Thursday, 31 October 2024

अपने साथ ही देश की समृद्धि हेतु भी कामना करें



 दुनिया जब अर्थव्यवस्था के बारे में जानती भी नहीं थी तब से भारत में दीपावली का त्यौहार मनाया जा रहा है । कालान्तर में इसके साथ  पौराणिक प्रसंग जुड़ते चले गए | न सिर्फ सनातन धर्म के अनुयायियों अपितु जैन , बौद्ध , सिख सभी इस पर्व पर हर्षोल्लास से भर उठते हैं ।  ये कहना भी गलत न होगा कि दीपावली भारत का सबसे बड़ा लोक महोत्सव है । पूरे विश्व में फैले भारतवंशी इसका आयोजन पूरे उत्साह और उमंग से करते हैं | अब तो अमेरिका और ब्रिटेन तक में सरकारी तौर पर  दीपावली का जलसा होने लगा है । इसका कारण वहां भारतीयों की बढ़ती संख्या ही नहीं बल्कि शैक्षणिक , आर्थिक और राजनीतिक क्षेत्र में उनकी प्रभावशाली उपस्थिति है । वैसे अन्य भारतीय तीज – त्यौहारों की तरह दीपावली भी कृषि आधारित पर्व ही है | वर्षा ऋतु की विदाई के बाद नई फसल आते ही आर्थिक और धार्मिक गतिविधियाँ शुरू होने के साथ शुरू हो जाता है शीतकाल जिसमें रबी फसल की तैयारी होती है । इस प्रकार दीपावली  व्यापारिक महत्व का अवसर भी है । इसे दुनिया का सबसे बड़ा व्यापारिक मेला भी कह सकते हैं |  भारत की अर्थव्यवस्था आज  भी कृषि आधारित है और  दीपावली भी उसी से जुडी है । अच्छी फसल से समाज के हर वर्ग को  उत्साह के साथ ही भविष्य के आर्थिक नियोजन में  मदद मिलती है । जब फसल अच्छी आती है तब शादियाँ भी खूब होती हैं जिनकी वजह से बाजार में रौनक आती है । इसीलिए दीपावली को व्यवसायी समुदाय का त्यौहार कहा जाता है । इस दिन  धन -  धान्य की अधिष्ठात्री देवी लक्ष्मी की पूजा का महात्म्य भी इसी वजह से है । बावजूद इसके इस त्यौहार से जुड़ी परंपराओं में सामाजिक ढांचे का भी ध्यान रखा गया था । तभी तमाम चमक – दमक के बावजूद मिट्टी का दिया और दीपावली एक दूसरे के पूरक हैं । आधुनिकता के साथ सजावट के अनेकानेक साधन विकसित होने पर भी धनकुबेरों से लेकर तो झोपड़ी में रहने वाला निर्धन भी दीपक के माध्यम से ही दीपावली मनाता है जिसके पीछे भी एक प्रतीकात्मक सोच रही है । दीपावली पर चूंकि अमावस्या  होती है इसलिए दीपमालिका के माध्यम से ये प्रदर्शित किया जाता है  कि निराशा के माहौल में भी आशावान होना हमारा स्वभाव है । इस प्रकार  यह अँधेरे में प्रकाश उत्पन्न करने रूपी पौरुष का प्रतीक है | लक्ष्मी की पूजा और आराधना को केवल धन – संपत्ति की प्राप्ति से जोड़ना अधकचरापन है । सही मायनों में दीपावली श्रम और नैतिकता से अर्जित सम्पन्नता की प्रेरणा देती है । अमावस की अंधियारी रात को दीपों  से आलोकित करने की परम्परा इस बात का द्योतक है कि हमारे आचरण में पारदर्शिता हो और हम ऐसा कुछ न करें जिसे छिपाने की जरूरत पड़े । इसके साथ ही ये पर्व हमारी सामाजिक व्यवस्था में निहित समतामूलक सोच का सर्वोत्तम उदाहरण है । इसीलिये भले ही यह लक्ष्मी जी को समर्पित है किन्तु सुख और समृद्धि की कामना करने का अधिकार सभी को है , ये इस त्यौहार का संदेश है । पूंजीवादी और साम्यवादी विचारधारा के विपरीत भारतीय सामाजिक व्यवस्था वर्ग  संघर्ष जैसे दर्शन से अलग वर्ग समन्वय को पोषित करने  वाली है । इस अवसर पर रोजगारमूलक सामाजिक ढांचे का सर्वोत्तम स्वरूप उभरकर सामने आता है । 21 वीं सदी ने यद्यपि काफी कुछ बदल डाला लेकिन आज भी बचत और संयम का जो संस्कार  हमें विरासत में मिला उसने अनगिनत झंझावातों के बावजूद भारत को संगठित और सुरक्षित रखा । सदियों  की गुलामी भी हमारे सांस्कृतिक व्यवहार को नहीं बदल सकी तो उसका बड़ा कारण हमारी पर्व परम्परा है जो हमें जड़ों से जोड़े रखती है । दीपावली इस परम्परा का शिखर है । मौजूदा वैश्विक परिस्थितियों में हमारे देश की भूमिका की ओर पूरा विश्व निहार रहा है । आर्थिक मजबूती के साथ सुरक्षा के क्षेत्र में बढ़ती आत्मनिर्भरता के कारण ही भारत दुनिया की बड़ी ताकतों की कतार में शामिल हो सका है । नई पीढ़ी ने ज्ञान – विज्ञान की हर विधा में अपनी प्रतिभा प्रमाणित की है । स्वामी विवेकानंद और महर्षि अरविंद की भविष्यवाणी के अनुरूप भारत विश्व का नेतृत्व करने के आत्मविश्वास से भरा हुआ है । हालाँकि राह में बाधाएं भी हैं किन्तु आज का भारत समस्याओं के समाधान के सामर्थ्य से भरपूर है । दीपावली इस आत्मविश्वास को और सुदृढ़ बनाने का पुनीत अवसर है । आइये , अपनी उन्नति के साथ ही हम अपने देश की समृद्धि हेतु भी प्रार्थना करें क्योंकि उसी के साथ हमारा भविष्य भी जुड़ा हुआ है । 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Wednesday, 30 October 2024

