Saturday, 29 November 2025

10 फीसदी जीडीपी के लिए जीएसटी जैसे अन्य करों का बोझ भी कम हो


अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प  द्वारा की गई टैरिफ वृद्धि के कारण भारतीय अर्थव्यवस्था पर संकट के बादल मंडराने की आशंका उत्पन्न हो गई थी। इसका असर शेयर बाजार पर भी नजर आने लगा। विदेशी निवेशक भी अपना धन निकालने लगे जिससे  उद्योग - व्यापार जगत में घबराहट फैलने लगी।  निर्यातकों को अपना भविष्य अंधकारमय दिखने लगा। रूस से तेल एवं अन्य चीजें न खरीदने के अमेरिकी दबाव को भारत द्वारा नजरंदाज करने से भन्नाये ट्रम्प नई - नई धमकी देने लगे। लेकिन भारत सरकार ने नये - नये बाजार खोजकर निर्यातकों को राहत देने का जो प्रयास किया उसके अनुकूल परिणाम देखने मिले। जब ट्रम्प को ये लगा कि भारत  व्यापार संधि में अमेरिका द्वारा लगाई जा रही शर्तों को मानने राजी नहीं हो रहा तब उन्होंने कुछ चीजों पर टैरिफ का बोझ कम करने की चाल चली किंतु डेरी उत्पादों सहित अनेक अमेरिकी वस्तुओं के  आयात पर भारत के साफ इंकार के कारण अभी तक नया  समझौता अंतिम रूप नहीं ले सका।   हालांकि जैसी खबर है अमेरिकी दबाव में रिलायंस सहित कुछ निजी कंपनियों ने रूसी तेल की खरीदी में कमी कर दी किंतु सरकारी स्तर पर यथास्थिति बनी हुई है। इस सबके बीच रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन 4 दिसंबर को  भारत  आ रहे हैं। इस दौरान वे रक्षा सौदों के अलावा अन्य व्यापार समझौते भी करेंगे जिसमें तेल भी शामिल है। साथ ही भारतीय उपभोक्ता वस्तुओं के लिए रूसी बाजार खोलने सहित भारतीय प्रतिभाओं के लिए रूस के दरवाजे खोलने  का ऐलान भी करेंगे। पिछले कुछ दिनों से भारत के शेयर बाजार में रिकार्ड उछाल का कारण  भारत - अमेरिका व्यापार समझौते और यूक्रेन - रूस के बीच युद्ध विराम की संभावनाओं के अलावा पुतिन के भारत आने की पुष्टि होना भी है। लेकिन गत दिवस अर्थव्यवस्था में मजबूत स्थिति की खबर आने के बाद ये स्पष्ट हो गया कि अमेरिकी दबाव का सफलतापूर्वक सामना करने में भारत सफल हो गया। मौजूदा वित्तीय वर्ष की दूसरी तिमाही में जीडीपी ( सकल घरेलू उत्पादन) की दर ने 8.2 प्रतिशत का आंकड़ा छूकर पूरी दुनिया को चौंका दिया। इस वर्ष भारत की जीडीपी के जो अनुमान लगाए जा रहे हैं उनमें वैश्विक परिस्थितियों के मद्देनजर उतार - चढ़ाव की आशंका व्यक्त की जा रही थी। अमेरिकी दबाव के कारण भारतीय अर्थव्यवस्था की रफ्तार सुस्त पड़ने की आशंका भी जताई जाने लगी थी। लेकिन भारत सरकार ने जीएसटी सुधारों को लागू कर तमाम प्रतिकूलताओं को अनुकूलताओं में बदलने की जो बुद्धिमत्ता दिखाई उसके चमत्कारिक परिणाम देखने मिले। हालांकि नई जीएसटी दरें दशहरा - दीपावली के पहले लागू होने का लाभ  उपभोक्ताओं को तो मिला ही, उद्योग - व्यापार जगत भी उससे लाभान्वित हुआ। इसके अलावा निर्यातकों को भी इस सुधार से राहत मिली। इन सबका समन्वित परिणाम ही जीडीपी में आई जबरदस्त उछाल के रूप में देखने मिला। हालांकि इस दर को बनाये रखना बड़ी चुनौती होगी क्योंकि आने वाले कुछ महीनों में वैश्विक समीकरण तेजी से बदलेंगे। रूस - यूक्रेन युद्ध रुकने के बाद यदि पुतिन और ट्रम्प करीब आये तब शीतयुद्ध के जो हालात बीते दो - तीन सालों में बने उनसे उत्पन्न तनाव कम होना संभव है और तब भारत को अपनी महत्वपूर्ण स्थिति बनाये रखने के बारे में सतर्क रहना होगा। ट्रम्प द्वारा शुरू किये गए टैरिफ युद्ध के कारण भारत, रूस, चीन, ब्राज़ील और द. अफ्रीका ने ब्रिक्स जैसे मंच को ताकतवर बनाकर अमेरिकी प्रभुत्व को कमजोर करने की जो रणनीति बनाई वह अब तक कारगर साबित हुई है।  लेकिन भारत की अर्थव्यवस्था में वृद्धि की रफ्तार इन सभी में अधिक होने से पूरी दुनिया की नजरें हम पर लगी हैं। लगभग सभी बड़े देश भारत के साथ व्यापार बढ़ाने उत्सुक हैं। वहीं प्रमुख बहुराष्ट्रीय कंपनियां अपनी उत्पादन इकाइयाँ यहाँ लगाने को इच्छुक हैं। वित्तीय वर्ष 2025 - 26 की दूसरी तिमाही में जीडीपी का आंकड़ा उत्साह बढ़ाने वाला है। यदि केंद्र सरकार जीएसटी की तरह से ही अन्य करों के बोझ में भी कमी करे तो विकास की गति 10 फीसदी तक पहुँच सकती है जो 2047 में भारत को विकसित देश बनाने में सहायक साबित होगी। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Friday, 28 November 2025

नीति और नेतृत्व दोनों के संकट से जूझ रही कांग्रेस


कांग्रेस देश की सबसे पुरानी राजनीतिक पार्टी है। आजादी के बाद तीन दशक तक वह  केन्द्र में सत्तारूढ़ रही। उसके बाद भी उसके नेतृत्व में सरकारें बनती रहीं। हालांकि 1984 के चुनाव के बाद उसे स्पष्ट बहुमत नहीं मिला किंतु अन्य दलों के सहयोग से पहले पी. वी. नरसिम्हा राव और फिर डाॅ. मनमोहन सिंह के नेतृत्व में उसकी सरकार चली। बीच - बीच में  कांग्रेस ने चंद्रशेखर, एच. डी. देवगौड़ा और इंदर कुमार गुजराल को भी प्रधानमंत्री बनवाया किंतु फिर बहाना बनाकर उन्हें हटवा भी दिया। लेकिन 2014 में नरेंद्र मोदी के राष्ट्रीय राजनीति में कदम रखने से कांग्रेस को जबरदस्त झटका लगा। 1977 में भी कांग्रेस  उत्तर भारत में सफाये के बाद भी दक्षिण में लोकसभा की 154 सीटें जीत गई किंतु 2014 में तो 44 पर सिमट गई। वहीं 2019 में बमुश्किल 50 का आंकड़ा पार कर पाई। हालांकि 2024 में 99 सांसद जीतने के कारण राहुल गाँधी लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष बन गए। यद्यपि ये उतना महत्वपूर्ण नहीं था जितना ये कि भाजपा 300 से उतरकर 240 पर आ गई जिससे नरेंद्र मोदी को नीतीश कुमार और चंद्रा बाबू नायडू रूपी बैसाखियों का सहारा लेना पड़ा । बहरहाल जैसे - तैसे मोदी सरकार बन तो गई किंतु  राहुल के आक्रामक तेवरों से ऐसा लगने लगा जैसे वे इस सरकार को जल्द गिरवाने में सफल हो जाएंगे। नीतीश और नायडू के भी इधर - उधर होने की आशंका हर समय राजनीतिक माहौल में तैरती रही। लोकसभा चुनाव के झटके के बाद  भाजपा की चिंता बढ़ गई क्योंकि कुछ महीनों बाद हरियाणा, जम्मू - कश्मीर और उसके बाद महाराष्ट्र और झारखंड तथा  2025 में दिल्ली और बिहार के विधानसभा चुनाव रूपी चुनौती सामने थी। जम्मू - कश्मीर में 370 हटने के बाद विधानसभा का पहला चुनाव निश्चित तौर पर अग्निपरीक्षा थी। वहीं हरियाणा, झारखंड और महाराष्ट्र में लोकसभा चुनाव का खराब प्रदर्शन प्रधानमंत्री और उनके चाणक्य कहे जाने वाले अमित शाह की परेशानी बढ़ाने वाला था। दिल्ली में भाजपा को अरविंद केजरीवाल से दो विधानसभा चुनाव बुरी तरह हार चुकी थी जबकि बिहार में नीतीश उसके लिए अबूझ पहेली बने हुए थे। दूसरी तरफ कांग्रेस सतही तौर पर भारी नजर आ रही थी। राहुल के अलावा इंडिया गठबंधन में शामिल अन्य दल भी उत्साह से भरे हुए थे। इस सबसे लगता था कांग्रेस के अच्छे दिन ज्यादा दूर नहीं हैं और श्री मोदी के विकल्प स्वरूप श्री गाँधी की स्वीकार्यता उठान पर है। लेकिन उक्त सभी राज्यों के विधानसभा चुनाव  के बाद राजनीतिक स्थिति का आकलन करें तो भाजपा जहाँ लोकसभा चुनाव के बाद उत्पन्न हताशा से उबरकर विजय रथ पर सवार है वहीं कांग्रेस की साख और धाक लगातार गिरती गई। बिहार में मिली शर्मनाक पराजय के बाद तो ऐसा लगने लगा है मानो कांग्रेस  सोचने समझने की शक्ति ही खो चुकी है। इसका प्रमाण कर्नाटक की उसकी सरकार में चल रहा अंतर्द्वंद है। मुख्यमंत्री सिद्धारमैया के विरुद्ध उपमुख्यमंत्री डी. शिवकुमार सहित गृहमंत्री खुलकर मैदान में हैं। पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे इसी राज्य से होने के बाद भी ये कहकर अपनी दयनीय स्थिति उजागर कर  रहे हैं कि नेतृत्व का विवाद श्री गाँधी की उपस्थिति में सुलझाया जाएगा। लेकिन सवाल ये है कि इतने गम्भीर मसले पर पार्टी नेतृत्व द्वारा निर्णय करने में देर क्यों लगाई जा रही है ? ऐसी ही देरी पार्टी ने राजस्थान में अशोक गहलोत और सचिन पायलट के बीच चल रहे झगड़े को निपटाने में लगाई थी जिसका दुष्परिणाम सामने है।? उसके पहले पंजाब में नवजोत सिंह सिद्धू और कैप्टन अमरिंदर सिंह की रस्साकाशी को समय पर नहीं रोकने के कारण राज्य में कांग्रेस की सत्ता और संगठन दोनों का नुकसान हुआ। और आम आदमी पार्टी के पैर जम गए। आगामी वर्ष भी पाँच राज्यों में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं। भाजपा ने जहाँ बिहार से फुर्सत होते ही नये मुकाबलों के लिए अपनी तैयारी शुरू कर दी है जबकि कांग्रेस अभी तक पराजय के जमीनी कारणों का पता करने के बजाय वोट चोरी के आरोप से ही चिपकी हुई है। सोनिया गाँधी अस्वस्थ होने की वजह  से सक्रिय नहीं हैं। वहीं महासचिव होने के बाद भी प्रियंका वाड्रा की भूमिका समझ से परे है। कभी - कभी लगता है बीते डेढ़ साल में हुए विधानसभा चुनावों में कांग्रेस के दयनीय प्रदर्शन ने उनका उत्साह ठंडा कर दिया है। राजनीति पर पैनी नजर रखने वाले विश्लेषकों की मानें तो कांग्रेस के भीतर गाँधी परिवार के विरुद्ध जो असंतोष धधक रहा है वह ज्वालमुखी की तरह कभी भी फूट सकता है। प्रधानमंत्री ने बिहार चुनाव परिणाम के बाद भाजपा मुख्यालय में आयोजित समारोह में कांग्रेस के विभाजन का जो संकेत दिया वह चौंकाने वाला था किंतु दो सप्ताह बाद के हालात उसी दिशा में बढ़ते दिख रहे हैं। सही बात ये है कि आज कांग्रेस नीति और नेतृत्व दोनों ही दृष्टि से बेहद कमजोर नजर आ रही है। यदि यही स्थिति जारी रही तो आने वाले चुनावी मुकाबलों में भी पराजय उसका पीछा नहीं छोड़ेगी । 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Thursday, 27 November 2025

केवल दिल्ली ही नहीं अपितु पूरे देश की हवा प्रदूषित है


देश  के नवनियुक्त मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत द्वारा दिल्ली में वायु प्रदूषण पर की गई यह टिप्पणी समाचार पत्रों में प्रथम पेज की खबर बन गई कि उन्हें शाम 55 मिनिट की सैर (वॉक) करने में तकलीफ होने लगी।  दिल्ली की हवा में प्रदूषण के खतरनाक स्तर पर पहुँचने का हवाला देते हुए अदालत की कार्रवाई में ऑनलाइन भाग लेने की अनुमति मांगे जाने पर मुख्य न्यायाधीश द्वारा अपनी आपबीती बताते हुए अधिवक्ता की बात से सहमति व्यक्त की। वरिष्ट अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने भी वैसी ही मांग रखी तब श्री सूर्यकांत ने कहा कि राजधानी में वायु प्रदूषण से लोगों को सांस लेने में जो दिक्कत हो रही है उसके मद्देनजर वे बार एसोसियेशनों और न्यायाधीशों से चर्चा उपरांत अदालत की कार्रवाई ऑनलाइन मोड पर करने के बारे में जल्द निर्णय लेंगे। उल्लेखनीय है राष्ट्रीय राजधानी प्रतिवर्ष की तरह सर्दियाँ आते ही वायु प्रदूषण की गिरफ्त में आ जाती है। इस कारण एयर क्वालिटी का स्तर बहुत नीचे चला जाता है जिससे बाहर निकलने वालों को तो समस्या होती ही है घर में भी एयर प्यूरीफायर उपकरण लगाने पड़ते हैं। मुख्य न्यायाधीश भले ही सर्वोच्च और उच्च न्यायालय में अधिवक्ताओं को ऑनलाइन शामिल होने की सुविधा प्रदान कर दें किंतु निचली अदालतों में ऐसा करना संभव नहीं होगा। और उससे भी बड़ी बात ये है कि दिल्ली में रह रहे लोग क्या केवल अदालती कार्य के लिए घरों से बाहर निकलते हैं ? लाखों शासकीय और अशासकीय कर्मचारियों के अलावा बड़ी संख्या में प्रतिदिन बाहर से लोग सरकारी या निजी कार्य से दिल्ली आते हैं। यह महानगर व्यापार का भी बड़ा केंद्र है। उद्योग और निर्माण कार्यों में मजदूरी करने वाले तो रहते ही बेहद प्रदूषित जगहों पर हैं। उनके लिए घर पर बैठकर पेट पालन सम्भव नहीं। फिर स्कूल -  कालेज जाने वाले छोटे -  बड़े बच्चों के लिए भी बाहर निकलना मजबूरी है। कुल मिलाकर मुद्दा ये है कि हर साल उठने वाली इस समस्या का स्थायी समाधान खोजे बिना सभी तात्कालिक उपायों में उलझकर रह जाते हैं। दिल्ली चूँकि देश की राजधानी है इसलिए वहाँ होने वाली हर छोटी - बड़ी घटना सुर्खियां बन जाती है। जबकि वायु प्रदूषण  राष्ट्रीय समस्या में बन चुका है। छोटे  शहर तक इसकी चपेट में आ चुके हैं। इसका एक कारण किसानों द्वारा खेतों में फसल कटाई के बाद पराली जलाने से उत्पन्न धुएँ को बताया जाता है। अरविंद केजरीवाल जब दिल्ली के मुख्यमंत्री बने तब उन्होंने पंजाब और हरियाणा के किसानों को दिल्ली के वायु प्रदूषण के लिए जिम्मेदार बताया। उनके राज में ऑड - ईवन नामक प्रयोग करके भी देखा गया जिसके अंतर्गत एक दिन सम और एक  दिन विषम नम्बर के वाहन चले। लोगों से पूल बनाकर एक ही वाहन से आने - जाने की अपील भी की गई। लेकिन वह सफल नहीं हुआ।  पंजाब में भी आम आदमी की सरकार बन जाने के बाद अब श्री केजरीवाल पराली की चर्चा नहीं करते।  दिल्ली विधानसभा के पिछले चुनाव में यमुना की स्वच्छता एक बड़े मुद्दे के बतौर पर चर्चा में रही ।  भाजपा ने केजरीवाल सरकार को इस बात के लिए कठघरे में खड़ा किया कि वह 10 साल में यमुना को स्वच्छ करने का वायदा पूरा नहीं कर सकी। चूंकि राजधानी में बड़ी संख्या में बसे उ.प्र और बिहार के लोग यमुना के बेहद दूषित जल में छठ पूजा करते थे इसलिए उन्होंने भाजपा के आरोप का संज्ञान लिया। सत्ता में आने के बाद भाजपा ने यमुना को स्वच्छ बनाने का अभियान शुरू किया जिसके परिणामस्वरूप इस बार छठ पर यमुना में झाग की बजाय साफ जल दिखाई दिया। लेकिन ले - देकर बात वही है कि राजधानी होने से सारा ध्यान दिल्ली तक ही सीमित रह जाता है जबकि कमोबेश, पूरे देश में पर्यावरण और प्रदूषण की स्थिति चिंताजनक होती जा रही है। सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश को बाहर टहलने पर वायु प्रदूषण ने परेशान किया और अधिवक्ताओं को अदालत आते - जाते साँस लेने में तकलीफ होने लगी तो अदालत की कार्रवाई ऑन लाइन किये जाने पर विचार होने लगा किंतु इतने बड़े देश के बारे में सोचें तब इस तरह की व्यवस्थाओं से समस्या का स्थायी समाधान नहीं किया जा सकता। दिल्ली में सीएनजी वाहन और मेट्रो ट्रेन चलने के बाद वाहनों से निकलने वाले धुएं से होने वाला प्रदूषण कुछ कम होने की जो उम्मीद थी वह वाहनों की बढ़ती संख्या के कारण धूमिल हो गई। एक विशेषज्ञ के अनुसार राजधानी में बड़े पैमाने पर चल रहे निर्माण कार्य भी वायु प्रदूषण बढ़ाने के लिए जिम्मेदार हैं। ताजा खबरों के अनुसार मुंबई में भी ये समस्या दस्तक देने लगी है। ऐसे में इस बात की आवश्यकता है कि वायु प्रदूषण को रोकने के लिए किये जाने वाले उपायों को सर्वोच्च प्राथमिकता के साथ लागू किया जाए। राष्ट्रीय स्वच्छता मिशन जैसा कोई अभियान देश भर में प्रारंभ करते हुए जनता की भागीदारी से प्रदूषण मुक्त भारत का संकल्प लेना होगा। भले ही ये काम कठिन लगता हो किंतु एक बार लोगों को इसका लाभ समझ में आ गया तो बड़ी बात नहीं आगामी कुछ वर्षों के भीतर ही भारत में हर नागरिक को जहरीली हवा में सांस लेने से मुक्ति मिल सकेगी। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Wednesday, 26 November 2025

