.आई.आर (मतदाता सूचियों के गहन पुनरीक्षण) को लेकर कांग्रेस नेता राहुल गाँधी ने अपनी पिछली पत्रकार वार्ता में जो खुलासे किये उन्हें हाइड्रोजन बम का नाम दिया। हालांकि ये बम फोड़ने में उन्होंने लंबा समय लगाया जिसके कारण उन पर तंज कसे जाने लगे थे। उनसे बचने के लिए ही वे बिहार में मतदान के पहले चरण के एक दिन पूर्व पत्रकारों से मुखातिब हुए और हरियाणा विधानसभा चुनाव में मतदाता सूचियों में गड़बड़ी का आरोप लगाया जैसा वे महाराष्ट्र और कर्नाटक के बारे में भी वे कर चुके थे। हालांकि चुनाव आयोग उनके आरोपों को निराधार बता चुका है। हरियाणा के अनेक समाचार माध्यमों ने भी श्री गाँधी के आरोपों की मौके पर जाँच कर स्पष्ट किया कि वे तथ्यात्मक तौर पर सही नहीं हैं। लेकिन उसी पत्रकार वार्ता में उनका ये कहना चर्चा का विषय बन गया कि बिहार में भी एस.आई.आर के जरिये वोट चोरी से चुनाव जीतने की कोशिश की जा रही है। जबकि पूरे चुनाव में राज्य से मतदाता सूचियों में गड़बड़ी की शिकायतें न्यूनतम आईं। बिहार में कल अंतिम चरण का मतदान होने के बाद 14 नवंबर को नतीजे आ जायेंगे। यदि एनडीए जीता तब राहुल और तेजस्वी यादव एस.आई.आर पर ठीकरा फोड़ेंगे किंतु विजय महागठबंधन के हिस्से आई तब भी क्या विपक्ष मतदाता सूचियों के गहन पुनरीक्षण की प्रक्रिया का विरोध करेगा जो कि पूरे देश में प्रारंभ हो चुकी है। उल्लेखनीय है बिहार विधानसभा चुनाव में श्री गाँधी ने मतदाता सूचियों की जाँच को बड़ा मुद्दा बनाया और तेजस्वी के साथ वोट अधिकार यात्रा भी निकाली। लेकिन सर्वोच्च न्यायालय के दरवाजे खटखटाने के बाद भी उसको रोकने में उन्हें सफलता नहीं मिली। उलटे चुनाव आयोग ने पूरे देश में एस.आई.आर प्रारंभ कर दी। बिहार में लाखों मतदाताओं के नाम कट जाने के बाद प. बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बैनर्जी ने अपने राज्य में मतदाता सूचियों की सघन जाँच का विरोध शुरू कर दिया। चूंकि राज्य के सरकारी कर्मचारी ही इस काम को करते हैं लिहाजा उसमें रुकावट पैदा करने की कोशिश भी की गई किंतु चुनाव आयोग की सख्ती के आगे उनकी दाल नहीं गली । तब ये शिगूफा छोड़ा जाने लगा कि एस. आई. आर के डर से लोग आत्महत्या कर रहे हैं क्योंकि उनके मन में ये डर समा गया है कि आवश्यक दस्तावेजों के अभाव में कहीं उनकी नागरिकता संदेह के घेरे में न आ जाए। दरअसल, ममता बैनर्जी द्वारा एस.आई.आर का विरोध करने का मुख्य कारण मतदाता सूचियों से उन बांग्लादेशियों के नाम कटने की आशंका है जो तृणमूल कांग्रेस की मदद से अवैध रूप से मतदाता बन बैठे और चुनाव में उसकी जीत का आधार बनते हैं। राज्य में 30 फीसदी से ज्यादा मुस्लिम मतदाता हैं जिनका 75 प्रतिशत ममता समर्थक है और इसीलिए वे घुसपैठियों को वापस भेजने का खुलकर विरोध करती हैं। ये बात भी ध्यान देने योग्य है कि बांग्ला देश से सटे सीमावर्ती जिलों में बीते कुछ वर्षों में मतदाताओं की संख्या में अकल्पनीय वृद्धि से वहाँ का जनसंख्या संतुलन पूरी तरह इकतरफा हो चुका है जिसकी वजह से गैर मुस्लिम उम्मीदवार का जीत पाना असंभव है। हालांकि ऐसी स्थिति बिहार की कुछ सीटों पर भी है किंतु प. बंगाल में ममता बैनर्जी की राजनीतिक जड़ों को मजबूत करने में मुस्लिम मतदाताओं की महत्वपूर्ण भूमिका है जिनमें बांग्लादेश से आये घुसपैठियों की भी बड़ी संख्या है।एस.आई.आर के कारण इन घुसपैठियों के साथ ही तृणमूल कांग्रेस भी परेशान है क्योंकि आगामी वर्ष गर्मियों में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं। ममता की तमाम कोशिशों के बाद भी मतदाता सूचियों की बारीकी से की जाने वाली जांच चूंकि रुक नहीं पाई इसलिए अवैध रूप से मतदाता बन बैठे घुसपैठियों में घबराहट फैल गई है। बीते कुछ दिनों में सैकड़ों लोग बांग्लादेश भागने की कोशिश में पकड़े जा चुके हैं। समाचार पत्रों से मिल रही जानकारियों के मुताबिक अनेक शहरी बस्तियों के मुस्लिम रहवासी अचानक गायब हो गए हैं। बीते कुछ सालों में बनी बहुमंजिला इमारतों में रह रहे मुस्लिम परिवारों ने भी अपना आवास छोड़ दिया। इसका कारण एस.आई.आर से बचना है क्योंकि मतदाता सूची में बने रहने के लिए यदि वे आवशयक कागजात नहीं दिखा सके तब उनकी अवैध नागरिकता का खुलासा हो जाएगा। जाहिर है इन कारणों से प. बंगाल की मतदाता सूचियों से भी बिहार की तरह ही लाखों नाम कट जाएंगे जिसका सीधा - सीधा नुकसान तृणमूल कांग्रेस को होने की आशंका से ममता की चिंता बढ़ती जा रही है। देखना ये है कि प. बंगाल में उनके विरुद्ध लड़ने वाली कांग्रेस एस.आई.आर का विरोध करती है या नहीं? याद रहे लोकसभा चुनाव में ममता ने कांग्रेस नेता अधीर रंजन चौधरी को क्रिकेटर युसुफ पठान के हाथों हरवा दिया क्योंकि उस सीट पर मुस्लिम मतदाता पठान के पक्ष में गोलबंद हो गए जबकि अधीर रंजन काफी समय से वहाँ जीतते आ रहे थे।
- रवीन्द्र वाजपेयी
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