आखिर लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गाँधी बिहार विधानसभा चुनाव में प्रचार के लिए उतर ही गए। हालांकि वोट अधिकार यात्रा के दौरान उन्होंने तेजस्वी यादव के साथ पूरे राज्य का दौरा कर महागठबंधन की एकता का संदेश दिया था। लेकिन फिर लंबी विदेश यात्रा पर रवाना हो गए जिसको लेकर राजनीतिक विश्लेषकों ने काफी टिप्पणियां भी कीं। प्रवास से लौटने के उपरांत भी वे बिहार से दूर रहे। जिससे चर्चा होने लगी कि उनके और तेजस्वी के बीच विवाद है। असल में कांग्रेस 2020 की तुलना में अधिक सीट चाहती थी किंतु उसका पिछला प्रदर्शन चूंकि निराशाजनक रहा इसलिए तेजस्वी उसे कम सीटें देना चाहते थे। किसी तरह वह मसला सुलझा किंतु उसके बाद भी श्री गाँधी बिहार नहीं आये तो महागठबंधन के टूटने तक की आशंका व्यक्त की जाने लगी और तब कांग्रेस नेता अशोक गहलोत ने पटना जाकर खाई पाटने का काम किया। उसी के बाद राहुल और प्रियंका वाड्रा के बिहार दौरे का कार्यक्रम भी घोषित हो गया। दरअसल जमीन और भर्ती घोटाले में लालू प्रसाद यादव और परिजनों पर आरोप पत्र तैयार करने का अदालती फैसला आने के बाद तेजस्वी को मुख्यमंत्री का चेहरा बनाये जाने के लिए श्री गाँधी हिचकिचा रहे थे। और इसीलिये उनसे मिलने के अलावा बिहार आने से भी बचते रहे। श्री गाँधी की चिंता लालू परिवार की भ्रष्ट छवि से कांग्रेस को होने वाले संभावित नुकसान को लेकर थी। लेकिन तेजस्वी अड़ गए कि उनको चेहरा बनाये बिना गाड़ी आगे नहीं बढ़ेगी तब जाकर कांग्रेस को झुकना पड़ा। जबकि वोट अधिकार यात्रा के दौरान श्री गाँधी समूचे परिदृश्य पर हावी बने रहे वहीं तेजस्वी उनके ड्राइवर की भूमिका में दिखे। उस दौरान राज्य में कांग्रेस के हालात सुधरने की उम्मीदें बढ़ने लगीं परंतु उस अनुकूल वातावरण को बनाये रखने के लिए जिस सक्रियता की जरूरत थी उसे नजरंदाज करते हुए श्री गाँधी लंबी विदेश यात्रा पर निकल गए । उनके इस रवैये ने कांग्रेस के हाथ से वह बढ़त छीन ली जो वोट अधिकार यात्रा से हासिल हुई थी। आज महागठबंधन यदि मुकाबले में है तो इसलिए क्योंकि तेजस्वी उसका चेहरा हैं। कांग्रेस। अभी भी उसकी कमजोर कड़ी है जो राष्ट्रीय पार्टी होने के बावजूद क्षेत्रीय दल जैसा प्रभाव छोड़ पाने में भी असफल है। ऊपर से श्री गाँधी के बयान रही - सही कसर भी पूरी किये दे रहे हैं। छठ पूजा के लिए यमुना नदी के पानी को स्वच्छ किये जाने का जो काम दिल्ली की भाजपा सरकार ने किया उसकी बिहार वासियों ने दिल खोलकर तारीफ की किंतु श्री गाँधी ने बिहार आकर उसके बारे में जो बातें कहीं और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर जिस तरह के कटाक्ष किये उसका उल्टा असर हो रहा है। इसी तरह उन्होंने मुकेश अंबानी के बेटे के विवाह समारोह में श्री मोदी के शामिल होने का मुद्दा छेड़कर तेजस्वी के पूरे परिवार को कठघरे में खड़ा कर दिया। उल्लेखनीय है उस विवाह में लालू प्रसाद यादव अपने पूरे परिवार सहित विशेष विमान से गए जो कि अंबानी परिवार द्वारा भेजा गया था। श्री गाँधी के उक्त बयान के बाद लालू परिवार के साथ ही कांग्रेस के तमाम नेताओं के चित्र सोशल मीडिया पर नजर आने लगे जिन्होंने उस विवाह में अंबानी परिवार की मेहमाननवाजी का लुत्फ़ उठाया था। चुनावी रैलियों में श्री गाँधी जिस प्रकार की बातें बोल रहे हैं उनके कारण महागठबंधन को फ़ायदा कम नुकसान ज्यादा होता लग रहा है। लालू प्रसाद यादव के शासनकाल को बिहार में जंगल राज के रूप में याद किया जाता है। इसीलिये तेजस्वी तक अपने पिता का चित्र अपनी पार्टी की प्रचार सामग्री में उपयोग करने से बच रहे हैं। हालांकि प्रशांत किशोर की जनसुराज पार्टी के कारण ये चुनाव त्रिकोणीय माना जाने लगा है। इसी वजह से भविष्यवाणी करने वाले बेहद सतर्क है किंतु ये सभी मान रहे हैं कि राहुल का मैदान में देर से उतरना और फिर अंबानी - अडानी जैसे पुराने पड़ चुके मुद्दों में ही उलझे रहने से कांग्रेस की संभावनाएं कमजोर हो रही हैं जिसका खामियाजा तेजस्वी को होगा। कांग्रेस के लिए गड्ढा खोदने में उसके अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे भी पीछे नहीं हैं जो बिना वजह राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर प्रतिबंध लगाने की मुहिम छेड़कर ऐसा मोर्चा खोल रहे हैं जिस पर कांग्रेस हमेशा से चारों खाने चित्त होती रही है। आज की स्थिति में जब पहले चरण के मतदान हेतु मात्र पाँच दिन रह गए हैं तब जो संकेत आ रहे हैं उनके मुताबिक यदि महागठबंधन जीतता है तो पूरा श्रेय तेजस्वी के खाते में दर्ज होगा और यदि हार नसीब हुई तब उसका ठीकरा कांग्रेस पर फूटेगा जिसकी कमान श्री गाँधी के हाथ में है।
- रवीन्द्र वाजपेयी
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