तो भारत फिर से सोने की चिड़िया कहलाने लगेगा

हमारे यहाँ धातु में निवेश प्राचीनकाल से होता आया है। ये हमारे पूर्वजों की दूरदर्शिता ही थी जिसने समाज के प्रत्येक वर्ग को दीर्घकालीन निवेश का महत्व समझाया। धनतेरस से दीपावली पर्व का शुभारंभ हो जाता है। यह दिन अनेक पौराणिक  प्रसंगों से जुड़ा है किंतु इसका मुख्य आकर्षण बाजारों में नजर आने वाली रौनक है। एक समय था जब धनतेरस पर पीतल, तांबे, काँसे के बर्तनों से लेकर सोने - चाँदी के आभूषण खरीदने का रिवाज था। हर व्यक्ति अपनी हैसियत के मुताबिक उक्त धातुओं में से कोई खरीद कर त्यौहार की खुशी मनाता था। धातु से बनी चीज चाहे  वह पीतल हो या कांसा एक तरह की पूंजी ही होती है जो बरसों तक उपयोग किये जाने के बाद बेचने पर भी अपने खरीद मूल्य के बराबर तो पैसा दे ही जाती है। जबकि सोने   - चांदी कितने भी पुराने क्यों न हो जाएं उन्हें बेचने पर उसके मौजूदा दाम के बराबर धन वापस मिल जाता है। समय के साथ समाज की सोच भी बदली और जरूरतें भी। जीवन स्तर में आये सुधार के अलावा बाजारवाद ने भी लोगों की मानसिकता को प्रभावित किया। मध्यम वर्ग के रूप में एक बड़ा उपभोक्ता समूह विकसित हुआ जिसने अर्थव्यवस्था की दिशा ही बदलकर रख दी। धनतेरस पर बाजार में बर्तनों की जगह वाहन, इलेक्ट्रानिक उपकरण आदि ने ले ली किंतु  सोने - चांदी का आकर्षण जस का तस है। बीते कुछ समय से वैश्विक परिस्थितियों के कारण सोना - चांदी की कीमतें काफी बढ़ चुकी हैं। इसके कारण बाजार में ये आशंका थी कि इनकी बिक्री पिछले सालों की अपेक्षा कम होगी। लेकिन कल धनतेरस पर देश में 60 हजार करोड़ के कुल कारोबार में 20 हजार करोड़ रु.का सोना और 2500 करोड़ रु. की चांदी की बिक्री होना  दर्शाता है कि भारतीय समाज में इन धातुओं में निवेश के प्रति आकर्षण यथावत है। पूंजी बाजार से मिली जानकारी के अनुसार बीते एक साल में सोने - चांदी की कीमतों में हुई जबरदस्त वृद्धि की वजह से उनमें निवेश करने वालों को आशातीत लाभ हुआ। दीपावली पर सोना लगभग 80 हजार प्रति ग्राम और चांदी 1 लाख रु .प्रति किलो तक पहुँचने के बाद भी उनकी बिक्री के आंकड़े उस आशंका को भी दर्शा रहे हैं जिसके अनुसार रूस और यूक्रेन में चल रही जंग के साथ ही इजरायल और ईरान के बीच युद्ध होने वाला है। लेकिन कोरोना के बाद से दुनिया के बड़े देशों की अर्थव्यवस्था में आई गिरावट ने भी उक्त मूल्यवान धातुओं की मांग बढ़ा दी। भारत तो हजारों सालों से सोने और चांदी के प्रति दीवाना रहा है। कहा जाता है कि देश के कुछ बड़े मंदिरों में जमा सोने के भंडारों का बाजार मूल्य अरबों - खरबों में होगा और ये भी कि करोड़ों भारतीय परिवारों के पास सोने और चांदी के जो आभूषण हैं यदि उनकी कीमत आंकी जाए तो देश अमेरिका को भी पीछे छोड़ देगा। ये बात भी बिल्कुल सही है कि कच्चे तेल के अलावा सोना - चांदी के आयात में भी विदेशी मुद्रा बड़ी मात्रा में खर्च होती है। कई बार ये चर्चा चली कि यदि परिवारों में रखा सोना सरकार के खजाने में होता तो हमारी हैसियत विदेशी बाजारों में विकसित देशों के बराबर होती। मंदिरों आदि के बारे में भी यही सोच है किंतु भारतीय जनमानस ऐसी चर्चा को सरकार की खस्ता हालत के तौर पर देखता है। सोना - चांदी आम भारतीय के लिए केवल प्रतिष्ठा सूचक न होकर बुरे वक्त के साथी हैं क्योंकि  यही धातुएँ हैं जिन्हें कभी भी बेचकर वह अपनी आपातकालीन जरूरतें पूरी कर सकता है। गिरवी रखकर भी छोटी समस्या हल हो जाती है। यही कारण है कि  वह मौका मिलते ही इन दोनों धातुओं में निवेश करने से नहीं चूकता। यद्यपि ये बात भी चुभती है कि घरों में रखा हुआ सोना व्यक्तिगत संपत्ति तो है किंतु देश की समृद्धि में उसका योगदान नहीं है। जो स्वर्ण भंडार रिजर्व बैंक के पास है वही उसका पैमाना है। यद्यपि सरकार ने निजी सोने को अपने पास जमा करने की कई योजनाएं निकालीं किंतु उनका अपेक्षित लाभ नहीं हुआ। इससे ये भी सिद्ध होता है कि जिस सरकार को जनता चुनती है उस पर उसे भरोसा कितना कम है। बेहतर होगा सरकार ऐसा कुछ करे जिससे उसके सोने के भंडार में जनता से ज्यादा सोना हो । जिस दिन ऐसा हो जाएगा भारत फिर से सोने की चिड़िया कहलाने लगेगा। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Tuesday, 29 October 2024

भारतीय छात्रों के विदेश जाने से उठ रहा सवाल


भारत और कैनेडा के रिश्तों  में कुछ  समय से बेहद खटास घुल गई है। इसका कारण वहाँ के प्रधानमंत्री ट्रूडो का भारत विरोधी खालिस्तानी तत्वों को दिया जा रहा संरक्षण है। ये कहना भी अतिशयोक्ति नहीं होगी कि पंजाब से बड़ा खालिस्तानी गतिविधियों का केंद्र कैनेडा बन गया है। निज्जर नामक खालिस्तानी की हत्या के मामले में ट्रूडो , भारत सरकार को जिस तरह कठघरे में खड़ा कर रहे हैं उसके पीछे वहाँ होने जा रहे चुनाव हैं। अपनी खस्ता हालत देखकर उन्होंने खालिस्तानी संगठनों को खुली छूट दे रखी है ताकि सिखों के मत उन्हें मिल सकें। हालांकि वहाँ बसे सभी सिख खालिस्तान समर्थक या भारत विरोधी हैं ये सही नहीं है किंतु वे खालिस्तान समर्थकों की मुख़ालफत करने से बचते हैं। ट्रूडो इसी का लाभ उठाकर भारत पर दबाव बनाने की चाल चल रहे हैं जबकि उनकी अपनी पार्टी में इसे लेकर विरोध के स्वर उठ रहे हैं। भारत सरकार ट्रूडो द्वारा बनाये जा रहे दबाव का कड़ाई से जवाब दे रही है। लेकिन इस बीच एक जानकारी आई है कि कैनेडा में पढ़ रहे विदेशी छात्रों में 40 फीसदी संख्या भारतीय विद्यार्थियों की है।  2022 के आंकड़ों के अनुसार 4 लाख भारतीय छात्रों से  उस साल 85000 करोड़ रु. कैनेडा की अर्थव्यवस्था को मिले। भारत सरकार द्वारा संसद में दी गई  जानकारी के मुताबिक वर्ष  2023 में 13 लाख से अधिक भारतीय छात्र विदेशों में पढ़ रहे थे जबकि 2022 में ये संख्या 9 लाख थी। इससे स्पष्ट है कि महज एक साल में अध्ययन हेतु विदेश जाने वाले भारतीय विद्यार्थियों की संख्या में लगभग 30 फीसदी की वृद्धि हुई। और ये भी कि इन छात्रों द्वारा विदेशों में खर्च की जाने वाले राशि 2.5 लाख करोड़ रु. से अधिक होगी। हालांकि ये कोई नई बात नहीं है। आजादी के पहले से ही भारत के छात्र उच्च अध्ययन हेतु विदेश जाते रहे हैं। महात्मा गाँधी, पं. जवाहरलाल नेहरू, जयप्रकाश नारायण, डा. राममनोहर लोहिया, ज्योति बसु, डाॅ. भीमराव आंबेडकर के अलावा बड़ी संख्या में राष्ट्रीय नेताओं ने विदेशों में शिक्षा प्राप्त की। उस दौर में भारतीय विश्वविद्यालयों में शिक्षा का स्तर किसी भी तरह कम था ये मान लेना गलत होगा। हाँ, विज्ञान के क्षेत्र में शायद शोध आदि के लिए समुचित संसाधनों का अभाव होने से अनेक वैज्ञानिक विदेश चले जाते होंगे। भारत चूंकि ब्रिटेन के अधीन था इसलिए वहाँ जाकर पढ़ना सरल भी था। मेधावी छात्रों को कुछ राजा - महाराजा  छात्रवृत्ति प्रदान कर देते थे। धन संपन्न लोगों में विदेश में शिक्षा ग्रहण करना प्रतिष्ठा सूचक था। आजादी के आठ दशक पूरे होने को आ रहे हैं लेकिन अभी भी यदि भारतीय विद्यार्थियों को शिक्षा हेतु विदेश जाना पड़ रहा है तो ये विचारणीय होने के साथ ही शर्म का विषय भी है। धनकुबेरों की संतानें यदि बाहर पढ़ने जाएं तो उसे अस्वाभविक नहीं माना जाना चाहिए किंतु अब तो मध्यम वर्ग में भी कर्ज लेकर बच्चों को विदेश पढ़ने भेजने का चलन बढ़ता जा रहा है। सबसे चौंकाने वाली बात ये है कि उन राजनेताओं की संतानें तक विदेश पढ़ने  जाती हैं जो संसद और विधानसभा में गाँव, गरीब, किसानों, मजदूरों और दलित - पिछड़ों का प्रतिनिधि होने का दावा करते हैं। उनकी औलादों को भी अपनी  इच्छानुसार पढ़ने और भविष्य चुनने का अधिकार है किंतु इससे साबित होता है कि जिन नेताओं पर इस देश में गुणवत्तायुक्त शिक्षा व्यवस्था विकसित करने की जिम्मेदारी थी उन्होंने अपना दायित्व  सही ढंग से नहीं निभाया। भारत - कैनेडा के बीच चल रही खींचतानी के बीच ही ये सुनने में आया कि यदि भारतीय छात्र वहाँ से लौट आयें तो उस देश के अनेक विश्वविद्यालयों में ताले लटक सकते हैं। कैनेडा, अमेरिका , जर्मनी या ब्रिटेन जैसे देश ही नहीं यूक्रेन तक में हजारों भारतीय छात्र अध्ययनरत थे जिन्हें युद्ध के बीच वापस  लाया गया। लेकिन शर्मिंदगी तब सबसे ज्यादा हुई जब हाल ही में बांग्ला देश में सत्ता पलट के दौरान हुए उपद्रव के कारण मुसीबत में आये भारतीय विद्यार्थियों को सुरक्षित देश बुलाने के लिए मशक्कत करनी पड़ी। इन बातों को केवल संकटकालीन विषय मानकर भूल जाने की बजाय एक सबक के तौर पर ग्रहण करना होगा। दुनिया की पांचवी सबसे बड़ी और सबसे तेज भागती अर्थव्यवस्था वाले देश के लाखों छात्र सामान्य विषयों की  शिक्षा के लिए सात समंदर पार जाएं ये अटपटा लगता है। उल्टे होना तो ये चाहिए कि हमारे विश्वविद्यालय विदेशी छात्रों को आकर्षित कर सकें। ये स्थिति कैसे निर्मित होगी ये सोचने और उसके लिए समुचित प्रयास करने का समय आ गया है । मेक इन इंडिया की तरह स्टडी इन इंडिया का नारा बुलंद करना जरूरी है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Monday, 28 October 2024

