लोकसभा चुनाव के बाद कांग्रेस में जो उत्साह लौटा था वह बीते डेढ़ साल में ठंडा हो गया। इस दौरान जम्मू - कश्मीर , हरियाणा, झारखंड, महाराष्ट्र, दिल्ली और बिहार के विधानसभा चुनावों में उसका प्रदर्शन इतना निराशाजनक रहा कि इंडिया गठबंधन के घटक तक उससे कन्नी काटने लगे। जम्मू - कश्मीर के चुनाव में नेशनल काँफ्रेंस ने कांग्रेस को जम्मू अंचल में सीटें दी गईं ताकि वह हिन्दू बहुल क्षेत्रों में भाजपा को रोक सके किंतु राहुल गाँधी घाटी में प्रचार करते रहे जिस पर उमर अब्दुल्ला ने नाराजगी भी व्यक्त की। जम्मू में भाजपा को जबरदस्त सफलता मिली जबकि कांग्रेस कुछ खास नहीं कर सकी। उसी के साथ ही हरियाणा चुनाव में भी कांग्रेस का प्रदर्शन दयनीय रहा। सपा और आम आदमी पार्टी उससे सीटें मांगते रहे किंतु वह अकेले लड़कर औंधे मुँह गिरी। उस पर सपा के अलावा उद्धव ठाकरे वाली शिवसेना ने भी राहुल गाँधी की नेतृत्व क्षमता पर सवाल उठाये। हालांकि महाराष्ट्र और झारखंड के चुनाव में कांग्रेस के लिए अपनी साख बचाने का मौका था। झारखंड में तो हेमंत सोरेन भाजपा को रोकने में सफल रहे किंतु महाराष्ट्र में विपक्ष को जबरदस्त पराजय मिली जहाँ लोकसभा चुनाव में एनडीए को बड़ा धक्का लगा था । 48 में से 30 सीटें विपक्ष ले गया जिनमें कांग्रेस को 13 मिलीं जबकि 2019 में वह 1 पर सिमट गई थी। लेकिन विधानसभा चुनाव में महायुति सरकार भारी बहुमत से लौटी। भाजपा तो अकेले ही बहुमत के बेहद नजदीक पहुँच गई । वहीं कांग्रेस ने अब तक का सबसे खराब प्रदर्शन किया और महज 16 विधायकों तक सीमित होकर रह गई। उद्धव ठाकरे तक उससे अधिक सीटें ले आये। महाराष्ट्र के चुनाव ने लोकसभा चुनाव के बाद बने माहौल को पूरी तरह उलट दिया। हालांकि इसकी शुरुआत हरियाणा से हो चुकी थी। इन नतीजों से कांग्रेस और राहुल गाँधी की साख और धाक दोनों को काफी नुकसान पहुंचा जिससे इंडिया गठबंधन में उनका दबदबा कमजोर पड़ गया। कुछ महीनों बाद दिल्ली विधानसभा के चुनाव आ गए जहाँ पिछले दो चुनावों में कांग्रेस शून्य पर ही अटकी रही। हालांकि लोकसभा में उसने आम आदमी पार्टी के साथ गठबंधन किया किंतु भाजपा सभी 7 सीटें जीत गई। इसके बाद से ही दोनों में दूरियाँ बढ़ीं क्योंकि पंजाब में कांग्रेस ने आम आदमी पार्टी को नुकसान पहुंचाया जिसका बदला उसने हरियाणा विधानसभा चुनाव में कांग्रेस की जड़ों में मठा डालकर ले लिया। इसीलिए दिल्ली में दोनों एक दूसरे के विरुद्ध उतरे। लेकिन इंडिया गठबंधन के दो प्रमुख सदस्य ममता बैनर्जी और अखिलेश यादव ने कांग्रेस के बजाय आम आदमी पार्टी का समर्थन कर राहुल गाँधी को नजरंदाज कर दिया। हरियाणा और महाराष्ट्र की हार से बौखलाए श्री गाँधी ने दिल्ली में खुद मैदान संभाला और मुस्लिम क्षेत्रों से प्रचार की शुरूआत की। लेकिन यहाँ भी वे बुरी तरह असफल रहे और कांग्रेस लगातार तीसरी मर्तबा शून्य से आगे नहीं बढ़ सकी। वहीं भाजपा ने हरियाणा और महाराष्ट्र के बाद दिल्ली में भी धमाकेदार जीत दर्ज की। भाजपा के लिए यह जीत हौसला बढ़ाने वाली साबित हुई वहीं आम आदमी पार्टी की महत्वाकांक्षाओं को इससे बड़ा धक्का लगा किंतु कांग्रेस तो मुँह दिखाने लायक नहीं बची। होना तो ये चाहिए था कि इंडिया गठबंधन की बैठक बुलाकर भाजपा का विजय रथ रोकने की रणनीति बनाई जाती किंतु राहुल लग गए वोट चोरी का ढोल बजाने में । उन्हें लगता था कि चुनाव आयोग को घेरकर वे बिहार विधानसभा चुनाव में लोकसभा जैसा करिश्मा कर ले जाएंगे किंतु उनकी अपरिपक्वता ने वहाँ भी कांग्रेस को तो डुबोया ही तेजस्वी यादव का भविष्य भी मटियामेट कर दिया। कांग्रेस दहाई के आंकड़े तक नहीं पहुँच सकी। दरअसल कांग्रेस की इस दुरावस्था के लिए श्री गाँधी की पार्ट टाइम राजनीतिक शैली जिम्मेदार है। अपने नेतृत्व में कांग्रेस की हार का कीर्तिमान स्थापित करने के बाद भी वे गलतियों को दोहराने पर आमादा हैं। पार्टी संगठन दिन ब दिन कमजोर होता जा रहा है। पार्टी अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे अपना राज्य कर्नाटक ही नहीं संभाल पा रहे जहाँ कांग्रेस सरकार अपने अंतर्विरोधों के कारण खतरे में है। अगले वर्ष होने वाले 5 राज्यों के विधानसभा चुनाव की रणनीति बनाना तो दूर पार्टी पिछली पराजयों के कारण तक नहीं ढूंढ़ सकी। यही हाल रहा तो अगले साल भी कांग्रेस शर्मिंदगी झेलने मजबूर रहेगी। जहाँ तक बात राहुल की है तो उनका क्या , जब मर्जी विदेश चले जाएंगे।
- रवीन्द्र वाजपेयी
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