ट्रम्प का शांति प्रस्ताव अमेरिका के दोगलेपन का परिचायक



डोनाल्ड ट्रम्प का दावा है कि  वे  अनेक युद्ध रुकवा चुके हैं। हालांकि उनकी बातों को कोई गंभीरता से नहीं लेता क्योंकि शांति स्थापना के उनके प्रयास धमकी भरे होते हैं। आर्थिक प्रतिबंध थोपकर वे पूरी दुनिया को अपनी मर्जी से हाँकना चाहते हैं । उनकी ताजा मुहिम यूक्रेन और रूस के बीच  युद्ध को रोकने की है। वैसे तो इसकी शुरुआत फरवरी  2022 में हुई किंतु रूस द्वारा 2014 में क्रीमिया नामक यूक्रेनी बंदरगाह पर बलात कब्जा करने के बाद से ही दोनों के बीच तनाव बना हुआ था। इस लड़ाई में कसूर किसका है ये तय कर पाना कठिन है क्योंकि एक तरफ तो रूसी राष्ट्रपति पुतिन की विस्तारवादी सोच है दूसरी ओर यूक्रेनी राष्ट्रपति जेलेंस्की की कूटनीतिक अपरिपक्वता ने स्थिति को इतना बिगाड़ दिया। दरअसल रूस द्वारा  क्रीमिया पर कब्जा करने का वैसा विरोध नहीं हुआ जैसा जरूरी था। वैसे रूस ये दुस्साहस कभी नहीं करता यदि सोवियत संघ से आजाद होने के बाद 1996 में यूक्रेन ने अपने सभी परमाणु हथियार रूस को न सौंपे होते जिसके बदले उसे आर्थिक मुआवजे के अलावा सुरक्षा का आश्वासन भी मिला। बाद में वह परमाणु अप्रसार संधि में भी शामिल हो गया। लेकिन क्रीमिया पर रूस  के कब्जे  बाद उसे अपनी सुरक्षा की चिंता सताने लगी और तब उसने अमेरिकी प्रभुत्व वाले नाटो नामक संगठन की सदस्यता के लिए कदम बढ़ाये। ऐसा होने पर अमेरिकी फ़ौजें तथा मिसाइलें यूक्रेन - रूस सीमा पर तैनात हो जातीं। पुतिन को ये किसी भी कीमत पर स्वीकार नहीं था। उधर क्रीमिया हाथ से निकलने के बाद यूक्रेन कोई खतरा उठाने से बच रहा था । उसकी चिंता तब और बढ़ गई जब रूस ने उसके कुछ सीमावर्ती राज्यों पर दावा किया जहाँ रूसी भाषी लोग रहते हैं। इसके पहले कि  उसे नाटो की सदस्यता हासिल होती पुतिन ने अपनी फ़ौजें यूक्रेन में प्रविष्ट करवा दीं। हालांकि तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन के अलावा यूरोप के तमाम देशों ने यूक्रेन को आर्थिक और सामरिक सहायता देकर मुकाबले में तो खड़ा कर दिया किंतु रूस जैसी महाशक्ति से उधार के पैसे और खैरात के हथियारों से  जीत पाना लगभग असंभव था और वही हुआ। बीते 45 महीनों  में यूक्रेन ने बेशक बहादुरी दिखाई और बीच - बीच में रूस पर घातक हमले कर काफी नुकसान भी पहुंचाया किंतु रूस ने जो कहर बरपाया उसने यूक्रेन को तबाह कर दिया।  आज यदि युद्ध रुक  जाए तब भी इस खूबसूरत देश को पुरानी स्थिति में लौटने में कई दशक लग जाएंगे। लेकिन इससे भी बड़ा सवाल ये है कि उसके लिए आर्थिक संसाधन कहां से आयेंगे ? हालांकि जंग रोकना जितना यूक्रेन के लिए जरूरी है उतना  रूस के लिए भी क्योंकि ट्रम्प द्वारा उसके  साथ व्यापार करने वाले भारत और चीन जैसे देशों पर भी अनाप - शनाप टैरिफ थोप दिये गए । इस लड़ाई से वैश्विक अर्थव्यवस्था अनिश्चितता में फंस गई है। वहीं कूटनीतिक मोर्चे पर भी शीत युद्ध वाला माहौल नजर आने लगा जिससे कई मर्तबा विश्व युद्ध  के आसार भी नजर आये। लेकिन ट्रम्प ने जो ताजा शांति प्रस्ताव रखा है उसे यूक्रेन यदि स्वीकार कर लेता है तब वह हर दृष्टि से नुकसान में रहेगा। रूस द्वारा कब्जाई अपनी 20 फीसदी भूमि उसे सौंपने के साथ ही क्रीमिया पर उसके आधिपत्य को मान्यता देने के लिए सहमत होना जेलेंस्की क्या किसी के लिए भी जहर का घूँट पीने जैसा होगा। इसके अलावा सेना की सीमित संख्या, लंबी दूरी तक मार करने वाले अस्त्रों पर प्रतिबंध, नाटो की सदस्यता लेने पर रोक सहित जो प्रावधान ट्रम्प के शांति प्रस्ताव में हैं उन्हें सतही तौर पर देखने पर तो लगता है जैसे उनका प्रारूप उन्होंने पुतिन के साथ बैठकर बनाया हो। ट्रम्प जिस तरह जेलेंस्की पर उक्त शर्तों को स्वीकार करने का दबाव बना रहे हैं वह भी अजीबोगरीब है क्योंकि ऐसी बातें बैठकर तय होती हैं। यूक्रेनी राष्ट्रपति शुरू से कहते आ रहे हैं कि अमेरिका उन्हें और पुतिन को आमने - सामने बिठाये।  ट्रम्प शांति को जिस तरह थोपना चाह रहे हैं उससे यूरोपीय देशों में भी हड़कंप है। उन्हें चिंता है यूक्रेन का बड़ा हिस्सा हड़पने में सफल होने के बाद पुतिन अन्य पड़ोसी देशों के साथ भी वैसा ही व्यवहार करेंगे। इसीलिए ज्यादातर यूरोपीय देश इस शांति प्रस्ताव के विरोध में खड़े होकर यूक्रेन को हरसंभव सहायता देते रहने का आश्वासन दे रहे हैं। चौंकाने वाली बात ये भी है कि ट्रम्प की इस पहल पर रूस ने किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया अब तक नहीं दी। इससे लगता है अमेरिकी राष्ट्रपति जबरन श्रेय लूटने में लगे हैं। सही बात तो ये है कि यूक्रेन की दयनीय और जेलेंस्की की हास्यास्पद स्थिति बनाने में सबसे अधिक कसूर अमेरिका का ही है जिसने यूक्रेन को पहले तो रूस से भिड़ने के लिए उकसा दिया और जब वह बुरी तरह फंस गया तब बजाय सहारा देने के उसे दुत्कारने लगा। उसके इस आचरण पर उसके पूर्व विदेशमंत्री हेनरी किसिंजर का ये कथन सटीक बैठता है कि अमेरिका का दुश्मन होना खतरनाक हो सकता है, लेकिन उसका दोस्त होना घातक है।

- रवीन्द्र वाजपेयी


Tuesday, 25 November 2025

घुसपैठियों में मची भगदड़ से ममता घबराहट में



मतदाता सूचियों के सघन विशेष पुनरीक्षण (एस.आई आर) के विरोध में आसमान सिर पर उठाने वाली प. बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बैनर्जी को जब लगा कि वे इस प्रक्रिया को नहीं रोक पाएंगी तब वे ठंडी पड़ गईं । उनकी तरफ से तृणमूल कांग्रेस पार्टी के कार्यकर्ताओं की टोलियां तैयार करने का ऐलान भी हुआ था जिन्हें  घर - घर जाकर मतदाताओं की जाँच कर रहे बीएलओ के साथ रहकर देखना है कि किसी का नाम गलत तरीके से तो नहीं काटा जा रहा। उन्होंने ये प्रयास भी किया कि इस काम में प्रदेश के सरकारी कर्मचारी असहयोग करें। शुरुआत में ऐसा लगा भी परंतु चुनाव आयोग की सख्ती के कारण वह दाँव भी असफल हो गया। चूंकि मतदाता सूचियों का गहन पुनरीक्षण 12 राज्यों में एक साथ चल रहा है इसलिए सुश्री बैनर्जी का ये आरोप निराधार साबित हुआ कि केंद्र सरकार उनके राज्य को निशाना बना रही है। उल्लेखनीय है आगामी वर्ष प. बंगाल सहित अनेक राज्यों में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं इसलिए ममता की बेचैनी बढ़ गई। हाल ही में हुए बिहार विधानसभा चुनाव के पहले चुनाव आयोग द्वारा मतदाता सूचियों  का पुनरीक्षण करते हुए जब 65 लाख नाम अलग किये तब विपक्षी दलों ने उसे लोकतंत्र विरोधी कदम बताते हुए आरोप लगाया कि चुनाव आयोग भाजपा के इशारे पर विपक्षी दलों के समर्थकों के नाम सूचियों से अलग करवा रहा है। राहुल गाँधी ने इसे वोट चोरी जैसा नाम देते हुए बिहार में वोट अधिकार यात्रा तक निकाली। हालांकि चुनाव आयोग ने काटे गए नामों को दोबारा जोड़ने का समुचित अवसर प्रदान किया जिसका लाभ लेकर लाखों नये मतदाताओं ने भी  अपना पंजीयन करवाया। हालांकि 40 लाख से ज्यादा नाम सूचियों से अलग हुए। यदि विपक्ष के आरोप सही होते तब मतदाता सूचियों का प्रारूप प्रकाशित होने पर  बड़ी संख्या में शिकायतें आयोग को मिलतीं। श्री गाँधी को लगता था  मतदाता सूचियों के गहन पुनरीक्षण के विरोध में बिहार की जनता सड़कों पर उतर आयेगी। लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ। पूरा चुनाव शांतिपूर्ण और व्यवस्थित तरीके से संपन्न हो गया। एक भी मतदान केंद्र पर दोबारा मतदान की नौबत नहीं आई जो बिहार के लिए नया अनुभव था। मतदान का प्रतिशत  बढ़ने से तमाम आशंकाएँ निर्मूल साबित हुईं।  नीतीश सरकार की वापसी  प्रचंड बहुमत के साथ हुई जिसके बाद ये सुनने में भी आया कि जनता इसके विरुद्ध सड़कों पर उतर आयेगी और विपक्ष के चुने विधायक त्यागपत्र दे देंगे किंतु नई सरकार का शपथ ग्रहण निर्विघ्न संपन्न हो गया। मंत्रीमंडल को लेकर भी कोई विवाद सामने नहीं आया। इस प्रकार वोट चोरी और मतदाता सूचियों से नाम काटे जाने का मुद्दा फुस्स होकर रह गया। ममता बैनर्जी को उम्मीद थी कि बिहार में एनडीए को जनता सत्ता से बाहर कर देगी जिसके बाद प. बंगाल में चुनाव आयोग मतदाता सूचियों की सघन जाँच के काम में ढील डाल देगा किंतु उनकी आशाओं पर तुषारापात हो गया। बिहार की जनता ने वोट चोरी के मुद्दे को रद्दी की टोकरी में फ़ेंक दिया वहीं मतदाता सूचियों से लाखों नाम कट जाने के बाद भी कोई आसमान नहीं फटा।  मतदाता सूचियों के पुनरीक्षण की आहट मात्र से प. बंगाल के अवैध घुसपैठियों में जो भगदड़ दिखाई दे रही है उससे ममता की घबराहट की वजह स्पष्ट हो गई। जैसी कि खबरें आ रही हैं उसके अनुसार राज्य के विभिन्न इलाकों में रह रहे लोग बड़ी संख्या में रहस्यमय तरीके से घरों में ताला बंद कर गायब हो गए। बांग्लादेश की सीमा पर भी लोगों का हुजूम नजर आ रहा है जो वापस जाना चाह रहा है। असल में मतदाता सूचियों की सघन जाँच के शुरू होते ही अवैध रूप से मतदाता बन बैठे घुसपैठियों में ये भय समा गया है कि दस्तावेजों के अभाव में उनकी असलियत सामने आ जाने पर वे कानून के शिकंजे में फंस जाएंगे। जाहिर है ये वर्ग ममता का  प्रबल समर्थक है क्योंकि तृणमूल कांग्रेस की सहायता से ही उन्हें घुसपैठिया होने के बाद भी भारत में सभी सुविधाओं के साथ रहने की छूट प्राप्त है। प. बंगाल में एस. आई .आर के विरोध में जनता को आंदोलित करने की योजना भी सफल नहीं हुई। बड़ी बात नहीं बिहार जैसे ही यहाँ भी बड़ी संख्या में मतदाताओं के नाम मतदाता सूचियों से अलग हो जाएं। इसका राजनीतिक लाभ या हानि किस पार्टी को होगी ये बात उतनी महत्वपूर्ण नहीं जितनी ये कि चुनाव आयोग की इस पहल से राज्य में अवैध रूप से आकर बस गए बांग्लादेशी और रोहिंग्या घुसपैठियों का पर्दाफाश हो जायेगा जो देश के दूरगामी हित में है।

- रवीन्द्र वाजपेयी

Monday, 24 November 2025

यही हाल रहा तो कांग्रेस की हार का सिलसिला जारी रहेगा


लोकसभा चुनाव के बाद कांग्रेस में जो उत्साह लौटा था वह बीते डेढ़ साल में ठंडा हो गया। इस दौरान जम्मू - कश्मीर , हरियाणा, झारखंड, महाराष्ट्र, दिल्ली और बिहार के विधानसभा चुनावों में उसका प्रदर्शन इतना निराशाजनक रहा कि इंडिया गठबंधन के घटक तक उससे कन्नी काटने लगे। जम्मू - कश्मीर के चुनाव में नेशनल काँफ्रेंस ने कांग्रेस को जम्मू अंचल में सीटें दी गईं ताकि वह हिन्दू बहुल क्षेत्रों में भाजपा को रोक सके किंतु राहुल गाँधी घाटी में प्रचार करते रहे जिस पर  उमर अब्दुल्ला ने नाराजगी भी व्यक्त की। जम्मू में भाजपा को जबरदस्त सफलता मिली जबकि कांग्रेस कुछ खास नहीं कर सकी। उसी के साथ ही हरियाणा चुनाव में भी कांग्रेस का प्रदर्शन दयनीय रहा। सपा और आम आदमी पार्टी उससे सीटें मांगते रहे किंतु वह  अकेले लड़कर औंधे मुँह गिरी। उस पर  सपा के अलावा उद्धव ठाकरे वाली शिवसेना ने भी राहुल गाँधी की नेतृत्व क्षमता पर सवाल उठाये। हालांकि महाराष्ट्र और झारखंड के चुनाव में कांग्रेस के लिए अपनी साख बचाने का मौका था। झारखंड में तो हेमंत सोरेन भाजपा को रोकने में सफल रहे किंतु महाराष्ट्र में विपक्ष को जबरदस्त पराजय मिली जहाँ लोकसभा चुनाव में एनडीए को बड़ा धक्का लगा था । 48 में से 30 सीटें विपक्ष ले गया जिनमें  कांग्रेस को 13 मिलीं जबकि 2019 में वह 1 पर सिमट गई थी। लेकिन विधानसभा चुनाव में  महायुति सरकार भारी बहुमत से लौटी। भाजपा तो अकेले ही बहुमत के बेहद नजदीक पहुँच गई ।  वहीं कांग्रेस ने अब तक का सबसे खराब प्रदर्शन किया और महज 16 विधायकों तक सीमित होकर रह गई। उद्धव ठाकरे तक उससे अधिक सीटें ले आये। महाराष्ट्र के चुनाव ने लोकसभा चुनाव के बाद बने माहौल को पूरी तरह उलट दिया। हालांकि इसकी शुरुआत हरियाणा से हो चुकी थी। इन नतीजों से कांग्रेस और राहुल गाँधी की साख और धाक दोनों को काफी नुकसान पहुंचा जिससे इंडिया गठबंधन में उनका दबदबा कमजोर पड़ गया। कुछ महीनों बाद दिल्ली विधानसभा के चुनाव आ गए जहाँ पिछले दो चुनावों में कांग्रेस शून्य पर ही अटकी रही। हालांकि लोकसभा में उसने आम आदमी पार्टी के साथ गठबंधन किया किंतु भाजपा सभी 7 सीटें जीत गई। इसके बाद से ही दोनों में दूरियाँ बढ़ीं क्योंकि पंजाब में कांग्रेस ने आम आदमी पार्टी को नुकसान पहुंचाया  जिसका बदला उसने हरियाणा विधानसभा चुनाव में कांग्रेस की जड़ों में मठा डालकर ले लिया। इसीलिए  दिल्ली में दोनों एक दूसरे के विरुद्ध उतरे। लेकिन इंडिया गठबंधन के दो प्रमुख सदस्य ममता बैनर्जी और अखिलेश यादव ने कांग्रेस के बजाय आम आदमी पार्टी का समर्थन कर राहुल गाँधी को नजरंदाज कर दिया। हरियाणा और महाराष्ट्र की हार से बौखलाए श्री गाँधी ने दिल्ली में खुद मैदान संभाला और मुस्लिम क्षेत्रों से प्रचार की शुरूआत की। लेकिन यहाँ भी वे बुरी तरह असफल रहे और कांग्रेस लगातार तीसरी मर्तबा शून्य से आगे नहीं बढ़ सकी। वहीं भाजपा ने हरियाणा और महाराष्ट्र के बाद दिल्ली में भी धमाकेदार जीत दर्ज की। भाजपा के लिए यह  जीत हौसला बढ़ाने वाली साबित हुई वहीं आम आदमी पार्टी की महत्वाकांक्षाओं को इससे बड़ा धक्का लगा किंतु कांग्रेस  तो मुँह दिखाने लायक नहीं बची। होना तो ये चाहिए था कि इंडिया गठबंधन की बैठक बुलाकर भाजपा का विजय रथ रोकने की रणनीति बनाई जाती किंतु राहुल लग गए वोट चोरी का ढोल बजाने में । उन्हें लगता था कि चुनाव आयोग को घेरकर वे बिहार विधानसभा चुनाव में लोकसभा जैसा करिश्मा कर ले जाएंगे किंतु उनकी अपरिपक्वता ने वहाँ भी कांग्रेस को तो डुबोया ही  तेजस्वी यादव का भविष्य भी मटियामेट कर दिया। कांग्रेस दहाई के आंकड़े तक  नहीं पहुँच सकी।  दरअसल कांग्रेस की इस दुरावस्था के लिए श्री गाँधी की पार्ट टाइम राजनीतिक शैली जिम्मेदार है। अपने नेतृत्व में कांग्रेस की हार का कीर्तिमान स्थापित करने के बाद भी वे गलतियों को  दोहराने  पर आमादा हैं। पार्टी संगठन दिन ब दिन कमजोर होता जा रहा है। पार्टी अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे अपना राज्य कर्नाटक ही नहीं संभाल पा रहे जहाँ कांग्रेस सरकार अपने अंतर्विरोधों के कारण खतरे में है। अगले वर्ष होने वाले 5 राज्यों के विधानसभा चुनाव की रणनीति बनाना तो दूर पार्टी पिछली पराजयों के कारण तक नहीं ढूंढ़ सकी। यही हाल रहा तो अगले साल भी कांग्रेस शर्मिंदगी झेलने मजबूर रहेगी। जहाँ  तक बात राहुल की है तो उनका क्या , जब मर्जी विदेश चले जाएंगे। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Saturday, 22 November 2025

