकर उनके तेवर सदैव उग्र रहे  हैं। सरकारी नौकरी के लिए परीक्षा देने आये अन्य राज्यों के युवकों के साथ हिंसा भी उन्हीं के उकसावे पर होती थी। दूसरी ओर उद्धव ने गैर मराठीभाषियों को भी अपने साथ जोड़ने की नीति  बनाई जिसका लाभ भी मिलने लगा था। ऐसे में एक सीमा के बाद हिन्दी विरोध करने से गैर मराठी समर्थक छिटक सकते हैं। उससे भी बड़ी बात ये हुई कि राज व और उद्धव के मंच साझा करने से मुंबई के गैर मराठी भाषियों का ध्रुवीकरण होने की संभावना बढ़ गई। इससे मुंबई महानगरपालिका के आसन्न चुनावों में  उद्धव को अपना खेल खराब होने की आशंका सताने लगी। मराठी की आड़ में हिन्दी भाषियों के साथ किये गए अपमानजनक व्यवहार के बारे में मुंबई से ही सोशल मीडिया पर जो उग्र प्रतिक्रियाएं  प्रसारित हुईं उनसे भी वे चौकन्ने हुए। ये सब देखते हुए लगता है उद्धव द्वारा हिन्दी विरोध का जो दांव चला गया वह उल्टा पड़ गया इसीलिए उन्होंने श्री राउत को आगे करते हुए बचाव का रास्ता खोजा। लेकिन मराठी का समर्थन करने में गुंडा कहलाने तक के लिए तैयार उद्धव को जो नुकसान होना था उसकी भरपाई अब संभव नहीं है। उल्टे  हिन्दी के प्रति ज्यादा नरम होने का दिखावा करने से कट्टर मराठी समर्थक हाथ से खिसक जाने का खतरा पैदा हो गया है। ठाकरे बंधुओं को ये बात समझनी होगी कि यदि गैर मराठीभाषी मुंबई छोड़ दें तो माया नगरी अपनी रौनक खो बैठेगी। 