ईरान और इजरायल में सीधी जंग तीसरे विश्वयुद्ध का पूर्वाभ्यास होगी


बीते सप्ताह इजरायल द्वारा ईरान पर किये गए हवाई हमले  के बाद पूरी दुनिया दहशत में है। स्मरणीय है कुछ समय पहले ईराक ने भी इजरायल पर मिसाइलें दागी थीं। तभी से ये आशंका थी कि नेतन्याहू पलटवार करेंगे। हालांकि इजरायल का जैसा स्वभाव और शैली है उसे देखते हुए जवाबी हमले में काफी समय उसने लगाया। लेकिन उसके बाद ईरान ने भी बदला लेने की बात कही तो इससे दोनों देशों के बीच बड़ी जंग का अंदेशा पैदा हो गया जिसके संभावित परिणामों ने वैश्विक स्तर पर हलचल मचा दी। यही वजह है कि    इजरायल के हमले को उसका अधिकार बताने वाले अमेरिका ने ईरान को दोबारा हमला न करने की समझाइश भरी चेतावनी दे डाली। दुनिया की अन्य महाशक्तियाँ भी नहीं चाह रहीं कि ईरान और इजरायल में सीधी लड़ाई हो क्योंकि वैसा होने पर दुनिया की हालत दूबरे में दो असाढ़ जैसी हो जाएगी जो रूस और यूक्रेन के बीच चल रहे युद्ध से ही परेशान है। सही बात ये है कि रूस पर प्रतिबंध लगाने के बाद यूरोपीय देशों की अर्थव्यवस्था भी बुरी तरह प्रभावित हुई है।  विशेष रूप से गैस और कच्चे तेल की आपूर्ति रुक जाने से  आम जनता त्रस्त है। अमेरिका खुद तो ऊर्जा के मामले में आत्मनिर्भर है वहीं  सऊदी अरब के शाही परिवार से अच्छे ताल्लुकात होने से उसे खास फर्क नहीं पड़ा किंतु उसके समर्थक देशों के अलावा बाकी दुनिया हलाकान हो उठी है। ऐसे में यदि ईरान और इजरायल के बीच जंग ने बड़ा रूप लिया तब वह विश्वयुद्ध का पूर्वाभ्यास ही होगा। रूस की तरह ईरान भी कच्चे तेल एवं गैस का बड़ा उत्पादक है। हालांकि अमेरिका ने उस पर काफी पहले से आर्थिक प्रतिबंध लगा रखे हैं जिनसे भारत भी संकट में आ गया। यदि रूस से सस्ता तेल उपलब्ध नहीं होता तो हमारे यहाँ भी हाहाकार मच जाता। इन सब कारणों से ही पूरी दुनिया ये चाह रही है कि  ईरान और इजरायल  किसी भी कीमत पर सीधी जंग में न उलझें। यद्यपि ईरान हमास और हिज़्बुल्ला जैसे इजरायल विरोधी  इस्लामिक संगठनों का संरक्षक है। ये बात भी सर्वविदित है कि जिस तरह बिना अमेरिकी  समर्थन  और सहायता के इजरायल अपना अस्तित्व सुरक्षित नहीं रख सकता वैसे ही हमास और हिज़्बुल्ला की पीठ पर ईरान का हाथ न हो तो वे इजरायल से टकराने की सोच भी नहीं सकते। जहाँ तक बात रूस और यूक्रेन युद्ध की है तो उसका विस्तार वहीं तक सीमित है किंतु  प. एशिया में चल रही जंग में हमास और हिज़्बुल्ला के साथ ईरान ने भी इजरायल के विरुद्ध मोर्चा खोला तब इस्लामिक जगत तो उसकी आग से झुलसेगा ही , कच्चे तेल का आयात करने वाले दुनिया के तमाम देश अभूतपूर्व संकट में फंस जाएंगे। रूस और चीन चूंकि ईरान के साथ हैं इसलिए अमेरिका भी उसके विरुद्ध सीधी कारवाई से बचेगा। वैसे भी अफगानिस्तान में उसके हाथ जिस बुरी तरह झुलसे उसकी जलन अभी तक कम नहीं हुई। यही वजह है कि यूक्रेन को हर तरह की सैन्य और आर्थिक सहायता देने के बावजूद न तो अमेरिका और न ही उसके सहयोगी अन्य किसी देश ने वहाँ अपनी सेनाएं भेजीं। इजरायल और हमास के बीच  युद्ध में हिजबुल्ला के भी शामिल होने के बावजूद अमेरिका या इजरायल के समर्थक अन्य यूरोपीय देशों ने सीधे हस्तक्षेप नहीं किया। इसीलिए अमेरिका ने ईरान को इजरायल पर दोबारा हमला न करने के बारे में चेताया तो अवश्य किंतु ये नहीं कहा कि वैसा नहीं करने पर वह खुद मैदान में उतरेगा। कुल मिलाकर बात ये है कि इजरायल के आत्मरक्षा के अधिकार की वकालत करने वाला अमेरिका इस बात का विरोधी है कि ईरान भी इजरायली हमले का जवाब दे क्योंकि यदि दोनों के बीच हमलों का आदान  - प्रदान जारी रहा तो युद्ध का केंद्र गाज़ा से हटकर ईरान स्थानांतरित हो जायेगा और तब कच्चे तेल के कुए ही नहीं जलेंगे बल्कि पेट्रोल, डीजल और गैस की कीमतें भी कमर तोड़कर रख देंगी। लेकिन प्रश्न ये है कि इस आशंका को टालने कौन आगे आयेगा? ये इसलिए महत्वपूर्ण हो जाता है क्योंकि दुनिया धीरे - धीरे ही सही किंतु शीतयुद्ध के पुराने दौर में लौट रही है जिसमें अमेरिका और रूस ( पूर्व सोवियत संघ) रूपी दो महारथियों ने दुनिया को वैचारिक, आर्थिक और सामरिक आधार पर बाँट रखा था। यूक्रेन के साथ रूस ने जंग छेड़कर अमेरिका के बढ़ते प्रभुत्व को ही चुनौती दी थी। भले ही वह यूक्रेन को पराजित नहीं कर पाया किंतु अमेरिकी लाॅबी द्वारा थोपे गए आर्थिक और अन्य प्रतिबंधों के बाद भी वह झुकने को तैयार नहीं है । उसकी वजह से  शीतयुद्ध के दौर जैसा ध्रुवीकरण फिर होता दिखाई दे रहा है। ऐसे में यदि ईरान और इजरायल में सीधे तौर पर लड़ाई छिड़ी तो फिर उसका दुष्प्रभाव बहुत व्यापक और भीषण होगा। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Saturday, 26 October 2024

