Wednesday, 26 November 2025

ट्रम्प का शांति प्रस्ताव अमेरिका के दोगलेपन का परिचायक



डोनाल्ड ट्रम्प का दावा है कि  वे  अनेक युद्ध रुकवा चुके हैं। हालांकि उनकी बातों को कोई गंभीरता से नहीं लेता क्योंकि शांति स्थापना के उनके प्रयास धमकी भरे होते हैं। आर्थिक प्रतिबंध थोपकर वे पूरी दुनिया को अपनी मर्जी से हाँकना चाहते हैं । उनकी ताजा मुहिम यूक्रेन और रूस के बीच  युद्ध को रोकने की है। वैसे तो इसकी शुरुआत फरवरी  2022 में हुई किंतु रूस द्वारा 2014 में क्रीमिया नामक यूक्रेनी बंदरगाह पर बलात कब्जा करने के बाद से ही दोनों के बीच तनाव बना हुआ था। इस लड़ाई में कसूर किसका है ये तय कर पाना कठिन है क्योंकि एक तरफ तो रूसी राष्ट्रपति पुतिन की विस्तारवादी सोच है दूसरी ओर यूक्रेनी राष्ट्रपति जेलेंस्की की कूटनीतिक अपरिपक्वता ने स्थिति को इतना बिगाड़ दिया। दरअसल रूस द्वारा  क्रीमिया पर कब्जा करने का वैसा विरोध नहीं हुआ जैसा जरूरी था। वैसे रूस ये दुस्साहस कभी नहीं करता यदि सोवियत संघ से आजाद होने के बाद 1996 में यूक्रेन ने अपने सभी परमाणु हथियार रूस को न सौंपे होते जिसके बदले उसे आर्थिक मुआवजे के अलावा सुरक्षा का आश्वासन भी मिला। बाद में वह परमाणु अप्रसार संधि में भी शामिल हो गया। लेकिन क्रीमिया पर रूस  के कब्जे  बाद उसे अपनी सुरक्षा की चिंता सताने लगी और तब उसने अमेरिकी प्रभुत्व वाले नाटो नामक संगठन की सदस्यता के लिए कदम बढ़ाये। ऐसा होने पर अमेरिकी फ़ौजें तथा मिसाइलें यूक्रेन - रूस सीमा पर तैनात हो जातीं। पुतिन को ये किसी भी कीमत पर स्वीकार नहीं था। उधर क्रीमिया हाथ से निकलने के बाद यूक्रेन कोई खतरा उठाने से बच रहा था । उसकी चिंता तब और बढ़ गई जब रूस ने उसके कुछ सीमावर्ती राज्यों पर दावा किया जहाँ रूसी भाषी लोग रहते हैं। इसके पहले कि  उसे नाटो की सदस्यता हासिल होती पुतिन ने अपनी फ़ौजें यूक्रेन में प्रविष्ट करवा दीं। हालांकि तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन के अलावा यूरोप के तमाम देशों ने यूक्रेन को आर्थिक और सामरिक सहायता देकर मुकाबले में तो खड़ा कर दिया किंतु रूस जैसी महाशक्ति से उधार के पैसे और खैरात के हथियारों से  जीत पाना लगभग असंभव था और वही हुआ। बीते 45 महीनों  में यूक्रेन ने बेशक बहादुरी दिखाई और बीच - बीच में रूस पर घातक हमले कर काफी नुकसान भी पहुंचाया किंतु रूस ने जो कहर बरपाया उसने यूक्रेन को तबाह कर दिया।  आज यदि युद्ध रुक  जाए तब भी इस खूबसूरत देश को पुरानी स्थिति में लौटने में कई दशक लग जाएंगे। लेकिन इससे भी बड़ा सवाल ये है कि उसके लिए आर्थिक संसाधन कहां से आयेंगे ? हालांकि जंग रोकना जितना यूक्रेन के लिए जरूरी है उतना  रूस के लिए भी क्योंकि ट्रम्प द्वारा उसके  साथ व्यापार करने वाले भारत और चीन जैसे देशों पर भी अनाप - शनाप टैरिफ थोप दिये गए । इस लड़ाई से वैश्विक अर्थव्यवस्था अनिश्चितता में फंस गई है। वहीं कूटनीतिक मोर्चे पर भी शीत युद्ध वाला माहौल नजर आने लगा जिससे कई मर्तबा विश्व युद्ध  के आसार भी नजर आये। लेकिन ट्रम्प ने जो ताजा शांति प्रस्ताव रखा है उसे यूक्रेन यदि स्वीकार कर लेता है तब वह हर दृष्टि से नुकसान में रहेगा। रूस द्वारा कब्जाई अपनी 20 फीसदी भूमि उसे सौंपने के साथ ही क्रीमिया पर उसके आधिपत्य को मान्यता देने के लिए सहमत होना जेलेंस्की क्या किसी के लिए भी जहर का घूँट पीने जैसा होगा। इसके अलावा सेना की सीमित संख्या, लंबी दूरी तक मार करने वाले अस्त्रों पर प्रतिबंध, नाटो की सदस्यता लेने पर रोक सहित जो प्रावधान ट्रम्प के शांति प्रस्ताव में हैं उन्हें सतही तौर पर देखने पर तो लगता है जैसे उनका प्रारूप उन्होंने पुतिन के साथ बैठकर बनाया हो। ट्रम्प जिस तरह जेलेंस्की पर उक्त शर्तों को स्वीकार करने का दबाव बना रहे हैं वह भी अजीबोगरीब है क्योंकि ऐसी बातें बैठकर तय होती हैं। यूक्रेनी राष्ट्रपति शुरू से कहते आ रहे हैं कि अमेरिका उन्हें और पुतिन को आमने - सामने बिठाये।  ट्रम्प शांति को जिस तरह थोपना चाह रहे हैं उससे यूरोपीय देशों में भी हड़कंप है। उन्हें चिंता है यूक्रेन का बड़ा हिस्सा हड़पने में सफल होने के बाद पुतिन अन्य पड़ोसी देशों के साथ भी वैसा ही व्यवहार करेंगे। इसीलिए ज्यादातर यूरोपीय देश इस शांति प्रस्ताव के विरोध में खड़े होकर यूक्रेन को हरसंभव सहायता देते रहने का आश्वासन दे रहे हैं। चौंकाने वाली बात ये भी है कि ट्रम्प की इस पहल पर रूस ने किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया अब तक नहीं दी। इससे लगता है अमेरिकी राष्ट्रपति जबरन श्रेय लूटने में लगे हैं। सही बात तो ये है कि यूक्रेन की दयनीय और जेलेंस्की की हास्यास्पद स्थिति बनाने में सबसे अधिक कसूर अमेरिका का ही है जिसने यूक्रेन को पहले तो रूस से भिड़ने के लिए उकसा दिया और जब वह बुरी तरह फंस गया तब बजाय सहारा देने के उसे दुत्कारने लगा। उसके इस आचरण पर उसके पूर्व विदेशमंत्री हेनरी किसिंजर का ये कथन सटीक बैठता है कि अमेरिका का दुश्मन होना खतरनाक हो सकता है, लेकिन उसका दोस्त होना घातक है।

- रवीन्द्र वाजपेयी


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