बिहार के बाद प. बंगाल पर टिकी भाजपा की नजरें



बिहार में नीतीश सरकार की धमाकेदार वापसी के बाद भाजपा ने  प. बंगाल में ममता बैनर्जी का किला ढहाने की तैयारियां शुरू कर दी हैं। 2021 के चुनाव में भाजपा अपने विधायकों की संख्या में आश्चर्यजनक वृद्धि करते हुए 3 से 73 तक पहुँचने के कारण मुख्य विपक्षी दल बनने की हैसियत में आ गयी। वहीं  कांग्रेस और वामपंथियों का पूरी तरह सफाया हो गया। लंबे समय तक वामपंथियों का अभेद्य दुर्ग बने रहे प. बंगाल में  पाँव जमाना भाजपा के लिए सपना जैसा था जबकि उसके पितृ पुरुष डाॅ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी यहीं के थे। भारत विभाजन की विभीषिका को जितना पंजाब और सिंध ने झेला उतना ही बंगाल ने भी। कोलकाता समेत समूचे बंगाल में हिंदुओं का जिस बेरहमी से नरसंहार हुआ उसने आजादी की खुशियों को मातम में बदल दिया। लेकिन उसके बाद भी इस राज्य में हिंदुवादी राजनीति को अपेक्षित समर्थन नहीं मिला और पूरे देश की तरह से ही बंगाल में भी कांग्रेस का वर्चस्व कायम रहा । लेकिन 1977 की जनता लहर में वहाँ ज्योति बसु के नेतृत्व में सीपीएम सरकार बनी। वे 2000 तक मुख्यमंत्री रहे। उनके बाद बुद्धदेव भट्टाचार्य आये किंतु  वे वामपंथियों के किले को बचाकर नहीं रख पाए और 2011 में ममता बैनर्जी ने अपना झंडा फहरा दिया। कांग्रेस में रहते हुए भी वे वामपंथियों से लड़ती रहीं किंतु पार्टी नेतृत्व से अपेक्षित सहयोग न मिलने से क्षुब्ध होकर उन्होंने तृणमूल कांग्रेस बनाई और 10 वर्ष के सतत संघर्ष के बाद वामपंथी सत्ता को उखाड़ फेंका। लोगों को उम्मीद थी कि वे मार्क्सवादी सत्ता के दौरान पनपी अराजकता से निजात दिलवाने के साथ ही बांग्लादेशी घुसपैठियों को वापस भेजने के लिए प्रभावी कदम उठाएंगी। लेकिन धीरे - धीरे ममता ने भी  वही तौर - तरीके अपनाये जिनके लिए वामपंथी सरकार की आलोचना करते हुए वे संघर्ष करती रहीं। राज्य के तमाम असामाजिक तत्वों ने रातों - रात मार्क्सवादी चोला उतारकर तृणमूल का झंडा थाम लिया। बांग्लादेशी घुसपैठियों को बाहर करने के बजाय ममता सरकार ने उन्हें मतदाता बनाकर अपनी राजनीतिक जमीन मजबूत करने का दाँव चला। बाद में म्यांमार से भागकर रोहिंग्या मुस्लिम भी प. बंगाल में बसते चले गये। वामपंथियों की तरह ममता सरकार को भी इन घुसपैठियों में अपना वोट बैंक नजर आने लगा । इसकी वजह से प. बंगाल का जनसंख्या संतुलन तेजी से बदला। ममता के लिए ये घुसपैठिये चुनाव जिताने वाला ब्रह्मास्त्र बन गए। राजनीतिक गुंडागर्दी को भी उन्होंने अपना प्रमुख हथियार बनाते हुए कांग्रेस और वामपंथियों को धीरे - धीरे हाशिये पर धकेल दिया। लेकिन 2014 में केंद्र में नरेंद्र मोदी की सरकार बनते ही भाजपा ने न सिर्फ प. बंगाल वरन समूचे पूर्वी और उत्तर पूर्वी राज्यों में अपने विस्तार की कार्य योजना बनाई जिसका परिणाम अरुणाचल, असम, त्रिपुरा, मणिपुर और उड़ीसा में उसकी सरकारें बन जाने के रूप में सामने है। लेकिन प. बंगाल अभी भी उसके लिए चुनौती बना हुआ है।  2014 और 2019 के लोकसभा चुनाव  के बाद 2021 के विधानसभा चुनाव में उसे अच्छी सफलता मिली। यहाँ तक कि ममता  विधानसभा चुनाव हार गईं  । यद्यपि उन्हें विशाल बहुमत मिला और तीसरी बार सत्ता में आने के बाद उन्होंने भाजपा को रोकने के लिए हरसंभव प्रयास शुरू किये जिसके कारण पिछले लोकसभा चुनाव में भाजपा को काफी नुकसान हुआ। लेकिन उसके बाद से भाजपा ने प. बंगाल को अपनी सर्वोच्च प्राथमिकता में रखा । ममता सरकार के भ्रष्टाचार को उजागर कर उसकी साख गिराने में तो उसे सफलता मिल गई लेकिन चुनाव जीतने के लिये घुसपैठियों को मतदाता सूचियों से बाहर करना जरूरी है। अब एस. आई. आर (मतदाता सूचियों का गहन पुनरीक्षण) के जरिये इस बाधा को दूर करने का बीड़ा भी उठा लिया गया है। चुनाव आयोग के इस कदम से ममता सरकार घबराई हुई है। उसने इस प्रक्रिया को रोकने के भरसक प्रयास किये किंतु सफल नहीं हुई। बिहार में मतदाता सूचियों की जाँच के कारण बड़ी संख्या में मतदाता बाहर हो गए। प. बंगाल में भी ऐसी ही उम्मीद है। बड़ी संख्या में घुसपैठियों के भागने से लगता है तीर सही निशाने पर बैठा है। बिहार की जीत के समारोह में प्रधानमंत्री द्वारा गंगा के बिहार  से प. बंगाल जाने जैसी जो टिप्पणी की उसका निहितार्थ राजनीति के जानकार समझ रहे हैं। भाजपा की चुनावी मशीनरी राज्य में सक्रिय होने की खबरें आने के बाद ममता सतर्क हो उठी हैं किंतु 2026 के मुकाबले के लिये भाजपा की तैयारियों से लगता है मुकाबला जोरदार होगा क्योंकि हिंदुत्व की हवा इस राज्य में भी महसूस होने लगी है। 

- रवीन्द्र वाजपेयी

Friday, 21 November 2025

परिवारवाद : नीतीश खुद तो दूर किंतु सहयोगियों के आगे मजबूर

हार चुनाव में एनडीए की ओर से दो मुद्दे जोरदारी से उठाये गए थे। इनमें पहला जंगल राज और दूसरा था परिवारवाद ।  इन दोनों का निशाना लालू प्रसाद यादव ही थे क्योंकि उनके शासन काल में कानून व्यवस्था की खराब स्थिति के कारण सर्वत्र अराजकता फैल गई थी। इसके अलावा सामाजिक न्याय के जिस मुद्दे पर लालू सत्ता में आये वह धीरे - धीरे उनके परिवार के उत्थान पर केंद्रित हो गया। परिणामस्वरूप राजद नामक उनकी पार्टी परिवार की निजी संपत्ति में परिवर्तित होकर रह गई। नीतीश कुमार के 20 वर्षीय शासन में बिहार में रामराज्य आ गया हो ये कहना तो अतिशयोक्ति होगी किंतु कानून व्यवस्था में जबरदस्त सुधार हुआ ।  वहीं सामाजिक कल्याण की अनेक योजनाएं भी प्रारंभ हुईं जिनका केंद्र महिलाएं होने से नीतीश के प्रति उनका झुकाव बढ़ता गया। शराबबंदी जैसे निर्णयों से भी उनकी  सकारात्मक छवि निर्मित हुई। लेकिन सबसे बड़ी बात जिसके लिए नीतीश की प्रशंसा सभी करते हैं वह है अपने आपको परिवारवाद से परे रखना। उनकी पत्नी काफी पहले दिवंगत हो चुकी थीं। उनके इकलौते पुत्र निशांत कुमार राजनीति से दूर रहने की वजह से सार्वजनिक तौर पर बहुत कम नजर आते हैं। चुनाव के दौरान शायद ही किसी ने उनको किसी रैली या सभा में देखा हो। चुनाव परिणाम के बाद जरूर वे पिता को चरण छूकर बधाई देते दिखे । दूसरी तरफ लालू प्रसाद यादव का पूरा कुनबा ही उनकी पार्टी पर हावी रहा है। स्व. रामविलास पासवान के बेटे चिराग ने भी पिता की पार्टी लोक जनशक्ति पूरी तरह से हथिया ली और चाचा पारस को किनारे लगा दिया।  एनडीए के एक और घटक के मुखिया जीतन राम मांझी ने भी अपने परिवार को ही स्थापित किया। उनकी बहू और समधिन जीतकर विधायक भी बन गईं । हालाँकि भाजपा में भी बहुत से विधायक पारिवारिक विरासत के कारण आगे आ सके और कुछ मंत्री भी बने किंतु पार्टी पर किसी एक नेता या परिवार का कब्जा नहीं होने से वह परिवारवाद के आरोप से बच जाती है। एनडीए का एक और घटक राष्ट्रीय लोक मोर्चा है जिसके सर्वेसर्वा उपेंद्र कुशवाहा अपनी जातीय प्रभाव के चलते बिहार की राजनीति में महत्वपूर्ण बने रहते हैं। हालाँकि वे अपनी सुविधानुसार यहाँ - वहाँ होते रहते हैं। इस बार उनकी पार्टी को अच्छी सफलता मिल गई तथा श्रीमती कुशवाहा भी विधानसभा में आ गईं। उसके बाद खबर उड़ी कि वे पार्टी कोटे से मंत्री बनेंगी क्योंकि क्षेत्रीय पार्टियों में ये चलन आम हो चुका है। लेकिन जब  शपथ ग्रहण हुआ तब मंत्रियों में एक ऐसे युवा को देखकर सभी चौंक गये जो विधानसभा और विधान परिषद दोनों का सदस्य नहीं है। फिर पता चला कि दीपक प्रकाश नामक ये व्यक्ति कुशवाहा जी  के साहेबजादे हैं। चूंकि घटक दल  गठबंधन की जरूरत  होते हैं इसलिए उनके नखरे उठाना बड़ी पार्टियों के लिए मजबूरी बन चुकी है। 2020 में चिराग ने जदयू को दर्जनों सीटें हरवा दी थीं किंतु इस बार मन मारकर नीतीश को उन्हें गठबंधन में शामिल करना पड़ा। उपेंद्र के साथ भी वही स्थिति है। इसीलिए खुद परिवारवाद  से परहेज करने वाले नीतीश को सहयोगियों के परिजनों को मंत्री बनाना पड़ा जिनमें जीतन राम के बेटे भी हैं जो पिछली सरकार में भी थे और विधान परिषद सदस्य हैं। स्मरण रहे बिहार में विधानसभा के दो सदन होने से कई मंत्री उच्च सदन से भी बनते हैं। खुद नीतीश कुमार भी विधान परिषद में ही हैं। एक सप्ताह पूर्व जो नई विधानसभा चुनकर आई उसमें विभिन्न दलों के ऐसे दर्जनों विधायक हैं जिन्हें राजनीति विरासत में प्राप्त हुई। लेकिन उपेंद्र ने  जिस प्रकार अपने बेटे को मंत्री बनाया वह तो लोकतंत्र का मजाक है। संविधान के अनुसार अब उन्हें छह माह में किसी सदन का सदस्य बनना होगा और वे बन भी जाएंगे किंतु फ़िलहाल तो उनकी ताजपोशी उसी परिवारवाद का उदाहरण है जिसके लिए लालू परिवार की आलोचना की जाती है। आश्चर्य तो तब होता है जब भाजपा भी चुपचाप गठबंधन राजनीति की इस मजबूरी को जरूरी मानकर ढोने को राजी हो जाती है। जाति के नाम पर बने तमाम छोटे दलों के मुखिया अपनी जाति के नाम पर अपने परिवार का उत्थान किस तरह कर रहे हैं बिहार का नया मंत्रीमंडल इसका उदाहरण है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Thursday, 20 November 2025

खैरात बाँटने के सिलसिले को कभी न कभी तो रोकना पड़ेगा


नीतीश कुमार ने बिहार के मुख्यमंत्री पद की शपथ ले ली। उनके साथ ही दो दर्जन से ज्यादा मंत्रियों ने भी पद और गोपनीयता की शपथ ली । कुछ पद भावी समीकरणों की वजह से खाली रखे गए जो स्वाभाविक ही है। इस बार नीतीश की पार्टी के विधायकों की संख्या पूर्वापेक्षा काफी बढ़ने से उनका मनोबल  ऊँचा होना लाजमी है। मंत्रीमंडल में भाजपा के विधायकों की संख्या सबसे ज्यादा होने पर किसी को आश्चर्य नहीं हुआ क्योंकि उसके पास सर्वाधिक सीटें हैं। दो उपमुख्यमंत्री और विधानसभा अध्यक्ष पद भी उसी के खाते में जाने की संभावना है। चूंकि एनडीए के पास पर्याप्त बहुमत है इसलिए सरकार के स्थायित्व पर किसी तरह का खतरा नहीं है । बिहार के हित में भी यही होगा कि  सरकार पूरे पाँच वर्ष निर्विघ्न चले। विपक्ष चूंकि काफी कमजोर है इसलिए उसकी तरफ से किसी तोड़फोड़ की आशंका भी नजर नहीं आती। लेकिन इस सबके साथ ही जो  बात इस चुनाव के बाद समूचे राजनीतिक विमर्श का विषय बन गई वह है सरकार द्वारा संचालित वे योजनाएं जिनमें जनता के खाते में सीधे नगदी जमा की जाती है। यद्यपि इसकी शुरुआत काफी पहले हो चुकी थी। वृद्धावस्था और निराश्रित पेंशन तो बहुत  पुरानी है। म.प्र में शिवराज सिंह चौहान ने लाड़ली लक्ष्मी योजना शुरू की जिसमें बेटी के जन्म पर एक लाख रु. उसके नाम से सावधि जमा कर दिये जाते हैं। छात्र - छात्राओं को साइकिलें, टैबलेट , लैपटॉप, गणवेश, पुस्तकें, बस्ता, फीस माफी, छात्र वृत्ति जैसी योजनाएं भी कालांतर में प्रारंभ हुईं। नीतीश  कुमार ने 20 साल पहले जिन  स्कूली छात्राओं को साइकिलें दीं वे माँ बनने के बाद भी उनकी समर्थक हैं। हालाँकि महिलाओं के उनके प्रति झुकाव में शराब बंदी का भी बड़ा योगदान है किंतु माना जा रहा है कि हाल ही में संपन्न विधानसभा चुनाव में नीतीश सरकार ने जीविका दीदी नामक योजना के नाम पर डेढ़ करोड़ महिलाओं के खाते में जो दस हजार जमा करवाये उसने चुनाव को इकतरफा बना दिया। वैसे  ये फार्मूला आजमाने वाले वे पहले मुख्यमंत्री नहीं हैं। बीते कुछ सालों में म.प्र, हरियाणा, महाराष्ट्र और झारखंड में सरकार  चुनाव के पहले महिलाओं के खातों में नगद राशि जमा करने के बाद सत्ता में लौटी। हालाँकि खजाना खोलकर मुफ्त खैरात बांटने के बाद भी छत्तीसगढ़ और राजस्थान की सरकार सत्ता गँवा बैठी। लेकिन चुनाव जीतने के लिए खजाना खाली करने का जो मंत्र राजनेताओं ने सीख लिया उसके दूरगामी दुष्परिणामों को लेकर हर जिम्मेदार व्यक्ति चिंता व्यक्त कर रहा है। निजी चर्चाओं में नेतागण भी  स्वीकार करते हैं कि भविष्य में नगदी बाँटने के इस तरीके से  सरकारों पर कर्ज का बोझ इतना बढ़ जाएगा जिसकी अदायगी करने में वे सक्षम नहीं रहेंगी। हालाँकि सभी पार्टियां इस मामले में एक जैसी हैं। कांग्रेस ने कर्नाटक और हिमाचल प्रदेश में महिलाओं को नगद राशि के अलावा कर्मचारियों को पुरानी पेंशन का वायदा कर भाजपा से सत्ता तो छीन ली परंतु अब इन राज्यों में वेतन बाँटने तक में सरकार को पसीना आ रहा है। मुफ्त बिजली के कारण लगभग सभी राज्यों के बिजली बोर्ड कंगाल हो गए वहीं मुफ्त पट्टों के वितरण ने सरकारी जमीन की लूटपाट का रास्ता खोल दिया। खैरात बाँटकर चुनाव जीतने का चलन हालाँकि  कई दशकों से चला आ रहा है लेकिन अब इसका स्वरूप जिस  तरह बड़ा होता जा रहा है वह बड़े खतरे का संकेत है। बिहार चुनाव में नीतीश द्वारा खेले गए  दस हजार रूपी दाँव की काट के रूप में तेजस्वी यादव ने चुनाव जीतने पर महिलाओं को तीस हजार देने का वायदा कर दिया। यदि वे जीतते तब उसमें उसी वायदे का योगदान होता। लेकिन  राज्य सरकार के खजाने पर तीन गुना बोझ पड़ता। अगले साल प. बंगाल, असम, तमिलनाडु, केरल में विधानसभा चुनाव होने हैं। बिहार के परिणाम से उत्साहित इन  राज्यों के मुख्यमंत्री भी नीतीश जैसी ही दरियादिली दिखाएं तो उन्हें कौन रोकेगा ? हालाँकि दिल्ली में केजरीवाल सरकार मुफ्त  बिजली, पानी  , शिक्षा और इलाज देने के बाद भी सत्ता से बाहर आ गई जिसके अन्य कारण भी हैं किंतु आम आदमी पार्टी सत्ता में आई ही मुफ्त उपहारों के वायदों के कारण थी । भले ही देश की अर्थव्यवस्था कितनी भी सुदृढ हो लेकिन जिस तरह बड़े से बड़े बर्तन में एक छेद करने पर उसमें भरा पानी रिसते - रिसते खत्म हो जाएगा उसी तरह सरकार का खजाना चाहे कितना भी भरा हो यदि उसे अनुत्पादक कार्यों में लुटाया जाता रहा तो देश में निकम्मों की संख्या बढ़ती चली जायेगी जिसका अनुभव होने भी लगा है। चुनाव आयोग को इस दिशा में पहल करना चाहिए। हालाँकि राजनीतिक पार्टियां इस बारे में किसी भी प्रकार की रोक को शायद ही स्वीकार करेंगी । लेकिन खैरात बांटने के इस सिलसिले को कभी न कभी तो विराम देना ही पड़ेगा। वरना विश्व की सबसे तेज बढ़ती अर्थव्यवस्था की रफ्तार का धीमा पड़ना सुनिश्चित है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Wednesday, 19 November 2025