मुफ्त योजनाएं आज नहीं तो कल बंद करना ही पड़ेंगी


चुनावी राजनीति जिस तरह से बाजारवादी संस्कृति की चपेट में आ गई है उसे लेकर अब समाज के जिम्मेदार वर्ग में चिंता दिखाई देने लगी है। सबसे रोचक बात ये है कि चुनाव हारने वाली पार्टी विजेता पर आरोप लगाती है कि उसने मतदाताओं को लालच देकर चुनाव जीता। गत वर्ष इन्हीं दिनों म.प्र के विधानसभा चुनाव में सारे सर्वेक्षण कांग्रेस और भाजपा के बीच बराबरी का मुकाबला बता रहे थे। 15 माह की कमलनाथ सरकार को छोड़ दें तो लगभग दो दशक से प्रदेश में भाजपा की सरकार रहने से सामान्य अवधारणा ये थी कि जनता उससे ऊब चुकी है और 2018 की तरह एक बार फिर सत्ता पलट देगी। लेकिन चुनाव के पहले शिवराज सिंह चौहान ने लाड़ली बहना नामक योजना शुरू की और उसका इतना जबरदस्त प्रचार किया कि बाकी सारे मुद्दे  हवा में उड़ गए। हालांकि कांग्रेस भी कर्नाटक और हिमाचल में ऐसी ही गारंटियां देकर भाजपा से  सत्ता छीन चुकी थी और म.प्र में भी  ऐसे ही वायदे कर रही थी किंतु शिवराज सरकार ने चूंकि महिलाओं के खाते में हर माह पैसे जमा करवाना शुरू कर दिया था इसलिए  महिला मतदाताओं ने दिल खोलकर भाजपा को समर्थन देकर उसकी सरकार बनवा दी। लेकिन म.प्र से ज्यादा खैरात बांटने के बाद भी राजस्थान में कांग्रेस की गहलोत सरकार को लोगों ने नकार दिया। सबसे चौंकाने वाला परिणाम आया छत्तीसगढ़ में जहाँ किसी को सपने में भी कांग्रेस सरकार के बाहर होने की उम्मीद नहीं थी। मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने पाँच साल में जो योजनाएं संचालित कीं उनसे भाजपा काफी दबाव में थी । लगभग सभी चुनाव विशेषज्ञ मान रहे थे कि इस राज्य में कांग्रेस वापसी करेगी किंतु जब परिणाम आये तो सब आश्चर्यचकित रह गए। राजस्थान और छत्तीसगढ़ में मतदाताओं ने कांग्रेस की पाँच साल पुरानी सरकार द्वारा चलाई जा रही कल्याणकारी योजनाओं के बाद भी उसे बदल दिया जबकि म.प्र में लगभग दो  दशक से सत्ता में जमी भाजपा को एक मौका और दे दिया। यही नजारा हाल में हरियाणा में देखने मिला जहाँ पहलवान, किसान और जवान जैसे मुद्दों से भाजपा की 10 साल से चली आ रही सरकार पर खतरे के बादल मंडरा रहे थे। लेकिन जनता ने कांग्रेस की गारंटियों को ठुकराते हुए भाजपा को स्पष्ट बहुमत दे दिया। बीते लोकसभा चुनाव में भी कांग्रेस ने महिलाओं और बेरोजगारों के खाते में हर माह हजारों रुपये जमा करने का वायदा किया जिसे खटाखट बोलकर प्रचारित किया किंतु उसका उतना असर नहीं हुआ जितना  संविधान बदलने और आरक्षण खत्म करने के प्रचार का। उ.प्र और महाराष्ट्र में भाजपा को इन मुद्दों ने जबरदस्त नुकसान पहुंचाया किंतु कांग्रेस शासित कर्नाटक और हिमाचल प्रदेश में भाजपा उससे आगे रही। इसके अलावा प. बंगाल और तमिलनाडु जैसे राज्यों में क्षेत्रीय दलों के सामने भाजपा असरहीन साबित हुई किंतु उड़ीसा में उसने नवीन पटनायक के अभेद्य समझे जाने वाले गढ़ को ध्वस्त कर दिया। इस सबसे ये निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि देश की राजनीति में कोई एक मुद्दा या फॉर्मूला  चुनाव जिताने में कारगर नहीं होता और हर राज्य में अलग - अलग समीकरण काम करते हैं। राममंदिर के शुभारंभ के बावजूद लोकसभा चुनाव में उ.प्र में भाजपा के निराशाजनक प्रदर्शन ने सबको चौंका दिया। इसी तरह दिल्ली में आम आदमी पार्टी और कांग्रेस के गठबंधन के बाद भी भाजपा  लगातार सातों सीटें जीत गई। इससे यही समझा जा सकता है कि मुफ्त उपहारों के वायदे और जाति समीकरण हर जगह काम नहीं आते। जो भाजपा नरेंद्र मोदी के नाम पर हिमाचल, दिल्ली, म.प्र , गुजरात और छत्तीसगढ़ में  लोकसभा चुनाव में विपक्ष को चारों खाने चित्त कर देती है वह प. बंगाल और तमिलनाडु में  करिश्मा नहीं दिखा पाई। राजस्थान और महाराष्ट्र में सत्ता होते हुए भी उसे नुकसान हुआ।  ऐसे में मुफ्त खैरात कितनी प्रभावशाली है इस पर विचार करने का समय आ गया है। केंद्र सरकार करोड़ों लोगों को मुफ्त अनाज और मकान बनाकर देने के बावजूद उ.प्र में आधी से ज्यादा सीटें हार जाती है। महाराष्ट्र विधानसभा के आगामी चुनाव में शिंदे सरकार के विरुद्ध विपक्ष की मजबूत मोर्चेबन्दी के बावजूद लाड़ली बहना जैसी योजना शुरू होने से बाजी फिर सत्ता पक्ष की तरफ झुकने की चर्चा होने लगी जबकि लोकसभा चुनाव में महा विकास अघाड़ी को भारी सफलता मिली थी। ये देखते हुए राजनीतिक दलों को सोचना चाहिए कि मुफ्त योजनाओं से परहेज करते हुए ऐसे मुद्दों पर चुनाव लड़ें जिनसे खजाने में शिक्षा, स्वास्थ्य, सार्वजनिक परिवहन  कानून व्यवस्था और रोजगार जैसे बुनियादी मुद्दों के लिए धन बचे। वर्तमान स्थिति में सभी राज्य कर्ज के बोझ से दबते जा रहे हैं। हिमाचल और कर्नाटक में सरकार चुनावी वायदे पूरे नहीं कर पा रही और बाकी की राज्य सरकारें हर महीने कर्ज ले रही हैं। बेहतर हो इस मुद्दे पर राष्ट्रीय स्तर पर आवाज उठे क्योंकि अंततः इसका बोझ जनता पर ही पड़ेगा और आज नहीं तो कल इस मुफ्तखोरी को बंद करना ही पड़ेगा। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Friday, 25 October 2024

