बिहार विधानसभा चुनाव के पहले ये चर्चा आम थी कि नीतीश कुमार की राजनीतिक पारी खत्म होने जा रही है। उन्हें बीमार और थका हुआ बताने के साथ ही ये प्रचार भी किया जाता रहा कि एनडीए का बहुमत आने पर भी भाजपा उन्हें मुख्यमंत्री नहीं बनायेगी। इस बारे में महाराष्ट्र का उदाहरण दिया गया जहाँ एकनाथ शिंदे को हटाकर भाजपा ने देवेंद्र फड़नवीस की ताजपोशी करवा दी। 2020 में भाजपा को जदयू से काफी ज्यादा सीटें मिलने पर भी मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ही बनाये गए। हालाँकि 2022 में उन्होंने भाजपा को झटका देकर लालू प्रसाद यादव की राजद के साथ मिलकर सरकार बना ली और लोकसभा चुनाव में नरेंद्र मोदी के विरुद्ध इंडिया गठबंधन की रचना में महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वहन भी किया। दरअसल नीतीश को इस बात की खुन्नस थी कि विधानसभा चुनाव में भाजपा की शह पर चिराग पासवान ने जदयू के विरुद्ध प्रत्याशी खड़े किये जिससे जदयू के विधायकों की संख्या घट जाने ने से वे भाजपा की कृपा पर निर्भर हो गए। लेकिन जल्द ही लालू परिवार की हरकतों से परेशान होकर उन्होंने भाजपा के साथ लौटकर इंडिया गठबंधन को जबरदस्त झटका दे दिया जिसका असर लोकसभा में एनडीए की वापसी के तौर पर दिखाई दिया। लेकिन भाजपा स्पष्ट बहुमत से पीछे रह गई और उसे नीतीश और चंद्रबाबू नायडू के समर्थन से सरकार बनाना पड़ी। इस कारण नीतीश भाजपा की मजबूरी बन गए। बावजूद इसके बिहार के संदर्भ में तरह - तरह की बातें चलती रहीं। यहाँ तक हवा उड़ाई गई कि चुनाव के बाद नीतीश फिर खेला करेंगे जिससे मोदी सरकार खतरे में पड़ जाएगी। इन चर्चाओं के कारण बिहार में तेजस्वी यादव की संभावनाएं उज्ज्वल मानी जाने लगीं। विभिन्न सर्वे उन्हें मुख्यमंत्री की दौड़ में नीतीश से आगे बता रहे थे। मतदान के बाद हुए अनेक एग्जिट पोल में एनडीए को बहुमत मिलने के बाद भी तेजस्वी की लोकप्रियता नीतीश से अधिक बताई गई। लेकिन जब नतीजे आये तब सारे अनुमान और आशंकाएँ ध्वस्त हो गए। एनडीए को ऐतिहसिक बहुमत मिलने के साथ ही भाजपा और जदयू ने अपने सहयोगियों के साथ भारी सफलता हासिल की। हालाँकि भाजपा सबसे बड़ी पार्टी बनने में कामयाब रही वहीं नीतीश भी 2020 से दोगुनी सीटें जीतकर अच्छी स्थिति में तो आ गए किंतु लालू एंड कंपनी के साथ जाने का खतरा उठाना उनके लिए कठिन हो गया। भाजपा ने भी चुनाव के दौरान किया वायदा निभाते हुए उन्हें बिहार की बागडोर सौंप दी। कल नीतीश शपथ लेंगे जिसमें प्रधानमंत्री सहित एनडीए शासित राज्यों के मुख्यमंत्री भी शामिल होंगे जिससे इस गठबंधन की मजबूती उजागर होगी। उल्लेखनीय है आगामी वर्ष प. बंगाल, असम, तमिलनाडु और केरल में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं। बिहार के परिणामों ने भाजपा के हौसले बुलंद कर दिये हैं । इसीलिए उसने प.बंगाल और तमिलनाडु में अपनी रणनीति पर काम करना शुरू कर दिया है। बिहार के परिणामों के बाद राजनीतिक क्षेत्रों में चर्चा है कि प. बंगाल, असम और तमिलनाडु में बिहार के प्रवासी काफी बड़ी संख्या में हैं जिनको अपने पक्ष में लाने के लिए भाजपा, नीतीश का उपयोग करेगी। बिहार में एनडीए की धमाकेदार जीत के बाद नीतीश की वजनदारी न सिर्फ अपने राज्य अपितु अन्य राज्यों में फैले बिहारी प्रवासियों के बीच भी बढ़ गई है। चूंकि जदयू अन्य राज्यों में नहीं है, इसलिए नीतीश को भी भाजपा के लिए प्रचार करने में कोई परेशानी नहीं होगी। हरियाणा, महाराष्ट्र, दिल्ली और बिहार में शानदार सफलता के बाद भाजपा की चुनावी मशीनरी और सूक्ष्म प्रबंधन की विरोधी भी तारीफ कर रहे हैं। जो पत्रकार दिन रात श्री मोदी और अमित शाह के विरुद्ध ज़हर उगला करते थे वे भी ये कहने को बाध्य हो गए हैं कि वे प्रयासों की पराकाष्ठा से विपरीत परिस्थितियों में भी अपनी सफलता सुनिश्चित कर लेते हैं। नीतीश को भी ये बात समझ में आ चुकी है कि बिना भाजपा के उनका गुजारा संभव नहीं है। बिहार में लालू युग का अवसान होने के साथ ही भाजपा ही भविष्य की राजनीतिक शक्ति है। वैसे भी ये नीतीश की आखिरी पारी है और सम्मानजनक रिटायरमेंट के लिए भाजपा से जुड़े रहना उनके लिए जरूरी होगा। उनको मुख्यमंत्री बनाकर भाजपा ने बेहद चतुराई दिखाई है। उसके पास नीतीश की टक्कर का कोई नेता है नहीं और चिराग पासवान को एक सीमा से आगे वह जाने नहीं देगी। इस जीत का सबसे अधिक लाभ भाजपा को हुआ क्योंकि बिहार जैसे जाति में जकड़े राज्य में राष्ट्रवादी राजनीति का बढ़ता वर्चस्व राष्ट्रीय परिदृश्य को प्रभावित किये बिना नहीं रहेगा। इस चुनाव के बाद लालू और उनका परिवार तो सन्निपात की स्थिति में है ही कांग्रेस भी झटके से उबर नहीं पा रही ।
-रवीन्द्र वाजपेयी
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