नीतीश कुमार ने बिहार के मुख्यमंत्री पद की शपथ ले ली। उनके साथ ही दो दर्जन से ज्यादा मंत्रियों ने भी पद और गोपनीयता की शपथ ली । कुछ पद भावी समीकरणों की वजह से खाली रखे गए जो स्वाभाविक ही है। इस बार नीतीश की पार्टी के विधायकों की संख्या पूर्वापेक्षा काफी बढ़ने से उनका मनोबल ऊँचा होना लाजमी है। मंत्रीमंडल में भाजपा के विधायकों की संख्या सबसे ज्यादा होने पर किसी को आश्चर्य नहीं हुआ क्योंकि उसके पास सर्वाधिक सीटें हैं। दो उपमुख्यमंत्री और विधानसभा अध्यक्ष पद भी उसी के खाते में जाने की संभावना है। चूंकि एनडीए के पास पर्याप्त बहुमत है इसलिए सरकार के स्थायित्व पर किसी तरह का खतरा नहीं है । बिहार के हित में भी यही होगा कि सरकार पूरे पाँच वर्ष निर्विघ्न चले। विपक्ष चूंकि काफी कमजोर है इसलिए उसकी तरफ से किसी तोड़फोड़ की आशंका भी नजर नहीं आती। लेकिन इस सबके साथ ही जो बात इस चुनाव के बाद समूचे राजनीतिक विमर्श का विषय बन गई वह है सरकार द्वारा संचालित वे योजनाएं जिनमें जनता के खाते में सीधे नगदी जमा की जाती है। यद्यपि इसकी शुरुआत काफी पहले हो चुकी थी। वृद्धावस्था और निराश्रित पेंशन तो बहुत पुरानी है। म.प्र में शिवराज सिंह चौहान ने लाड़ली लक्ष्मी योजना शुरू की जिसमें बेटी के जन्म पर एक लाख रु. उसके नाम से सावधि जमा कर दिये जाते हैं। छात्र - छात्राओं को साइकिलें, टैबलेट , लैपटॉप, गणवेश, पुस्तकें, बस्ता, फीस माफी, छात्र वृत्ति जैसी योजनाएं भी कालांतर में प्रारंभ हुईं। नीतीश कुमार ने 20 साल पहले जिन स्कूली छात्राओं को साइकिलें दीं वे माँ बनने के बाद भी उनकी समर्थक हैं। हालाँकि महिलाओं के उनके प्रति झुकाव में शराब बंदी का भी बड़ा योगदान है किंतु माना जा रहा है कि हाल ही में संपन्न विधानसभा चुनाव में नीतीश सरकार ने जीविका दीदी नामक योजना के नाम पर डेढ़ करोड़ महिलाओं के खाते में जो दस हजार जमा करवाये उसने चुनाव को इकतरफा बना दिया। वैसे ये फार्मूला आजमाने वाले वे पहले मुख्यमंत्री नहीं हैं। बीते कुछ सालों में म.प्र, हरियाणा, महाराष्ट्र और झारखंड में सरकार चुनाव के पहले महिलाओं के खातों में नगद राशि जमा करने के बाद सत्ता में लौटी। हालाँकि खजाना खोलकर मुफ्त खैरात बांटने के बाद भी छत्तीसगढ़ और राजस्थान की सरकार सत्ता गँवा बैठी। लेकिन चुनाव जीतने के लिए खजाना खाली करने का जो मंत्र राजनेताओं ने सीख लिया उसके दूरगामी दुष्परिणामों को लेकर हर जिम्मेदार व्यक्ति चिंता व्यक्त कर रहा है। निजी चर्चाओं में नेतागण भी स्वीकार करते हैं कि भविष्य में नगदी बाँटने के इस तरीके से सरकारों पर कर्ज का बोझ इतना बढ़ जाएगा जिसकी अदायगी करने में वे सक्षम नहीं रहेंगी। हालाँकि सभी पार्टियां इस मामले में एक जैसी हैं। कांग्रेस ने कर्नाटक और हिमाचल प्रदेश में महिलाओं को नगद राशि के अलावा कर्मचारियों को पुरानी पेंशन का वायदा कर भाजपा से सत्ता तो छीन ली परंतु अब इन राज्यों में वेतन बाँटने तक में सरकार को पसीना आ रहा है। मुफ्त बिजली के कारण लगभग सभी राज्यों के बिजली बोर्ड कंगाल हो गए वहीं मुफ्त पट्टों के वितरण ने सरकारी जमीन की लूटपाट का रास्ता खोल दिया। खैरात बाँटकर चुनाव जीतने का चलन हालाँकि कई दशकों से चला आ रहा है लेकिन अब इसका स्वरूप जिस तरह बड़ा होता जा रहा है वह बड़े खतरे का संकेत है। बिहार चुनाव में नीतीश द्वारा खेले गए दस हजार रूपी दाँव की काट के रूप में तेजस्वी यादव ने चुनाव जीतने पर महिलाओं को तीस हजार देने का वायदा कर दिया। यदि वे जीतते तब उसमें उसी वायदे का योगदान होता। लेकिन राज्य सरकार के खजाने पर तीन गुना बोझ पड़ता। अगले साल प. बंगाल, असम, तमिलनाडु, केरल में विधानसभा चुनाव होने हैं। बिहार के परिणाम से उत्साहित इन राज्यों के मुख्यमंत्री भी नीतीश जैसी ही दरियादिली दिखाएं तो उन्हें कौन रोकेगा ? हालाँकि दिल्ली में केजरीवाल सरकार मुफ्त बिजली, पानी , शिक्षा और इलाज देने के बाद भी सत्ता से बाहर आ गई जिसके अन्य कारण भी हैं किंतु आम आदमी पार्टी सत्ता में आई ही मुफ्त उपहारों के वायदों के कारण थी । भले ही देश की अर्थव्यवस्था कितनी भी सुदृढ हो लेकिन जिस तरह बड़े से बड़े बर्तन में एक छेद करने पर उसमें भरा पानी रिसते - रिसते खत्म हो जाएगा उसी तरह सरकार का खजाना चाहे कितना भी भरा हो यदि उसे अनुत्पादक कार्यों में लुटाया जाता रहा तो देश में निकम्मों की संख्या बढ़ती चली जायेगी जिसका अनुभव होने भी लगा है। चुनाव आयोग को इस दिशा में पहल करना चाहिए। हालाँकि राजनीतिक पार्टियां इस बारे में किसी भी प्रकार की रोक को शायद ही स्वीकार करेंगी । लेकिन खैरात बांटने के इस सिलसिले को कभी न कभी तो विराम देना ही पड़ेगा। वरना विश्व की सबसे तेज बढ़ती अर्थव्यवस्था की रफ्तार का धीमा पड़ना सुनिश्चित है।
- रवीन्द्र वाजपेयी
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