Saturday, 15 November 2025

कांग्रेस के साथ ही तेजस्वी को भी ले डूबे राहुल

बिहार विधानसभा  चुनावों के नतीजों से पूरा देश चौंक गया। हालाँकि महागठबंधन की जीत के लिए खुलकर मैदान में उतरे तमाम वामपंथी पत्रकार भी अंतिम चरण आते तक ये कहने लगे थे कि नीतीश कुमार के 20 वर्ष  सत्ता में रहने के बाद न तो सत्ता विरोधी लहर है और न ही मुख्यमंत्री के प्रति नाराजगी या ऊब । उन्होंने ये भी स्वीकारा कि महिलाओं में नीतीश और नरेंद्र मोदी की योजनाओं का जबरदस्त प्रभाव है। एनडीए के सुव्यवस्थित  प्रचार अभियान , घटक दलों में बेहतर तालमेल और जातीय समीकरणों को साधने की सटीक रणनीति से  वे  प्रभावित थे। महागठबंधन के प्रति झुकाव रखने वाले विश्लेषक भी टीवी चर्चाओं में चुनाव आयोग पर छींटाकशी करने के बावजूद मान बैठे कि वोट चोरी   कोई मुद्दा नहीं बन सका। राहुल गाँधी का वोट अधिकार यात्रा के बाद  विदेश चले जाना भी महागठबंधन  समर्थक पत्रकारों को रास नहीं आया। उन्होंने निःसंकोच कहा  कि श्री गाँधी  बुनियादी मुद्दों को छोड़ यहाँ - वहाँ की जो बातें कहते रहे उनकी वजह से महागठबंधन के प्रति आकर्षण पैदा नहीं हो सका। दूसरी ओर एनडीए भले ही नीतीश कुमार को सामने रखकर लड़ा किंतु उसकी पूरी कमान  भाजपा के पास थी जिसने अपनी संगठन शक्ति का उपयोग करते हुए बिहार की जमीनी सच्चाई को समझकर व्यूह रचना की जिसका परिणाम एनडीए की ऐतिहासिक विजय के रूप में सामने आया जिसका अंदाज  चुनाव विश्लेषक और सर्वेक्षण  एजेंसियां तक नहीं लगा सकीं। औरों को तो छोड़ भी दें लेकिन  धूमकेतु की तरह उभरी जनसुराज पार्टी के संस्थापक प्रशांत किशोर तक हवा का रुख भांपने में विफल रहे जबकि 2015 में प्रचंड  मोदी लहर के बावजूद  नीतीश कुमार को सत्ता में लाने में उनकी रणनीति कारगर साबित हुई थी।  ये सब देखते हुए कांग्रेस को चाहिए वह पराजय के सही कारणों को समझकर प्रतिक्रिया दे किंतु राहुल से लेकर निचले स्तर तक के प्रवक्ता और पार्टी का सोशल मीडिया चलाने वाले जिस तरह की सतही टिप्पणियां कर रहे हैं उनसे लगता है कांग्रेस ने गलतियों से सबक लेने के बजाय उन्हें दोहराते रहने की कसम खा रखी है। श्री गाँधी ने अपनी कमजोरियों को स्वीकार करने के बजाय चुनाव आयोग की वजह से जीत पाने में कठिनाई का बहाना बनाकर अपना बचाव किया जबकि इस शर्मनाक पराजय के लिए वे सबसे ज्यादा जिम्मेदार हैं। उन्होंने  सही समय पर निर्णय नहीं होने दिये वहीं तेजस्वी पर अनावश्यक दबाव बनाकर सीटें तो ज्यादा झटक लीं परंतु जीतने के लिए आवश्यक प्रयास करने के बजाय चुनाव को बेहद हल्के में लिया। तेजस्वी को मुख्यमंत्री का चेहरा घोषित करने में की गई देरी के बाद उनके साथ श्री गाँधी का तालमेल नहीं बन सका। हालाँकि नीतीश को लेकर ये गलती भाजपा ने भी की किंतु एक बार घोषणा होने के बाद प्रधानमंत्री के अलावा अमित शाह, राजनाथ सिंह , जगत प्रकाश नड्डा सहित केंद्रीय मंत्री, भाजपा शासित राज्यों के मुख्यमंत्री, दर्जनों सांसद और सहयोगी  संगठन न केवल भाजपा के अपितु एनडीए के अन्य घटकों की जीत के लिए भी जुट गए। दरअसल  लोकसभा चुनाव में लगे झटके के बाद भाजपा ने विभिन्न राज्यों के विधानसभा चुनाव को गंभीरता से लड़ा जिसके कारण उसे सफलता मिली। इसके विपरीत राहुल गाँधी 99 सीटें जीतने के बाद खुशफहमी में डूब गए। उन्हें ये लगा कि वे प्रधानमंत्री के विरुद्ध तीखी शब्दावली का उपयोग कर जनता के मन में अपनी छवि बना लेंगे किंतु लोकसभा चुनाव के बाद हुए विधानसभा चुनावों में जहाँ भाजपा ने शानदार सफलताएं अर्जित कीं वहीं कांग्रेस के हाथ खाली रहे। सच्चाई यही है कि बिहार में कांग्रेस के दयनीय प्रदर्शन के लिए सीधे श्री गाँधी ही जिम्मेदार हैं। यदि वे तेजस्वी को खुला हाथ देते तो हो सकता है महागठबंधन की इतनी दुर्गति न होती। प्रधानमंत्री ने कल शाम कांग्रेस के एक और विभाजन की जो भविष्यवाणी की वह सही हो जाए तो आश्चर्य नहीं होगा। वैसे भी जिस राहुल ब्रिगेड के बारे में कहा जाता था कि वह कांग्रेस के सुनहरे दिन वापस लायेगी उसके अनेक  सदस्य श्री गाँधी से नाराज होकर  पार्टी छोड़ चुके हैं। आज कांग्रेस में दूसरी पंक्ति का नेतृत्व नजर नहीं आता। संगठन इसीलिए कमजोर है। सोनिया गाँधी के निष्क्रिय होने के बाद ले - देकर राहुल और प्रियंका ही  हैं किंतु दोनों राजनीति को मनोरंजन का साधन मानकर चलते हैं। बिहार की दुर्दशा के बाद भी यदि श्री गाँधी  अपना रवैया नहीं बदलते तब इंडिया गठबंधन के घटक दल भी उन्हें बोझ समझने लगेंगे। प.बंगाल में  ममता बैनर्जी और केरल में वामपंथी तो पहले से ही उनको महत्व नहीं देते। बिहार में राजद के अलावा वीआईपी और वाम दलों की भी जो लुटिया डूबी उसके बाद बाकी दल भी कांग्रेस से दूरी बनाने लगें तो आश्चर्य नहीं होगा। 


- रवीन्द्र वाजपेयी


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