Saturday, 8 November 2025

सर्वोच्च न्यायालय के फैसले मात्र से आवारा पशुओं की समस्या हल नहीं होगी



इसे मजाक कहें या विडंबना कि आवारा कुत्तों के आतंक से लोगों को बचाने के लिए सर्वोच्च न्यायालय को आदेश पारित करना पड़ा।  इसमें विद्यालयों  , अस्पतालों, बस अड्डों और रेलवे स्टेशनों के पास मंडराते कुत्तों की नसबंदी करने के बाद उनको वापस उन्हीं स्थानों पर छोड़ने की बजाय उनके लिए बनाये गए आश्रय स्थल पर रखने का निर्देश दिया  गया है। राजस्थान उच्च न्यायालय के तत्संबंधी निर्णय को बरकरार रखते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को आवारा कुत्तों को हटाये जाने के अलावा राष्ट्रीय राजमार्गों एवं एक्सप्रेस हाइवे पर बैठे रहने वाले पशुओं को हटाये जाने के पुख्ता और स्थायी इंतजाम करने का निर्देश भी दिया है। उक्त फैसले में सभी राज्यों को कहा गया है कि वे उन सभी निजी और सरकारी संस्थानों का पता करें जहाँ आवारा कुत्ते जमा होते हैं। इस अभियान के लिए आठ हफ्ते का समय भी दिया गया। कुछ समय पहले दिल्ली में इस समस्या को लेकर जब सर्वोच्च न्यायालय ने आदेश पारित किया तब मेनका गाँधी सहित अनेक पशु प्रेमी हस्तियों के अलावा कुछ संगठन इसे कुत्तों पर अत्याचार बताकर विरोध करने खड़े हो गए। हजारों आवारा कुत्तों की नसबंदी और उनके लिए आश्रय स्थल बनाये जाने  पर होने वाले अनुमानित खर्च और प्रशासनिक व्यवस्था को लेकर भी सवाल उठे। दिल्ली की देखादेखी अन्य राज्यों से भी आवारा पशुओं से होने वाली परेशानियों के विरुद्ध आवाजें सुनाई दीं। पहले भी इस समस्या पर देश भर में बहस होती रही है। आवारा कुत्तों द्वारा लोगों को काटे जाने की घटनाएं बढ़ने से लोगों की नाराजगी स्थानीय प्रशासन के प्रति बढ़ती जा रही है। देश भर से जो जानकारी आई उससे स्पष्ट हुआ कि  सैकड़ों छोटे बच्चे इन कुत्तों के शिकार हुए। राहगीरों और दोपहिया वाहन चालकों पर आवारा कुत्तों के झपटने से दुर्घटनाओं की संख्या लगातार बढ़ रही है। कुत्ते के काटने से होने वाली रेबीज नामक बीमारी से बचाव के लिए जिस टीके की जरूरत होती है उसकी उपलब्धता सरकारी अस्पतालों में नहीं होने से भी लोगों के लिये खतरा पैदा होता है। कुत्तों के काटने से हुई मौतों की संख्या लगातार बढ़ना इस बात का प्रमाण है कि समस्या के निदान हेतु या तो समुचित कदम नहीं उठाये गए या फिर वे पर्याप्त नहीं हैं। स्थानीय निकायों द्वारा आवारा कुत्तों को रेबीज रोधक इंजेक्शन लगाने के अलावा उनकी आबादी में वृद्धि को रोकने के लिए नसबंदी करने के लिए भी इन विभागों के पास न तो पर्याप्त धन है और न ही मानव संसाधन। यही वजह है कि पूरे देश में आवारा कुत्ते तेजी से बढ़ते जा रहे हैं जिससे समस्या लगातार गम्भीर होती गई। शहरों में आवारा कुत्तों के अलावा अन्य पशुओं के कारण भी आम जनता हलाकान है। इनमें गाय, भैंस साँड़ आदि हैं। इसी तरह राजमार्गों पर भी आवारा कुत्तों से ज्यादा गायों के झुण्ड वाहन चालकों  के लिए अकल्पनीय हालात  उत्पन्न करते हैं। गोवंश के वध पर रोक लग जाने से राजमार्गों पर ऐसी  गायों की संख्या बढ़ती ही जा रही है जो दूध नहीं देने के कारण उनके मालिकों द्वारा लावारिस छोड़ दी जाती हैं। इनके कारण हर साल बड़े पैमाने पर जो दुर्घटनाएं होती हैं उनमें मनुष्यों के साथ ही ये पशु भी हताहत होते हैं। कुल मिलाकर समस्या का स्वरूप दिन ब दिन बड़ा होते जाने से उसका इलाज  समय की मांग है। पशु प्रेमियों के तर्क अपनी जगह हैं। प्रकृति और पर्यावरण का  संतुलन बनाये रखने के लिए पशुओं का होना भी जरूरी है। इसीलिए हिंसक पशुओं तक के संरक्षण हेतु बने अभ्यारणों  पर करोड़ों रु. का व्यय होता है। सरकार गौशालाओं का रखरखाव करने के  लिए अनुदान भी देती है। लेकिन वह राशि इतनी कम है कि उसमें गौशाला का ठीक से संचालन संभव ही नहीं है। ऐसे में सर्वोच्च न्यायालय कितने भी आदेश जारी कर दे किंतु आवारा कुत्तों एवं गाय आदि अन्य पशुओं की शहरों एवं राजमार्गों पर मौजूदगी रोकना ठीक उसी तरह असम्भव प्रतीत होता है जैसे उसके सख्त आदेश के बाद भी हेलमेट और  सीटबेल्ट का उपयोग शत् -  प्रतिशत नहीं हो सका। बहरहाल , आवारा पशुओं की समस्या का समुचित निदान करने की दिशा में सर्वोच्च न्यायालय ने जो ताजा फैसला सुनाया उसको लागू करवाने के लिए समाज को भी अपने दायित्व का निर्वहन करने आगे आना होगा। पशु प्रेमी तबके को भी ये सोचना चाहिए कि यदि कोई पशु  मानव जीवन के लिए खतरा बन जाए तब भी उसको आजादी के साथ घूमने दिया जाना संभव नहीं है। अपने शौक और आवश्यकता के लिए पशु पालना और फिर उसे घर से बाहर छोड़ देना कानूनी न सही  किन्तु सामाजिक अपराध तो है ही। गौरतलब है शेर के शिकार पर रोक होने के बाद भी  आदमखोर होने पर उसे मार दिया जाता है।


- रवीन्द्र वाजपेयी

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