हार चुनाव में एनडीए की ओर से दो मुद्दे जोरदारी से उठाये गए थे। इनमें पहला जंगल राज और दूसरा था परिवारवाद । इन दोनों का निशाना लालू प्रसाद यादव ही थे क्योंकि उनके शासन काल में कानून व्यवस्था की खराब स्थिति के कारण सर्वत्र अराजकता फैल गई थी। इसके अलावा सामाजिक न्याय के जिस मुद्दे पर लालू सत्ता में आये वह धीरे - धीरे उनके परिवार के उत्थान पर केंद्रित हो गया। परिणामस्वरूप राजद नामक उनकी पार्टी परिवार की निजी संपत्ति में परिवर्तित होकर रह गई। नीतीश कुमार के 20 वर्षीय शासन में बिहार में रामराज्य आ गया हो ये कहना तो अतिशयोक्ति होगी किंतु कानून व्यवस्था में जबरदस्त सुधार हुआ । वहीं सामाजिक कल्याण की अनेक योजनाएं भी प्रारंभ हुईं जिनका केंद्र महिलाएं होने से नीतीश के प्रति उनका झुकाव बढ़ता गया। शराबबंदी जैसे निर्णयों से भी उनकी सकारात्मक छवि निर्मित हुई। लेकिन सबसे बड़ी बात जिसके लिए नीतीश की प्रशंसा सभी करते हैं वह है अपने आपको परिवारवाद से परे रखना। उनकी पत्नी काफी पहले दिवंगत हो चुकी थीं। उनके इकलौते पुत्र निशांत कुमार राजनीति से दूर रहने की वजह से सार्वजनिक तौर पर बहुत कम नजर आते हैं। चुनाव के दौरान शायद ही किसी ने उनको किसी रैली या सभा में देखा हो। चुनाव परिणाम के बाद जरूर वे पिता को चरण छूकर बधाई देते दिखे । दूसरी तरफ लालू प्रसाद यादव का पूरा कुनबा ही उनकी पार्टी पर हावी रहा है। स्व. रामविलास पासवान के बेटे चिराग ने भी पिता की पार्टी लोक जनशक्ति पूरी तरह से हथिया ली और चाचा पारस को किनारे लगा दिया। एनडीए के एक और घटक के मुखिया जीतन राम मांझी ने भी अपने परिवार को ही स्थापित किया। उनकी बहू और समधिन जीतकर विधायक भी बन गईं । हालाँकि भाजपा में भी बहुत से विधायक पारिवारिक विरासत के कारण आगे आ सके और कुछ मंत्री भी बने किंतु पार्टी पर किसी एक नेता या परिवार का कब्जा नहीं होने से वह परिवारवाद के आरोप से बच जाती है। एनडीए का एक और घटक राष्ट्रीय लोक मोर्चा है जिसके सर्वेसर्वा उपेंद्र कुशवाहा अपनी जातीय प्रभाव के चलते बिहार की राजनीति में महत्वपूर्ण बने रहते हैं। हालाँकि वे अपनी सुविधानुसार यहाँ - वहाँ होते रहते हैं। इस बार उनकी पार्टी को अच्छी सफलता मिल गई तथा श्रीमती कुशवाहा भी विधानसभा में आ गईं। उसके बाद खबर उड़ी कि वे पार्टी कोटे से मंत्री बनेंगी क्योंकि क्षेत्रीय पार्टियों में ये चलन आम हो चुका है। लेकिन जब शपथ ग्रहण हुआ तब मंत्रियों में एक ऐसे युवा को देखकर सभी चौंक गये जो विधानसभा और विधान परिषद दोनों का सदस्य नहीं है। फिर पता चला कि दीपक प्रकाश नामक ये व्यक्ति कुशवाहा जी के साहेबजादे हैं। चूंकि घटक दल गठबंधन की जरूरत होते हैं इसलिए उनके नखरे उठाना बड़ी पार्टियों के लिए मजबूरी बन चुकी है। 2020 में चिराग ने जदयू को दर्जनों सीटें हरवा दी थीं किंतु इस बार मन मारकर नीतीश को उन्हें गठबंधन में शामिल करना पड़ा। उपेंद्र के साथ भी वही स्थिति है। इसीलिए खुद परिवारवाद से परहेज करने वाले नीतीश को सहयोगियों के परिजनों को मंत्री बनाना पड़ा जिनमें जीतन राम के बेटे भी हैं जो पिछली सरकार में भी थे और विधान परिषद सदस्य हैं। स्मरण रहे बिहार में विधानसभा के दो सदन होने से कई मंत्री उच्च सदन से भी बनते हैं। खुद नीतीश कुमार भी विधान परिषद में ही हैं। एक सप्ताह पूर्व जो नई विधानसभा चुनकर आई उसमें विभिन्न दलों के ऐसे दर्जनों विधायक हैं जिन्हें राजनीति विरासत में प्राप्त हुई। लेकिन उपेंद्र ने जिस प्रकार अपने बेटे को मंत्री बनाया वह तो लोकतंत्र का मजाक है। संविधान के अनुसार अब उन्हें छह माह में किसी सदन का सदस्य बनना होगा और वे बन भी जाएंगे किंतु फ़िलहाल तो उनकी ताजपोशी उसी परिवारवाद का उदाहरण है जिसके लिए लालू परिवार की आलोचना की जाती है। आश्चर्य तो तब होता है जब भाजपा भी चुपचाप गठबंधन राजनीति की इस मजबूरी को जरूरी मानकर ढोने को राजी हो जाती है। जाति के नाम पर बने तमाम छोटे दलों के मुखिया अपनी जाति के नाम पर अपने परिवार का उत्थान किस तरह कर रहे हैं बिहार का नया मंत्रीमंडल इसका उदाहरण है।
- रवीन्द्र वाजपेयी
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