Tuesday, 18 November 2025

बांग्लादेश के मामले में सावधानी से कदम उठाने की जरूरत


बांग्लादेश की पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना को गत दिवस फांसी की सजा सुनाई गई। ढाका की इंटरनेशनल क्राइम्स ट्रिब्यूनल ने उन्हें हत्या के लिए उकसाने और हत्या का आदेश देने के लिए दोषी मानते हुए जुलाई 2024 के छात्र आंदोलन के दौरान हुई हत्याओं का जिम्मेदार बताया। उनके साथ ही पूर्व गृह मंत्री असदुज्जमान खान को भी मृत्युदंड दिया। बांग्लादेश के अंतरिम शासक मो. यूनुस ने भारत से हसीना को  सौंपने करने की मांग की है। उल्लेखनीय है गत वर्ष हुए  तख्तापलट के बाद हसीना और असदुज्जमान  देश छोड़कर भारत आ गए थे। बांग्लादेश का कहना है कि दोनों देशों के बीच प्रत्यर्पण संधि के मुताबिक भारत को चाहिए कि वह हसीना को उसके हवाले करे। हालाँकि सं. रा. संघ के महासचिव ने उक्त फैसले को गलत बताया है। मानवाधिकार से जुड़ी अनेक हस्तियों ने भी मृत्युदण्ड दिये जाने के फैसले को प्राकृतिक न्याय के विरुद्ध बताया क्योंकि  हसीना को अपना पक्ष रखने का अवसर दिये बिना उन पर लगे आरोप सही मानकर फांसी की सजा का ऐलान कर दिया गया। हालाँकि इस निर्णय से किसी को आश्चर्य नहीं हुआ क्योंकि पाकिस्तान की तरह से ही बांग्लादेश में अपने राजनीतिक विरोधी को खत्म करने की परिपाटी रही है। बांग्लादेश के राष्ट्रपिता कहे जाने वाले शेख मुजीबुर्रहमान की 1975 में उनके सरकारी आवास में घुसकर सपरिवार हत्या कर दी गई थी। उनकी पुत्री हसीना उस समय विदेश में होने से बच गईं और बाद में प्रधानमंत्री भी बनीं। उनके पहले वाली सरकार  भारत विरोधी नीति पर चलती रही। हसीना के शासनकाल में दोनों देशों के रिश्तों में काफी सुधार हुआ जिसके कारण अनेक विवादित मुद्दे हल हो गए और आपसी व्यापार भी बढ़ा। लेकिन वे भारत विरोधी ताकतों को नियंत्रित नहीं कर सकीं  जो वहाँ रह रहे हिंदुओं पर अत्याचार और उनके धर्मस्थलों को नष्ट करते रहते हैं। हसीना के विरोध में हुए छात्र आंदोलन के पीछे अमेरिका और चीन दोनों की भूमिका रही क्योंकि वे इस देश का उपयोग भारत को घेरने के लिए करना चाहते हैं। तख्ता पलट के कारण जब हसीना भारत आईं तब मोदी सरकार ने  ये सोचकर उन्हें यहाँ रहने की अनुमति दे दी कि जल्द ही वे किसी अन्य देश में राजनीतिक शरण  ले लेंगी किंतु अमेरिका के दबाव में ऐसा नहीं हो सका और लगभग 15 माह से वे यहीं रह रही हैं। बांग्लादेश ने कई बार भारत से हसीना को लौटाने की मांग कि जिसे सरकार ने स्वीकार नहीं किया। यद्यपि दोनों देशों के बीच कूटनीतिक रिश्ते कायम हैं किंतु भारत ने अपनी मित्र को संकट में अकेला छोड़ना उचित नहीं समझा। लेकिन अब जबकि हसीना को फांसी की सजा सुना दी गई है तब  यह मामला काफी पेचीदा हो गया है। बांग्लादेश इसे वैश्विक मंचों पर उठायेगा जहाँ उसे चीन और पाकिस्तान का समर्थन तो मिलेगा ही , बड़ी बात नहीं अमेरिका भी साथ खड़ा हो जाए जिसकी नजर उसके एक द्वीप पर है। ऐसे में भारत को बाहरी दबाव  झेलने पड़ सकते हैं। हालाँकि बांग्लादेश में भारत विरोधी सरकार है जो हिंदुओं का दमन करने पर आमादा मुस्लिम कट्टरपंथियों को खुलकर संरक्षण दे रही है किंतु हसीना पर अदालत के फैसले के पहले उनके समर्थक भी सड़कों पर उतरे जिसके चलते फैसले की तारीख टालनी पड़ी। जिन छात्र संगठनों ने हसीना को सत्ता से हटाने के लिए देशव्यापी आंदोलन  किये वे भी नये  चुनाव की मांग लेकर आंदोलनरत हैं। मो. युनुस यद्यपि जल्द चुनाव करवाने का आश्वासन देते रहे किंतु इस दिशा में कोई तैयारी दिखाई नहीं देने से असंतोष बढ़ रहा है। हसीना की गैर मौजूदगी में यदि चुनाव हुए भी तो सत्ता किसके हाथ जाएगी ये कहना कठिन है। हसीना  के शासनकाल में जेल में रहीं पूर्व प्रधानमंत्री बेगम खालिदा जिया की पार्टी बीएनपी भले ही मुख्य दावेदार हो किंतु छात्र नेताओं की उम्मीदें भी आसमान छू रही हैं। ऐसे में बांग्लादेश आंतरिक अशांति में फंसा रहेगा। एक आशंका ये भी है कि मौके का लाभ उठाकर फौजी जनरल सत्ता हथिया लें जैसा शेख मुजीब की हत्या के बाद हुआ था। खालिदा के पति जनरल जिया उर रहमान भी राष्ट्रपति रहे। कुल मिलाकर बांग्लादेश एक बार फिर आंतरिक तौर पर अस्थिरता और अशांति से गुजर रहा है। मो. युनुस चूंकि अमेरिका द्वारा लादे गए हैं इसलिए उनकी जनता पर पकड़ नहीं है। और वामपंथी होने से उन्हें चीन की मिजाजपुर्सी भी करनी पड़ रही है। हसीना को नहीं लौटाने के निर्णय पर भारत यदि अडिग रहा तब दोनों देशों के बीच तनाव और बढ़ सकता है। ये देखते हुए भारत को बेहद सावधानी से कदम उठाना चाहिए क्योंकि बांग्लादेश को हमारे पड़ोस में बैठे शत्रु देशों का समर्थन है। हाल ही में पाकिस्तान के अनेक आतंकी सरगना भी  भारत विरोधी गतिविधियों की तैयारी करने बांग्लादेश गए थे। आने वाले दिन बांग्लादेश के लिए उथलपुथल भरे होंगे। पड़ोसी के यहाँ लगी आग से हमारा घर न झुलसे इसकी सावधानी भारत को रखनी होगी। 


- रवीन्द्र वाजपेयी


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