Saturday, 22 November 2025

बिहार के बाद प. बंगाल पर टिकी भाजपा की नजरें



बिहार में नीतीश सरकार की धमाकेदार वापसी के बाद भाजपा ने  प. बंगाल में ममता बैनर्जी का किला ढहाने की तैयारियां शुरू कर दी हैं। 2021 के चुनाव में भाजपा अपने विधायकों की संख्या में आश्चर्यजनक वृद्धि करते हुए 3 से 73 तक पहुँचने के कारण मुख्य विपक्षी दल बनने की हैसियत में आ गयी। वहीं  कांग्रेस और वामपंथियों का पूरी तरह सफाया हो गया। लंबे समय तक वामपंथियों का अभेद्य दुर्ग बने रहे प. बंगाल में  पाँव जमाना भाजपा के लिए सपना जैसा था जबकि उसके पितृ पुरुष डाॅ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी यहीं के थे। भारत विभाजन की विभीषिका को जितना पंजाब और सिंध ने झेला उतना ही बंगाल ने भी। कोलकाता समेत समूचे बंगाल में हिंदुओं का जिस बेरहमी से नरसंहार हुआ उसने आजादी की खुशियों को मातम में बदल दिया। लेकिन उसके बाद भी इस राज्य में हिंदुवादी राजनीति को अपेक्षित समर्थन नहीं मिला और पूरे देश की तरह से ही बंगाल में भी कांग्रेस का वर्चस्व कायम रहा । लेकिन 1977 की जनता लहर में वहाँ ज्योति बसु के नेतृत्व में सीपीएम सरकार बनी। वे 2000 तक मुख्यमंत्री रहे। उनके बाद बुद्धदेव भट्टाचार्य आये किंतु  वे वामपंथियों के किले को बचाकर नहीं रख पाए और 2011 में ममता बैनर्जी ने अपना झंडा फहरा दिया। कांग्रेस में रहते हुए भी वे वामपंथियों से लड़ती रहीं किंतु पार्टी नेतृत्व से अपेक्षित सहयोग न मिलने से क्षुब्ध होकर उन्होंने तृणमूल कांग्रेस बनाई और 10 वर्ष के सतत संघर्ष के बाद वामपंथी सत्ता को उखाड़ फेंका। लोगों को उम्मीद थी कि वे मार्क्सवादी सत्ता के दौरान पनपी अराजकता से निजात दिलवाने के साथ ही बांग्लादेशी घुसपैठियों को वापस भेजने के लिए प्रभावी कदम उठाएंगी। लेकिन धीरे - धीरे ममता ने भी  वही तौर - तरीके अपनाये जिनके लिए वामपंथी सरकार की आलोचना करते हुए वे संघर्ष करती रहीं। राज्य के तमाम असामाजिक तत्वों ने रातों - रात मार्क्सवादी चोला उतारकर तृणमूल का झंडा थाम लिया। बांग्लादेशी घुसपैठियों को बाहर करने के बजाय ममता सरकार ने उन्हें मतदाता बनाकर अपनी राजनीतिक जमीन मजबूत करने का दाँव चला। बाद में म्यांमार से भागकर रोहिंग्या मुस्लिम भी प. बंगाल में बसते चले गये। वामपंथियों की तरह ममता सरकार को भी इन घुसपैठियों में अपना वोट बैंक नजर आने लगा । इसकी वजह से प. बंगाल का जनसंख्या संतुलन तेजी से बदला। ममता के लिए ये घुसपैठिये चुनाव जिताने वाला ब्रह्मास्त्र बन गए। राजनीतिक गुंडागर्दी को भी उन्होंने अपना प्रमुख हथियार बनाते हुए कांग्रेस और वामपंथियों को धीरे - धीरे हाशिये पर धकेल दिया। लेकिन 2014 में केंद्र में नरेंद्र मोदी की सरकार बनते ही भाजपा ने न सिर्फ प. बंगाल वरन समूचे पूर्वी और उत्तर पूर्वी राज्यों में अपने विस्तार की कार्य योजना बनाई जिसका परिणाम अरुणाचल, असम, त्रिपुरा, मणिपुर और उड़ीसा में उसकी सरकारें बन जाने के रूप में सामने है। लेकिन प. बंगाल अभी भी उसके लिए चुनौती बना हुआ है।  2014 और 2019 के लोकसभा चुनाव  के बाद 2021 के विधानसभा चुनाव में उसे अच्छी सफलता मिली। यहाँ तक कि ममता  विधानसभा चुनाव हार गईं  । यद्यपि उन्हें विशाल बहुमत मिला और तीसरी बार सत्ता में आने के बाद उन्होंने भाजपा को रोकने के लिए हरसंभव प्रयास शुरू किये जिसके कारण पिछले लोकसभा चुनाव में भाजपा को काफी नुकसान हुआ। लेकिन उसके बाद से भाजपा ने प. बंगाल को अपनी सर्वोच्च प्राथमिकता में रखा । ममता सरकार के भ्रष्टाचार को उजागर कर उसकी साख गिराने में तो उसे सफलता मिल गई लेकिन चुनाव जीतने के लिये घुसपैठियों को मतदाता सूचियों से बाहर करना जरूरी है। अब एस. आई. आर (मतदाता सूचियों का गहन पुनरीक्षण) के जरिये इस बाधा को दूर करने का बीड़ा भी उठा लिया गया है। चुनाव आयोग के इस कदम से ममता सरकार घबराई हुई है। उसने इस प्रक्रिया को रोकने के भरसक प्रयास किये किंतु सफल नहीं हुई। बिहार में मतदाता सूचियों की जाँच के कारण बड़ी संख्या में मतदाता बाहर हो गए। प. बंगाल में भी ऐसी ही उम्मीद है। बड़ी संख्या में घुसपैठियों के भागने से लगता है तीर सही निशाने पर बैठा है। बिहार की जीत के समारोह में प्रधानमंत्री द्वारा गंगा के बिहार  से प. बंगाल जाने जैसी जो टिप्पणी की उसका निहितार्थ राजनीति के जानकार समझ रहे हैं। भाजपा की चुनावी मशीनरी राज्य में सक्रिय होने की खबरें आने के बाद ममता सतर्क हो उठी हैं किंतु 2026 के मुकाबले के लिये भाजपा की तैयारियों से लगता है मुकाबला जोरदार होगा क्योंकि हिंदुत्व की हवा इस राज्य में भी महसूस होने लगी है। 

- रवीन्द्र वाजपेयी

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