Wednesday, 5 November 2025

राहुल को सत्ता में रहते दलित, आदिवासी और पिछड़ों की याद नहीं आई

राहुल गाँधी लंबे समय से आरक्षण का प्रतिशत बढ़ाये जाने की बात कर रहे हैं। जिसकी जितनी भागीदारी, उसकी उतनी हिस्सेदारी जैसे नारे के जरिये वे ये प्रचारित करने में जुटे हैं कि दलित, आदिवासी और पिछड़ी जातियों को उनकी संख्या के अनुसार नौकरियों और उच्च शिक्षा में समुचित प्रतिनिधित्व नहीं मिला। कभी वे  नौकरशाही में उक्त वर्ग की कम संख्या का बखान करते हैं तो कभी समाचार माध्यमों में भी सवर्ण जातियों के बाहुल्य की। इसी क्रम में वे सौंदर्य प्रतियोगिताओं तक में दलित और आदिवासी का चयन नहीं होने जैसी हास्यास्पद बात भी उठा चुके हैं। बजट पर भाषण देते हुए लोकसभा में वे इस बात को उठाते रहे कि उसे बनाने वाले अधिकारियों के दल में दलित और आदिवासी नहीं थे। जातिगत जनगणना के भी वे प्रबल पक्षधर हैं।  हालांकि उनकी पार्टी ने पाँच दशक तक देश पर राज करने के बाद भी उनकी संख्या के आधार पर दलित, आदिवासी और पिछड़ी जातियों को नौकरियों सहित अन्य अवसरों से क्यों वंचित रखा , पहले  इसका उत्तर उन्हें देना चाहिए। उल्लेखनीय है  दलित और आदिवासियों के आरक्षण का प्रावधान तो संविधान निर्माताओं ने ही कर दिया था किंतु पिछड़ी जातियों के बारे में पंडित नेहरू से लेकर इंदिरा जी तक की सरकार ने कभी नहीं सोचा। जबकि डॉ. लोहिया शुरू से  ही पिछड़ा पावे सौ में साठ का नारा बुलंद करते रहे। पिछड़ी जातियों को आरक्षण का रास्ता भी जिस मंडल आयोग की सिफारिशों से  साफ हुआ उसका गठन भी 1979 में जनता पार्टी  सरकार ने किया था। 1980 में श्रीमती गाँधी फिर सत्ता में आईं और 1984 में राजीव गाँधी ऐतिहासिक सफलता के साथ प्रधानमंत्री बने और 1989 तक रहे। मंडल आयोग की रिपोर्ट 1980 में ही आ चुकी थी किंतु उसकी सिफारिशों के अनुसार अन्य पिछड़ी जातियों को नौकरियों और उच्च शिक्षा के लिए  27 फीसदी आरक्षण देने की कोई कोशिश न इंदिरा जी ने की और न ही राजीव ने। 1990 में विश्वनाथ प्रताप सिंह की सरकार ने उक्त रिपोर्ट को लागू किया था। ऐसे में राहुल को ये भी स्पष्ट करना चाहिए कि 1980 में आई मंडल आयोग की रिपोर्ट को 1989 तक कांग्रेस की केंद्र सरकार क्यों दबाये बैठी रही ? ज़ाहिर है  दलित, आदिवासी और पिछड़ी जातियों के प्रति उनके मन में अचानक उमड़े प्रेम के पीछे कांग्रेस के खिसकते जनाधार को पुनः कायम करना है । कुछ वर्ष पूर्व तक वे खुद को जनेऊधारी ब्राह्मण प्रचारित करते रहे। मंदिरों और मठों में जाकर पूजा - अर्चना भी की किंतु   सवर्ण जातियों पर उसका कोई असर नहीं होने पर वे दलित, आदिवासी और पिछड़ी जातियों के मसीहा  बनने का प्रयास करने लगे। इस बारे में वे जो तर्क देते हैं उनका कोई असर इन वर्गों पर पड़ता नहीं दिखता क्योंकि उन जातियों में पहले से ही अनेक स्थापित नेता हैं। लेकिन वोटों की लालच में अब वे सेना को भी इस खतरनाक खेल में घसीट रहे हैं जो देश के लिए बहुत घातक है। सेना में जातीय के अलावा मुस्लिमों के लिए आरक्षण की मांग मुलायम सिंह यादव ने भी उठाई थी किंतु उसे समर्थन नहीं मिला। 2004 से 2014 तक केंद्र में डाॅ. मनमोहन सिंह की सरकार रही जिसकी लगाम श्री गाँधी और उनकी माताजी सोनिया गाँधी के हाथ में रही। सरकार में न रहते हुए भी राहुल उसके द्वारा जारी अध्यादेश पत्रकारों के सामने फाड़ने की जुर्रत कर जाते और  प्रधानमंत्री उनके सामने लाचार बने रहते। आज वे दलित, आदिवासी और पिछड़ी जातियों को उनकी संख्या के आधार पर नौकरियों और उच्च शिक्षा में आरक्षण दिलवाने संविधान संशोधन तक की जो डींग हाँक  रहे हैं वह उन 10 वर्षों में उन्हें याद नहीं आई। और यदि वह सरकार सत्ता में बनी रहती तब शायद अभी भी वे इस बारे में न सोचते और न ही  बोलते। आरक्षण निश्चित रूप से सामाजिक परिवर्तन और समतामूलक समाज की स्थापना के लिए महत्वपूर्ण है किंतु सेना जैसे विभाग में इसकी मांग करना देश हित  की बलि चढ़ाने जैसा है। भारतीय सेना में जाति और धर्म के आधार पर भेदभाव की बात नहीं सुनाई दी। सभी धर्मों के लोग सेना प्रमुख के पद तक पहुंचे हैं। निचले स्तर पर भी पूरी तरह से सद्भाव बना हुआ है। ऐसे में ये कहना कि केवल 10 प्रतिशत उसे चला रहे हैं सेना के ढांचे को कमजोर करने का प्रयास है। श्री गाँधी को ये नहीं भूलना चाहिए कि वे एक राष्ट्रीय पार्टी के नेता होने के कारण नेता प्रतिपक्ष बने हैं। उनके द्वारा इस तरह की बातें करने से कांग्रेस की भी मुसीबतें बढ़ती हैं। अपने राजनीतिक स्वार्थ के लिए देश की सुरक्षा करने वाली संस्था में जाति के बीज बोना बेहद गैर जिम्मेदार सोच का परिचायक है।


- रवीन्द्र वाजपेयी

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