सैनिक भले ही पीछे हटा ले लेकिन चीन पर भरोसा करना आत्मघाती होगा


इसे दोनों देशों के सैन्य अधिकारियों के बीच लंबे समय से चले आ रहे वार्ताओं के दौर का फलितार्थ कहें या रूस में हुए ब्रिक्स सम्मेलन में नरेंद्र मोदी और चीन के राष्ट्रपति जिनपिंग के बीच होने वाली बातचीत के पहले रिश्तों में आई कड़वाहट दूर करने की कूटनीतिक पहल, ये तय कर पाना मुश्किल है। असल में  चीनियों के चेहरे की जो  बनावट है उसके कारण उनके मनोभाव पढ़ पाना बेहद कठिन होता है। ताजा समझौते के अनुसार दोनों देशों ने पूर्वी लद्दाख़ के डेमचोक और देपसांग इलाके से अपने सैनिक पीछे हटाना शुरू कर दिया है। इसके अंतर्गत टेंट, शेड और सैन्य वाहन आदि हटाने की कारवाई हो रही है। 2020 में  गलवान घाटी में हुई फौजी झड़प के बाद पूरे लद्दाख़ क्षेत्र में युद्ध की स्थिति बनी हुई थी। भारत ने समूचे क्षेत्र में वायुसेना के साथ मिसाइलों की भी तैनाती कर दी। इसके अलावा बड़े पैमाने पर सड़कें और पुल वगैरह विकसित कर दिये गए। इसका प्रभाव ये हुआ कि चीन की तरफ से की जाने वाली घुसपैठ नियंत्रित हो गई। गलवान में हुई झड़प में भारत के एक कर्नल की शहादत हो गई थी। लेकिन जवाबी कारवाई में चीन के सैनिक बड़ी संख्या में मारे गए जिसे वह छिपाता रहा। चूंकि उस समय कोरोना का प्रकोप था इसलिए चीन को लगा कि उस निर्जन इलाके में वह अपना कब्जा जमा लेगा। दरअसल सीमा का निर्धारण नहीं होने की वजह से लद्दाख़ के बड़े इलाके में दोनों देशों की सेनाएं गश्त करती रहती हैं। अतीत में हुए समझौते के अंतर्गत  तनाव की स्थिति में किसी भी ओर  से गोली नहीं चलाई जाएगी। गलवान घाटी में हुई झड़प में दोनों पक्षों ने एक दूसरे  के साथ हाथापाई की। बंदूकों को लाठी की तरह इस्तेमाल तो किया किंतु गोली न चलाने के करार का उल्लंघन नहीं हुआ। उसके बाद से दोनों  के बीच सैन्य स्तर की बातचीत जारी रही और अनेक क्षेत्रों से सैनिक पीछे हटा लिए गए। ताजा समझौते के बाद 2020 वाली स्थिति बहाल होगी और दोनों देश निर्जन इलाके में बारी - बारी से पेट्रोलिंग कर सकेंगे जिसके पहले दूसरे पक्ष को सूचित करना होगा। जिनपिंग और श्री मोदी के बीच रूस में हुई बातचीत का ब्यौरा तो सामने नहीं आया किंतु ऐसा लगता है वह दुआ - सलाम तक सीमित रही। ये भी कहा जा सकता है कि ब्रिक्स सम्मेलन को सफल साबित करने के लिए रूसी राष्ट्रपति पुतिन ने दोनों नेताओं की बातचीत के लिए जमीन तैयार की हो क्योंकि इससे अमेरिका की चिंता बढ़ेगी। वैसे भी वर्तमान वैश्विक परिदृश्य में अमेरिका भारत के प्रति जिस तरह का दोहरा रवैया दिखा रहा है उसमें  हमारे लिए भी कूटनीतिक स्तर पर पैंतरेबाजी करनी जरूरी है। विशेष रूप से बांग्लादेश में हुए सत्ता पलट में अमेरिका की भूमिका में भारत का विरोध साफ झलकता है। लेकिन समस्या ये है कि चीन से भी किसी सदाशयता की उम्मीद नहीं की जा सकती क्योंकि वह हमारा जन्मजात शत्रु है। उसके साथ चला आ रहा सीमा विवाद लाइलाज मर्ज बन गया है। भारत के पड़ोसी देशों को उसने अपने प्रभाव क्षेत्र में ले लिया है। नेपाल, मालदीव और श्रीलंका में वामपंथी सत्ता आने के बाद बांग्लादेश में भी भारत विरोधी सरकार बन गई। पाकिस्तान से तो हमारी जन्मजात शत्रुता है। अरुणाचल और सिक्किम के साथ ही चीन की नजर भूटान पर भी है। ये बात तो पूरी तरह सही है कि वह भारत के साथ  सीधे युद्ध से बचता रहा है।   गलवान घाटी में किये दुस्साहस का उसे जो जवाब मिला उसके बाद वह समझ गया कि भारत अब 1962 वाला  देश नहीं है। उसके पास हर वो सैन्य क्षमता है जिससे वह चीन को माकूल जवाब दे सकता है। चीन के पास बड़ी सेना जरूर है किंतु सीमाओं की  भौगोलिक स्थिति देखते हुए भारतीय सेना भारी पड़ती है। सही बात ये है कि उसकी फितरत अपने पड़ोसियों को परेशान करने की है ।  इसलिए ये मान लेना भूल होगी कि पूर्वी लद्दाख़ से सैनिक हटाने के बाद उसकी नीयत बदल जाएगी। हालांकि भारत भी इस बात को जान गया है और इसीलिए गलवान विवाद के बाद से ही उसने कड़ा रुख अपनाया। सैन्य स्तर पर हमारी तैयारियां देखकर ही वह बातचीत के लिए रजामंद हुआ और  जिस तरह की ऐंठ दिखाता था उसमें कमी आई। लेकिन विवादित क्षेत्रों से दोनों देशों के सैनिकों के पीछे हटने के  बाद भी भारत को चौकन्ना रहना होगा क्योंकि चीन और धोखेबाजी एक दूसरे के पर्याय हैं। उसके  द्वारा जो नरमी समय - समय पर दिखाई जाती है उसके पीछे भारत के साथ उसका व्यापार है। इसीलिए वह सीधी टक्कर से भले बचता हो किंतु अप्रत्यक्ष रूप से वह भारत विरोधी गतिविधियों को संरक्षण देने में तनिक भी संकोच नहीं करता। संरासंघ में पाकिस्तान का समर्थन इसका प्रमाण है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी


Thursday, 24 October 2024

ब्रिक्स संगठन अमेरिकी प्रभुत्व के लिए बड़ी चुनौती

सरे महायुद्ध के बाद  दुनिया दो धड़ों में बंट गई थी। एक का नेतृत्व अमेरिका तो दूसरे का सोवियत संघ के पास था। इनसे अलग  गुट निरपेक्ष देशों का भी एक संगठन बना जिसमें भारत, मिस्र, यूगोस्लाविया और इंडोनेशिया आदि थे। हालांकि इनका झुकाव कुछ - कुछ सोवियत संघ की तरफ दिखाई देता था। चीन लंबे समय तक विश्व बिरादरी से अलग - थलग रहा। लेकिन 1972 में सं.रा.संघ में प्रवेश  और सुरक्षा परिषद का स्थायी सदस्य बनने के बाद संतुलन बदलने लगा। अमेरिका और सोवियत संघ का दबदबा मुख्य रूप से परमाणु शक्ति संपन्न होने के साथ ही अंतरिक्ष के क्षेत्र में  बढ़ते कदम थे। लेकिन चीन ने जल्द ही अपनी उपस्थिति एक महाशक्ति के तौर पर महसूस करवा दी। माओ युग में बने लौह आवरण से बाहर निकलकर उसने अपने दरवाजे पूंजी निवेशकों के लिए खोल दिये।  1991 में सोवियत संघ बिखर गया और उसके मुख्य घटक रूस की आर्थिक स्थिति बेहद दयनीय होने का लाभ चीन को मिला। ये कहने में कुछ भी गलत नहीं है कि 21 वीं सदी के पहले दो दशक चीन के नाम लिखे जा सकते हैं। लेकिन इस  दौरान रूस ने फिर पाँव जमाये और अमेरिका को चुनौती देने के लिए कूटनीतिक पहल की। ब्रिक्स नामक संगठन उसी का परिणाम है जिसमें ब्राज़ील, रूस, भारत, चीन और दक्षिण अफ्रीका हैं। यद्यपि इस संगठन के गठन के पीछे शीतयुद्ध जैसी कोई भावना नहीं थी किंतु उसमें शामिल सभी देश वैश्विक अर्थव्यस्था में तेजी से उभर रहे थे। उदारीकरण की जो बयार 20 वीं सदी के अंतिम दौर में बही उसने साम्यवाद को इतिहास के कूड़ेदान में फेंक दिया। यहाँ तक कि चीन  उन बहुराष्ट्रीय कंपनियों के उत्पादन का गढ़ बन गया जिन्हें वह अमेरिकी पूंजीवाद का एजेंट मानकर त्याज्य समझता था। इसी के साथ बीते दो दशकों में भारत भी दुनिया की महाशक्ति के रूप में अपनी जगह बनाने में कामयाब हो गया । ये अवधारणा भी प्रबल होने लगी कि वह जल्द ही चीन को पीछे छोड़ सकता है। कोरोना के बाद दुनिया में आये बदलाव ने ब्रिक्स जैसे संगठन का महत्व बढ़ा  दिया। हालांकि जी -8 और जी-20 आदि भी वैश्विक परिदृश्य को प्रभावित करते हैं किंतु  उनमें शामिल ज्यादातार देश अमेरिकी प्रभाव वाले हैं। वहीं ब्रिक्स की खास बात ये है कि इसके मुख्य सदस्य रूस, चीन और भारत अमेरिका के दबाव से बाहर हैं और आर्थिक, सामरिक और तकनीकी दृष्टि से पश्चिम के संपन्न देशों से टक्कर ले रहे हैं। यूक्रेन के साथ रूस के युद्ध ने एक बार फिर पूरी दुनिया को प्रभावित किया है। इसके बाद इजरायल और हमास के बीच शुरू हुई जंग का दायरा भी बढ़ता जा रहा है। इन दोनों युद्धों का रोचक पहलू ये है कि यूक्रेन - रूस के बीच चल रही लड़ाई में चीन और भारत ने तटस्थ रुख अपनाकर एक तरह से अमेरिका को ठेंगा दिखा दिया जिसने रूस पर प्रतिबंध लगवा दिये। वहीं इजरायल और हमास के झगड़े में रूस और चीन इजरायल विरोधी हैं किंतु भारत उसके साथ खड़ा है। बावजूद उसके ब्रिक्स में ये तीनों एकजुट हैं। रूस में संपन्न ब्रिक्स की हालिया बैठक मौजूदा हालात में बेहद महत्वपूर्ण रही। इसमें जो सबसे महत्वपूर्ण बात  हुई वह अमेरिकी डॉलर के मुकाबले ब्रिक्स देशों की साझा मुद्रा शुरू करना। हालांकि ये बहुत ही चुनौती भरा कदम होगा क्योंकि यूरोपीय यूनियन के देशों द्वारा संचालित यूरो नामक मुद्रा भी डॉलर के दबदबे को कम नहीं कर सकी। ये भी सही है कि मौजूदा स्थिति में रूस को ऐसी मुद्रा की ज्यादा जरूरत है किंतु चीन,भारत , दक्षिण अफ्रीका और  ब्राज़ील भी इससे जुड़ेंगे तो उसकी वजनदारी दुनिया के मुद्रा बाजार में बढ़ जाएगी। भारत की  इस संगठन में सक्रिय भूमिका निश्चित रूप से अमेरिका को रास नहीं आ रही किंतु बीते कुछ समय से वह जिस तरह से भारत को दबाने का प्रयास कर रहा है उसे देखते हुए दूसरे विकल्प खुले रखना जरूरी है। रूस में ब्रिक्स का जो सम्मेलन संपन्न हुआ उसका समय बेहद महत्वपूर्ण था क्योंकि एक तो दुनिया में दो बड़ी लड़ाईयां लंबे समय से चल रही हैं दूसरा अमेरिका में अगले माह राष्ट्रपति चुनाव होने वाले हैं जिसके बाद इजरायल और ईरान के बीच सीधी जंग होने की आशंका है। ब्रिक्स बैठक में नरेंद्र मोदी और  जिनपिंग के बीच हुई वार्ता से हालांकि  कुछ बड़ा फायदा तो नहीं हुआ किंतु कूटनीति कब कौन सी करवट ले ले ये कहना मुश्किल है। फिर भी भारत के लिए ये अच्छा है कि अंतर्राष्ट्रीय राजनीति में उसे सम्मानजनक स्थान प्राप्त होने लगा है। रूस और चीन के साथ ब्रिक्स में उसकी भागीदारी के बावजूद अमेरिका उसे रोकने की हिम्मत नहीं कर पा रहा जो साधारण बात नहीं है। राष्ट्रीय हितों की रक्षा के लिए कूटनीति का बुद्धिमत्तापूर्ण उपयोग करने के लिए भारत सरकार प्रशंसा की हकदार है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Wednesday, 23 October 2024

विचारधारा छोड़ चुनाव जीतने वाली मशीन बन रहीं राजनीतिक पार्टियां

हाराष्ट्र और झारखंड  विधानसभा चुनाव में विभिन्न राजनीतिक दलों द्वारा उम्मीदवारों की  सूची जारी की जा रही  है । प्रत्याशियों के बारे में मतदाताओं की पसंद - नापसंद तो मतगणना के बाद ही स्पष्ट होगी लेकिन सूची सार्वजनिक होते ही जिस प्रकार से विरोध और असंतोष देखने मिलता है वह राजनीति के गिरते स्तर का परिचायक है। बड़े नेताओं के मुर्दाबाद के नारे और पुतला दहन , पार्टी दफ्तरों का घेराव और आत्मदाह का प्रयास तक होता है। जिन नेताओं को लोग अपना रहनुमा मानते हैं वे ही टिकिट कटने पर  खलनायक हो जाते हैं । दशकों तक  पार्टी की विचारधारा को धर्मशास्त्रों की तरह पूजने वाले उसे एक झटके में रद्दी की टोकरी में फेंकने से परहेज नहीं करते। नीतिगत निष्ठा , आदर्श सब क्षण भर में बदल  जाते हैं। इसके पीछे यदि नीतिगत मतभेद हो तो बात समझ आती  है किंतु मौजूदा राजनीति  पूरी तरह स्वार्थ केंद्रित हो चली है। नीतियां और नेता भी तभी तक सुहाते हैं जब तक वे स्वार्थों की पूर्ति करते रहें।  अधिकतर लोगों का एकमात्र लक्ष्य चुनाव की टिकिट प्राप्त करना  रह गया है। केंद्रीय मंत्री नितिन गड़करी ने कुछ साल पहले राजस्थान विधानसभा में आयोजित कार्यक्रम में कहा था कि राजनीति में काम करने वालों की महत्वाकांक्षाओं का कोई अंत नहीं  है। विधायक बनने के बाद मंत्री और मंत्री बन जाने के बाद मुख्यमंत्री बन जाने के लिए हाथ - पांव मारे जाते हैं । उस आयोजन में मंच पर कांग्रेस के नेता भी मौजूद थे। हास - परिहास में गहरी और गंभीर बात कह जाने वाले श्री गड़करी  ऐसे राजनेता  हैं जिनको विरोधी भी पसंद करते हैं । बावजूद इसके कि वे रास्वसंघ और भाजपा की विचारधारा के प्रति पूरी तरह प्रतिबद्ध हैं। लेकिन  उनकी अपनी पार्टी में ही  ऐसे लोग लुप्त  होते जा रहे हैं जो निःस्वार्थ भाव से विचारधारा की सेवा करते हों। जहाँ तक  बात कांग्रेस की  है तो  उसमें एक ही परिवार के प्रति  निष्ठा के कारण  विचारधारा नामक तत्व विलुप्त हो चुका है। वहीं देश भर में फैले जो दर्जनों  क्षेत्रीय दल हैं वे किसी नेता या परिवार की जागीर जैसे हैं जिनका उद्देश्य केवल निहित स्वार्थ साधने के लिए सौदेबाजी और अवसरवादी गठबंधन करना  है। वामपंथी दल इस बुराई से दूर माने जाते थे किंतु राष्ट्रीय राजनीति में हाशिए पर सिमटने के कारण वे भी बेमेल गठबंधन करने मजबूर लगे हैं। भाजपा के अंध विरोध में  नकारात्मक राजनीति का शिकार होने से युवा पीढ़ी उनसे विमुख होती जा रही है । जिन  राज्यों की राजनीति  दो ध्रुवीय है उनमें  नेतागिरी के इच्छुक व्यक्ति  मुख्य पार्टियों में संभावनाएं तलाशते हैं।  आजकल सेवा निवृत्त नौकरशाहों को भी राजनीति का चस्का लग गया  है। जिंदगी भर अफसरी करने के बाद सांसद और विधायक बन जाने की योजना के साथ ऐसे लोग  किसी नेता के कृपा पात्र बनकर लालबत्ती हासिल कर लेते हैं। लेकिन ज्योंही  लगता है कि स्वार्थ सिद्ध नहीं हो रहा , पाला बदलने में देर नहीं करते। दरअसल ऐसे लोगों की न तो विचारधारा में रुचि होती है और न ही वे जमीनी कार्यकर्ता बनकर काम करना पसंद करते हैं। लेकिन उनकी वजह से बरसों तक दरी - फट्टा उठाने वाले कार्यकर्ता के मन में भी महत्वाकांक्षा उछाल मारने लगती हैं । और जब लगता है कि उसके योगदान की  कद्र नहीं हो रही तब वह दबाव की राजनीति पर उतारू हो जाता है। हरियाणा और जम्मू - कश्मीर  के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस और भाजपा दोनों को इसका सामना करना पड़ा। झारखण्ड में भी  टिकिट कटते ही पार्टी बदलने का सिलसिला जारी है। क्षेत्रीय दलों का तो खैर कोई ईमान - धर्म नहीं है किंतु राष्ट्रीय पार्टी होने के नाते भाजपा और कांग्रेस को इस सबसे सबक लेना चाहिए। अन्यथा भविष्य में वे केवल चुनाव लड़ने वाली मशीन बनकर रह जाएंगी जिसका विचारधारा से कोई संबंध नहीं होगा । वैसे भी चुनाव जीतने  के लिए पार्टी की नीतियां और कार्यक्रम आकर्षण खो चुके हैं । इसीलिए मुफ्त उपहारों का लालच देकर चुनाव रूपी वैतरणी पार करने  की कोशिश होने लगी है।