- रवीन्द्र वाजपेयी


Saturday, 5 July 2025

मराठी तो बहाना है, मुंबई महानगरपालिका निशाना है


बई में आज बरसों पहले अलग हुए दो भाई एक मंच पर नजर आये। मराठी को बहाना बनाकर उद्धव ठाकरे और उनके चचेरे भाई राज ठाकरे ने बड़ी रैली की। रैली में  शिवसेना के पुराने तेवर दिखाने का प्रयास हुआ। किसी पार्टी या संगठन का बैनर और झंडा नहीं लगने से ये कहना कठिन है कि उद्धव की खंडित शिवसेना और राज की मनसे का एकीकरण हो जाएगा क्योंकि बीते कुछ सालों में अनेक बार उनके साथ आने की अटकलें लगीं किंतु वे ज़मीन पर नहीं उतर सकीं। पिछले विधानसभा चुनाव में तो उद्धव के बेटे आदित्य के विरुद्ध राज ने अपने पुत्र को लड़ाया जो हार गया। ऐसे में दोनों भाई अचानक एक मंच पर आकर मराठी के सम्मान की बात करने लगे ये चौंकाने वाली बात है। खास तौर पर इसलिए क्योंकि राज के बारे में ये कयास काफी समय से लग रहे थे कि वे भीतर - भीतर भाजपा के साथ जुड़ने की  तैयारी में हैं। उद्धव के कारण ही राज को शिवसेना छोड़नी पड़ी थी। वरना एक जमाना था जब अपनी ओजस्वी भाषण शैली में  हिंदुत्व का पक्ष रखने के कारण उन्हें बाला साहेब का राजनीतिक उत्तराधिकारी माना जाने लगा था। उस दौर में उद्धव वन्य छायांकन का अपना शौक पूरा करने में व्यस्त रहते थे। राज ने नाराज होकर शिवसेना ही नहीं छोड़ी अपितु बाला साहेब की छाया से बाहर निकलने के उद्देश्य से मनसे (महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना) का गठन किया किंतु तमाम कोशिशों के बावजूद वे शिवसेना के समानांतर खड़े नहीं हो सके। उद्धव भाजपा के साथ रहकर अच्छी स्थिति में थे किंतु मुख्यमंत्री बनने की चाहत ने उन्हें शरद पवार और कांग्रेस की गोद में बिठा दिया। हालांकि वह प्रयोग फुस्स साबित हुआ और उद्धव हिंदुत्व छोड़कर मुस्लिम समर्थक कांग्रेस और शरद पवार के जाल में फंस गये। लेकिन अब उनको ये लगने लगा कि वे कहीं के नहीं रहे। पार्टी भी हाथ से गई और पिता से विरासत में मिली पुण्याई भी। इंडिया गठबंधन के साथ भी उनकी पटरी नहीं बैठ रही। शरद पवार का सूर्य  अस्त होने के कगार पर है। उधर कांग्रेस ने भी उद्धव को आँखें दिखाना शुरू कर दिया और मुंबई महानगरपालिका का चुनाव अकेले लड़ने का संकेत देकर उनकी नींद उड़ा दी। उल्लेखनीय है कई राज्यों  से बड़े बजट वाली मुंबई महानगरपालिका शिवसेना और ठाकरे परिवार के लिए प्राणवायु जैसी है। उसका आगामी चुनाव उद्धव के लिए जीवन - मरण का सवाल है क्योंकि उसके बिना उनके लिए अपना राजनीतिक अस्तित्व बनाये रखना असम्भव हो जाएगा। एकनाथ शिंदे को साथ लाकर भाजपा ने इस चुनाव के लिए कड़ी मोर्चेबंदी कर ली है। इस सबका ही परिणाम है कि सारे शिकवे - गिले भुलाकर उन्होंने राज से हाथ मिलाने में संकोच नहीं किया । ज्यादा पुरानी बात नहीं जब दोनों एक दूसरे को फूटी आँख से भी नहीं देखना चाहते थे। वैसे इस मिलन की जितनी जरूरत उद्धव को थी उतनी ही राज को भी जिनकी राजनीतिक पूंजी  पूरी तरह खत्म हो चुकी है। आज मराठी का झंडा उठाकर उद्धव के साथ मंच साझा करते हुए राज ने मुख्यमंत्री देवेंद्र फड़नवीस को इस बात का श्रेय दिया कि दोनों भाईयों को एक करने का जो काम बाला साहेब नहीं कर पाए वह हिन्दी की शिक्षा को अनिवार्य बनाकर उन्होंने कर दिया। राज ने एक बार फिर महाराष्ट्र को सबसे ऊपर बताकर मुंबई को न छेड़ने की चुनौती भी दी। यद्यपि रैली में जुटी भीड़ से कोई निष्कर्ष निकालना बेमानी है क्योंकि आज की मुंबई अब मराठी को लेकर आंदोलित नहीं होगी। गैर मराठी भाषियों के साथ मारपीट की घटनाओं से ठाकरे बंधुओं की मुहिम पहले ही दागदार हो चुकी है। बेहतर होगा यदि राज और उद्धव अपने मन से ये गलतफहमी निकाल दें कि वे मराठी मानुष वाले बाला साहेब के हथियार के सहारे अपनी राजनीति चमका लेंगे क्योंकि उसमें जंग लग चुकी है। ये कहना गलत नहीं होगा कि ठाकरे बंधुओं के इस मूर्खता पूर्ण कदम से अन्य प्रांतों में रह रहे मराठी भाषियों पर संकट आ सकता है। उन्हें ये नहीं भूलना चाहिए कि मुंबई की चाल, चरित्र और चेहरा पूरी तरह बदल चुका है और वहाँ की राजनीति की लगाम गैर मराठी भाषियों के हाथ है। इसलिए  मुंबई महानगरपालिका का चुनाव मराठी के नाम पर उत्पात मचाकर नहीं जीता जा सकता। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Friday, 4 July 2025