नीतीश की ताजपोशी के बाद भी भाजपा फायदे में


बिहार विधानसभा चुनाव के पहले ये चर्चा आम थी कि नीतीश कुमार की राजनीतिक पारी खत्म होने जा  रही है। उन्हें बीमार और थका हुआ बताने  के साथ ही ये प्रचार भी  किया जाता रहा कि एनडीए का बहुमत आने पर भी भाजपा उन्हें मुख्यमंत्री नहीं बनायेगी। इस बारे में महाराष्ट्र का उदाहरण दिया गया जहाँ एकनाथ शिंदे को हटाकर  भाजपा ने देवेंद्र फड़नवीस की ताजपोशी करवा दी। 2020 में  भाजपा को जदयू से काफी ज्यादा सीटें मिलने पर भी मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ही बनाये गए। हालाँकि 2022 में उन्होंने भाजपा को झटका देकर लालू प्रसाद यादव की राजद के साथ मिलकर सरकार बना ली और लोकसभा चुनाव में  नरेंद्र मोदी के विरुद्ध इंडिया गठबंधन की  रचना में महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वहन भी किया। दरअसल नीतीश को इस बात की खुन्नस थी कि विधानसभा चुनाव में भाजपा की शह पर  चिराग पासवान ने जदयू के विरुद्ध प्रत्याशी खड़े किये जिससे जदयू के विधायकों की संख्या घट जाने ने से वे भाजपा की कृपा पर निर्भर हो गए। लेकिन जल्द ही  लालू परिवार की हरकतों से परेशान होकर उन्होंने भाजपा के साथ लौटकर  इंडिया गठबंधन को जबरदस्त झटका दे दिया जिसका असर लोकसभा में एनडीए की वापसी के तौर पर दिखाई दिया। लेकिन भाजपा स्पष्ट बहुमत से पीछे रह गई और उसे नीतीश और चंद्रबाबू नायडू के समर्थन से सरकार बनाना पड़ी। इस कारण नीतीश भाजपा की मजबूरी बन गए। बावजूद इसके बिहार के संदर्भ में तरह - तरह की बातें चलती रहीं। यहाँ तक हवा उड़ाई गई कि चुनाव के बाद नीतीश फिर खेला करेंगे जिससे मोदी सरकार खतरे में पड़ जाएगी। इन चर्चाओं के कारण बिहार में तेजस्वी यादव  की संभावनाएं उज्ज्वल मानी जाने लगीं। विभिन्न सर्वे उन्हें मुख्यमंत्री की दौड़ में नीतीश से आगे बता रहे थे। मतदान के बाद हुए अनेक एग्जिट पोल में एनडीए को बहुमत मिलने के बाद भी तेजस्वी की लोकप्रियता नीतीश से अधिक बताई गई। लेकिन जब नतीजे आये तब सारे अनुमान और आशंकाएँ ध्वस्त हो गए। एनडीए को ऐतिहसिक बहुमत मिलने के साथ ही भाजपा और जदयू ने अपने सहयोगियों के साथ भारी सफलता हासिल की। हालाँकि भाजपा  सबसे बड़ी पार्टी बनने में कामयाब रही वहीं नीतीश भी 2020 से दोगुनी सीटें जीतकर अच्छी स्थिति में तो आ गए किंतु  लालू एंड कंपनी के साथ जाने का खतरा उठाना उनके लिए कठिन हो गया। भाजपा ने भी चुनाव के दौरान किया वायदा निभाते हुए उन्हें बिहार की बागडोर सौंप दी। कल नीतीश शपथ लेंगे जिसमें प्रधानमंत्री सहित एनडीए शासित राज्यों के मुख्यमंत्री भी शामिल होंगे जिससे इस गठबंधन की मजबूती उजागर होगी। उल्लेखनीय है आगामी वर्ष प. बंगाल, असम, तमिलनाडु और केरल में  विधानसभा चुनाव होने वाले हैं। बिहार के परिणामों ने भाजपा के हौसले बुलंद कर दिये हैं । इसीलिए  उसने प.बंगाल और तमिलनाडु में अपनी रणनीति पर  काम करना शुरू कर दिया है। बिहार के परिणामों के बाद राजनीतिक क्षेत्रों में  चर्चा  है कि प. बंगाल, असम और तमिलनाडु में बिहार के प्रवासी काफी बड़ी संख्या में हैं जिनको अपने पक्ष में लाने के लिए भाजपा, नीतीश का उपयोग करेगी। बिहार में एनडीए की धमाकेदार जीत के बाद नीतीश की वजनदारी न सिर्फ अपने राज्य अपितु अन्य राज्यों में फैले बिहारी प्रवासियों के बीच भी बढ़ गई है। चूंकि जदयू अन्य राज्यों में नहीं है, इसलिए नीतीश को भी भाजपा के लिए प्रचार करने में कोई परेशानी नहीं होगी। हरियाणा, महाराष्ट्र, दिल्ली और बिहार में शानदार सफलता के बाद भाजपा की चुनावी मशीनरी और सूक्ष्म प्रबंधन की  विरोधी भी तारीफ कर रहे हैं। जो पत्रकार दिन रात श्री मोदी और अमित शाह के विरुद्ध ज़हर उगला करते थे वे भी ये कहने को बाध्य हो गए हैं कि वे प्रयासों की पराकाष्ठा से  विपरीत परिस्थितियों में भी अपनी सफलता सुनिश्चित कर लेते हैं। नीतीश को भी ये बात समझ में आ चुकी है कि बिना भाजपा के उनका गुजारा संभव नहीं है। बिहार में लालू युग का अवसान होने के साथ ही भाजपा ही भविष्य की राजनीतिक शक्ति है।  वैसे भी ये नीतीश की आखिरी पारी है और सम्मानजनक रिटायरमेंट के लिए भाजपा से जुड़े रहना उनके लिए जरूरी होगा। उनको मुख्यमंत्री बनाकर भाजपा ने बेहद चतुराई दिखाई है। उसके पास नीतीश की टक्कर का कोई नेता है नहीं और चिराग पासवान को एक सीमा से आगे वह जाने नहीं देगी।  इस जीत का सबसे अधिक लाभ भाजपा को हुआ क्योंकि बिहार जैसे जाति में जकड़े राज्य में राष्ट्रवादी राजनीति का बढ़ता वर्चस्व राष्ट्रीय परिदृश्य को प्रभावित किये बिना नहीं रहेगा। इस चुनाव के बाद लालू और उनका परिवार तो सन्निपात की स्थिति में है ही कांग्रेस भी झटके से उबर नहीं पा रही । 


-रवीन्द्र वाजपेयी

Tuesday, 18 November 2025

न वैसे नेता रहे और न ही श्रोता


     समय के साथ सभी चीजें बदलती हैं। इसलिए चुनाव भी नए रंग और नए रूप में नजर आने लगे हैं। सघन जनसंपर्क अब औपचारिकता में बदल गया है। मतदाताओं की बढ़ती संख्या और निर्वाचन क्षेत्र के फैलाव ने प्रत्याशियों की मुश्किलें बढ़ा दी हैं। इसीलिए घर - घर जाकर दरवाजा खटखटाने वाले प्रचार की जगह अब हाईटेक संचार माध्यमों ने ले ली है। मोबाइल पर धड़ाधड़ संदेश आते हैं , प्रत्याशी का रिकॉर्डेड अनुरोध भी सुनाई देता है। सोशल मीडिया के सभी मंच चुनावी प्रचार से भरे हैं । बड़े  नेताओं के तामझाम भरे रोड शो होने लगे हैं। कुछ विशिष्ट हस्तियों के नाम पर भीड़ जमा करने का तरीका भी अपनाया जाने लगा है किंतु इस सबके बीच देर रात तक चलने वाली छोटी - बड़ी सभाएं अतीत बन चुकी हैं जिनमें विभिन्न दलों के नेता घंटों अपनी विचारधारा का बखान करते हुए मतदाताओं से समर्थन की अपील करते थे।

      वे नेता  हेलीकॉप्टर और चार्टर्ड विमानों से नहीं अपितु रेल या सड़क मार्ग से आते। उनके आने में  देर होने पर भी जनता उनको सुनने घंटों प्रतीक्षा करती रहती थी। नुक्कड़ सभाओं में प्रादेशिक या स्थानीय नेतागण अपनी पार्टी का पक्ष रखते थे। आज की तरह रैलियों में शामियाना और कुर्सियां नहीं लगती थीं । आगे बिछी कुछ दरियों पर पहले से आए श्रोता कब्जा जमा लेते और पीछे हजारों श्रोता खड़े -खड़े भाषण सुनते थे। प्रधानमंत्री के अलावा अनेक ऐसे राष्ट्रीय नेता भी थे जो भले सांसद - विधायक न रहे हों किंतु जनता उनको सुनने बेताब रहा करती थी। सबसे बड़ी बात ये थी कि उन नेताओं को सुनने के लिए वे लोग भी आते जो उनकी विचारधारा से सहमत नहीं होते थे । नुक्कड़ सभाओं के माध्यम से प्रादेशिक नेता छोटे - छोटे श्रोता समूह से मुखातिब होते और लोग भी धैर्यपूर्वक उन्हें सुनते थे।

      समय बीतने के साथ चुनाव महंगे होते जा रहे हैं। चुनाव आयोग ने बीते कुछ दशकों में उनका रंग - रूप पूरी तरह बदल दिया। खर्च कम करने के लिए किए गए उपाय कितने सफल हुए ये बड़ा सवाल है क्योंकि धन का उपयोग पहले से कई गुना बढ़ गया है। रात 10 बजे सभाएं बंद कर दी जाती हैं। आयोग एक - एक कुर्सी और वाहन का हिसाब रखता है। चाय , समोसे तक का खर्च जोड़ा जाने लगा है। अखबारी विज्ञापन के अलावा सोशल मीडिया पर भी  हेट, फेक और पेड समाचार पर 24 घंटे निगाह रखी जाने लगी है। वृद्ध और निःशक्त मतदाताओं को घर पर मतदान की सुविधा भी शुरू हो गई है। मतदाता सूचियां बनाने और मतपर्चियां घर - घर भेजने का सरकारी इंतजाम  मत प्रतिशत बढ़ाने में  सहायक हुआ है। लेकिन चुनावी सभाओं का  असली आनंद  लुप्त हो गया है। न वैसे ओजस्वी वक्ता रहे और न ही प्रतिबद्ध श्रोता। इसका मुख्य कारण ये भी है कि सभी प्रमुख राजनीतिक दल और उनके नेता सत्ता में रह चुके हैं। ऐसे में वे केवल अपने विरोधी की आलोचना कर जनता को प्रभावित नहीं कर सकते। उन्हें सरकार में रहते हुए जनहित में किए गए कामों का हिसाब भी देना होता है।  वह पीढ़ी भी धीरे - धीरे समाप्त होती जा रही है जो किसी पार्टी  या नेता की अंधभक्त होती थी। नेहरू जी ,  डा.लोहिया और अटल जी जैसे जननेताओं के विरोधी भी उनके प्रति सम्मान का भाव रखते थे। धीरे - धीरे नेताओं का स्तर गिरने लगा जिसके परिणामस्वरूप राजनीति के प्रति समाज में व्याप्त आदर भाव में  भी कमी आती गई। आज देश में शायद ही कोई नेता बचा हो जिसको सुनने स्वस्फूर्त जनता उमड़ पड़ती हो। गांव और कस्बों में हेलीकॉप्टर देखने जरूर लोग जमा हो जाते हैं किंतु नेताओं को सुनने का लालच खत्म होने लगा है। और हो भी क्यों न , बीते 75 साल से भाषण सुनती आई जनता जब देखती है कि साधारण परिस्थिति का व्यक्ति तो चुनाव जीतने के बाद अपार धन संपत्ति अर्जित कर लेता है किंतु उसकी अपनी  दशा नहीं बदलती तब उसके मन में गुस्सा जागता है। और इसी गुस्से ने नेताओं के प्रति असम्मानजनक संबोधनों को जन्म दिया ।

      जो राजनीति समाज को दिशा देती थी वह खुद ही दिशाहीन हो चली है । इसी तरह जिन नेताओं को जनता अपना पथ प्रदर्शक माना करती थी वे खुद भटकाव का शिकार  हैं। ये स्थिति अच्छी नहीं है जिसका प्रमाण राजनीति से अच्छे  लोगों का दूर होते जाना है। हालांकि सभी पार्टियों और नेताओं को कठघरे में खड़ा करना न्यायोचित नहीं होगा किंतु अधिकांश की साख में कमी आई है , जो लोकतंत्र के लिए शुभ  संकेत नहीं है। चूंकि हमारा समाज काफी धैर्यवान है इसलिए अपनी उपेक्षा और बदहाली पर उत्तेजित नहीं होता। हर चुनाव के बाद लोकतंत्र की मजबूती और मतदाताओं की समझदारी का बखान तो खूब होता है किंतु  अधिक मतदान और चुनाव के निर्विघ्न संपन्न हो जाने को ही सफलता और संतोष का पैमाना माना लेना सच्चाई से आंखें चुराने जैसा है।

      भारतीय लोकतंत्र दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र भले हो किंतु वह अपनी नैसर्गिक खूबसूरती खोता जा रहा है। कृत्रिमता , बाजारवाद और नीतिगत भटकाव उसकी पहिचान बन चुके हैं। चुनावों के  लगातार महंगे होने से भी उनकी गंभीरता और गरिमा में कमी आई है। नेताओं के आकर्षण में कमी आने का ही सबूत है कि पहले उनको देखने - सुनने जनसैलाब उमड़ा करता था किंतु अब वही नेता रोड शो के माध्यम से खुद को दिखाते नजर आते हैं।


आलेख:- रवीन्द्र वाजपेयी

बांग्लादेश के मामले में सावधानी से कदम उठाने की जरूरत


बांग्लादेश की पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना को गत दिवस फांसी की सजा सुनाई गई। ढाका की इंटरनेशनल क्राइम्स ट्रिब्यूनल ने उन्हें हत्या के लिए उकसाने और हत्या का आदेश देने के लिए दोषी मानते हुए जुलाई 2024 के छात्र आंदोलन के दौरान हुई हत्याओं का जिम्मेदार बताया। उनके साथ ही पूर्व गृह मंत्री असदुज्जमान खान को भी मृत्युदंड दिया। बांग्लादेश के अंतरिम शासक मो. यूनुस ने भारत से हसीना को  सौंपने करने की मांग की है। उल्लेखनीय है गत वर्ष हुए  तख्तापलट के बाद हसीना और असदुज्जमान  देश छोड़कर भारत आ गए थे। बांग्लादेश का कहना है कि दोनों देशों के बीच प्रत्यर्पण संधि के मुताबिक भारत को चाहिए कि वह हसीना को उसके हवाले करे। हालाँकि सं. रा. संघ के महासचिव ने उक्त फैसले को गलत बताया है। मानवाधिकार से जुड़ी अनेक हस्तियों ने भी मृत्युदण्ड दिये जाने के फैसले को प्राकृतिक न्याय के विरुद्ध बताया क्योंकि  हसीना को अपना पक्ष रखने का अवसर दिये बिना उन पर लगे आरोप सही मानकर फांसी की सजा का ऐलान कर दिया गया। हालाँकि इस निर्णय से किसी को आश्चर्य नहीं हुआ क्योंकि पाकिस्तान की तरह से ही बांग्लादेश में अपने राजनीतिक विरोधी को खत्म करने की परिपाटी रही है। बांग्लादेश के राष्ट्रपिता कहे जाने वाले शेख मुजीबुर्रहमान की 1975 में उनके सरकारी आवास में घुसकर सपरिवार हत्या कर दी गई थी। उनकी पुत्री हसीना उस समय विदेश में होने से बच गईं और बाद में प्रधानमंत्री भी बनीं। उनके पहले वाली सरकार  भारत विरोधी नीति पर चलती रही। हसीना के शासनकाल में दोनों देशों के रिश्तों में काफी सुधार हुआ जिसके कारण अनेक विवादित मुद्दे हल हो गए और आपसी व्यापार भी बढ़ा। लेकिन वे भारत विरोधी ताकतों को नियंत्रित नहीं कर सकीं  जो वहाँ रह रहे हिंदुओं पर अत्याचार और उनके धर्मस्थलों को नष्ट करते रहते हैं। हसीना के विरोध में हुए छात्र आंदोलन के पीछे अमेरिका और चीन दोनों की भूमिका रही क्योंकि वे इस देश का उपयोग भारत को घेरने के लिए करना चाहते हैं। तख्ता पलट के कारण जब हसीना भारत आईं तब मोदी सरकार ने  ये सोचकर उन्हें यहाँ रहने की अनुमति दे दी कि जल्द ही वे किसी अन्य देश में राजनीतिक शरण  ले लेंगी किंतु अमेरिका के दबाव में ऐसा नहीं हो सका और लगभग 15 माह से वे यहीं रह रही हैं। बांग्लादेश ने कई बार भारत से हसीना को लौटाने की मांग कि जिसे सरकार ने स्वीकार नहीं किया। यद्यपि दोनों देशों के बीच कूटनीतिक रिश्ते कायम हैं किंतु भारत ने अपनी मित्र को संकट में अकेला छोड़ना उचित नहीं समझा। लेकिन अब जबकि हसीना को फांसी की सजा सुना दी गई है तब  यह मामला काफी पेचीदा हो गया है। बांग्लादेश इसे वैश्विक मंचों पर उठायेगा जहाँ उसे चीन और पाकिस्तान का समर्थन तो मिलेगा ही , बड़ी बात नहीं अमेरिका भी साथ खड़ा हो जाए जिसकी नजर उसके एक द्वीप पर है। ऐसे में भारत को बाहरी दबाव  झेलने पड़ सकते हैं। हालाँकि बांग्लादेश में भारत विरोधी सरकार है जो हिंदुओं का दमन करने पर आमादा मुस्लिम कट्टरपंथियों को खुलकर संरक्षण दे रही है किंतु हसीना पर अदालत के फैसले के पहले उनके समर्थक भी सड़कों पर उतरे जिसके चलते फैसले की तारीख टालनी पड़ी। जिन छात्र संगठनों ने हसीना को सत्ता से हटाने के लिए देशव्यापी आंदोलन  किये वे भी नये  चुनाव की मांग लेकर आंदोलनरत हैं। मो. युनुस यद्यपि जल्द चुनाव करवाने का आश्वासन देते रहे किंतु इस दिशा में कोई तैयारी दिखाई नहीं देने से असंतोष बढ़ रहा है। हसीना की गैर मौजूदगी में यदि चुनाव हुए भी तो सत्ता किसके हाथ जाएगी ये कहना कठिन है। हसीना  के शासनकाल में जेल में रहीं पूर्व प्रधानमंत्री बेगम खालिदा जिया की पार्टी बीएनपी भले ही मुख्य दावेदार हो किंतु छात्र नेताओं की उम्मीदें भी आसमान छू रही हैं। ऐसे में बांग्लादेश आंतरिक अशांति में फंसा रहेगा। एक आशंका ये भी है कि मौके का लाभ उठाकर फौजी जनरल सत्ता हथिया लें जैसा शेख मुजीब की हत्या के बाद हुआ था। खालिदा के पति जनरल जिया उर रहमान भी राष्ट्रपति रहे। कुल मिलाकर बांग्लादेश एक बार फिर आंतरिक तौर पर अस्थिरता और अशांति से गुजर रहा है। मो. युनुस चूंकि अमेरिका द्वारा लादे गए हैं इसलिए उनकी जनता पर पकड़ नहीं है। और वामपंथी होने से उन्हें चीन की मिजाजपुर्सी भी करनी पड़ रही है। हसीना को नहीं लौटाने के निर्णय पर भारत यदि अडिग रहा तब दोनों देशों के बीच तनाव और बढ़ सकता है। ये देखते हुए भारत को बेहद सावधानी से कदम उठाना चाहिए क्योंकि बांग्लादेश को हमारे पड़ोस में बैठे शत्रु देशों का समर्थन है। हाल ही में पाकिस्तान के अनेक आतंकी सरगना भी  भारत विरोधी गतिविधियों की तैयारी करने बांग्लादेश गए थे। आने वाले दिन बांग्लादेश के लिए उथलपुथल भरे होंगे। पड़ोसी के यहाँ लगी आग से हमारा घर न झुलसे इसकी सावधानी भारत को रखनी होगी। 


