बिहार विधानसभा चुनाव के लिए प्रथम चरण का मतदान आज हो रहा है। 121 सीटों पर मतदाता भावी विधायक का चयन करेंगे। राजनीतिक दृष्टि से बेहद जागरूक कहे जाने वाले इस राज्य के चुनाव पर एक चौथाई 21 वीं सदी बीत जाने के बाद भी जातिवाद का प्रभाव स्पष्ट है। चुनाव वैसे तो भाजपा और जनता दल ( यू) के नेतृत्व वाले एनडीए और राजद तथा कांग्रेस की अगुआई वाले महागठबंधन के बीच ही माना जा रहा है किंतु चुनाव प्रबंधन विशेषज्ञ प्रशांत किशोर की नई नवेली जनसुराज पार्टी ने इसे त्रिकोणीय स्वरूप प्रदान कर दिया। हालांकि उनको लेकर जो उत्साह शुरुआत में था उसमें कमी आई है । इसका प्रमुख कारण उनका चुनाव लड़ने से इंकार करना है किंतु इतना तो माना ही जा सकता है कि जनसुराज द्वारा हासिल किये जाने वाले मत अनेक सीटों पर दोनों गठबंधनों के उम्मीदवारों की जीत - हार तय करेंगे। हालांकि असदुद्दीन, ओवैसी और बसपा भी जोर आजमाइश कर रहे हैं किंतु जिन तीन चेहरों के इर्द - गिर्द चुनाव सिमटा दिख रहा है वे हैं नीतीश कुमार, तेजस्वी यादव और प्रशांत किशोर। अगले मुख्यमंत्री के तौर पर श्री कुमार और श्री यादव के बीच ही मुकाबला है। जो कुछ सतही तौर पर दिखाई दिया उसके अनुसार एनडीए और महागठबंधन के अपने - अपने दावे हैं किंतु शुरू - शुरू में अनुमान लगाने से बच रहे चुनाव विश्लेषकों ने बीते कुछ दिनों में जो पत्ते खोले उनके अनुसार तो एनडीए की सत्ता में वापसी की सम्भावनाएँ बढ़ी हैं जिसका मुख्य कारण महिलाओं में नीतीश कुमार के प्रति परंपरागत झुकाव है। बीते कुछ महीनों में उनकी सरकार ने महिलाओं को नगद आर्थिक सहायता रूपी जो तोहफा दिया उसकी वजह से सत्ता विरोधी रुझान को ठंडा करने में वे सफल रहे। हालांकि उसके जवाब में तेजस्वी ने हर घर में एक शासकीय नौकरी का जो वायदा किया उसकी भी बड़ी चर्चा है। यदि सत्ता परिवर्तन हुआ तो इस वायदे की भूमिका सबसे अधिक होगी। नीतीश कुमार की व्यक्तिगत छवि निश्चित रूप से सबसे बेहतर है। वहीं तेजस्वी ने भले ही अपने पिता लालू प्रसाद यादव को चुनाव प्रचार से दूर रखा किंतु उनकी सरकार के दौर की जो भयावह यादें लोगों के मन - मस्तिष्क में बरकरार हैं वे महागठबंधन की संभावनाओं को कमजोर करती है। हालांकि इस चुनाव में तेजस्वी एक बड़े नेता के तौर पर उभरे हैं जिनको युवाओं के महानायक का दर्जा देकर उभारा जा रहा है । लेकिन उनके साथ जुड़ी कांग्रेस को लेकर जनता में चूंकि कोई उत्साह नहीं है इसलिए महागठबंधन के अंतिम क्षणों में पीछे रहने की आशंका बढ़ गई है। 2020 में भी तेजस्वी के हाथ से सत्ता खिसकने का कारण कांग्रेस का दयनीय प्रदर्शन ही था। विगत पाँच वर्षों में उसने अपने संगठन को मज़बूत बनाने के लिए कोई सार्थक प्रयास किये हों ऐसा भी नहीं लगता। वोट चोरी के विरोध में तेजस्वी के साथ निकाली यात्रा से कांग्रेस में जो उत्साह जागा वह राहुल गाँधी की लम्बी विदेश यात्रा के कारण ठंड़ा पड़ गया। ऐसे में महागठबंधन का भविष्य मुस्लिम - यादव नामक समीकरण पर ही टिका है। मुकेश सहनी के सजातीय मल्लाह मतों को छोड़कर अन्य पिछड़ी और अति पिछड़ी जातियों पर एनडीए की पकड़ बरकरार लग रही है। जीतनराम मांझी , उपेंद्र कुशवाहा और चिराग पासवान के साथ आने से एनडीए सफलता के प्रति आश्वस्त है तो उसे गलत नहीं कहा जा सकता। हालांकि युवाओं के अलावा उच्च जातियों के मतदाताओं के बीच यदि जनसुराज ने थोड़ी सी भी सेंध लगाई तो परिणाम चौंकाने वाले हो सकते हैं। इसी तरह ओवैसी मुस्लिम मतों में ज्यादा घुसपैठ करने में सफल रहे तब तेजस्वी का सपना बिखर सकता है। लेकिन सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या बेटी और वोट जाति में ही देने की सोच त्यागने का साहस इस चुनाव में बिहार के मतदाता दिखा सकेंगे? यदि ऐसा हुआ तब वह बड़ी क्रांति होगी जिसका प्रभाव भविष्य के चुनावों पर भी पड़े बिना नहीं रहेगा। अब तक के प्रचलित मापदंडों के आधार पर आकलन करें तो एनडीए चेहरों और मोहरों दोनों ही कसौटियों पर भारी प्रतीत हो रहा है। भले ही तेजस्वी ने कड़े मुकाबले का एहसास करवाया किंतु उनको कांग्रेस का वैसा साथ नहीं मिलता लग रहा जैसा जरूरी होता है। इसीलिए वे मुख्यमंत्री के सर्वे में नीतीश पर भारी दिखने के बाद भी आखिरी दौर में पिछड़ते लग रहे हैं। उनकी नैया तभी पार हो सकेगी जब युवा मतदाता पूरी तरह महागठबंधन के साथ खड़े हों , वहीं मुस्लिम - यादव समीकरण भी एकजुट रहे। हालांकि कुछ सर्वे एनडीए की स्पष्ट विजय की भविष्यवाणी करने लगे हैं किंतु प्रशांत किशोर की जनसुराज यदि छुपी रुस्तम साबित हुई तब अप्रत्याशित परिणाम आ जाएं तो अचरज नहीं होगा।
- रवीन्द्र वाजपेयी
No comments:
Post a Comment