मतदाता सूचियों के सघन विशेष पुनरीक्षण (एस.आई आर) के विरोध में आसमान सिर पर उठाने वाली प. बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बैनर्जी को जब लगा कि वे इस प्रक्रिया को नहीं रोक पाएंगी तब वे ठंडी पड़ गईं । उनकी तरफ से तृणमूल कांग्रेस पार्टी के कार्यकर्ताओं की टोलियां तैयार करने का ऐलान भी हुआ था जिन्हें घर - घर जाकर मतदाताओं की जाँच कर रहे बीएलओ के साथ रहकर देखना है कि किसी का नाम गलत तरीके से तो नहीं काटा जा रहा। उन्होंने ये प्रयास भी किया कि इस काम में प्रदेश के सरकारी कर्मचारी असहयोग करें। शुरुआत में ऐसा लगा भी परंतु चुनाव आयोग की सख्ती के कारण वह दाँव भी असफल हो गया। चूंकि मतदाता सूचियों का गहन पुनरीक्षण 12 राज्यों में एक साथ चल रहा है इसलिए सुश्री बैनर्जी का ये आरोप निराधार साबित हुआ कि केंद्र सरकार उनके राज्य को निशाना बना रही है। उल्लेखनीय है आगामी वर्ष प. बंगाल सहित अनेक राज्यों में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं इसलिए ममता की बेचैनी बढ़ गई। हाल ही में हुए बिहार विधानसभा चुनाव के पहले चुनाव आयोग द्वारा मतदाता सूचियों का पुनरीक्षण करते हुए जब 65 लाख नाम अलग किये तब विपक्षी दलों ने उसे लोकतंत्र विरोधी कदम बताते हुए आरोप लगाया कि चुनाव आयोग भाजपा के इशारे पर विपक्षी दलों के समर्थकों के नाम सूचियों से अलग करवा रहा है। राहुल गाँधी ने इसे वोट चोरी जैसा नाम देते हुए बिहार में वोट अधिकार यात्रा तक निकाली। हालांकि चुनाव आयोग ने काटे गए नामों को दोबारा जोड़ने का समुचित अवसर प्रदान किया जिसका लाभ लेकर लाखों नये मतदाताओं ने भी अपना पंजीयन करवाया। हालांकि 40 लाख से ज्यादा नाम सूचियों से अलग हुए। यदि विपक्ष के आरोप सही होते तब मतदाता सूचियों का प्रारूप प्रकाशित होने पर बड़ी संख्या में शिकायतें आयोग को मिलतीं। श्री गाँधी को लगता था मतदाता सूचियों के गहन पुनरीक्षण के विरोध में बिहार की जनता सड़कों पर उतर आयेगी। लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ। पूरा चुनाव शांतिपूर्ण और व्यवस्थित तरीके से संपन्न हो गया। एक भी मतदान केंद्र पर दोबारा मतदान की नौबत नहीं आई जो बिहार के लिए नया अनुभव था। मतदान का प्रतिशत बढ़ने से तमाम आशंकाएँ निर्मूल साबित हुईं। नीतीश सरकार की वापसी प्रचंड बहुमत के साथ हुई जिसके बाद ये सुनने में भी आया कि जनता इसके विरुद्ध सड़कों पर उतर आयेगी और विपक्ष के चुने विधायक त्यागपत्र दे देंगे किंतु नई सरकार का शपथ ग्रहण निर्विघ्न संपन्न हो गया। मंत्रीमंडल को लेकर भी कोई विवाद सामने नहीं आया। इस प्रकार वोट चोरी और मतदाता सूचियों से नाम काटे जाने का मुद्दा फुस्स होकर रह गया। ममता बैनर्जी को उम्मीद थी कि बिहार में एनडीए को जनता सत्ता से बाहर कर देगी जिसके बाद प. बंगाल में चुनाव आयोग मतदाता सूचियों की सघन जाँच के काम में ढील डाल देगा किंतु उनकी आशाओं पर तुषारापात हो गया। बिहार की जनता ने वोट चोरी के मुद्दे को रद्दी की टोकरी में फ़ेंक दिया वहीं मतदाता सूचियों से लाखों नाम कट जाने के बाद भी कोई आसमान नहीं फटा। मतदाता सूचियों के पुनरीक्षण की आहट मात्र से प. बंगाल के अवैध घुसपैठियों में जो भगदड़ दिखाई दे रही है उससे ममता की घबराहट की वजह स्पष्ट हो गई। जैसी कि खबरें आ रही हैं उसके अनुसार राज्य के विभिन्न इलाकों में रह रहे लोग बड़ी संख्या में रहस्यमय तरीके से घरों में ताला बंद कर गायब हो गए। बांग्लादेश की सीमा पर भी लोगों का हुजूम नजर आ रहा है जो वापस जाना चाह रहा है। असल में मतदाता सूचियों की सघन जाँच के शुरू होते ही अवैध रूप से मतदाता बन बैठे घुसपैठियों में ये भय समा गया है कि दस्तावेजों के अभाव में उनकी असलियत सामने आ जाने पर वे कानून के शिकंजे में फंस जाएंगे। जाहिर है ये वर्ग ममता का प्रबल समर्थक है क्योंकि तृणमूल कांग्रेस की सहायता से ही उन्हें घुसपैठिया होने के बाद भी भारत में सभी सुविधाओं के साथ रहने की छूट प्राप्त है। प. बंगाल में एस. आई .आर के विरोध में जनता को आंदोलित करने की योजना भी सफल नहीं हुई। बड़ी बात नहीं बिहार जैसे ही यहाँ भी बड़ी संख्या में मतदाताओं के नाम मतदाता सूचियों से अलग हो जाएं। इसका राजनीतिक लाभ या हानि किस पार्टी को होगी ये बात उतनी महत्वपूर्ण नहीं जितनी ये कि चुनाव आयोग की इस पहल से राज्य में अवैध रूप से आकर बस गए बांग्लादेशी और रोहिंग्या घुसपैठियों का पर्दाफाश हो जायेगा जो देश के दूरगामी हित में है।
- रवीन्द्र वाजपेयी
No comments:
Post a Comment