- रवीन्द्र वाजपेयी


Monday, 17 November 2025

बिहार में लगे झटके के बाद : इंडिया गठबंधन बिखरने के कगार पर

बिहार चुनाव के बाद इंडिया गठबंधन के भविष्य पर  सवाल उठने लगे हैं। 2026 में प. बंगाल, असम, तमिलनाडु , केरल तथा पुडुचेरी के विधानसभा चुनाव होने वाले हैं। प. बंगाल में ममता बैनर्जी ने एकला चलो की नीति के कारण ही तृणमूल कांग्रेस नामक अलग पार्टी बनाई और चार दशकों से चले आ रहे वामपंथी राज को उखाड़ फेंका। नरेंद्र मोदी के केंद्रीय सत्ता में आने के बाद जब भाजपा ने वहाँ पाँव जमाना शुरू किया तब ममता विपक्षी गठबंधन की पेशकश करते हुए शरद पवार आदि से मिलीं भी। लेकिन बात इसलिए नहीं बनी क्योंकि उन्हें राहुल गाँधी से परहेज था। पिछले विधानसभा चुनाव में कांग्रेस और वामपंथी एकजुट होकर उनके विरुद्ध लड़े किंतु उन्हें एक सीट तक नहीं मिली । बाद में इंडिया गठबंधन बनने पर ममता उसमें शामिल तो हो गईं परंतु  कांग्रेस और वाम दलों को लोकसभा की एक भी सीट देने से मना कर दिया। बीते सप्ताह  बिहार में कांग्रेस और वाम दलों की जो दुर्गति हुई उसे देखते हुए कहा जा सकता है कि विधानसभा चुनाव में ममता उनको एक सीट भी नहीं देंगी । असम में जरूर कांग्रेस ही भाजपा के मुकाबले में है लेकिन ममता की पार्टी वहाँ भी अकेले लड़कर विपक्षी एकता में सेंध लगाने से बाज नहीं आयेगी। अगला राज्य है तमिलनाडु जहाँ इंडिया गठबंधन कायम है क्योंकि सत्तारूढ़ द्रमुक द्वारा कांग्रेस सहित वामदलों को भी सीटें दी जाती हैं किंतु राष्ट्रीय दल होने के बाद भी कांग्रेस  बराबरी का हिस्सा मांगने की स्थिति में नहीं है जैसा बिहार में भाजपा ने जदयू से हासिल किया और  ऐसा ही पुडुचेरी में भी है। लेकिन केरल में इंडिया गठबंधन पूरी तरह से छिन्न - भिन्न है जहाँ मुख्य मुकाबला वाम मोर्चा और कांग्रेस की अगुआई वाले गठबंधन के बीच होना है। अर्थात बिहार, प. बंगाल और तमिलनाडु में साथ - साथ लड़ने वाले वाम दल और कांग्रेस केरल में एक दूसरे के विरुद्ध खड़े होंगे जबकि दोनों ही इंडिया गठबंधन के घटक हैं । वाम दलों को नाराजगी है कि 2019 में  राहुल गाँधी केरल की वायनाड सीट से लड़ने आ गए।  वे अमेठी से भी लड़े किंतु हारने के बाद वायनाड का प्रतिनिधित्व करते रहे। 2024 में उन्होंने दोबारा  वायनाड से नामांकन भरा तब वामदलों ने माँग की कि वे उत्तर भारत की किसी सीट से लड़ें  किंतु राहुल नहीं माने तब सीपीआई नेता डी. राजा की पत्नी को वाम दलों ने वहाँ से खड़ा किया। श्री गाँधी ने उ.प्र की रायबरेली सीट से भी नामांकन भरा और दोनों  जीतने के बाद वायनाड छोड़ दी। वामदलों को लगा कि अब कांग्रेस वह सीट छोड़ देगी लेकिन उसने  राहुल की बहिन प्रियंका वाड्रा को उतारकर इंडिया गठबंधन की एकता को धता बता दिया।  इसके बाद  वाम सरकार और कांग्रेस के बीच टकराहट और बढ़ गई।  पिछली बार  वाम मोर्चे ने लगातार दूसरी बार सत्ता पर कब्जा किया था। कांग्रेस को उम्मीद है आगामी चुनाव में वहाँ सत्ता बदल सकती है इसलिए वह उत्साहित है। लेकिन वाम मोर्चा भी केरल पर कब्जा  बनाये रखना चाहेगा क्योंकि प. बंगाल और त्रिपुरा के दुर्ग ढह जाने के बाद यही उसका एकमात्र ठिकाना है। ऐसे में इंडिया गठबंधन की एकता को केरल में जबरदस्त धक्का पहुंचेगा । अन्य राज्यों से भी अच्छी खबरें नहीं आ आ रहीं। बिहार के नतीजों के बाद राजद में भी चर्चा है कि अकेले लड़े होते तब शायद इतनी बुरी गति न होती। 2027 में  उ.प्र में भी विधानसभा चुनाव होने वाले हैं। लोकसभा चुनाव में अच्छे प्रदर्शन के बाद अखिलेश यादव चाहते थे कि इंडिया गठबंधन में उन्हें महत्व मिले किंतु राहुल के रवैये से सपा और कांग्रेस के बीच दूरी बढ़ती गई। विशेष रूप से जब कुछ उपचुनावों में सीटों के बंटवारे से क्षुब्ध कांग्रेस ने चुनाव लड़ने से मना कर दिया जिसके कारण भाजपा ने जोरदार वापसी की। महाराष्ट्र में भी इंडिया गठबंधन में दरार के संकेत हैं। शरद पवार विधानसभा चुनाव में मिली करारी हार के बाद शांत बैठे हैं। सुना है उनके और भाजपा के बीच खिचड़ी पक रही है। उधर उद्धव ठाकरे भी राहुल गाँधी से छिड़कने लगे हैं। मुंबई महानगर पालिका के चुनाव में कांग्रेस और उद्धव अलग - अलग लड़ने वाले हैं। उनकी और राज ठाकरे की संयुक्त  रैली के बाद इंडिया गठबंधन का भविष्य अधर में है। आम आदमी पार्टी पहले ही कन्नी काट चुकी है। लगता है लोकसभा चुनाव के पहले फूला इंडिया गठबंधन रूपी गुब्बारा फूटने को आ गया है। उसकी पिछली बैठक कब हुई थी ये भी किसी को याद नहीं है। जम्मू कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला भी अलग रास्ते पर हैं। दरअसल लोकसभा चुनाव के बाद हरियाणा, महाराष्ट्र, दिल्ली और बिहार विधानसभा चुनाव में एनडीए की शानदार  जीत के बाद राहुल गाँधी की क्षमता पर घटक दलों का भरोसा खत्म सा है। कांग्रेस के भीतर भी असंतोष बढ़ रहा है जो कभी भी सतह पर आ सकता है। प्रधानमंत्री द्वारा कांग्रेस में एक और विभाजन की संभावना जताये जाने के बाद से राजनीतिक हल्कों  में भी उत्सुकता है। ऐसे में आने वाले कुछ दिन भारी उथल - पुथल के होंगे। बड़ी बात नहीं संसद का शीतकालीन सत्र शुरू होने के पहले ही कांग्रेस में ही कोई हाइड्रोजन बम फोड़ दे। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Saturday, 15 November 2025

कांग्रेस के साथ ही तेजस्वी को भी ले डूबे राहुल

बिहार विधानसभा  चुनावों के नतीजों से पूरा देश चौंक गया। हालाँकि महागठबंधन की जीत के लिए खुलकर मैदान में उतरे तमाम वामपंथी पत्रकार भी अंतिम चरण आते तक ये कहने लगे थे कि नीतीश कुमार के 20 वर्ष  सत्ता में रहने के बाद न तो सत्ता विरोधी लहर है और न ही मुख्यमंत्री के प्रति नाराजगी या ऊब । उन्होंने ये भी स्वीकारा कि महिलाओं में नीतीश और नरेंद्र मोदी की योजनाओं का जबरदस्त प्रभाव है। एनडीए के सुव्यवस्थित  प्रचार अभियान , घटक दलों में बेहतर तालमेल और जातीय समीकरणों को साधने की सटीक रणनीति से  वे  प्रभावित थे। महागठबंधन के प्रति झुकाव रखने वाले विश्लेषक भी टीवी चर्चाओं में चुनाव आयोग पर छींटाकशी करने के बावजूद मान बैठे कि वोट चोरी   कोई मुद्दा नहीं बन सका। राहुल गाँधी का वोट अधिकार यात्रा के बाद  विदेश चले जाना भी महागठबंधन  समर्थक पत्रकारों को रास नहीं आया। उन्होंने निःसंकोच कहा  कि श्री गाँधी  बुनियादी मुद्दों को छोड़ यहाँ - वहाँ की जो बातें कहते रहे उनकी वजह से महागठबंधन के प्रति आकर्षण पैदा नहीं हो सका। दूसरी ओर एनडीए भले ही नीतीश कुमार को सामने रखकर लड़ा किंतु उसकी पूरी कमान  भाजपा के पास थी जिसने अपनी संगठन शक्ति का उपयोग करते हुए बिहार की जमीनी सच्चाई को समझकर व्यूह रचना की जिसका परिणाम एनडीए की ऐतिहासिक विजय के रूप में सामने आया जिसका अंदाज  चुनाव विश्लेषक और सर्वेक्षण  एजेंसियां तक नहीं लगा सकीं। औरों को तो छोड़ भी दें लेकिन  धूमकेतु की तरह उभरी जनसुराज पार्टी के संस्थापक प्रशांत किशोर तक हवा का रुख भांपने में विफल रहे जबकि 2015 में प्रचंड  मोदी लहर के बावजूद  नीतीश कुमार को सत्ता में लाने में उनकी रणनीति कारगर साबित हुई थी।  ये सब देखते हुए कांग्रेस को चाहिए वह पराजय के सही कारणों को समझकर प्रतिक्रिया दे किंतु राहुल से लेकर निचले स्तर तक के प्रवक्ता और पार्टी का सोशल मीडिया चलाने वाले जिस तरह की सतही टिप्पणियां कर रहे हैं उनसे लगता है कांग्रेस ने गलतियों से सबक लेने के बजाय उन्हें दोहराते रहने की कसम खा रखी है। श्री गाँधी ने अपनी कमजोरियों को स्वीकार करने के बजाय चुनाव आयोग की वजह से जीत पाने में कठिनाई का बहाना बनाकर अपना बचाव किया जबकि इस शर्मनाक पराजय के लिए वे सबसे ज्यादा जिम्मेदार हैं। उन्होंने  सही समय पर निर्णय नहीं होने दिये वहीं तेजस्वी पर अनावश्यक दबाव बनाकर सीटें तो ज्यादा झटक लीं परंतु जीतने के लिए आवश्यक प्रयास करने के बजाय चुनाव को बेहद हल्के में लिया। तेजस्वी को मुख्यमंत्री का चेहरा घोषित करने में की गई देरी के बाद उनके साथ श्री गाँधी का तालमेल नहीं बन सका। हालाँकि नीतीश को लेकर ये गलती भाजपा ने भी की किंतु एक बार घोषणा होने के बाद प्रधानमंत्री के अलावा अमित शाह, राजनाथ सिंह , जगत प्रकाश नड्डा सहित केंद्रीय मंत्री, भाजपा शासित राज्यों के मुख्यमंत्री, दर्जनों सांसद और सहयोगी  संगठन न केवल भाजपा के अपितु एनडीए के अन्य घटकों की जीत के लिए भी जुट गए। दरअसल  लोकसभा चुनाव में लगे झटके के बाद भाजपा ने विभिन्न राज्यों के विधानसभा चुनाव को गंभीरता से लड़ा जिसके कारण उसे सफलता मिली। इसके विपरीत राहुल गाँधी 99 सीटें जीतने के बाद खुशफहमी में डूब गए। उन्हें ये लगा कि वे प्रधानमंत्री के विरुद्ध तीखी शब्दावली का उपयोग कर जनता के मन में अपनी छवि बना लेंगे किंतु लोकसभा चुनाव के बाद हुए विधानसभा चुनावों में जहाँ भाजपा ने शानदार सफलताएं अर्जित कीं वहीं कांग्रेस के हाथ खाली रहे। सच्चाई यही है कि बिहार में कांग्रेस के दयनीय प्रदर्शन के लिए सीधे श्री गाँधी ही जिम्मेदार हैं। यदि वे तेजस्वी को खुला हाथ देते तो हो सकता है महागठबंधन की इतनी दुर्गति न होती। प्रधानमंत्री ने कल शाम कांग्रेस के एक और विभाजन की जो भविष्यवाणी की वह सही हो जाए तो आश्चर्य नहीं होगा। वैसे भी जिस राहुल ब्रिगेड के बारे में कहा जाता था कि वह कांग्रेस के सुनहरे दिन वापस लायेगी उसके अनेक  सदस्य श्री गाँधी से नाराज होकर  पार्टी छोड़ चुके हैं। आज कांग्रेस में दूसरी पंक्ति का नेतृत्व नजर नहीं आता। संगठन इसीलिए कमजोर है। सोनिया गाँधी के निष्क्रिय होने के बाद ले - देकर राहुल और प्रियंका ही  हैं किंतु दोनों राजनीति को मनोरंजन का साधन मानकर चलते हैं। बिहार की दुर्दशा के बाद भी यदि श्री गाँधी  अपना रवैया नहीं बदलते तब इंडिया गठबंधन के घटक दल भी उन्हें बोझ समझने लगेंगे। प.बंगाल में  ममता बैनर्जी और केरल में वामपंथी तो पहले से ही उनको महत्व नहीं देते। बिहार में राजद के अलावा वीआईपी और वाम दलों की भी जो लुटिया डूबी उसके बाद बाकी दल भी कांग्रेस से दूरी बनाने लगें तो आश्चर्य नहीं होगा। 


- रवीन्द्र वाजपेयी


Friday, 14 November 2025

जाति और परिवारवाद की लालटेन बुझी और विकास का कमल खिला


हालांकि अंतिम क्षणों में उलटफेर होते हैं किंतु दोपहर 2 बजे तक के  रुझानों को  देखते हुए तमाम चुनाव पूर्व सर्वे और यू ट्यूब पर  इकतरफा मोदी विरोधी विश्लेषण धरे रह गए। प्रतिष्ठित एजेंसियों ने भी एग्जिट पोल के निष्कर्षों को डरते - डरते पेश किया। दावा होता रहा  कि तेजस्वी यादव लोकप्रियता  में नीतीश कुमार से बहुत आगे हैं।  नीतीश को बीमार और थका हुआ प्रचारित किया गया। वहीं तेजस्वी की छवि युवा हृदय सम्राट जैसी बनाने का अभियान चला। हर घर में एक सरकारी नौकरी जैसे  वायदे को तुरुप का पत्ता बताने की होड़ भी मची। भाजपा द्वारा नीतीश को मुख्यमंत्री उम्मीदवार घोषित करने में देर लगाए जाने को आत्मघाती निर्णय बताकर एनडीए की हार की भविष्यवाणी की जाने लगी। नीतीश सरकार द्वारा  महिलाओं के खाते में 10 हजार जमा करवाने के फैसले की काट के तौर पर बेरोजगार युवा मतदाताओं का महागठबंधन के पक्ष में गोलबंद होने का शिगूफा छोड़ा गया।  एम- वाय नामक मुस्लिम - यादव समीकरण को तेजस्वी की ताजपोशी की गारंटी बताकर नीतीश सरकार की विदाई तय मानी जाने लगी। एनडीए द्वारा लालू, प्रसाद यादव के शासन को जंगलराज बताकर उसकी वापसी की जो आशंका व्यक्त की गई उससे डरकर महागठबंधन ने लालू को मैदान में उतारना तो दूर प्रचार सामग्री में उनका चित्र प्रसारित करने तक से परहेज किया । जातीय समीकरण साधने के लिए मुकेश सहनी को उप मुख्यमंत्री बनाने की घोषणा भी हुई। लेकिन चुनाव परिणाम ने बिहार की राजनीति में एक नये चारित्रिक बदलाव का संकेत पूरे देश को दे दिया जिसमें विकास, सुशासन और राष्ट्रवाद के प्रति खुले समर्थन का ऐलान है।  महागठबंधन के सारे छत्रप धराशायी होते दिख रहे हैं।  तेजस्वी के भी आगे - पीछे होने से ये अंदाज लगाया जा सकता है कि बाकी सबका क्या होगा? मुस्लिम - यादव गठजोड़ के दम पर बिहार को  खानदानी जागीर समझने की मानसिकता को मतदाताओं ने बुरी तरह कुचल दिया। यादव बहुल अनेक सीटों में राजद का पिछड़ना इसका प्रमाण है ।  वहीं सीमांचल की मुस्लिम बाहुल्य सीटों पर भी एनडीए का शानदार प्रदर्शन राष्ट्रवादी राजनीति के बढ़ते प्रभाव को प्रतिबिंबित कर रहा है। चुनाव के आखिरी दौर में अपनी खस्ता हालत देख लालू एंड कंपनी ने ये प्रचार भी शुरू कर दिया कि 2020 के चुनाव में भाजपा द्वारा चिराग पासवान को एनडीए से  बाहर रखकर जदयू को जो नुकसान पहुंचाया था उसे नीतीश भूले नहीं हैं और इसलिए इस बार वे चिराग की लोजपा को हरवाकर बदला लेंगे। दूसरा शिगूफा ये भी छोड़ा गया कि नीतीश चुनाव बाद एक बार फिर तेजस्वी से हाथ मिलाकर भाजपा को झटका देंगे। कुछ वामपंथी पत्रकार तो नीतीश और चंद्रबाबू नायडू द्वारा मोदी सरकार को गिराए जाने की योजना  का भी ढोल पीटने लगे। जनसुराज के प्रशांत किशोर की ताकत को बढ़ा - चढ़ाकर पेश करने की चाल चली गई जिससे वे भाजपा समर्थक सवर्ण और युवाओं में सेंध लगा सकें। सबसे बड़ा अभियान चलाया कांग्रेस नेता राहुल गाँधी ने जिन्होंने वोट चोरी का हल्ला मचाकर पूरे बिहार में वोट अधिकार यात्रा भी निकाली। प्रशांत किशोर को भी ये गुमान हो चला था कि जब वे नरेंद्र मोदी, नीतीश कुमार, ममता बैनर्जी, जगन मोहन रेड्डी आदि को चुनाव जितवा सकते हैं तब अपनी पार्टी को क्यों नहीं किंतु वे भूल गए कि अच्छा प्रशिक्षक अच्छा खिलाड़ी हो ये जरूरी नहीं। और इसीलिए किंग मेकर बनने की उनकी उम्मीद शून्य पर अटक गई और जिस जदयू को वे 25 से ज्यादा सीटें मिलने पर राजनीति छोड़ने की डींग हाँक रहे थे वह 80 के करीब है। ये भी कहा जा रहा था कि बिहार में केवल जाति चलती है और  लोग वोट और बेटी जाति में ही देते हैं किंतु नतीजों ने इस मिथक को भी ध्वस्त कर दिया। मुस्लिम - यादव समीकरण के पास 31 प्रतिशत मतों की जिस ताकत को महागठबंधन अपनी जीत का आधार मान बैठा था वह भी छिन्न - भिन्न होता दिख रहा है। सभी जातियों और वर्गों को जोड़कर विकास और सुशासन के जरिये बिहार को प्रगति पथ पर ले जाने वाले नेता के तौर पर नीतीश  ने इतिहास रच डाला वहीं नरेंद्र मोदी की वैश्विक प्रतिष्ठा और अमित शाह की कुशल रणनीति ने महागठबंधन को जमीन दिखा दी। तेजस्वी को तो खैर उनके पिता लालू प्रसाद यादव की काली करतूतें खा गईं जो  नेता प्रतिपक्ष बनने लायक भी नहीं रहे। ऐसा ही हुआ राहुल गाँधी के साथ जिन्होंने  दबाव बनाकर 60 से ज्यादा सीटें तो ले लीं किंतु आधा दर्जन पर भी कांग्रेस का जीतना मुश्किल लग रहा है। लोकसभा चुनाव में 99 सीटें जीतकर खुद को नरेंद्र मोदी के बराबर समझने वाले श्री गाँधी अभी तक जमीनी हकीकत समझ नहीं सके। संविधान, जाति  जनगणना, अंबानी - अडानी जैसे मुद्दों पर अटके रहकर वे अपनी और कांग्रेस दोनों की फजीहत करवाने पर आमादा हैं। बिहार में भाजपा 90 सीटों की बढ़त के साथ महाराष्ट्र जैसी स्थिति में आ गई है। जदयू ने भी 80 सीटों पर पकड़ बना रखी है। चिराग का प्रदर्शन उनके उज्ज्वल भविष्य का संकेत है। राष्ट्रीय राजनीति पर इस चुनाव का गहरा असर होगा क्योंकि कांग्रेस और वाम दलों को बिहार ने जिस तरह नकारा उसके बाद इंडिया गठबंधन या तो टूटेगा या  कांग्रेस के चंगुल से निकल आयेगा। राहुल के लिए भी ये बड़ा झटका है क्योंकि कांग्रेस में ही उनके प्रभुत्व को चुनौती मिलना तय है। 2 बजे तक एनडीए 199 के आंकड़े पर है जो बड़ी उपलब्धि है। 25 साल बाद भी नीतीश की साख कायम रहने के पीछे मोदी की धाक का बड़ा योगदान है। यह एक सकारात्मक जनादेश है । चुनाव आयोग पर लगाए गये आरोपों को जनता ने रद्दी की टोकरी में डाल दिया। इतना व्यवस्थित चुनाव इस राज्य में पहले कभी नहीं हुआ। लालू ब्रांड घटिया राजनीति के साथ ही परिवारवाद पर भी इस परिणाम ने  जबरदस्त प्रहार किया है जिसके प्रतीक राहुल और तेजस्वी दोनों हैं। बिहार में लालू की लालटेन का बुझना अत्यंत शुभ संकेत है जिसका असर प.  बंगाल के आगामी चुनाव पर पड़े बिना नहीं रहेगा।