बिहार में महागठबंधन की जमीन खिसकाएँगे केजरीवाल



भारतीय राजनीति में धूमकेतु की तरह उभरी आम आदमी पार्टी दिल्ली की सत्ता गंवाने के बाद अपनी चमक और धमक खोती जा रही थी। लेकिन हाल ही में गुजरात और पंजाब में विधानसभा उपचुनाव जीतने से उसका आत्मविश्वास लौटता दिखा। यद्यपि उपचुनाव जीतने के फ़ौरन बाद गुजरात में उसके एक और विधायक ने पार्टी छोड़कर  जीत की खुशी को फीका  कर दिया।  वैसे आम आदमी पार्टी छोड़ने का सिलसिला बिना रुके जारी है। पार्टी के संस्थापकों में से कुछ तो जल्द ही खुद हट गए और कुछ धकियाकर हटा दिये गए। लेकिन जो बाद में आये उनमें से भी बहुतों का मोह केजरीवाल एंड कं से भंग होता गया। पंजाब में सरकार बनाने के बाद पार्टी नेताओं का आत्मविश्वास अहंकार का रूप लेने लगा जिसके कारण वे ये सोचकर अपनी छवि के विपरीत काम करने लगे कि उनका कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता। लेकिन दिल्ली के शराब घोटाले और शीशमहल कांड ने उस खुशफहमी को पूरी तरह खत्म कर दिया और पिछले विधानसभा चुनाव में दिल्ली की सत्ता उसके हाथ से खिसक गई। लोकसभा चुनाव में झटका खाने के बाद भाजपा ने हरियाणा, महाराष्ट्र और दिल्ली जीतकर जहाँ शानदार वापसी की वहीं आम आदमी पार्टी  इंडिया गठबंधन से अलग हटकर भी कुछ हासिल नहीं कर सकी। दिल्ली चुनाव  में तो राहुल गाँधी ने खुद अरविंद केजरीवाल पर जमकर हमले किये। जिसके बाद दोनों में तल्खी बढ़ती गई। गुजरात उपचुनाव के बाद  श्री केजरीवाल ने ये कहते हुए कांग्रेस और लालू यादव दोनों को झटका दे दिया कि बिहार विधानसभा के आगामी चुनाव में उनकी पार्टी इंडिया गठबंधन से अलग रहकर चुनाव लड़ेगी साथ ही ये स्पष्ट कर दिया कि वह गठबंधन केवल लोकसभा चुनाव के लिए ही था। दरअसल हरियाणा विधानसभा चुनाव में राहुल भी चाहते थे कि कांग्रेस आम आदमी पार्टी को साथ रखे किंतु भूपिन्दर सिंह हुड्डा ने उनकी बात नहीं मानी। उस  वजह से आम आदमी पार्टी ने सभी सीटों पर प्रत्याशी उतारकर कांग्रेस की राह में रोड़े अटका दिये। और फिर दिल्ली के दंगल में दोनों दलों के बीच खाई और चौड़ी हो गई। हालांकि इंडिया गठबंधन के अनेक घटक दल ये  कह चुके हैं कि विपक्षी