Friday, 14 November 2025

जाति और परिवारवाद की लालटेन बुझी और विकास का कमल खिला


हालांकि अंतिम क्षणों में उलटफेर होते हैं किंतु दोपहर 2 बजे तक के  रुझानों को  देखते हुए तमाम चुनाव पूर्व सर्वे और यू ट्यूब पर  इकतरफा मोदी विरोधी विश्लेषण धरे रह गए। प्रतिष्ठित एजेंसियों ने भी एग्जिट पोल के निष्कर्षों को डरते - डरते पेश किया। दावा होता रहा  कि तेजस्वी यादव लोकप्रियता  में नीतीश कुमार से बहुत आगे हैं।  नीतीश को बीमार और थका हुआ प्रचारित किया गया। वहीं तेजस्वी की छवि युवा हृदय सम्राट जैसी बनाने का अभियान चला। हर घर में एक सरकारी नौकरी जैसे  वायदे को तुरुप का पत्ता बताने की होड़ भी मची। भाजपा द्वारा नीतीश को मुख्यमंत्री उम्मीदवार घोषित करने में देर लगाए जाने को आत्मघाती निर्णय बताकर एनडीए की हार की भविष्यवाणी की जाने लगी। नीतीश सरकार द्वारा  महिलाओं के खाते में 10 हजार जमा करवाने के फैसले की काट के तौर पर बेरोजगार युवा मतदाताओं का महागठबंधन के पक्ष में गोलबंद होने का शिगूफा छोड़ा गया।  एम- वाय नामक मुस्लिम - यादव समीकरण को तेजस्वी की ताजपोशी की गारंटी बताकर नीतीश सरकार की विदाई तय मानी जाने लगी। एनडीए द्वारा लालू, प्रसाद यादव के शासन को जंगलराज बताकर उसकी वापसी की जो आशंका व्यक्त की गई उससे डरकर महागठबंधन ने लालू को मैदान में उतारना तो दूर प्रचार सामग्री में उनका चित्र प्रसारित करने तक से परहेज किया । जातीय समीकरण साधने के लिए मुकेश सहनी को उप मुख्यमंत्री बनाने की घोषणा भी हुई। लेकिन चुनाव परिणाम ने बिहार की राजनीति में एक नये चारित्रिक बदलाव का संकेत पूरे देश को दे दिया जिसमें विकास, सुशासन और राष्ट्रवाद के प्रति खुले समर्थन का ऐलान है।  महागठबंधन के सारे छत्रप धराशायी होते दिख रहे हैं।  तेजस्वी के भी आगे - पीछे होने से ये अंदाज लगाया जा सकता है कि बाकी सबका क्या होगा? मुस्लिम - यादव गठजोड़ के दम पर बिहार को  खानदानी जागीर समझने की मानसिकता को मतदाताओं ने बुरी तरह कुचल दिया। यादव बहुल अनेक सीटों में राजद का पिछड़ना इसका प्रमाण है ।  वहीं सीमांचल की मुस्लिम बाहुल्य सीटों पर भी एनडीए का शानदार प्रदर्शन राष्ट्रवादी राजनीति के बढ़ते प्रभाव को प्रतिबिंबित कर रहा है। चुनाव के आखिरी दौर में अपनी खस्ता हालत देख लालू एंड कंपनी ने ये प्रचार भी शुरू कर दिया कि 2020 के चुनाव में भाजपा द्वारा चिराग पासवान को एनडीए से  बाहर रखकर जदयू को जो नुकसान पहुंचाया था उसे नीतीश भूले नहीं हैं और इसलिए इस बार वे चिराग की लोजपा को हरवाकर बदला लेंगे। दूसरा शिगूफा ये भी छोड़ा गया कि नीतीश चुनाव बाद एक बार फिर तेजस्वी से हाथ मिलाकर भाजपा को झटका देंगे। कुछ वामपंथी पत्रकार तो नीतीश और चंद्रबाबू नायडू द्वारा मोदी सरकार को गिराए जाने की योजना  का भी ढोल पीटने लगे। जनसुराज के प्रशांत किशोर की ताकत को बढ़ा - चढ़ाकर पेश करने की चाल चली गई जिससे वे भाजपा समर्थक सवर्ण और युवाओं में सेंध लगा सकें। सबसे