- रवीन्द्र वाजपेयी

Wednesday, 12 November 2025

बिहार के नतीजों का दूरगामी असर होगा : सर्वे एजेंसियों की साख भी दाँव पर


बिहार में दूसरे चरण का मतदान समाप्त होते ही एग्जिट पोल की दूकानें सज गईं। हालाँकि इनकी विश्वसनीयता पहले जैसी नहीं रही। इसका कारण नौसिखियों का इस क्षेत्र में कूदना ही है। हालांकि चुनाव पूर्व सर्वे और एग्जिट पोल जिस सैंपलिंग विधि पर आधारित हैं उसको  इस आधार पर नकारा नहीं जा सकता कि वे गलत भी निकले क्योंकि अनेक सर्वे और एग्जिट पोल सत्य या उसके बेहद करीब भी रहे। शुरुआत में कुछ पेशेवर एजेंसियां ही इस कार्य से जुड़ी हुईं थीं किंतु जबसे राजनीतिक दल और कुछ प्रत्याशी भी चुनाव सर्वेक्षण का सहारा लेने लगे तबसे ये एक संगठित व्यवसाय बन गया। आजकल राजनीतिक दल प्रत्याशी चयन करने के लिए भी सर्वे एजेंसियों की सेवाएं लेते हैं जिनको इस काम के लिए अच्छे पैसे मिलते हैं। चुनाव बाद होने वाले एग्जिट पोल को टीवी समाचार चैनलों द्वारा भी प्रायोजित किया जाने लगा। ज्यों - ज्यों  चैनलों की संख्या बढ़ती गई एग्जिट पोल  का भी फैलाव होने लगा। इसीलिए 11 तारीख की शाम  से तमाम टीवी चैनल एग्जिट पोल दिखाने लगे। साथ ही विभिन्न दलों के प्रवक्ताओं, राजनीतिक विश्लेषकों और वरिष्ट पत्रकारों को बिठाकर उन पर बहस आयोजित की गई। जाहिर है इसका उद्देश्य  दर्शक संख्या बढ़ाकर विज्ञापन बटोरना होता है जो कि व्यवसायिक रणनीति  है। पिछले लोकसभा चुनाव में एक सुप्रसिद्ध सर्वे एजेंसी का एग्जिट पोल गलत निकलने पर उसके मुखिया को विपक्षी दलों ने टीवी चैनलों पर इतना जलील किया कि वे रोने लगे। हालाँकि उसके बाद हुए विधानसभा चुनावों में उन्होंने अपनी विश्वसनीयता बनाये रखी। और मतदान खत्म होते ही एग्जिट पोल जारी करने की बजाय एक दिन बाद अपने निष्कर्ष प्रसारित करने लगे ।  वैसे लगभग डेढ़  दर्जन एग्जिट पोल में एकाध अपवाद छोड़  सभी नीतीश कुमार की वापसी का संकेत दे रहे हैं। कुछ का कहना है कि कड़े मुकाबले के बाद भी एनडीए सत्ता में लौटेगा वहीं कुछ ने उसकी छप्परफ़ाड़ जीत का अनुमान लगाया है। लेकिन गत रात्रि जो एग्जिट पोल जारी  हुआ उसमें विभिन्न  जातियों , आयु वर्ग  और महिला - पुरुष के रुझान के आधार पर एनडीए की मामूली बढ़त का संकेत तो है किंतु  कुछ सर्वे महागठबंधन की विजय की भविष्यवाणी करने में भी जुटे हैं। इनके अतिरिक्त सट्टा बाजार भी चुनाव परिणामों के बारे में अपने अनुमान लगाता है। सट्टा बाजार में सबसे अग्रणी राजस्थान के फलोदी ने एनडीए की 150 से अधिक सीटें मिलने की भविष्यवाणी कर सबको चौंका दिया। हालांकि सट्टा गैर कानूनी है किंतु चुनावों के दौरान सभी की नजर उसके अनुमानों पर रहती है जो कि ज्यादातर सही निकलते रहे हैं।  कुल मिलाकर यदि सभी एग्जिट पोल का औसत निकालें तो 14 नवंबर को बिहार की सत्ता फिर नीतीश कुमार के हाथ आ  जाएगी। हालांकि लोकसभा चुनाव में हुए उलटफेर को लोग भूले नहीं हैं। इसीलिए महागठबंधन की संभावनाओं को पूरी तरह खारिज करने के प्रति भी हिचकिचाहट है। अनिश्चितता की एक वजह प्रशांत किशोर की जनसुराज पार्टी भी है जिसके प्रदर्शन को यद्यपि अधिकतर एग्जिट पोल में निराशाजनक बताया गया है किंतु  एनडीटीवी के पूर्व मालिक प्रणय रॉय के मुताबिक बिहार में एनडीए आगे रहकर भी बहुमत से पीछे रहेगा और  जनसुराज को मिलने वाली 24 सीटें संतुलन बनाने - बिगाड़ने का काम करेंगी। हालांकि ऐसा कहने वाले वे अकेले व्यक्ति हैं । बिहार के चुनावी नतीजे केवल इस राज्य ही नहीं अपितु राष्ट्रीय  राजनीति पर भी दूरगामी प्रभाव डालेंगे। साधारण तौर से देखें तो लालू प्रसाद यादव का युग समाप्ति की ओर है। वहीं इसका असर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार पर भी पड़ सकता है जो नीतीश कुमार की पार्टी जदयू के समर्थन से कायम है। कांग्रेस नेता राहुल गाँधी की चुनाव जिताऊ क्षमता भी बिहार में दाँव पर है। महागठबंधन की हार से उनकी साख और गिरने के अलावा पार्टी भी भविष्य में कमजोर होगी । बड़ी बात नहीं कर्नाटक की सरकार उसके हाथ से निकल जाए। वहीं इंडिया गठबंधन की एकजुटता भी  खतरे में पड़ सकती है । जबकि एनडीए के जीतने पर प. बंगाल के चुनाव में भाजपा दोगुने उत्साह से उतरेगी। राजनीतिक दलों के अलावा चुनाव पूर्व सर्वे और एग्जिट पोल करने वाली एजेंसियों की विश्वसनीयता का फैसला भी कल दोपहर तक हो जाएगा। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

उच्च शिक्षित मुस्लिमों का आतंकवाद से जुड़ाव नए खतरे का संकेत


दिल्ली में परसों हुए विस्फोट के बाद जो जानकारियां आ रही हैं उनके मुताबिक जितने भी लोग पकड़े गए उनका संबंध एक तो कश्मीर घाटी से है दूसरे वे हमेशा की तरह मुस्लिम समुदाय के हैं। लेकिन चौंकाने वाली बात ये है कि अब तक जो भी लोग पकड़े गए हैं उनमें से अधिकांश डॉक्टर हैं। फरीदाबाद में जिस डॉक्टर के यहाँ विस्फोटकों का जखीरा पकड़ा गया वह जिस शिक्षण संस्थान से जुड़ा था उसकी आड़ में आतंकवादी गतिविधियों की रूपरेखा बनाई जा रही थी। वह तो गनीमत रही कि खुफिया एजेंसियों ने समय रहते पर्दाफ़ाश कर दिया वरना न सिर्फ दिल्ली बल्कि देश के अन्य हिस्सों में भी बड़े पैमाने पर धमाके होते। जांच एजेंसियों से मिले संकेतों के अनुसार लखनऊ स्थित रा.स्व.संघ के कार्यालय को उड़ाने की योजना भी थी। लखनऊ में भी एक महिला मुस्लिम चिकित्सक को भी पकड़ा गया है। जिस प्रकार की पर्तें खुल रही हैं उससे स्पष्ट हो रहा है कि जितने भी मुस्लिम चिकित्सक पकड़े गए उनका संबंध पाकिस्तान के आतँकवादी संगठनों से है। ये बात भी विचारणीय है कि कश्मीर घाटी से निकले तमाम डाॅक्टर इस षडयंत्र में शामिल निकले। और यही सबसे चिंताजनक बात है कि इस्लाम के नाम पर आतंक का कारोबार अब बेरोजगार नौजवानों से आगे निकलकर सुशिक्षित वर्ग में भी फैल गया है। जिस स्तर के चिकित्सक इस कांड से जुड़े पाए गए उनके आतंकवाद में इतनी गहराई तक लिप्त होने से  मुस्लिम समुदाय की छवि पर नया संकट उत्पन्न हो गया है। अभी तक आम अवधारणा थी कि अशिक्षा के कारण जो धर्मांधता मुस्लिम समुदाय में है उसका लाभ उठाकर आतंकवादी संगठन अपना उद्देश्य पूरा करने में सफल होते रहे हैं। कश्मीर घाटी में पत्थरबाजी की जो घटनाएं होती थीं उनमें भी बेरोजगार नौजवान ही आगे - आगे दिखाई देते थे। समरणीय है  हुर्रियत काँफ्रेंस के नेता सैयद अली शाह जिलानी ने मुस्लिम समुदाय को पत्थरबाजी रूपी हथियार थमाया था। उसकी देखासीखी पूरे देश में इस समुदाय की छवि पत्थरबाज की बन गई। ये बात आम हो गई है कि जब भी कहीं सांप्रदायिक तनाव होता है तब मस्जिदों से पत्थर फेंकने के दृश्य दिखाई देते हैं। दिल्ली दंगों के दौरान भी मुस्लिम समाज के अनेक लोगों के घरों की छतों से पत्थर और ईंटों के अलावा अन्य घातक सामग्री जप्त हुई। जम्मू कश्मीर से धारा 370 हटाये जाने के बाद से घाटी के भीतर आतंकवादी गतिविधियों में कमी आने से पाकिस्तान भी परेशान हो उठा है। पहलगाम में हुए आतंकी हमले के बाद भारत द्वारा ऑपरेशन सिंदूर के माध्यम से जब आतंकवादियों के अड्डों को नष्ट करने की कारवाई की गई उसके बाद से ही वे भारत के विरुद्ध नए सिरे से व्यूह रचना बना रहे थे। लेकिन जिस तरह से मुस्लिम डाक्टरों का समूह आतंकवाद से जुड़ा मिला उससे लगता है कि इन लोगों का संबंध अरब देशों में सक्रिय इस्लामिक उग्रवादी संगठनों से भी हो सकता है। इस बारे में विचारणीय  ये है कि पश्चिम एशिया से भागकर मुस्लिम  शरणार्थी जबसे यूरोपीय देशों सहित अमेरिका और कैनेडा आदि में बसे तभी से वहाँ इस्लामिक उग्रवाद ने सिर उठा लिया। हाल ही में न्यूयॉर्क में हुए महापौर के चुनाव में ममदानी नामक मुस्लिम के जीतने के बाद अमेरिका में जिस तरह मुस्लिम उग्रवाद  सिर उठा रहा है उससे प्रोत्साहित होकर  अन्य  यूरोपीय देशों में भी मुस्लिम समुदाय बेहद आक्रामक हो उठा है। भारत में भी एक तबका है जो ममदानी  की जीत पर महज इसलिए जश्न मना रहा था क्योंकि वह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और इसराइल के प्रधानमंत्री नेतन्याहू का घोर विरोधी है। बड़ी बात नहीं ये तबका दिल्ली विस्फोट के सिलसिले में गिरफ्तार किये गए डॉक्टरों के बचाव में आगे आ जाए और देश के नामी वकील उनका बचाव करने सर्वोच्च न्यायालय में खड़े नजर आयें। इस कांड से एक बात साफ हो गई  कि इस्लामिक उग्रवाद में मुस्लिम समाज का वह वर्ग भी लिप्त हो चला है जिसे सुशिक्षित होने से समझदार और जिम्मेदार नागरिक माना जाता रहा है।  लालकिले के निकट हुए विस्फोट और थोक के भाव आतंकवादियों से जुड़े मुस्लिम डॉक्टरों के गिरफ्तार होने के बाद मुस्लिम धर्मगुरुओं और उनके संगठनों का शांत रहना भी सवाल खड़े करता है। केंद्र सरकार को चाहिए वह इस मामले की गहराई में जाकर देश को गृहयुद्ध में धकेलने के इस्लामिक षडयंत्र का पर्दाफ़ाश करे जिससे आंतरिक सुरक्षा के लिए खतरा उत्पन्न करने वालों के मंसूबे पूरे न हो सकें।


- रवीन्द्र वाजपेयी

Tuesday, 11 November 2025

दिल्ली में हुआ विस्फोट किसी बड़ी साजिश का हिस्सा


फरीदाबाद के एक डॉक्टर के यहाँ बड़ी मात्रा में विस्फोटक चीजों के अलावा घातक अस्त्र -शस्त्र बरामद होने के बाद से ही किसी बड़ी आतंकी वारदात की आशंका बढ़ गई थी जो कल शाम दिल्ली के लालकिले इलाके में एक वाहन में हुए विस्फोट से सही साबित हो गई।  जिस वाहन में विस्फोट हुआ उसमें बैठे शख्स के अलावा 9 लोगों की मौत और 20 के घायल होने की जानकारी मिली है। अभी उक्त विस्फोट के कारण और पृष्ठभूमि के बारे में स्पष्ट रूप से अधिकृत तौर कुछ भी नहीं कहा गया किंतु जिस तरह के तार जुड़ रहे हैं उनसे यह आतंकी हमला ही लगता है । जिस वाहन में विस्फोट हुआ उसमें बैठे उमर नामक व्यक्ति की तलाश की जा रही थी। ये संभावना है कि उसने विस्फोट में खुद को भी खत्म कर लिया। हालांकि इसकी पुष्टि भी जरूरी जाँच पड़ताल के बाद ही संभव है। इस बारे में ये सोचना गलत नहीं है कि फरीदाबाद में पकड़ा गया जखीरा किसी बड़ी घटना को अंजाम देने के लिए जमा हुआ था। उससे जुड़े लोगों का संबंध कश्मीर से निकलने से संदेह और गहरा हो जाता है। आश्चर्य की बात ये है कि इनमें डॉक्टर जैसे पेशेवर लोग भी हैं।  कुछ दिन पहले म.प्र के पूर्व मुख्यमंत्री वरिष्ट कांग्रेस नेता  दिग्विजय सिंह ने दिल्ली दंगों के सिलसिले में  बंद उमर खालिद को इस आधार पर रिहा करने की मांग की थी कि वे डॉक्टरेट कर रहे थे। लेकिन ताजा घटनाओं में डॉक्टरों का जुड़ाव होने के बाद ये कहना पड़ेगा कि किसी भी पेशे से जुड़ा इंसान  आतंकवादियों के साथ मिलकर खूनी खेल रच सकता है। ऐसा लगता है ऑपरेशन सिंदूर में अपने परिवार को गँवा चुका  कुख्यात आतँकवादी हाफिज सईद भारत में दहशत फैलाने के लिए नए सिरे से तैयारी कर रहा है। कल ही ये खबर भी आई थी कि वह बांग्लादेश में अपना अड्डा बनाने जा रहा है जहाँ से  आतंकी हमले संचालित किये जाएंगे। पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आई.एस.आई के प्रमुख ने भी  हाल ही में ढाका की यात्रा की थी। शेख हसीना का तख्ता पलटे जाने के बाद इस देश में भारत विरोधी भावनाओं को अंतरिम सरकार का संरक्षण मिलने से हिंदुओं और उनके धर्मस्थलों पर हमले बढ़े हैं। सरकार के मुखिया बने बैठे मो. युनुस का भारत विरोधी रवैया भी जगजाहिर है।  बीते कुछ महीनों में पाकिस्तान की सरकार ने हाफिज सईद को बड़ी मात्रा में धन देकर उसके संगठन को दोबारा खड़ा करने में सहायता दी। ऐसे में दिल्ली में हुए  विस्फोट में पाकिस्तान की भूमिका से इंकार नहीं किया जा सकता। फरीदाबाद के डॉक्टर के यहाँ पकड़ा गया सामान आतंकवादी गतिविधियों में ही उपयोग होने वाला था इससे कोई इंकार नहीं कर सकेगा। चूंकि इसमें पकड़े जा रहे लोगों की जड़ें कश्मीर घाटी से हैं लिहाजा ये सोचना गलत नहीं होगा कि घाटी से बाहर देश के भीतरी हिस्सों में मुंबई जैसे सीरियल बम धमाके करते हुए आंतरिक आंतरिक सुरक्षा तहस - नहस करने की साजिश रची जा रही है। बीते कुछ दिनों में ही गुजरात और म.प्र सहित अनेक राज्यों में आतंकवादियों की गिरफ्तारी के बाद फरीदाबाद में पकड़ा गया सामान इस बात की पुष्टि करने के लिए काफी है।  हालांकि खुफिया तंत्र ने किसी बड़े हादसे को टालने में तो सफलता हासिल कर ली किंतु इसी बीच लालकिले के पास धमाका हो गया जो उक्त योजना का छोटा हिस्सा कहा जा सकता है। हालांकि उसमें मारे गए लोगों के शव पर वैसे निशान नहींं मिलने की जानकारी आई है जैसे बम विस्फोट में होते हैं किंतु विस्फोट की भयावहता देखते हुए ये संदेह होना स्वाभाविक है कि वह किसी आतंकवादी योजना का ही हिस्सा है। इस बारे में ये बात भी गौरतलब है कि अमेरिका के न्यूयॉर्क शहर के महापौर चुनाव में ममदानी नामक मुस्लिम की जीत के बाद वहाँ अचानक इस्लामिक भावनाओं का ज्वार उठने लगा जिसमें अरबी भाषा बोलने की छूट के अलावा अमेरिका का राष्ट्रध्वज उतार फेंकने जैसी जुर्रत  की जा रही है। और उसकी देखा - सीखी ब्रिटेन और इटली सहित अनेक यूरोपीय देशों में बसे मुस्लिम सड़कों पर सामूहिक नमाज पढ़ने जैसी गतिविधियों से कानून व्यवस्था को ध्वस्त करने पर आमादा हैं। पहलगाम में आतंकी हमले के बाद भारत ने ऑपरेशन सिंदूर के रूप में पाकिस्तान को सबक सिखाया था किंतु अमेरिका ने उसकी पीठ पर हाथ रख दिया जिसके बाद से उसकी शरारतें फिर शुरू होती दिख रही हैं। दिल्ली में हुए विस्फोट की  घटना से एक बात स्पष्ट है कि सीमा पार बैठे दुश्मन के बराबर ही आस्तीन के सांप भी खतरनाक हैं जिनका फन सख्ती से कुचला जाना चाहिए। देश में बैठे घुसपैठियों की पहचान कर उन्हें निकाल बाहर करने की मुहिम को और तेज करना देश हित में जरूरी हो गया है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी


Monday, 10 November 2025

प. बंगाल में एस.आई.आर के डर से मुस्लिम मतदाता घर छोड़ भाग रहे

.आई.आर (मतदाता सूचियों के गहन पुनरीक्षण)  को लेकर कांग्रेस नेता राहुल गाँधी ने अपनी पिछली पत्रकार वार्ता में जो खुलासे किये उन्हें हाइड्रोजन बम   का नाम दिया। हालांकि ये बम फोड़ने में उन्होंने  लंबा समय लगाया जिसके कारण उन पर तंज कसे जाने लगे थे। उनसे बचने के लिए ही वे बिहार में मतदान के पहले चरण के एक दिन पूर्व पत्रकारों से मुखातिब हुए और हरियाणा  विधानसभा चुनाव में मतदाता सूचियों में गड़बड़ी का आरोप लगाया जैसा वे महाराष्ट्र और कर्नाटक के बारे में भी वे कर चुके थे। हालांकि चुनाव आयोग उनके आरोपों को निराधार बता चुका है। हरियाणा के अनेक समाचार माध्यमों ने भी श्री गाँधी के आरोपों की मौके पर जाँच कर स्पष्ट किया कि वे  तथ्यात्मक तौर पर सही नहीं हैं। लेकिन उसी पत्रकार वार्ता में उनका ये कहना चर्चा का विषय बन गया कि  बिहार में भी एस.आई.आर के जरिये वोट चोरी से चुनाव जीतने की कोशिश की जा रही है। जबकि पूरे चुनाव में राज्य से मतदाता सूचियों में गड़बड़ी की शिकायतें न्यूनतम आईं।  बिहार में कल अंतिम चरण का मतदान होने के बाद 14 नवंबर को नतीजे आ जायेंगे। यदि एनडीए जीता तब राहुल और तेजस्वी यादव एस.आई.आर पर ठीकरा फोड़ेंगे किंतु  विजय महागठबंधन के हिस्से आई तब भी क्या विपक्ष मतदाता सूचियों के गहन पुनरीक्षण की प्रक्रिया का विरोध करेगा जो कि पूरे देश में प्रारंभ हो चुकी है। उल्लेखनीय है बिहार विधानसभा चुनाव में श्री गाँधी ने मतदाता सूचियों की जाँच को बड़ा मुद्दा बनाया और तेजस्वी के साथ वोट अधिकार यात्रा भी निकाली। लेकिन सर्वोच्च न्यायालय के दरवाजे खटखटाने के बाद भी उसको रोकने में उन्हें सफलता नहीं मिली। उलटे चुनाव आयोग ने पूरे देश में एस.आई.आर प्रारंभ कर दी। बिहार में लाखों मतदाताओं के नाम कट जाने के बाद प. बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बैनर्जी ने अपने राज्य में मतदाता सूचियों की सघन जाँच का विरोध शुरू कर दिया। चूंकि राज्य के  सरकारी कर्मचारी ही इस काम को करते हैं लिहाजा उसमें रुकावट पैदा करने की कोशिश भी की गई किंतु चुनाव आयोग की सख्ती के  आगे उनकी दाल नहीं गली ।  तब ये शिगूफा छोड़ा जाने लगा कि एस. आई. आर के डर से लोग आत्महत्या कर रहे हैं क्योंकि उनके मन में ये डर समा गया है कि  आवश्यक दस्तावेजों के अभाव में कहीं उनकी नागरिकता संदेह के घेरे में न आ जाए। दरअसल, ममता बैनर्जी द्वारा एस.आई.आर का विरोध करने का मुख्य कारण मतदाता सूचियों से उन बांग्लादेशियों के नाम कटने की आशंका है जो तृणमूल कांग्रेस की मदद से अवैध रूप से मतदाता बन बैठे और चुनाव में उसकी जीत का आधार बनते हैं। राज्य में 30 फीसदी से ज्यादा मुस्लिम मतदाता हैं जिनका 75 प्रतिशत ममता समर्थक है और इसीलिए  वे घुसपैठियों को वापस भेजने का खुलकर विरोध करती हैं। ये बात भी ध्यान देने योग्य है कि बांग्ला देश से सटे सीमावर्ती जिलों में बीते कुछ वर्षों में मतदाताओं की संख्या में अकल्पनीय वृद्धि से वहाँ का जनसंख्या संतुलन पूरी तरह इकतरफा हो चुका है  जिसकी वजह से गैर मुस्लिम उम्मीदवार का जीत पाना असंभव है। हालांकि ऐसी स्थिति बिहार की कुछ सीटों पर भी है किंतु प. बंगाल में ममता बैनर्जी की राजनीतिक जड़ों को मजबूत करने में मुस्लिम मतदाताओं की महत्वपूर्ण  भूमिका है जिनमें बांग्लादेश से आये घुसपैठियों की भी बड़ी संख्या है।एस.आई.आर के कारण इन घुसपैठियों के साथ ही तृणमूल कांग्रेस भी परेशान है क्योंकि आगामी वर्ष गर्मियों में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं। ममता की तमाम कोशिशों के बाद भी मतदाता सूचियों की बारीकी से की जाने वाली जांच चूंकि रुक नहीं पाई इसलिए अवैध रूप से मतदाता बन बैठे घुसपैठियों में घबराहट फैल गई है। बीते कुछ दिनों में सैकड़ों लोग बांग्लादेश भागने की कोशिश में पकड़े जा चुके हैं। समाचार पत्रों से मिल रही जानकारियों के मुताबिक  अनेक शहरी बस्तियों के मुस्लिम रहवासी अचानक गायब हो गए हैं। बीते कुछ सालों में बनी बहुमंजिला इमारतों में रह रहे मुस्लिम परिवारों ने भी अपना आवास छोड़ दिया। इसका कारण एस.आई.आर से बचना है क्योंकि मतदाता सूची में बने रहने के लिए यदि वे आवशयक कागजात नहीं दिखा सके तब उनकी अवैध नागरिकता का खुलासा हो जाएगा। जाहिर है इन कारणों से प. बंगाल की मतदाता सूचियों से भी बिहार की तरह ही लाखों नाम कट जाएंगे जिसका सीधा - सीधा नुकसान तृणमूल कांग्रेस को होने की आशंका से ममता की चिंता बढ़ती जा रही है। देखना ये है कि प. बंगाल में उनके विरुद्ध लड़ने वाली कांग्रेस एस.आई.आर का विरोध करती है या नहीं? याद रहे लोकसभा चुनाव में ममता ने कांग्रेस नेता अधीर रंजन चौधरी को क्रिकेटर युसुफ पठान के हाथों हरवा दिया क्योंकि उस सीट पर मुस्लिम मतदाता पठान के पक्ष में गोलबंद हो गए जबकि अधीर रंजन काफी समय से वहाँ जीतते आ रहे थे। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Sunday, 9 November 2025

पाठकों के भरोसे को बनाये रखना हमारी प्रतिबद्धता



       9 नवम्बर 1989 को मध्यप्रदेश हिन्दी एक्सप्रेस का पहला अंक सम्माननीय पाठकों के हाथ आया था । वह  अभूतपूर्व राजनीतिक गतिविधियों का  दौर था। नये  सियासी समीकरण आकार ले रहे थे । बेमेल गठबंधन और अवसरवाद समूचे राजनीतिक विमर्श पर हावी होने से जनमानस भ्रमित था । स्थापित प्रतिमाएं ध्वस्त हो रही थीं । अविश्वास और अनिश्चितता  के कारण सर्वत्र भ्रम के साथ भय का माहौल बन गया । उस दौर में महाकोशल की  चेतनास्थली  जबलपुर में  नए सांध्य दैनिक के लिए पाँव जमाना आसान नहीं था । लेकिन देखते - देखते मध्यप्रदेश हिन्दी एक्सप्रेस पाठकों की पसंद बन गया । अपनी निर्भीकता और सटीकता के कारण  पाठकों  का पुरजोर  समर्थन मिलने से हमारा उत्साह  बढ़ा। जिससे  हम साहस के साथ अपने कर्तव्य का निर्वहन करने में समर्थ हो सके । तीन दशक से ज्यादा बीत चुके हैं । देश के साथ दुनिया भी पूरी तरह से बदल चुकी  है । राजनीति के अलावा अर्थव्यवस्था , साहित्य, कला और संस्कृति के साथ ही समाचार जगत के स्वरूप में भी आमूल परिवर्तन हुआ है । राजनीति ने अपनी  दिशा पूरी तरह बदल ली  है | 1989 में तेजी से उभरी हिंदुत्व की  लहर राष्ट्रीय मुख्यधारा का रूप ले चुकी है ।  वहीं देश की सबसे पुरानी राजनीतिक पार्टी अपनी प्रतिष्ठा बचाने संघर्षरत है ।  आर्थिक और सामरिक दृष्टि से भारत दुनिया के बड़े देशों के साथ बराबरी करने की स्थिति में है । कोरोना  महामारी का मुकाबला कुशलता के साथ करने के कारण  आम देशवासी  का आत्मविश्वास और मजबूत हुआ है । भारतीय समुदाय पेशेवर दक्षता और पौरुष के बलबूते विश्व भर में सम्मानित  और समृद्ध  हो रहा है ।  36  साल की इस यात्रा में मध्यप्रदेश हिन्दी एक्सप्रेस जागरूकता और जिम्मेदारी का प्रतीक बनकर पाठकों के साथ बना रहा । स्वस्थ पत्रकारिता की प्रतिबद्धता से हम सदैव जुड़े रहे। और इसी वजह से विश्वास के संकट के बाद भी इस  समाचार पत्र ने अपनी साख  बरकरार  रखी । हालांकि इसके लिए  हमें असंख्य कठिनाइयों  , अवरोधों और मुखालफत का सामना करना पड़ा । तेजी से हो रहे तकनीकी उन्नयन के कारण छोटे  और मझोले  समाचार पत्रों के सामने पूंजी का जबरदस्त संकट उत्पन्न होता जा रहा है । डिजिटल माध्यम के उद्भव से समाचार पत्रों के समक्ष एक सबल प्रतिद्वंदी खड़ा हो गया है। लेकिन इस सबसे अविचलित रहते हुए मध्यप्रदेश हिन्दी एक्सप्रेस निरंतर आगे बढ़ता जा रहा है । सम्माननीय पाठकों का  विश्वास ही हमारी ऊर्जा का अक्षत स्रोत है । इसी तरह निःस्वार्थ भाव से सदैव सहयोग देने वाले उदार विज्ञापनदाता हमारा संबल हैं । इसी  कारण पत्रकारिता के आदर्शों के अनुरूप  संघर्षपथ पर निर्बाध चलते रहने के लिए हम कटिबद्ध हैं । प्रारंभ से ही जिसे पढ़े बिना शाम अधूरी है का जो विशेषण हमारे साथ जुड़ा , उसे कायम  रखने हम पूरी ईमानदारी से समर्पित रहेंगे । भविष्य में और भी बड़ी  चुनौतियां आने वाली हैं । राजनीतिक घटनाचक्र भी अपनी गति से घूम रहा है। हर समय चुनावों में उलझे देश में  समाचार माध्यमों के लिए अपनी विश्वसनीयता बनाये रखना कठिन होता जा रहा है। उनकी छवि पर चौतरफा हमले हो रहे हैं। यद्यपि इस स्थिति के लिए वे स्वयं भी कुछ हद तक जिम्मेदार हैं | लेकिन मध्यप्रदेश हिन्दी एक्सप्रेस अपने पाठकों को आश्वस्त करता है कि वह उनके भरोसे को बनाये रखने  प्रतिबद्ध रहेगा। दबावों के सामने झुकने का स्वभाव न होने से ही हम पाठकों का विश्वास अर्जित कर सके। और आने वाले समय में भी उसी अंदाज में ये सफर चलता रहेगा क्योंकि जब पाठकों का  साथ हो तब फिर हमें किसी से भयभीत होने की  जरूरत ही नहीं है। 
विनम्र आभार एवं अनंत शुभकामनाओं सहित।

- रवीन्द्र वाजपेयी 

Saturday, 8 November 2025

सर्वोच्च न्यायालय के फैसले मात्र से आवारा पशुओं की समस्या हल नहीं होगी



इसे मजाक कहें या विडंबना कि आवारा कुत्तों के आतंक से लोगों को बचाने के लिए सर्वोच्च न्यायालय को आदेश पारित करना पड़ा।  इसमें विद्यालयों  , अस्पतालों, बस अड्डों और रेलवे स्टेशनों के पास मंडराते कुत्तों की नसबंदी करने के बाद उनको वापस उन्हीं स्थानों पर छोड़ने की बजाय उनके लिए बनाये गए आश्रय स्थल पर रखने का निर्देश दिया  गया है। राजस्थान उच्च न्यायालय के तत्संबंधी निर्णय को बरकरार रखते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को आवारा कुत्तों को हटाये जाने के अलावा राष्ट्रीय राजमार्गों एवं एक्सप्रेस हाइवे पर बैठे रहने वाले पशुओं को हटाये जाने के पुख्ता और स्थायी इंतजाम करने का निर्देश भी दिया है। उक्त फैसले में सभी राज्यों को कहा गया है कि वे उन सभी निजी और सरकारी संस्थानों का पता करें जहाँ आवारा कुत्ते जमा होते हैं। इस अभियान के लिए आठ हफ्ते का समय भी दिया गया। कुछ समय पहले दिल्ली में इस समस्या को लेकर जब सर्वोच्च न्यायालय ने आदेश पारित किया तब मेनका गाँधी सहित अनेक पशु प्रेमी हस्तियों के अलावा कुछ संगठन इसे कुत्तों पर अत्याचार बताकर विरोध करने खड़े हो गए। हजारों आवारा कुत्तों की नसबंदी और उनके लिए आश्रय स्थल बनाये जाने  पर होने वाले अनुमानित खर्च और प्रशासनिक व्यवस्था को लेकर भी सवाल उठे। दिल्ली की देखादेखी अन्य राज्यों से भी आवारा पशुओं से होने वाली परेशानियों के विरुद्ध आवाजें सुनाई दीं। पहले भी इस समस्या पर देश भर में बहस होती रही है। आवारा कुत्तों द्वारा लोगों को काटे जाने की घटनाएं बढ़ने से लोगों की नाराजगी स्थानीय प्रशासन के प्रति बढ़ती जा रही है। देश भर से जो जानकारी आई उससे स्पष्ट हुआ कि  सैकड़ों छोटे बच्चे इन कुत्तों के शिकार हुए। राहगीरों और दोपहिया वाहन चालकों पर आवारा कुत्तों के झपटने से दुर्घटनाओं की संख्या लगातार बढ़ रही है। कुत्ते के काटने से होने वाली रेबीज नामक बीमारी से बचाव के लिए जिस टीके की जरूरत होती है उसकी उपलब्धता सरकारी अस्पतालों में नहीं होने से भी लोगों के लिये खतरा पैदा होता है। कुत्तों के काटने से हुई मौतों की संख्या लगातार बढ़ना इस बात का प्रमाण है कि समस्या के निदान हेतु या तो समुचित कदम नहीं उठाये गए या फिर वे पर्याप्त नहीं हैं। स्थानीय निकायों द्वारा आवारा कुत्तों को रेबीज रोधक इंजेक्शन लगाने के अलावा उनकी आबादी में वृद्धि को रोकने के लिए नसबंदी करने के लिए भी इन विभागों के पास न तो पर्याप्त धन है और न ही मानव संसाधन। यही वजह है कि पूरे देश में आवारा कुत्ते तेजी से बढ़ते जा रहे हैं जिससे समस्या लगातार गम्भीर होती गई। शहरों में आवारा कुत्तों के अलावा अन्य पशुओं के कारण भी आम जनता हलाकान है। इनमें गाय, भैंस साँड़ आदि हैं। इसी तरह राजमार्गों पर भी आवारा कुत्तों से ज्यादा गायों के झुण्ड वाहन चालकों  के लिए अकल्पनीय हालात  उत्पन्न करते हैं। गोवंश के वध पर रोक लग जाने से राजमार्गों पर ऐसी  गायों की संख्या बढ़ती ही जा रही है जो दूध नहीं देने के कारण उनके मालिकों द्वारा लावारिस छोड़ दी जाती हैं। इनके कारण हर साल बड़े पैमाने पर जो दुर्घटनाएं होती हैं उनमें मनुष्यों के साथ ही ये पशु भी हताहत होते हैं। कुल मिलाकर समस्या का स्वरूप दिन ब दिन बड़ा होते जाने से उसका इलाज  समय की मांग है। पशु प्रेमियों के तर्क अपनी जगह हैं। प्रकृति और पर्यावरण का  संतुलन बनाये रखने के लिए पशुओं का होना भी जरूरी है। इसीलिए हिंसक पशुओं तक के संरक्षण हेतु बने अभ्यारणों  पर करोड़ों रु. का व्यय होता है। सरकार गौशालाओं का रखरखाव करने के  लिए अनुदान भी देती है। लेकिन वह राशि इतनी कम है कि उसमें गौशाला का ठीक से संचालन संभव ही नहीं है। ऐसे में सर्वोच्च न्यायालय कितने भी आदेश जारी कर दे किंतु आवारा कुत्तों एवं गाय आदि अन्य पशुओं की शहरों एवं राजमार्गों पर मौजूदगी रोकना ठीक उसी तरह असम्भव प्रतीत होता है जैसे उसके सख्त आदेश के बाद भी हेलमेट और  सीटबेल्ट का उपयोग शत् -  प्रतिशत नहीं हो सका। बहरहाल , आवारा पशुओं की समस्या का समुचित निदान करने की दिशा में सर्वोच्च न्यायालय ने जो ताजा फैसला सुनाया उसको लागू करवाने के लिए समाज को भी अपने दायित्व का निर्वहन करने आगे आना होगा। पशु प्रेमी तबके को भी ये सोचना चाहिए कि यदि कोई पशु  मानव जीवन के लिए खतरा बन जाए तब भी उसको आजादी के साथ घूमने दिया जाना संभव नहीं है। अपने शौक और आवश्यकता के लिए पशु पालना और फिर उसे घर से बाहर छोड़ देना कानूनी न सही  किन्तु सामाजिक अपराध तो है ही। गौरतलब है शेर के शिकार पर रोक होने के बाद भी  आदमखोर होने पर उसे मार दिया जाता है।


- रवीन्द्र वाजपेयी

Friday, 7 November 2025

बिहार में रिकार्ड तोड़ मतदान चुनाव आयोग की बड़ी सफलता


बिहार विधानसभा के बहुप्रतीक्षित चुनाव में पहले चरण का मतदान कल जिस शांतिपूर्ण ढंग से संपन्न हुआ वह स्वागत योग्य है। यद्यपि कुछ जगहों पर हिंसा हुई किंतु वह इस राज्य के इतिहास को देखते हुए नगण्य ही कही जाएगी। लेकिन जिस बात के लिए इस चरण की चर्चा देश भर में हो रही है वह है मतदान का प्रतिशत 64 प्रतिशत से भी आगे निकल जाना। 2020 के विधानसभा चुनाव में 57 और पिछले लोकसभा चुनाव में 56 फीसदी मतदाताओं द्वारा अपने मताधिकार का प्रयोग किया गया था। ऐसे में 7 - 8 फीसदी की वृद्धि निश्चित रूप से सुखद आश्चर्य है और वह भी तब, जब कांग्रेस नेता राहुल गांधी सहित अन्य विपक्षी दल  मतदाता सूचियों के गहन पुनरीक्षण पर आसमान सिर पर उठाकर घूमते हुए आरोप लगाते रहे कि चुनाव आयोग ने भाजपा के दबाव में बड़ी संख्या में उन मतदाताओं के नाम सूची से अलग कर दिये जिन्हें विपक्ष का समर्थक माना जाता है। वैसे तो सभी चुनाव महत्वपूर्ण होते हैं लेकिन बिहार विधानसभा के  इस चुनाव पर अनेक कारणों से पूरे देश की निगाह लगी है। 2024 के लोकसभा चुनाव में नरेंद्र मोदी को स्पष्ट बहुमत नहीं मिलने से विपक्ष काफी उत्साहित था। लेकिन हरियाणा, महाराष्ट्र और दिल्ली विधानसभा चुनाव में भाजपा ने शानदार सफलता हासिल कर ये दिखा दिया कि अभी उनका आकर्षण बना हुआ है। उसी के बाद राहुल ने मतदाता सूचियों में गड़बड़ी का शिगूफा छेड़कर देश भर में आंदोलन खड़ा करने का प्रयास किया किंतु उन्हें अपेक्षित सफलता नहीं मिली। ऐसे में जब चुनाव आयोग द्वारा बिहार में मतदाता सूचियों से विदेशी घुसपैठियों को अलग करने के लिए उनका  गहन पुनरीक्षण करने का फैसला किया तो श्री गाँधी और अन्य विपक्षी दलों ने उसे रुकवाने के लिए सर्वोच्च न्यायालय तक का दरवाजा खटखटाया । वहाँ भी जब निराशा हाथ लगी तब श्री गाँधी ने राजद नेता तेजस्वी यादव के साथ  मिलकर पूरे बिहार में वोट अधिकार यात्रा भी निकाली। विपक्ष का यही आरोप था कि चुनाव आयोग  बड़ी संख्या में वोट काटकर भाजपा की आसान कर रहा  है। हालांकि सर्वोच्च न्यायालय के आदेश पर काटे गए 65 लाख नामों का विवरण सार्वजनिक भी किया गया और लोगों को  नाम जुड़वाने का पर्याप्त अवसर भी मिला। ऐसा माना जा रहा है कि उस प्रक्रिया में ज्यादातर  उन बांग्लादेशी और रोहिंग्या मुसलमानों के नाम अलग किये गए जो अवैध तरीकों से मतदाता बन गए थे जबकि उनके पास भारत की नागरिकता नहीं है। सर्वोच्च न्यायालय द्वारा चुनाव आयोग के अधिकार  क्षेत्र में हस्तक्षेप से इंकार के बाद मतदाता सूचियों का अंतिम प्रकाशन हो गया जिसके कारण विपक्ष के पास करने के लिए कुछ नहीं बचा तो उसने वोट चोरी - वोट चोरी चिल्लाकर लोगों को भड़काने की कोशिश की । लेकिन जिस उत्साह के साथ बिहार के मतदाताओं ने मतदान का नया कीर्तिमान स्थापित किया उसने ये साबित कर दिया कि चुनाव आयोग आम मतदाता का विश्वास अर्जित करने में सफल रहा। कौन जीतेगा, कौन नहीं इसका अनुमान  लगाने वाले अपने काम में लगे हैं। एनडीए और महागठबंधन के अलावा जनसुराज के भी अपने - अपने दावे हैं। सट्टा बाजार के धन्धेबाज भी हमेशा की तरह रोज नये अनुमान लेकर आ रहे हैं। लेकिन जिस शांतिपूर्ण और व्यवस्थित तरीके से प्रथम चरण का मतदान पूरा हुआ उसके लिए चुनाव आयोग प्रशंसा का पात्र है। मतदाता सूचियों में गड़बड़ी और गलत तरीके से नाम काटे जाने की शिकायतें भी उंगली पर गिनने लायक ही आईं। महागठबंधन द्वारा प्रथम चरण में बढ़त हासिल करने का दावा चुनाव प्रक्रिया के निष्पक्ष और पारदर्शी होने का सबसे बड़ा प्रमाण पत्र है। भले ही राहुल , दिल्ली में बिहार चुनाव को चोरी किये जाने की आशंका जताते रहे हों। कल के अनुभव के आधार पर 11 नवम्बर को होने वाले द्वितीय चरण के मतदान की प्रक्रिया भी शांतिपूर्ण और सुव्यवस्थित संपन्न होने की उम्मीद बढ़ गई है। बिहार में इसके पहले कभी भी इतना अधिक मतदान नहीं हुआ जिससे पता चलता है कि वोट चोरी के दुष्प्रचार का कोई असर नहीं हुआ। बेहतर होगा ममता बैनर्जी भी मतदाता सूचियों के सघन, पुनरीक्षण में सहयोग दें क्योंकि मतदाता सूचियों का शुद्धिकरण लोकतंत्र को सुदृढ़ बनाने के साथ ही चुनाव प्रक्रिया में लोगों का विश्वास बनाये रखने में कितना सहायक है ये बिहार में गत दिवस हुए मतदान से स्पष्ट हो गया। हर देशप्रेमी ये मानेगा कि मतदाता सूचियों में विदेशी नागरिकों का नाम होना पूरी तरह गलत  है । और जो नेता या पार्टी उनके नाम काटे जाने का विरोध करती है उसकी नीयत पर संदेह होना स्वाभाविक है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Thursday, 6 November 2025