एकता का वह प्रयोग केवल संसदीय चुनाव के लिए हुआ था और उसके बाद उसकी भूमिका खत्म हो चुकी है। बावजूद उसके महाराष्ट्र में कांग्रेस ने शरद पवार और उद्धव ठाकरे की पार्टियों के साथ मिलकर चुनाव लड़ा। लेकिन नतीजे बेहद खराब होने के बाद इंडिया गठबंधन के भविष्य पर सवाल खड़े होने लगे। निकट भविष्य में बिहार में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं। जिसमें मुख्य मुकाबला लालू के नेतृत्व वाले महागठबंधन और एनडीए के बीच होगा जिसमें भाजपा, नीतीश और चिराग पासवान की पार्टी शामिल हैं। लेकिन श्री केजरीवाल ने भी आम आदमी पार्टी के अकेले ही मैदान में उतरने का ऐलान कर महागठबंधन की चिंताएं बढ़ा दी हैं। ये आश्चर्यजनक है कि कुछ समय पहले तक वे भाजपा को अपना सबसे बड़ा शत्रु मानते थे किंतु अब विपक्ष की टाँग खींचने में भी शर्म नहीं कर रहे। इसका कारण संभवतः ये है कि इंडिया गठबंधन में शामिल होने से आम आदमी पार्टी का वह दावा हवा - हवाई होकर रह गया कि वह भाजपा की विकल्प है। दिल्ली की सत्ता हाथ से निकलना उसके लिए बहुत बड़ा धक्का था क्योंकि उसके कारण उसके सबसे बड़े नेता की साख और धाक दोनों को जबरदस्त नुकसान पहुंचा। बिहार में अकेले लड़कर आम आदमी पार्टी एक सीट भी जीत जाए तो आश्चर्य होगा किंतु वह महागठबंधन की जमीन जरूर खिसका देगी ये आशंका प्रबल है। हो सकता है कल को लालू और राहुल  ये आरोप लगाने लग जाएं कि आम आदमी पार्टी भी भाजपा की बी टीम है। सही बात ये है कि  दिल्ली में श्री केजरीवाल ने सरकार तो गंवाई ही आम आदमी पार्टी  की जो पहचान बनी थी उसे भी खत्म कर दिया। बाकी विपक्षी दलों से अलग लड़कर श्री केजरीवाल उसी प्रतिष्ठा को दोबारा हासिल करने के लिए प्रयासरत हैं। बिहार में  लालू युग अस्त होने को है , वहीं कांग्रेस घुटनों के बल चलने मजबूर है। ऐसे में जो खालीपन उत्पन्न होने वाला है उसे भरने अकेले चुनाव लड़ने का निर्णय किया गया। ये कितना सही होगा कहना कठिन है क्योंकि बीते एक साल से अरविंद केजरीवाल और आम आदमी पार्टी लगातार अपनी प्रारंभिक पुण्याई  खोते गए हैं। और फिर बिहार में उन्हीं जैसी छवि वाले प्रशांत किशोर भी पहले से ही ताल ठोक रहे हैं।