बड़ा अभियान चलाया कांग्रेस नेता राहुल गाँधी ने जिन्होंने वोट चोरी का हल्ला मचाकर पूरे बिहार में वोट अधिकार यात्रा भी निकाली। प्रशांत किशोर को भी ये गुमान हो चला था कि जब वे नरेंद्र मोदी, नीतीश कुमार, ममता बैनर्जी, जगन मोहन रेड्डी आदि को चुनाव जितवा सकते हैं तब अपनी पार्टी को क्यों नहीं किंतु वे भूल गए कि अच्छा प्रशिक्षक अच्छा खिलाड़ी हो ये जरूरी नहीं। और इसीलिए किंग मेकर बनने की उनकी उम्मीद शून्य पर अटक गई और जिस जदयू को वे 25 से ज्यादा सीटें मिलने पर राजनीति छोड़ने की डींग हाँक रहे थे वह 80 के करीब है। ये भी कहा जा रहा था कि बिहार में केवल जाति चलती है और  लोग वोट और बेटी जाति में ही देते हैं किंतु नतीजों ने इस मिथक को भी ध्वस्त कर दिया। मुस्लिम - यादव समीकरण के पास 31 प्रतिशत मतों की जिस ताकत को महागठबंधन अपनी जीत का आधार मान बैठा था वह भी छिन्न - भिन्न होता दिख रहा है। सभी जातियों और वर्गों को जोड़कर विकास और सुशासन के जरिये बिहार को प्रगति पथ पर ले जाने वाले नेता के तौर पर नीतीश  ने इतिहास रच डाला वहीं नरेंद्र मोदी की वैश्विक प्रतिष्ठा और अमित शाह की कुशल रणनीति ने महागठबंधन को जमीन दिखा दी। तेजस्वी को तो खैर उनके पिता लालू प्रसाद यादव की काली करतूतें खा गईं जो  नेता प्रतिपक्ष बनने लायक भी नहीं रहे। ऐसा ही हुआ राहुल गाँधी के साथ जिन्होंने  दबाव बनाकर 60 से ज्यादा सीटें तो ले लीं किंतु आधा दर्जन पर भी कांग्रेस का जीतना मुश्किल लग रहा है। लोकसभा चुनाव में 99 सीटें जीतकर खुद को नरेंद्र मोदी के बराबर समझने वाले श्री गाँधी अभी तक जमीनी हकीकत समझ नहीं सके। संविधान, जाति  जनगणना, अंबानी - अडानी जैसे मुद्दों पर अटके रहकर वे अपनी और कांग्रेस दोनों की फजीहत करवाने पर आमादा हैं। बिहार में भाजपा 90 सीटों की बढ़त के साथ महाराष्ट्र जैसी स्थिति में आ गई है। जदयू ने भी 80 सीटों पर पकड़ बना रखी है। चिराग का प्रदर्शन उनके उज्ज्वल भविष्य का संकेत है। राष्ट्रीय राजनीति पर इस चुनाव का गहरा असर होगा क्योंकि कांग्रेस और वाम दलों को बिहार ने जिस तरह नकारा उसके बाद इंडिया गठबंधन या तो टूटेगा या  कांग्रेस के चंगुल से निकल आयेगा। राहुल के लिए भी ये बड़ा झटका है क्योंकि कांग्रेस में ही उनके प्रभुत्व को चुनौती मिलना तय है। 2 बजे तक एनडीए 199 के आंकड़े पर है जो बड़ी उपलब्धि है। 25 साल बाद भी नीतीश की साख कायम रहने के पीछे मोदी की धाक का बड़ा योगदान है। यह एक सकारात्मक जनादेश है । चुनाव आयोग पर लगाए गये आरोपों को जनता ने रद्दी की टोकरी में डाल दिया। इतना व्यवस्थित चुनाव इस राज्य में पहले कभी नहीं हुआ। लालू ब्रांड घटिया राजनीति के साथ ही परिवारवाद पर भी इस परिणाम ने  जबरदस्त प्रहार किया है जिसके प्रतीक राहुल और तेजस्वी दोनों हैं। बिहार में लालू की लालटेन का बुझना अत्यंत शुभ संकेत है जिसका असर प.  बंगाल के आगामी चुनाव पर पड़े बिना नहीं रहेगा।


- रवीन्द्र वाजपेयी

No comments:

Post a Comment