क्या बेटी और वोट जाति में ही देने की सोच से बाहर आ सकेगा बिहार


बिहार विधानसभा चुनाव के लिए प्रथम चरण का मतदान आज हो रहा है। 121 सीटों पर  मतदाता  भावी विधायक का चयन करेंगे। राजनीतिक दृष्टि से बेहद जागरूक कहे जाने वाले इस राज्य के चुनाव पर एक चौथाई 21 वीं सदी बीत जाने के बाद भी जातिवाद का प्रभाव स्पष्ट है। चुनाव वैसे तो भाजपा और जनता दल ( यू) के नेतृत्व वाले एनडीए और राजद तथा कांग्रेस की अगुआई वाले महागठबंधन के बीच ही माना जा रहा है किंतु चुनाव प्रबंधन विशेषज्ञ प्रशांत किशोर की नई नवेली जनसुराज पार्टी ने इसे त्रिकोणीय स्वरूप प्रदान कर दिया। हालांकि उनको लेकर जो उत्साह शुरुआत में था उसमें कमी आई है । इसका प्रमुख कारण उनका चुनाव लड़ने से इंकार करना है किंतु इतना तो माना ही जा सकता है कि जनसुराज द्वारा हासिल किये जाने वाले मत अनेक सीटों पर  दोनों गठबंधनों के उम्मीदवारों की जीत - हार तय करेंगे। हालांकि असदुद्दीन, ओवैसी और बसपा भी जोर आजमाइश कर रहे हैं किंतु जिन तीन चेहरों के इर्द - गिर्द चुनाव सिमटा दिख रहा है वे हैं नीतीश कुमार, तेजस्वी यादव और प्रशांत किशोर। अगले मुख्यमंत्री के तौर पर श्री कुमार और श्री यादव के बीच ही मुकाबला है। जो कुछ सतही तौर पर दिखाई दिया उसके अनुसार एनडीए और महागठबंधन के अपने - अपने दावे हैं किंतु शुरू - शुरू में अनुमान लगाने से बच रहे चुनाव विश्लेषकों ने बीते कुछ दिनों में जो पत्ते खोले उनके अनुसार तो एनडीए की सत्ता में वापसी की सम्भावनाएँ बढ़ी हैं जिसका मुख्य कारण महिलाओं में नीतीश कुमार के प्रति  परंपरागत झुकाव है। बीते कुछ महीनों में उनकी सरकार ने महिलाओं को नगद आर्थिक सहायता रूपी जो तोहफा दिया उसकी वजह से सत्ता विरोधी रुझान को ठंडा करने में वे सफल रहे। हालांकि उसके जवाब में तेजस्वी ने हर घर में एक शासकीय नौकरी का जो वायदा किया उसकी भी बड़ी चर्चा है। यदि सत्ता परिवर्तन हुआ तो इस वायदे की भूमिका सबसे अधिक होगी। नीतीश कुमार की व्यक्तिगत छवि निश्चित रूप से सबसे बेहतर है। वहीं तेजस्वी ने भले ही अपने पिता लालू प्रसाद यादव को चुनाव प्रचार से दूर रखा किंतु उनकी सरकार के दौर की जो भयावह यादें लोगों के मन - मस्तिष्क में बरकरार हैं वे महागठबंधन की संभावनाओं को कमजोर करती है। हालांकि इस चुनाव में तेजस्वी  एक बड़े नेता के तौर पर उभरे हैं जिनको युवाओं के महानायक का दर्जा देकर उभारा जा रहा है ।  लेकिन उनके साथ जुड़ी कांग्रेस को लेकर जनता में चूंकि कोई उत्साह नहीं है इसलिए महागठबंधन के अंतिम क्षणों में पीछे रहने की आशंका बढ़ गई है। 2020 में भी तेजस्वी के हाथ से सत्ता खिसकने का कारण कांग्रेस का दयनीय प्रदर्शन ही था। विगत पाँच वर्षों में  उसने अपने संगठन को मज़बूत बनाने के लिए कोई सार्थक प्रयास किये हों ऐसा भी नहीं लगता। वोट चोरी के विरोध में तेजस्वी के साथ निकाली यात्रा से कांग्रेस में जो उत्साह जागा वह राहुल गाँधी की लम्बी विदेश यात्रा के कारण ठंड़ा पड़ गया। ऐसे में महागठबंधन का भविष्य मुस्लिम - यादव नामक समीकरण  पर ही टिका है। मुकेश सहनी के सजातीय मल्लाह मतों को छोड़कर अन्य पिछड़ी और अति पिछड़ी जातियों पर एनडीए की पकड़ बरकरार लग रही है। जीतनराम मांझी , उपेंद्र कुशवाहा और  चिराग पासवान के साथ आने से एनडीए सफलता के प्रति आश्वस्त है तो उसे गलत नहीं कहा जा सकता। हालांकि युवाओं के अलावा उच्च जातियों के मतदाताओं के बीच यदि जनसुराज ने थोड़ी सी भी सेंध लगाई तो परिणाम चौंकाने वाले हो सकते हैं। इसी तरह ओवैसी मुस्लिम मतों में ज्यादा घुसपैठ करने में सफल रहे तब तेजस्वी का सपना बिखर सकता है। लेकिन सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या बेटी और वोट जाति में ही देने की सोच त्यागने का साहस इस चुनाव में बिहार के मतदाता दिखा सकेंगे? यदि ऐसा हुआ तब वह बड़ी क्रांति होगी जिसका प्रभाव भविष्य के चुनावों पर भी पड़े बिना नहीं रहेगा। अब तक के प्रचलित मापदंडों के आधार पर आकलन करें तो एनडीए चेहरों और मोहरों दोनों ही कसौटियों पर भारी प्रतीत हो रहा है। भले ही तेजस्वी ने कड़े मुकाबले का एहसास करवाया किंतु उनको कांग्रेस का वैसा साथ नहीं मिलता लग रहा जैसा जरूरी होता है। इसीलिए वे मुख्यमंत्री के सर्वे में नीतीश पर भारी दिखने के बाद भी आखिरी दौर में पिछड़ते लग रहे हैं। उनकी नैया तभी पार हो सकेगी जब युवा मतदाता पूरी तरह महागठबंधन के साथ खड़े हों , वहीं  मुस्लिम - यादव समीकरण भी एकजुट रहे। हालांकि कुछ सर्वे एनडीए की स्पष्ट विजय की भविष्यवाणी करने लगे हैं किंतु प्रशांत किशोर की जनसुराज यदि छुपी रुस्तम साबित हुई तब अप्रत्याशित परिणाम आ जाएं तो अचरज नहीं होगा। 

- रवीन्द्र वाजपेयी


Wednesday, 5 November 2025

राहुल को सत्ता में रहते दलित, आदिवासी और पिछड़ों की याद नहीं आई

राहुल गाँधी लंबे समय से आरक्षण का प्रतिशत बढ़ाये जाने की बात कर रहे हैं। जिसकी जितनी भागीदारी, उसकी उतनी हिस्सेदारी जैसे नारे के जरिये वे ये प्रचारित करने में जुटे हैं कि दलित, आदिवासी और पिछड़ी जातियों को उनकी संख्या के अनुसार नौकरियों और उच्च शिक्षा में समुचित प्रतिनिधित्व नहीं मिला। कभी वे  नौकरशाही में उक्त वर्ग की कम संख्या का बखान करते हैं तो कभी समाचार माध्यमों में भी सवर्ण जातियों के बाहुल्य की। इसी क्रम में वे सौंदर्य प्रतियोगिताओं तक में दलित और आदिवासी का चयन नहीं होने जैसी हास्यास्पद बात भी उठा चुके हैं। बजट पर भाषण देते हुए लोकसभा में वे इस बात को उठाते रहे कि उसे बनाने वाले अधिकारियों के दल में दलित और आदिवासी नहीं थे। जातिगत जनगणना के भी वे प्रबल पक्षधर हैं।  हालांकि उनकी पार्टी ने पाँच दशक तक देश पर राज करने के बाद भी उनकी संख्या के आधार पर दलित, आदिवासी और पिछड़ी जातियों को नौकरियों सहित अन्य अवसरों से क्यों वंचित रखा , पहले  इसका उत्तर उन्हें देना चाहिए। उल्लेखनीय है  दलित और आदिवासियों के आरक्षण का प्रावधान तो संविधान निर्माताओं ने ही कर दिया था किंतु पिछड़ी जातियों के बारे में पंडित नेहरू से लेकर इंदिरा जी तक की सरकार ने कभी नहीं सोचा। जबकि डॉ. लोहिया शुरू से  ही पिछड़ा पावे सौ में साठ का नारा बुलंद करते रहे। पिछड़ी जातियों को आरक्षण का रास्ता भी जिस मंडल आयोग की सिफारिशों से  साफ हुआ उसका गठन भी 1979 में जनता पार्टी  सरकार ने किया था। 1980 में श्रीमती गाँधी फिर सत्ता में आईं और 1984 में राजीव गाँधी ऐतिहासिक सफलता के साथ प्रधानमंत्री बने और 1989 तक रहे। मंडल आयोग की रिपोर्ट 1980 में ही आ चुकी थी किंतु उसकी सिफारिशों के अनुसार अन्य पिछड़ी जातियों को नौकरियों और उच्च शिक्षा के लिए  27 फीसदी आरक्षण देने की कोई कोशिश न इंदिरा जी ने की और न ही राजीव ने। 1990 में विश्वनाथ प्रताप सिंह की सरकार ने उक्त रिपोर्ट को लागू किया था। ऐसे में राहुल को ये भी स्पष्ट करना चाहिए कि 1980 में आई मंडल आयोग की रिपोर्ट को 1989 तक कांग्रेस की केंद्र सरकार क्यों दबाये बैठी रही ? ज़ाहिर है  दलित, आदिवासी और पिछड़ी जातियों के प्रति उनके मन में अचानक उमड़े प्रेम के पीछे कांग्रेस के खिसकते जनाधार को पुनः कायम करना है । कुछ वर्ष पूर्व तक वे खुद को जनेऊधारी ब्राह्मण प्रचारित करते रहे। मंदिरों और मठों में जाकर पूजा - अर्चना भी की किंतु   सवर्ण जातियों पर उसका कोई असर नहीं होने पर वे दलित, आदिवासी और पिछड़ी जातियों के मसीहा  बनने का प्रयास करने लगे। इस बारे में वे जो तर्क देते हैं उनका कोई असर इन वर्गों पर पड़ता नहीं दिखता क्योंकि उन जातियों में पहले से ही अनेक स्थापित नेता हैं। लेकिन वोटों की लालच में अब वे सेना को भी इस खतरनाक खेल में घसीट रहे हैं जो देश के लिए बहुत घातक है। सेना में जातीय के अलावा मुस्लिमों के लिए आरक्षण की मांग मुलायम सिंह यादव ने भी उठाई थी किंतु उसे समर्थन नहीं मिला। 2004 से 2014 तक केंद्र में डाॅ. मनमोहन सिंह की सरकार रही जिसकी लगाम श्री गाँधी और उनकी माताजी सोनिया गाँधी के हाथ में रही। सरकार में न रहते हुए भी राहुल उसके द्वारा जारी अध्यादेश पत्रकारों के सामने फाड़ने की जुर्रत कर जाते और  प्रधानमंत्री उनके सामने लाचार बने रहते। आज वे दलित, आदिवासी और पिछड़ी जातियों को उनकी संख्या के आधार पर नौकरियों और उच्च शिक्षा में आरक्षण दिलवाने संविधान संशोधन तक की जो डींग हाँक  रहे हैं वह उन 10 वर्षों में उन्हें याद नहीं आई। और यदि वह सरकार सत्ता में बनी रहती तब शायद अभी भी वे इस बारे में न सोचते और न ही  बोलते। आरक्षण निश्चित रूप से सामाजिक परिवर्तन और समतामूलक समाज की स्थापना के लिए महत्वपूर्ण है किंतु सेना जैसे विभाग में इसकी मांग करना देश हित  की बलि चढ़ाने जैसा है। भारतीय सेना में जाति और धर्म के आधार पर भेदभाव की बात नहीं सुनाई दी। सभी धर्मों के लोग सेना प्रमुख के पद तक पहुंचे हैं। निचले स्तर पर भी पूरी तरह से सद्भाव बना हुआ है। ऐसे में ये कहना कि केवल 10 प्रतिशत उसे चला रहे हैं सेना के ढांचे को कमजोर करने का प्रयास है। श्री गाँधी को ये नहीं भूलना चाहिए कि वे एक राष्ट्रीय पार्टी के नेता होने के कारण नेता प्रतिपक्ष बने हैं। उनके द्वारा इस तरह की बातें करने से कांग्रेस की भी मुसीबतें बढ़ती हैं। अपने राजनीतिक स्वार्थ के लिए देश की सुरक्षा करने वाली संस्था में जाति के बीज बोना बेहद गैर जिम्मेदार सोच का परिचायक है।


- रवीन्द्र वाजपेयी

Tuesday, 4 November 2025

थरूर के साहस की आलोचना नहीं प्रशंसा होनी चाहिए


कांग्रेस सांसद डॉ. शशि थरूर प्रभावशाली वक्ता, कुशल लेखक और वैश्विक सोच रखने वाले व्यक्ति हैं। संरासंघ की सेवा में रहने के कारण उन्हें दुनिया के बारे में अच्छी जानकारी है। उनकी वाणी और लेखन में अध्ययनशीलता का परिचय मिलता है। केरल की  तिरुवनंतपुरम सीट से जीतते आ रहे डॉ. थरूर , डाॅ. मनमोहन सिंह की सरकार में मंत्री भी रहे। पिछले कुछ सालों से वे कांग्रेस नेतृत्व से नाराज हैं । उनकी शिकायत है कि संसद और अन्य मंचों पर पार्टी उन्हें बोलने का अवसर नहीं देती। 2019 के लोकसभा चुनाव की हार के बाद राहुल गाँधी द्वारा पार्टी अध्यक्ष पद छोड़ने के बाद  बने जी - 23 नामक समूह में श्री थरूर भी शामिल थे। इसके प्रमुख सदस्य गुलाम नबी आजाद और कपिल सिब्बल पार्टी छोड़ गए जबकि अनेक घर बैठने मजबूर हो गए। हालांकि डॉ. थरूर को 2024 में भी कांग्रेस ने टिकिट दी और वे जीते  किंतु बीते डेढ़ वर्ष में  समय - समय पर उनके जो बयान आये उनसे ये अटकलें लगाई जाने लगीं कि वे भी कांग्रेस को अलविदा कहने की तैयारी में हैं। ये भी सुनने में आया  कि वे केरल विधानसभा के आगामी चुनाव में पार्टी की ओर से मुख्यमंत्री का चेहरा बनने के इच्छुक हैं । चूंकि श्री गाँधी उन्हें भाव नहीं दे रहे इसलिए दबाव बनाने की रणनीति अपना रहे हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार के अलावा उनकी निजी प्रशंसा करने वाले उनके बयानों के बाद  अनुमान लगने लगा कि वे भी भाजपा में घुसने की फिराक में है। ऑपरेशन सिंदूर के बाद भारत का पक्ष रखने  जो सर्वदलीय प्रतिनिधिमंडल विभिन्न देशों को भेजे गए उनमें जो दल अमेरिका गया उसका नेतृत्व श्री थरूर को सौंपने पर कांग्रेस ने ऐतराज जताया था क्योंकि उसने अपने जिन सांसदों की सूची सरकार को प्रतिनिधिमंडलों  के लिए सौंपी उसमें श्री थरूर के अलावा वे नाम नहीं थे जिनका चयन सरकार ने किया।  विदेशी धरती पर श्री थरूर  द्वारा मोदी सरकार की नीतियों  की प्रशंसा भी पार्टी को रास नहीं आई क्योंकि श्री गाँधी ऑपरेशन सिंदूर को लेकर श्री मोदी पर तीखे हमले करते रहते हैं। उसके बाद से श्री थरूर और श्री गाँधी के बीच की दूरियाँ बढ़ती जा रही हैं। इसका ताजा प्रमाण उनका वह लेख है जिसमें श्री थरूर ने वंशवादी राजनीति  पर तीखे प्रहार करते हुए लिखा है कि दशकों से एक परिवार भारतीय राजनीति पर हावी रहा।भारतीय राजनीति एक पारिवारिक व्यवसाय शीर्षक वाले लेख में थरूर ने कहा कि नेहरू-गांधी परिवार (जिसमें स्वतंत्र भारत के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू, प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी और राजीव गांधी और वर्तमान विपक्षी नेता राहुल गांधी और सांसद प्रियंका गांधी वाड्रा शामिल हैं) भारत के स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास से जुड़ा हुआ है। लेकिन इसने इस विचार को भी पुख्ता किया है कि राजनीतिक नेतृत्व जन्मसिद्ध अधिकार हो सकता है। थरूर ने कहा, यह विचार भारतीय राजनीति में हर पार्टी, हर क्षेत्र और स्तर पर व्याप्त है। उन्होंने कांग्रेस के प्रथम परिवार के अलावा अब्दुल्ला, बादल, मुलायम, लालू, पासवान, ठाकरे, पटनायक, परिवारों का उल्लेख करते हुए ममता बैनर्जी और मायावती पर भी निशाना साधा जिन्होंने अपने भतीजे को उत्तराधिकारी बना दिया। अपनी बात स्पष्ट करते हुए उन्होंने लिखा कि समय आ गया है जब भारत वंशवाद की जगह योग्यतावाद को अपनाये।  हालांकि उन्होंने भारत के अलावा पड़ोसी देशों में भी वंशवाद  का उल्लेख करते हुए इसे लोकतंत्र के लिए खतरा बताया किंतु उनके लेख ने कांग्रेस में हलचल मचा दी ।  प्रमोद तिवारी, राशिद अल्वी और उदित राज आदि ने गाँधी परिवार का बचाव करते हुए  श्री थरूर के लेख की तीखी आलोचना की जिससे इतना तो स्पष्ट हो ही गया कि वे अपने मकसद में कामयाब हो गए और वंशवाद एक बार फिर राजनीतिक विमर्श में आ गया। सही बात तो ये है कि सन्दर्भित लेख की प्रशंसा होनी चाहिए जिसमें भारतीय राजनीति में व्याप्त  एक बड़ी बुराई की ओर लोगों का ध्यान आकर्षित किया गया है। यदि वे केवल कांग्रेस पर नेहरू - गाँधी परिवार के आधिपत्य का मुद्दा उठाते तब पार्टी नेताओं का उन पर हमलावर होना स्वाभाविक होता किंतु  लेख में तो तमाम राजनीतिक परिवारों का जिक्र है जिन्होंने पार्टी को पुश्तैनी जागीर बना लिया। परिवार के सभी सदस्य एक ही दल में रहे इसमें कुछ भी गलत नहीं। विभिन्न पार्टियों में ऐसा है भी किंतु नेतृत्व रूपी विरासत परिवार तक सीमित रखना नव सामंतवाद का प्रतीक है जिसका समर्थन दरबारी मानसिकता के लोग ही कर सकते हैं। हो सकता है कांग्रेस श्री थरूर पर अनुशासन का चाबुक चलाये किंतु उन्होंने जो लिखा वह पूरी तरह सही है। कांग्रेस इस बुराई को फैलाने लिए सबसे अधिक कसूरवार है क्योंकि उसी का अनुसरण करते हुए ही अन्य पार्टियों ने वंशवाद को आत्मसात किया। 


- रवीन्द्र वाजपेयी