- रवीन्द्र वाजपेयी

Thursday, 3 July 2025

जीएसटी की वसूली बढ़ी तो जनता को भी राहत मिलनी चाहिए

1 अप्रैल 2017 से लागू हुए जीएसटी को प्रारंभ में प्रायोगिक तौर पर लिया गया था। इसमें व्याप्त जटिलता को देखते हुए इसकी सफलता पर भी संदेह जताया गया । सरकार ने भी इसमें जिस तेजी से  बदलाव किये उससे विपक्ष के इस आरोप की पुष्टि हुई कि बिना समुचित तैयारी के इसे लागू कर दिया था। उद्योग - व्यापार जगत में भी इसे लेकर  भारी नाराजगी थी। इसका प्रत्यक्ष असर दिसंबर 2017 में हुए  गुजरात  चुनाव के परिणामों में देखने मिला जब भाजपा 2012 की तुलना में 16 सीटें गंवाकर 99 पर अटक गई और वह भी तब, जब आखिरी दौर में गृहमंत्री अमित शाह ने सूरत में डेरा जमाकर भाजपा की डूबती नैया बचाई। लेकिन धीरे - धीरे इसकी स्वीकार्यता बढ़ती गई और उद्योग - व्यापार जगत ने भी इसे अपना लिया। इसके लागू होने से राज्यों के स्तर पर करों की भिन्नता कुछ हद तक दूर हुई है। आंकड़ों में आकलन करें तो बीते 5 साल में जीएसटी वसूली दोगुनी हो चुकी है। वित्त मंत्रालय के अनुसार, वित्तीय वर्ष 2024-25  में कुल GST संग्रह रु 22.08 लाख करोड़ रहा, जो 5 वर्ष पूर्व 11.37 लाख करोड़ था।  इस राशि में हर महीने वृद्धि होना एक तरफ तो देश में आर्थिक गतिविधियों के सुचारु रूप से संचालित होने का प्रतीक है वहीं दूसरी तरफ इस कर प्रणाली की सफलता का प्रमाण। इस व्यवस्था के 8 साल पूरे होने के मौके पर सरकार ने जून 2025 का जीएसटी वसूली का जो आंकड़ा जारी किया वह  1.85 लाख करोड़ रहा जो गत वर्ष से 6.2 फीसदी ज्यादा है। अर्थव्यवस्था को गतिशील बनाये रखने में जीएसटी के योगदान को आर्थिक विशेषज्ञ स्वीकार करने लगे हैं। हर माह इसकी वसूली में वृद्धि इस बात का परिचायक है कि  करदाता भी अपना दायित्व ठीक से निर्वहन कर रहे हैं। हालांकि टैक्स चोरी करने वालों ने जीएसटी को भी नहीं छोड़ा किंतु  उनके काले धंधे जल्द पकड़ में आ जाते हैं। आठ साल बाद जीएसटी सरकार के राजस्व का प्रमुख स्रोत बन चुका है। इसकी वजह से विभिन्न कल्याणकारी योजनाओं के संचालन के बाद भी सरकार का खजाना खाली नहीं हुआ और विकास कार्य भी रोकने की नौबत नहीं आई। लेकिन इस सफलता के शोर के बावजूद कुछ वायदे और अपेक्षाएं अभी भी पूरी होनी बाकी हैं। मसलन जीएसटी लागू करते समय एक देश एक टैक्स जैसा आश्वासन मिला था जो पूरा नहीं हो सका क्योंकि राज्यों के अपने कारण हैं अलग - अलग दरें रखने के। विशेष रूप से पेट्रोल - डीजल जैसी दैनिक उपयोग की चीजों को जीएसटी के दायरे में लाने की कोई संभावना नहीं दिखती। केन्द्र जहाँ राज्यों में आम सहमति न होने का बहाना बनाते हैं वहीं राज्य केन्द्र पर आरोप मढ़ते हैं। इसी का परिणाम है कि उ.प्र  में पेट्रोल - डीजल म.प्र से 10 रु. लीटर सस्ता है। चिकित्सा बीमा प्रीमियम पर  18 फीसदी जीएसटी असंवेदनशीलता नहीं तो और क्या है?  जीएसटी की ढेर सारी दरें भी इसकी मूल भावना के विरुद्ध है। 5 और 12 फीसदी तक  तो फिर भी ठीक है किंतु उससे अधिक दरें अव्यवहारिक हैं। विलासिता से जुड़ी कुछ वस्तुओं और सेवाओं पर अधिक करारोपण गलत नहीं है किंतु बाकी सभी पर अधिकतम 12 प्रतिशत जीएसटी ही लगना चाहिए। हालांकि गत दिवस आम जनता के उपयोग की तमाम चीजों को 12 से हटाकर  5 फीसदी के दायरे में लाये जाने का फैसला अगली जीएसटी काउंसिल बैठक में लिए जाने की संभावना समाचार माध्यमों से प्रचारित हुई किंतु 18 फीसदी की दर खत्म करने जैसी कोई बात सुनाई नहीं दे रही। इस दिशा में सोचने और करने का ये सही समय है। हमारे देश में आम जनता को चुनाव के पहले राहत देने का रिवाज है। दिल्ली विधानसभा चुनाव के पहले  केंद्रीय बजट में 12 लाख तक आयकर छूट दिये जाने का परिणाम भाजपा की जीत के तौर पर आया। निकट भविष्य में बिहार और  प. बंगाल, असम, त्रिपुरा, तमिलनाडु और केरल में विधानसभा चुनाव होना है। बड़ी बात नहीं इनमें जीत हासिल करने के लिए जीएसटी में राहत की सौगात मिल जाए।


