Wednesday, 12 November 2025

उच्च शिक्षित मुस्लिमों का आतंकवाद से जुड़ाव नए खतरे का संकेत


दिल्ली में परसों हुए विस्फोट के बाद जो जानकारियां आ रही हैं उनके मुताबिक जितने भी लोग पकड़े गए उनका संबंध एक तो कश्मीर घाटी से है दूसरे वे हमेशा की तरह मुस्लिम समुदाय के हैं। लेकिन चौंकाने वाली बात ये है कि अब तक जो भी लोग पकड़े गए हैं उनमें से अधिकांश डॉक्टर हैं। फरीदाबाद में जिस डॉक्टर के यहाँ विस्फोटकों का जखीरा पकड़ा गया वह जिस शिक्षण संस्थान से जुड़ा था उसकी आड़ में आतंकवादी गतिविधियों की रूपरेखा बनाई जा रही थी। वह तो गनीमत रही कि खुफिया एजेंसियों ने समय रहते पर्दाफ़ाश कर दिया वरना न सिर्फ दिल्ली बल्कि देश के अन्य हिस्सों में भी बड़े पैमाने पर धमाके होते। जांच एजेंसियों से मिले संकेतों के अनुसार लखनऊ स्थित रा.स्व.संघ के कार्यालय को उड़ाने की योजना भी थी। लखनऊ में भी एक महिला मुस्लिम चिकित्सक को भी पकड़ा गया है। जिस प्रकार की पर्तें खुल रही हैं उससे स्पष्ट हो रहा है कि जितने भी मुस्लिम चिकित्सक पकड़े गए उनका संबंध पाकिस्तान के आतँकवादी संगठनों से है। ये बात भी विचारणीय है कि कश्मीर घाटी से निकले तमाम डाॅक्टर इस षडयंत्र में शामिल निकले। और यही सबसे चिंताजनक बात है कि इस्लाम के नाम पर आतंक का कारोबार अब बेरोजगार नौजवानों से आगे निकलकर सुशिक्षित वर्ग में भी फैल गया है। जिस स्तर के चिकित्सक इस कांड से जुड़े पाए गए उनके आतंकवाद में इतनी गहराई तक लिप्त होने से  मुस्लिम समुदाय की छवि पर नया संकट उत्पन्न हो गया है। अभी तक आम अवधारणा थी कि अशिक्षा के कारण जो धर्मांधता मुस्लिम समुदाय में है उसका लाभ उठाकर आतंकवादी संगठन अपना उद्देश्य पूरा करने में सफल होते रहे हैं। कश्मीर घाटी में पत्थरबाजी की जो घटनाएं होती थीं उनमें भी बेरोजगार नौजवान ही आगे - आगे दिखाई देते थे। समरणीय है  हुर्रियत काँफ्रेंस के नेता सैयद अली शाह जिलानी ने मुस्लिम समुदाय को पत्थरबाजी रूपी हथियार थमाया था। उसकी देखासीखी पूरे देश में इस समुदाय की छवि पत्थरबाज की बन गई। ये बात आम हो गई है कि जब भी कहीं सांप्रदायिक तनाव होता है तब मस्जिदों से पत्थर फेंकने के दृश्य दिखाई देते हैं। दिल्ली दंगों के दौरान भी मुस्लिम समाज के अनेक लोगों के घरों की छतों से पत्थर और ईंटों के अलावा अन्य घातक सामग्री जप्त हुई। जम्मू कश्मीर से धारा 370 हटाये जाने के बाद से घाटी के भीतर आतंकवादी गतिविधियों में कमी आने से पाकिस्तान भी परेशान हो उठा है। पहलगाम में हुए आतंकी हमले के बाद भारत द्वारा ऑपरेशन सिंदूर के माध्यम से जब आतंकवादियों के अड्डों को नष्ट करने की कारवाई की गई उसके बाद से ही वे भारत के विरुद्ध नए सिरे से व्यूह रचना बना रहे थे। लेकिन जिस तरह से मुस्लिम डाक्टरों का समूह आतंकवाद से जुड़ा मिला उससे लगता है कि इन लोगों का संबंध अरब देशों में सक्रिय इस्लामिक उग्रवादी संगठनों से भी हो सकता है। इस बारे में विचारणीय  ये है कि पश्चिम एशिया से भागकर मुस्लिम  शरणार्थी जबसे यूरोपीय देशों सहित अमेरिका और कैनेडा आदि में बसे तभी से वहाँ इस्लामिक उग्रवाद ने सिर उठा लिया। हाल ही में न्यूयॉर्क में हुए महापौर के चुनाव में ममदानी नामक मुस्लिम के जीतने के बाद अमेरिका में जिस तरह मुस्लिम उग्रवाद  सिर उठा रहा है उससे प्रोत्साहित होकर  अन्य  यूरोपीय देशों में भी मुस्लिम समुदाय बेहद आक्रामक हो उठा है। भारत में भी एक तबका है जो ममदानी  की जीत पर महज इसलिए जश्न मना रहा था क्योंकि वह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और इसराइल के प्रधानमंत्री नेतन्याहू का घोर विरोधी है। बड़ी बात नहीं ये तबका दिल्ली विस्फोट के सिलसिले में गिरफ्तार किये गए डॉक्टरों के बचाव में आगे आ जाए और देश के नामी वकील उनका बचाव करने सर्वोच्च न्यायालय में खड़े नजर आयें। इस कांड से एक बात साफ हो गई  कि इस्लामिक उग्रवाद में मुस्लिम समाज का वह वर्ग भी लिप्त हो चला है जिसे सुशिक्षित होने से समझदार और जिम्मेदार नागरिक माना जाता रहा है।  लालकिले के निकट हुए विस्फोट और थोक के भाव आतंकवादियों से जुड़े मुस्लिम डॉक्टरों के गिरफ्तार होने के बाद मुस्लिम धर्मगुरुओं और उनके संगठनों का शांत रहना भी सवाल खड़े करता है। केंद्र सरकार को चाहिए वह इस मामले की गहराई में जाकर देश को गृहयुद्ध में धकेलने के इस्लामिक षडयंत्र का पर्दाफ़ाश करे जिससे आंतरिक सुरक्षा के लिए खतरा उत्पन्न करने वालों के मंसूबे पूरे न हो सकें।


- रवीन्द्र वाजपेयी

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