कांग्रेस देश की सबसे पुरानी राजनीतिक पार्टी है। आजादी के बाद तीन दशक तक वह केन्द्र में सत्तारूढ़ रही। उसके बाद भी उसके नेतृत्व में सरकारें बनती रहीं। हालांकि 1984 के चुनाव के बाद उसे स्पष्ट बहुमत नहीं मिला किंतु अन्य दलों के सहयोग से पहले पी. वी. नरसिम्हा राव और फिर डाॅ. मनमोहन सिंह के नेतृत्व में उसकी सरकार चली। बीच - बीच में कांग्रेस ने चंद्रशेखर, एच. डी. देवगौड़ा और इंदर कुमार गुजराल को भी प्रधानमंत्री बनवाया किंतु फिर बहाना बनाकर उन्हें हटवा भी दिया। लेकिन 2014 में नरेंद्र मोदी के राष्ट्रीय राजनीति में कदम रखने से कांग्रेस को जबरदस्त झटका लगा। 1977 में भी कांग्रेस उत्तर भारत में सफाये के बाद भी दक्षिण में लोकसभा की 154 सीटें जीत गई किंतु 2014 में तो 44 पर सिमट गई। वहीं 2019 में बमुश्किल 50 का आंकड़ा पार कर पाई। हालांकि 2024 में 99 सांसद जीतने के कारण राहुल गाँधी लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष बन गए। यद्यपि ये उतना महत्वपूर्ण नहीं था जितना ये कि भाजपा 300 से उतरकर 240 पर आ गई जिससे नरेंद्र मोदी को नीतीश कुमार और चंद्रा बाबू नायडू रूपी बैसाखियों का सहारा लेना पड़ा । बहरहाल जैसे - तैसे मोदी सरकार बन तो गई किंतु राहुल के आक्रामक तेवरों से ऐसा लगने लगा जैसे वे इस सरकार को जल्द गिरवाने में सफल हो जाएंगे। नीतीश और नायडू के भी इधर - उधर होने की आशंका हर समय राजनीतिक माहौल में तैरती रही। लोकसभा चुनाव के झटके के बाद भाजपा की चिंता बढ़ गई क्योंकि कुछ महीनों बाद हरियाणा, जम्मू - कश्मीर और उसके बाद महाराष्ट्र और झारखंड तथा 2025 में दिल्ली और बिहार के विधानसभा चुनाव रूपी चुनौती सामने थी। जम्मू - कश्मीर में 370 हटने के बाद विधानसभा का पहला चुनाव निश्चित तौर पर अग्निपरीक्षा थी। वहीं हरियाणा, झारखंड और महाराष्ट्र में लोकसभा चुनाव का खराब प्रदर्शन प्रधानमंत्री और उनके चाणक्य कहे जाने वाले अमित शाह की परेशानी बढ़ाने वाला था। दिल्ली में भाजपा को अरविंद केजरीवाल से दो विधानसभा चुनाव बुरी तरह हार चुकी थी जबकि बिहार में नीतीश उसके लिए अबूझ पहेली बने हुए थे। दूसरी तरफ कांग्रेस सतही तौर पर भारी नजर आ रही थी। राहुल के अलावा इंडिया गठबंधन में शामिल अन्य दल भी उत्साह से भरे हुए थे। इस सबसे लगता था कांग्रेस के अच्छे दिन ज्यादा दूर नहीं हैं और श्री मोदी के विकल्प स्वरूप श्री गाँधी की स्वीकार्यता उठान पर है। लेकिन उक्त सभी राज्यों के विधानसभा चुनाव के बाद राजनीतिक स्थिति का आकलन करें तो भाजपा जहाँ लोकसभा चुनाव के बाद उत्पन्न हताशा से उबरकर विजय रथ पर सवार है वहीं कांग्रेस की साख और धाक लगातार गिरती गई। बिहार में मिली शर्मनाक पराजय के बाद तो ऐसा लगने लगा है मानो कांग्रेस सोचने समझने की शक्ति ही खो चुकी है। इसका प्रमाण कर्नाटक की उसकी सरकार में चल रहा अंतर्द्वंद है। मुख्यमंत्री सिद्धारमैया के विरुद्ध उपमुख्यमंत्री डी. शिवकुमार सहित गृहमंत्री खुलकर मैदान में हैं। पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे इसी राज्य से होने के बाद भी ये कहकर अपनी दयनीय स्थिति उजागर कर रहे हैं कि नेतृत्व का विवाद श्री गाँधी की उपस्थिति में सुलझाया जाएगा। लेकिन सवाल ये है कि इतने गम्भीर मसले पर पार्टी नेतृत्व द्वारा निर्णय करने में देर क्यों लगाई जा रही है ? ऐसी ही देरी पार्टी ने राजस्थान में अशोक गहलोत और सचिन पायलट के बीच चल रहे झगड़े को निपटाने में लगाई थी जिसका दुष्परिणाम सामने है।? उसके पहले पंजाब में नवजोत सिंह सिद्धू और कैप्टन अमरिंदर सिंह की रस्साकाशी को समय पर नहीं रोकने के कारण राज्य में कांग्रेस की सत्ता और संगठन दोनों का नुकसान हुआ। और आम आदमी पार्टी के पैर जम गए। आगामी वर्ष भी पाँच राज्यों में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं। भाजपा ने जहाँ बिहार से फुर्सत होते ही नये मुकाबलों के लिए अपनी तैयारी शुरू कर दी है जबकि कांग्रेस अभी तक पराजय के जमीनी कारणों का पता करने के बजाय वोट चोरी के आरोप से ही चिपकी हुई है। सोनिया गाँधी अस्वस्थ होने की वजह से सक्रिय नहीं हैं। वहीं महासचिव होने के बाद भी प्रियंका वाड्रा की भूमिका समझ से परे है। कभी - कभी लगता है बीते डेढ़ साल में हुए विधानसभा चुनावों में कांग्रेस के दयनीय प्रदर्शन ने उनका उत्साह ठंडा कर दिया है। राजनीति पर पैनी नजर रखने वाले विश्लेषकों की मानें तो कांग्रेस के भीतर गाँधी परिवार के विरुद्ध जो असंतोष धधक रहा है वह ज्वालमुखी की तरह कभी भी फूट सकता है। प्रधानमंत्री ने बिहार चुनाव परिणाम के बाद भाजपा मुख्यालय में आयोजित समारोह में कांग्रेस के विभाजन का जो संकेत दिया वह चौंकाने वाला था किंतु दो सप्ताह बाद के हालात उसी दिशा में बढ़ते दिख रहे हैं। सही बात ये है कि आज कांग्रेस नीति और नेतृत्व दोनों ही दृष्टि से बेहद कमजोर नजर आ रही है। यदि यही स्थिति जारी रही तो आने वाले चुनावी मुकाबलों में भी पराजय उसका पीछा नहीं छोड़ेगी ।
- रवीन्द्र वाजपेयी
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