- रवीन्द्र वाजपेयी

Wednesday, 2 July 2025

भाजपा के नये प्रदेशाध्यक्ष के सामने 2028 और 29 बड़ी चुनौती


आखिरकार म.प्र में भाजपा को हेमंत खंडेलवाल के तौर पर नया अध्यक्ष प्राप्त हो गया जो निवर्तमान अध्यक्ष विष्णुदत्त शर्मा का स्थान लेंगे। श्री शर्मा का कार्यकाल काफी ऐतिहासिक रहा। 2018 के विधानसभा चुनाव में बहुमत से महज 8 सीट पीछे रहने के बाद भाजपा में निराशा छा गई थी। कमलनाथ के नेतृत्व में कांग्रेस सरकार की वापसी ने प्रदेश की राजनीति में नये युग की शुरुआत का संकेत दिया किंतु 2019 के लोकसभा चुनाव में भाजपा ने धमाकेदार वापसी की और छिंदवाड़ा में कमलनाथ के बेटे नकुल के अलावा सभी सीटें मोदी लहर में भाजपा की झोली में आ गईं। इसके बाद से ही प्रदेश सरकार के भविष्य पर खतरा मंडराने लगा और अंततः ज्योतिरादित्य सिंधिया की बगावत ने कांग्रेस की खुशियों पर पानी फेर दिया। 2020 के मार्च में कोरोना से बचाव के लिए लगाए गए लॉक डाउन के पहले शिवराज सिंह चौहान फिर सत्ता में लौट आये। वह सत्ता परिवर्तन चूंकि श्री शर्मा के प्रदेश अध्यक्ष बनने के फौरन बाद हुआ इसलिए पार्टी में उनकी ताजपोशी को शुभ माना गया। अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के संगठन मंत्री रहने के कारण युवाओं में उनकी अच्छी पकड़ थी। इसलिए भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष रहते हुए पांच वर्ष में उन्होंने युवाओं को पार्टी की ओर आकर्षित किया। वे भाजपा के सबसे लंबे समय तक प्रदेश अध्यक्ष रहने का  कीर्तिमान स्थापित कर चुके हैं। लेकिन जो सबसे बड़ा रिकार्ड उनके नाम है वह है 2024 के लोकसभा चुनाव में भाजपा द्वारा प्रदेश की सभी लोकसभा सीटों पर कब्जा कर लेना जो 1977 की जनता लहर में भी नहीं हो सका था। ये भी उल्लेखनीय है कि श्री शर्मा के कार्यकाल में ही 2023 में प्रदेश को डॉ. मोहन यादव के रूप में एक युवा मुख्यमंत्री मिला। ऐसे अध्यक्ष का उत्तराधिकारी तलाश करना भाजपा के लिए आसान नहीं था किंतु लंबे मंथन के बाद गत दिवस बैतूल के विधायक और पूर्व सांसद हेमंत खंडेलवाल निर्विरोध भाजपा के नये प्रदेश अध्यक्ष निर्वाचित हो गए। यदि सब कुछ सामान्य रहा तब उन्हीं के नेतृत्व में पार्टी आगामी विधानसभा और लोकसभा चुनाव लड़ेगी। इसलिए उनको पद भार संभालते