Tuesday, 4 November 2025

थरूर के साहस की आलोचना नहीं प्रशंसा होनी चाहिए


कांग्रेस सांसद डॉ. शशि थरूर प्रभावशाली वक्ता, कुशल लेखक और वैश्विक सोच रखने वाले व्यक्ति हैं। संरासंघ की सेवा में रहने के कारण उन्हें दुनिया के बारे में अच्छी जानकारी है। उनकी वाणी और लेखन में अध्ययनशीलता का परिचय मिलता है। केरल की  तिरुवनंतपुरम सीट से जीतते आ रहे डॉ. थरूर , डाॅ. मनमोहन सिंह की सरकार में मंत्री भी रहे। पिछले कुछ सालों से वे कांग्रेस नेतृत्व से नाराज हैं । उनकी शिकायत है कि संसद और अन्य मंचों पर पार्टी उन्हें बोलने का अवसर नहीं देती। 2019 के लोकसभा चुनाव की हार के बाद राहुल गाँधी द्वारा पार्टी अध्यक्ष पद छोड़ने के बाद  बने जी - 23 नामक समूह में श्री थरूर भी शामिल थे। इसके प्रमुख सदस्य गुलाम नबी आजाद और कपिल सिब्बल पार्टी छोड़ गए जबकि अनेक घर बैठने मजबूर हो गए। हालांकि डॉ. थरूर को 2024 में भी कांग्रेस ने टिकिट दी और वे जीते  किंतु बीते डेढ़ वर्ष में  समय - समय पर उनके जो बयान आये उनसे ये अटकलें लगाई जाने लगीं कि वे भी कांग्रेस को अलविदा कहने की तैयारी में हैं। ये भी सुनने में आया  कि वे केरल विधानसभा के आगामी चुनाव में पार्टी की ओर से मुख्यमंत्री का चेहरा बनने के इच्छुक हैं । चूंकि श्री गाँधी उन्हें भाव नहीं दे रहे इसलिए दबाव बनाने की रणनीति अपना रहे हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार के अलावा उनकी निजी प्रशंसा करने वाले उनके बयानों के बाद  अनुमान लगने लगा कि वे भी भाजपा में घुसने की फिराक में है। ऑपरेशन सिंदूर के बाद भारत का पक्ष रखने  जो सर्वदलीय प्रतिनिधिमंडल विभिन्न देशों को भेजे गए उनमें जो दल अमेरिका गया उसका नेतृत्व श्री थरूर को सौंपने पर कांग्रेस ने ऐतराज जताया था क्योंकि उसने अपने जिन सांसदों की सूची सरकार को प्रतिनिधिमंडलों  के लिए सौंपी उसमें श्री थरूर के अलावा वे नाम नहीं थे जिनका चयन सरकार ने किया।  विदेशी धरती पर श्री थरूर  द्वारा मोदी सरकार की नीतियों  की प्रशंसा भी पार्टी को रास नहीं आई क्योंकि श्री गाँधी ऑपरेशन सिंदूर को लेकर श्री मोदी पर तीखे हमले करते रहते हैं। उसके बाद से श्री थरूर और श्री गाँधी के बीच की दूरियाँ बढ़ती जा रही हैं। इसका ताजा प्रमाण उनका वह लेख है जिसमें श्री थरूर ने वंशवादी राजनीति  पर तीखे प्रहार करते हुए लिखा है कि दशकों से एक परिवार भारतीय राजनीति पर हावी रहा।भारतीय राजनीति एक पारिवारिक व्यवसाय शीर्षक वाले लेख में थरूर ने कहा कि नेहरू-गांधी परिवार (जिसमें स्वतंत्र भारत के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू, प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी और राजीव गांधी और वर्तमान विपक्षी नेता राहुल गांधी और सांसद प्रियंका गांधी वाड्रा शामिल हैं) भारत के स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास से जुड़ा हुआ है। लेकिन इसने इस विचार को भी पुख्ता किया है कि राजनीतिक नेतृत्व जन्मसिद्ध अधिकार हो सकता है। थरूर ने कहा, यह विचार भारतीय राजनीति में हर पार्टी, हर क्षेत्र और स्तर पर व्याप्त है। उन्होंने कांग्रेस के प्रथम परिवार के अलावा अब्दुल्ला, बादल, मुलायम, लालू, पासवान, ठाकरे, पटनायक, परिवारों का उल्लेख करते हुए ममता बैनर्जी और मायावती पर भी निशाना साधा जिन्होंने अपने भतीजे को उत्तराधिकारी बना दिया। अपनी बात स्पष्ट करते हुए उन्होंने लिखा कि समय आ गया है जब भारत वंशवाद की जगह योग्यतावाद को अपनाये।  हालांकि उन्होंने भारत के अलावा पड़ोसी देशों में भी वंशवाद  का उल्लेख करते हुए इसे लोकतंत्र के लिए खतरा बताया किंतु उनके लेख ने कांग्रेस में हलचल मचा दी ।  प्रमोद तिवारी, राशिद अल्वी और उदित राज आदि ने गाँधी परिवार का बचाव करते हुए  श्री थरूर के लेख की तीखी आलोचना की जिससे इतना तो स्पष्ट हो ही गया कि वे अपने मकसद में कामयाब हो गए और वंशवाद एक बार फिर राजनीतिक विमर्श में आ गया। सही बात तो ये है कि सन्दर्भित लेख की प्रशंसा होनी चाहिए जिसमें भारतीय राजनीति में व्याप्त  एक बड़ी बुराई की ओर लोगों का ध्यान आकर्षित किया गया है। यदि वे केवल कांग्रेस पर नेहरू - गाँधी परिवार के आधिपत्य का मुद्दा उठाते तब पार्टी नेताओं का उन पर हमलावर होना स्वाभाविक होता किंतु  लेख में तो तमाम राजनीतिक परिवारों का जिक्र है जिन्होंने पार्टी को पुश्तैनी जागीर बना लिया। परिवार के सभी सदस्य एक ही दल में रहे इसमें कुछ भी गलत नहीं। विभिन्न पार्टियों में ऐसा है भी किंतु नेतृत्व रूपी विरासत परिवार तक सीमित रखना नव सामंतवाद का प्रतीक है जिसका समर्थन दरबारी मानसिकता के लोग ही कर सकते हैं। हो सकता है कांग्रेस श्री थरूर पर अनुशासन का चाबुक चलाये किंतु उन्होंने जो लिखा वह पूरी तरह सही है। कांग्रेस इस बुराई को फैलाने लिए सबसे अधिक कसूरवार है क्योंकि उसी का अनुसरण करते हुए ही अन्य पार्टियों ने वंशवाद को आत्मसात किया। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

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