निशानेबाजी, मुक्केबाजी और बैंडमिंटन जैसे खेलों में वैश्विक स्तर पर अच्छा प्रदर्शन करने के बाद गत दिवस भारत की महिला क्रिकेट टीम ने विश्व कप मुकाबला जीतकर पूरे देश को आनंदित कर दिया। हालांकि इसके पूर्व भी दो बार हमारी टीम महिला क्रिकेट विश्व कप के अंतिम मुकाबले तक पहुंची किंतु जीत से वंचित रही। लेकिन इस बार पहले सेमी फाइनल और फिर अंतिम मुकाबले में इस टीम ने जो प्रदर्शन किया उसके बाद ये सिद्ध हो गया कि भारत में क्रिकेट की जड़ें काफी मज़बूत हो गई हैं। पुरुषों की टीम तो पहले भी कई बार विश्व कप जीत चुकी है किंतु लड़कियों ने पहली बार देश को गौरवान्वित किया है। पुरुषों की टीम के खिलाड़ियों को तो धन भी खूब मिलता है। उनकी लोकप्रियता फिल्मी सितारों को टक्कर देती है। सचिन तेंदुलकर तो क्रिकेट से सन्यास लेने के बाद भी राष्ट्रीय नायकों की श्रेणी में हैं जिन्हें आखिरी मैच खेलने वाले दिन ही भारत रत्न जैसा सर्वोच्च नागरिक सम्मान दिया गया। जबकि भारत को कई ओलंपिक स्वर्ण पदक दिलवाने वाले हॉकी के जादूगर कहे जाने वाले स्व. दादा ध्यानचंद को आज तक यह सम्मान नहीं मिला। यद्यपि लंबे समय तक क्रिकेट पर पुरुषों का एकाधिकार रहा लेकिन धीरे - धीरे अन्य खेलों की तरह लड़कियों के लिए भी इस खेल के दरवाजे खोले गए। शायद पूर्व में ये सोच रही होगी कि लड़कियों की शारीरिक क्षमता घंटों तक मैदान में डटे रहने लायक नहीं है किंतु ये अवधारणा भी समय के साथ गलत साबित होती गई। फिर सवाल भारत की लड़कियों के दमखम पर भी उठे किंतु हमारी क्रिकेट टीम ने विश्व कप जीतकर ये दिखा दिया कि आधी आबादी भी अब प्रत्येक क्षेत्र में पुरुषों के साथ बराबरी से चलने की योग्यता और क्षमता हासिल कर चुकी है। हाल ही में ऑपरेशन सिंदूर के दौरान पत्रकारों को जानकारी देने का दायित्व दो महिला सैन्य अधिकारियों को सौंपकर भारत ने पूरे विश्व को संदेश दे दिया कि हमारी नारी शक्ति अब चौके - चूल्हे तक ही सीमित न रहकर प्रत्येक क्षेत्र में अग्रणी भूमिका का निर्वहन करने तत्पर है। आज महिलाएं भी राष्ट्र निर्माण में अपना योगदान दे रही है। लड़ाकू और यात्री विमानों में वे पायलट की जिम्मेदारी संभाल रही हैं। बड़ी - बड़ी वित्तीय संस्थाओं का नेतृत्व उनके हाथ में हैं। विदेश और वित्त जैसे महत्वपूर्ण मंत्रालय में उनका प्रदर्शन उल्लेखनीय रहा है। राष्ट्रपति भवन में भी अनुसूचित जनजाति की महिला विराजमान है। ओलंपिक पदक विजेताओं में भी लड़कियों का नाम दर्ज हो चुका है। राजनीति, शिक्षा, प्रशासन आदि में वे पूरे आत्मविश्वास के साथ सक्रिय हैं। इन्हीं सबसे पूरी नारी शक्ति का हौसला बुलंद है। यही वजह है कि महिला विश्व कप क्रिकेट में भारतीय टीम के फाइनल में पहुँचने के बाद पूरा देश उनके जीतने की कामना करने लगा। वहीं मैच देखने के प्रति स्टेडियम जैसा ही उत्साह सर्वत्र दिखाई दिया। जैसे ही टीम को विजय हासिल हुई फटाके फूटने की आवाजों ने ये जता दिया कि खेल प्रेमियों के लिए लड़कियों की जीत भी उतनी ही महत्वपूर्ण है जितनी विराट कोहली और रोहित शर्मा जैसे सितारों से भरी टीम द्वारा अर्जित सफलता। ये हर्ष का विषय है कि खेलों में अब मध्यम और निम्नवर्गीय परिवारों के लड़के - लड़कियां भी बढ़ - चढ़कर अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन करने लगे हैं। कभी ओलंपिक में केवल हॉकी का पदक मिलने की ही उम्मीद होती थी किंतु बीते वर्षों में कुश्ती, मुक्केबाजी, बैडमिंटन, निशानेबाजी के अलावा भी अन्य खेलों में हमारे खिलाड़ियों ने पदक जीते। सरकार ने खेलो इंडिया कार्यक्रम के जरिये नवोदित प्रतिभाओं को उभरने का अवसर देने का जो बीड़ा उठाया वह स्वागत योग्य है। इसके अलावा देश भर में निजी क्षेत्र की खेल अकादमी बड़ी संख्या में खुलना और उनमें किशोरावस्था के लड़के - लड़कियों की उत्साहपूर्ण उपस्थिति इस बात का परिचायक है कि नई पीढ़ी में खेलों में भविष्य बनाने का आकर्षण बढ़ा है। ये भी अच्छी बात है कि खेल और खिलाड़ियों को निजी क्षेत्र द्वारा प्रायोजित किये जाने का चलन लगातार बढ़ रहा है जो पहले सरकार और सार्वजनिक क्षेत्र के उद्यमों तक ही सीमित था। महिलाओं का क्रिकेट विश्व कप जीतने वाली टीम की प्रत्येक सदस्य बधाई की पात्र है। उनकी इस सफलता से अन्य लड़कियों को भी खेलों के क्षेत्र में आगे बढ़ने की प्रेरणा मिलेगी इसमें संदेह नहीं है।
- रवीन्द्र वाजपेयी
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