ही तेज गति से कार्य करना पड़ेगा। सबसे बड़ी जरूरत होगी जिलों में प्रवास कर पार्टी कार्यकर्ताओं के बीच पहचान बनाना क्योंकि इस पैमाने पर वे श्री शर्मा से काफ़ी पीछे हैं। यद्यपि पार्टी का प्रादेशिक और राष्ट्रीय नेतृत्व श्री खंडेलवाल से भली - भाँति परिचित है। उनके स्वर्गीय पिता भी चूंकि बैतूल से सांसद रहे थे अतः उनकी विरासत का लाभ भी उनके साथ है। उस दृष्टि से भाजपा में श्री शर्मा नये - नये थे। अभाविप के बड़े नेताओं में वे शामिल जरूर थे किंतु शिवराज सिंह चौहान जैसे दिग्गज के सामने स्वयं को स्थापित करना आसान नहीं था किंतु खजुराहो के सांसद बनने के साथ ही प्रदेश संगठन की जिम्मेदारी उन्होंने बखूबी निभाई।  सौभाग्य से म.प्र में  भाजपा की जड़ें अब गाँव - गाँव तक फैल चुकी हैं। जनसंघ के जमाने से ही यहाँ हिंदुत्व की विचारधारा का प्रभाव रहा है। इसीलिए अन्य प्रांतों के नेता यहां से लोकसभा चुनाव जीते। जगन्नाथ राव जोशी, डॉ. वसंत राव पंडित और सुषमा स्वराज  इसके उदाहरण हैं। अटल  बिहारी वाजपेयी  यहाँ से लोकसभा और राज्यसभा दोनों सदनों के लिए निर्वाचित हुए। लालकृष्ण आडवाणी और भैरोसिंह शेखावत भी म.प्र के कोटे से  राज्यसभा भेजे जाते रहे। भाजपा का गढ़ बन चुके इस प्रदेश में पार्टी का अध्यक्ष बनना सतही तौर पर तो बड़ा आसान लगता है किंतु वास्तव में ऐसा है नहीं क्योंकि शिखर पर पहुंचने के बाद उस पर बने रहना कठिन होता है। 2018 के विधानसभा चुनाव में पार्टी  झटका खा चुकी है। नये अध्यक्ष के सामने चुनौती ये भी है कि स्व. कुशाभाऊ ठाकरे के सामने  युवा नेताओं की जो श्रृंखला तैयार हो चुकी थी वह अब 65 और 70 वर्ष के दायरे में आ गई है। इसलिए श्री खंडेलवाल को नई पीढी में से क्षमतावान नेतृत्व तैयार  करने की  दिशा में विशेष प्रयास करने होंगे। ये अच्छा  है कि मुख्यमंत्री से उनका अच्छा समन्वय है। चूंकि वे सादगी के लिए जाने जाते हैं इसलिए साधारण कार्यकर्ताओं में जल्द लोकप्रिय हो सकते हैं। गौरतलब है सत्तारूढ़ पार्टी के अध्यक्ष को पार्टी संगठन और सरकार के बीच बेहतर समन्वय बनाकर काम करना होता है। श्री खंडेलवाल इस कसौटी पर कितने खरे उतरते हैं वही उनकी सफलता का मापदंड होगा। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Tuesday, 1 July 2025