- रवीन्द्र वाजपेयी

 

Tuesday, 22 October 2024

आबादी बढ़ाने की होड़ में उ.प्र और बिहार भी शामिल हो गए तो


दो दक्षिण भारतीय  राज्यों के मुख्यमंत्रियों ने जनसंख्या बढ़ाने के लिए जो बयान दिये वे यदि राष्ट्रीय स्तर का मुद्दा बन जाएं तो आश्चर्य नहीं होगा। शुरुआत की आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री चंद्रा बाबू नायडू ने  नव विवाहित महिलाओं से अधिक बच्चे पैदा करने का आग्रह करते हुए जिससे कि युवा आबादी बढ़ सके। उनका मानना है कि युवा दंपत्तियों के बीच एक संतान की सोच बढ़ने से जिस अनुपात में वृद्ध बढ़ रहे हैं उसकी तुलना में युवाओं की वृद्धि दर घट रही है। परिणामस्वरूप भविष्य में  भारत उस जनसांख्यिकीय लाभ से वंचित हो जाएगा जो आज उसकी  बड़ी ताकत है। उन्होंने स्थानीय निकाय चुनाव में दो से अधिक बच्चों वालों को ही चुनाव लड़ने की पात्रता संबंधी कानून बनाये जाने की बात भी  कही। उनके बाद तमिलनाडु के मुख्यमंत्री स्टालिन का बयान आ गया कि नव विवाहित 16 बच्चे पैदा करें। उन्होंने तमिल परंपरा का हवाला देते हुए  कि पहले बुजुर्ग नवविवाहित जोड़ों से कहते थे कि तुम 16 संतानें प्राप्त करो और समृद्ध जीवन जियो, तो इसका मतलब 16 संतानें नहीं बल्कि 16 प्रकार की संपत्ति थी, जिनसे आशय गाय, घर, पत्नी, संतान, शिक्षा, जिज्ञासा, ज्ञान, अनुशासन, भूमि, जल, आयु, वाहन, सोना, संपत्ति, फसल और प्रशंसा से था। लेकिन अब कोई भी  16 प्रकार की संपत्ति प्राप्त करने का आशीर्वाद नहीं दे रहा है, बल्कि केवल पर्याप्त संतान होने और समृद्ध जीवन जीने का आशीर्वाद दे रहा है। उन्होंने अपनी बात स्पष्ट करते हुए कहा कि हमारी जनसंख्या  घटने का असर आगामी परिसीमन में  तमिलनाडु की लोकसभा की सीटें घटने के रूप में देखने मिलेगा।स्मरणीय है  2029 तक  महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत सीटें आरक्षित करने के प्रावधान के कारण  लोकसभा की सीटों को बढ़ाया जाना है। इसके तत्काल बाद तमिलनाडु से ये आवाज उठी कि ऐसा होने पर उत्तर भारतीय राज्यों का संसद में वर्चस्व और बढ़ जायेगा क्योंकि अधिक आबादी के कारण उनकी लोकसभा सीटों में और वृद्धि हो जायेगी। कहा भी जाता है कि दिल्ली की सत्ता का रास्ता लखनऊ से जाता है। यही वजह है कि अधिकतर प्रधानमंत्री उ. प्र से बने। दक्षिण के हिस्से राष्ट्रपति तो ढेर सारे आये किंतु   प्रधानमंत्री मात्र दो ही मिले।  मौजूदा प्रधानमंत्री भी  हालांकि हैं तो गुजरात के किंतु 2014 से लोकसभा में वे वाराणसी का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं। तमिलनाडु दक्षिण का एकमात्र राज्य है जहाँ उत्तर भारत और हिन्दी के प्रति शत्रुता का भाव खुलकर व्यक्त किया जाता है। पूर्व केंद्रीय मंत्री ए. राजा तो हिन्दी थोपे जाने के विरोध में देश से अलग होने जैसा  बयान भी दे चुके हैं। श्रीलंका में लिट्टे ने जब तमिल  देश का संघर्ष छेड़ा तब द्रमुक ने उसका समर्थन किया था। तमिलनाडु से ही हमेशा ये आवाज सुनाई देती रही है कि भारत के मूल निवासी द्रविड़  दक्षिण के हैं जबकि उत्तर भारत में आर्य विदेशों से आकर बसे। इस दावे के पीछे भी मूलतः भारत को दक्षिण और उत्तर में बांटने का षडयंत्र ही है। कुछ समय पहले स्टालिन के बेटे उदयनिधि ने सनातन के विरुद्ध जो निम्नस्तरीय बयान दिया था वह भी दरअसल उत्तर भारतीयों को अपमानित करने के लिए ही था। अधिक संतान उत्पन्न करने संबंधी बयान संयोग से  दो दक्षिणी राज्यों के मुख्यमंत्रियों की ओर से आया किंतु जहाँ श्री नायडू ने देश की चिंता की वहीं स्टालिन को तमिलनाडु की लोकसभा सीटें घटने की चिंता सता रही है। असल में द्रविड़ राजनीति प्रारंभ से ही हिन्दू  और उत्तर भारत की विरोधी रही है। लेकिन स्टालिन ने जनसंख्या बढ़ाने के लिए लोकसभा सीटों के घटने का जो आधार बताया यदि वैसी ही सोच उ.प्र और बिहार में भी विकसित होने लगे तब देश में जनसंख्या विस्फोट अनियंत्रित हो जायेगा। चंद्राबाबू की छवि विकास करने वाले शासक की रही है इसलिए उन्होंने जनसंख्या बढ़ाने का जो कारण बताया वह उनकी रचनात्मक सोच का परिचायक है वहीं स्टालिन की बात में क्षेत्रीयता की बू आती है। वैसे जबसे राहुल गाँधी जाति आधारित जनगणना और जाति की संख्या के आधार पर हिस्सेदारी की बात करने लगे हैं तबसे समाज के उस वर्ग में भी ज्यादा संतान पैदा करने का विचार हिलोरें मारने लगा है जो  जातिगत आरक्षण के चलते अवसरों से वंचित हो रहा है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Monday, 21 October 2024