भारत के बढ़ते प्रभाव से जिनपिंग बौखला उठे



चीन और चालाकी एक दूसरे के पर्याय हैं। गत दिवस उसने सीमा विवाद सुलझाने के लिए भारत के साथ  नये सिरे से वार्ता की पेशकश की ।  वहीं अब खबर है कि वह पाकिस्तान और बांग्लादेश के साथ मिलकर एक नया क्षेत्रीय संगठन बनाने जा रहा है जो सार्क के समानांतर कार्य करेगा।  सार्क में  8 देश  अफगानिस्तान, बांग्लादेश, भूटान, भारत, मालदीव, नेपाल, पाकिस्तान और श्रीलंका शामिल हैं। पाकिस्तान लंबे समय से चीन को इसकी सदस्यता दिलवाने हेतु प्रयासरत है किंतु उसे सफलता नहीं मिली। ये बात भी सही है कि सार्क में भारत की मौजूदगी काफी प्रभावशाली है जिसकी वजह से पाकिस्तान की हरकतों पर रोक लग जाती है। कूटनीतिक स्तर पर दक्षिण एशियाई राजनीति में भारत के एक बड़ी शक्ति के तौर पर स्थापित होने से पाकिस्तान और चीन दोनों के पेट में मरोड़ उठता रहता है। हाल ही में  चीन में हुई शंघाई सहयोग संगठन ( एस. सी. ओ.) की बैठक के बाद संयुक्त बयान पर चूंकि भारतीय प्रतिनिधिमंडल के नेता रक्षा मंत्री राजनाथ ने हस्ताक्षर करने से इंकार कर दिया था इसलिए वह जारी नहीं हो सका। असल में  चीन ने बयान का जो  प्रारूप तैयार करवाया उसमें पहलगाम में आतंकवादियों द्वारा किये गए नरसंहार का उल्लेख करने की जरूरत तक नहीं समझी गई। लेकिन बलूचिस्तान में  हो रहे आंदोलन को आतंकवादी निरूपित किया गया। साथ ही आतंकवाद संबंधी भारत की चिंताओं और दृष्टिकोण को भी पूरी तरह से उपेक्षित करते हुए पाकिस्तान को खुश करने का प्रयास हुआ। लेकिन रक्षा मंत्री श्री सिंह ने उक्त बयान से असहमति जताते हुए  जो कूटनीतिक बढ़त हासिल की उससे चीन और उसका पिछलग्गू पाकिस्तान बौखला गए।  अपने ही देश में भारत के रक्षा मंत्री द्वारा की गई फजीहत से जिनपिंग बुरी तरह भन्नाए हुए  हैं। इसका प्रमाण मिला उनके द्वारा ब्राज़ील में होने जा रहे ब्रिक्स सम्मेलन में न जाने के फैसले से। उनका विरोध  इस बात पर है कि सम्मेलन के बाद ब्राजील के राष्ट्रपति द्वारा श्री मोदी के सम्मान में सरकारी भोज का आयोजन किया है। ब्रिस्क के गठन के बाद ये पहला अवसर होगा जब जिनपिंग उसके सम्मेलन में उपस्थित नहीं रहेंगे। कूटनीतिक जगत  में इस बात की चर्चा है कि उनकी नाराजगी यूँ तो 2020 की गलवान घाटी मुठभेड़ के बाद से जारी है क्योंकि भारत ने लद्दाख़ से  अरुणाचल तक अग्रिम मोर्चों तक जिस तरह की सैन्य तैयारियां कीं उनसे चीनी सेना द्वारा की जाने वाली किसी भी हरकत का उसी की भाषा में जवाब दिया जाने लगा है। इसके अलावा वे  रक्षा उपकरणों के  निर्यात में भारत के बढ़ते कदमों से सहमे हुए हैं। पहलगाम की घटना के बाद भारत द्वारा ऑपरेशन सिंदूर के नाम से जो सैन्य कारवाई की गई उसने  पाकिस्तान कि जिस रक्षा प्रणाली को छिन्न - भिन्न किया वह चूंकि चीन द्वारा दी गई थी इसलिए उसे शर्मिंदगी झेलनी पड़ी। भारतीय मिसाइलें पाकिस्तान स्थित आतंकवादियों  के अड्डों सहित अनेक सैन्य प्रतिष्ठानों और हवाई अड्डों तक बेरोकटोक पहुँच गईं जबकि चीन में बनीं   पाकिस्तान की मिसाइलें और ड्रोन भारत की रक्षा प्रणाली द्वारा हवा में ही नष्ट कर दिये गए। उस  ऑपरेशन के बाद भारत में बनी सैन्य सामग्री की मांग  वैश्विक स्तर पर तेजी से बढ़ी  है। चीन से परेशान दक्षिण एशिया के तमाम छोटे - छोटे देशों द्वारा भारत के साथ रक्षा उपकरणों के सौदों से जिनपिंग बौखलाए हुए हैं। सार्क चूंकि उनके दबदबे को स्वीकार करने राजी नहीं है इसलिए जिनपिंग ने पाकिस्तान और बांग्ला देश के साथ नया क्षेत्रीय संगठन बनाने का दाँव चला। लेकिन वे भूल रहे हैं कि चीन की धौंस  से उसके पड़ोसी तो त्रस्त हैं ही पाकिस्तान और अफ़ग़ानिस्तान में भी उसकी चालबाजी के प्रति लोग चौकन्ने हैं। उल्लेखनीय है  तालिबान द्वारा अमेरिका के विरुद्ध जंग  में चीन ने तालिबान की काफी मदद की किंतु सत्ता में आने के बाद वे भारत के साथ अच्छे रिश्ते बना रहे हैं ।  निकट भविष्य में चीन की नई - नई हरकतें देखने मिल सकती हैं क्योंकि अब वह भारत को अपना प्रतिद्वंदी मानकर चलने लगा है। नीतिशास्त्र का ये कथन इस बारे में प्रासंगिक है कि जिसकी शक्ति बढ़ती है उसके शत्रु बढ़ते हैं। 

- रवीन्द्र वाजपेयी