प्रवासी मजदूरों की हत्या के जरिये कश्मीरी पंडितों को डराने का षडयंत्र


जम्मू - कश्मीर में नई सरकार का गठन हो गया। उम्मीद के मुताबिक  अब्दुल्ला परिवार की तीसरी पीढ़ी के उमर अब्दुल्ला मुख्यमंत्री बन गए। वे पहले भी इस पद पर रह चुके हैं। उनके पिता डाॅ. फारुख अब्दुल्ला ने लंबे समय तक इस राज्य की सत्ता संभाली और उन्हीं के राज में कश्मीर घाटी से कश्मीरी पंडितों का पलायन हुआ। यद्यपि कश्मीर घाटी की राजनीति के दो प्रमुख स्तंभ रहे अब्दुल्ला और मुफ्ती परिवार की ओर से सदैव ये कहा जाता रहा कि बिना पंडितों के कश्मीर अधूरा है लेकिन  सच्चाई यही है कि घाटी के सभी नेताओं की राजनीति पूरी तरह हिन्दू विरोधी रही है। वैसे तो उमर के दादा  शेख अब्दुल्ला के  समय से ही अनेक हिन्दू नेता नेशनल काँफ्रेंस में रहे किंतु किसी को भी उभरने का अवसर नहीं दिया गया। मुख्यमंत्री  पद पर भी हमेशा मुस्लिम ही बैठा। इसका कारण कश्मीर घाटी में विधानसभा की ज्यादा सीटें होना भी था। धारा 370 हटने के बाद हुए परिसीमन में जम्मू क्षेत्र में 43 सीटें हो गईं वहीं घाटी में 47। इस चुनाव में ये संभावना भी व्यक्त की जाने लगी थी कि भाजपा को यदि जम्मू क्षेत्र में भारी सफलता मिली और त्रिशंकु विधानसभा बनी तब  पहली बार हिन्दू मुख्यमंत्री बन सकता है। इस बात की घाटी में जबरदस्त प्रतिक्रिया हुई और वहाँ मुसलमानों ने नेशनल काँफ्रेंस को ऐतिहासिक जीत दिलवाकर भाजपा का रास्ता रोक दिया। उसके विपरीत जम्मू के अनेक हिन्दू बहुल क्षेत्रों में नेशनल काँफ्रेंस , कांग्रेस और आम आदमी पार्टी के विधायक जीत गए। ये भी उल्लेखनीय है कि नेशनल काँफ्रेंस का पूरा चुनाव अभियान पूर्ण राज्य का दर्जा और धारा 370 की बहाली पर केंद्रित रहा। पीडीपी भी इन्हीं बातों पर जोर देती रही। लेकिन कश्मीरी पंडितों की वापसी और पुनर्वास जैसे मुद्दों पर न अब्दुल्ला परिवार ने जोर दिया और न ही मुफ्ती ने। ये बात भी स्वीकार करनी होगी कि केंद्र सरकार ने धारा 370 हटाने के साथ ही जम्मू कश्मीर को केंद्र शासित बनाकर अपने अधीन तो कर लिया किंतु  कश्मीरी पंडितों की वापसी की स्थितियाँ नहीं बन सकीं। जब भी लगा कि माहौल सुधरने को है तभी आतंकवादियों ने  बचे - खुचे कश्मीरी पंडितों की हत्या कर दहशत फैला दी। ये बात तो सही है कि घाटी में आतंकवाद  पाकिस्तान द्वारा प्रायोजित है किंतु बिना स्थानीय समर्थन और संरक्षण के उसका जारी रहना असंभव है। बुरहान वानी जैसे लोगों को महानायक बनाने वाले नेताओं ने ही आतंकवाद को घाटी में कुटीर उद्योग बना दिया। विधानसभा चुनाव के बाद सत्ता उमर अब्दुल्ला के हाथ में आते ही ये उम्मीद लगाई जाने लगी थी कि अब घाटी का माहौल पूरी तरह शांत हो जाएगा। लेकिन  बीते एक सप्ताह में आतंकवादियों ने दो अलग - अलग घटनाओं में अन्य राज्यों से आकर घाटी में मजदूरी कर रहे श्रमिकों को गोलियों से भून डाला। पहली वारदात शोपिया में घटित हुई जहाँ बिहार के दो श्रमिकों की हत्या हुई और उसके बाद गत दिवस खबर आई कि मुख्यमंत्री उमर के  निर्वाचन क्षेत्र गांदरबल में तीन श्रमिकों को मौत के घाट उतार दिया गया जो अन्य किसी राज्य के थे। ये दोनों वारदातें इस बात का संकेत हैं कि राज्य की सत्ता चुनी हुई सरकार के हाथ में आते ही देश विरोधी ताकतों का हौसला बुलंद होने लगा। हालांकि उपराज्यपाल के शासन में भी आतंकवादियों की गतिविधियाँ पूरी तरह नहीं रुकीं किंतु तब केंद्र के शासन के विरुद्ध नाराजगी का बहाना बनाकर उसके औचित्य को ठहराया जाता रहा। लेकिन  सत्ता कश्मीर घाटी के मुस्लिम नेता के हाथों में आने के फौरन बाद  अन्य राज्य से आकर पेट पालने वाले गरीब मजदूरों की अकारण हत्या के जरिये कश्मीरी पंडितों को चेतावनी दे दी गई कि वे घाटी में लौटने का इरादा  त्याग दें । अन्यथा उनको एक बार फिर 1990 जैसी त्रासदी झेलनी होगी। अभी जम्मू कश्मीर केंद्र शासित राज्य ही है। उमर सरकार ने पूर्ण राज्य संबंधी प्रस्ताव पारित कर उपराज्यपाल के जरिये केंद्र सरकार को भेजने की औपचारिकता पूरी कर दी है। केंद्र  यद्यपि 370 की बहाली से तो स्पष्ट तौर पर इंकार कर चुका है किंतु पूर्ण राज्य  पर सहमत  है। लेकिन इस मामले में  जल्दबाजी करने से बचना चाहिए क्योंकि भले ही  उमर ने फिलहाल 370 की बहाली का मुद्दा पृष्ठभूमि में रख दिया हो लेकिन पूर्ण राज्य का दर्जा मिलते ही  वे अपने असली रंग में आ जाएंगे। अब्दुल्ला खानदान का इतिहास भारत विरोधी हरकतों से भरा पड़ा है। इसलिए उमर सरकार पर पैनी नजर रखना होगी। ये इसलिए भी जरूरी है क्योंकि ये सरकार  उन्हीं फारुख के इशारों पर चलेगी जिनके कारण कश्मीरी पंडितों को दर्दनाक हालात में अपना घर -  द्वार छोड़कर भागना पड़ा था। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Saturday, 19 October 2024

आम आदमी पार्टी : हरियाणा के नतीजों ने होश ठिकाने लगा दिये

जरात विधानसभा के पिछले चुनाव के बाद जब आम आदमी पार्टी को राष्ट्रीय पार्टी का दर्जा मिला तब संसद से सड़क तक उसके नेता ये कहते हुए जश्न मनाते दिखे कि महज 10 साल के भीतर इस दल ने ये उपलब्धि हासिल कर ली। दिल्ली के बाद पंजाब में सरकार बनाकर वह पहली ऐसी पार्टी बन गई जिसने एक केंद्र शासित राज्य  में अपना प्रभुत्व कायम करने के बाद किसी पूर्ण राज्य में सरकार बनाई और वह भी प्रचंड बहुमत के साथ। हालांकि वह अनेक राज्यों में हाथ - पाँव मारती रही किंतु गुजरात में 5 विधायकों के अलावा उसे अन्य कहीं उल्लेखनीय सफलता नहीं मिली। गोवा में 2 विधायकों के अलावा उसका एक विधायक हाल ही में जम्मू - कश्मीर में भी चुना गया।  लोकसभा चुनाव में भी आम आदमी पार्टी को अपेक्षित सफलता नहीं मिली। जबकि वह विपक्षी गठबंधन इंडिया का हिस्सा थी। दिल्ली में कांग्रेस के साथ मिलकर लड़ने के बावजूद  उसका सफ़ाया हो गया। पंजाब में उसने अकेले लड़ने का निर्णय करते हुए दावा किया कि वह सभी 13 सीटें जीतकर विधानसभा का प्रदर्शन दोहरायेगी किंतु  3 सीटों से ही संतोष करना पड़ा। चुनाव परिणाम आते ही आम आदमी पार्टी ने ये घोषणा कर दी कि आगे वह  एकला चलो की नीति पर चलेगी। इसके पीछे दिल्ली विधानसभा के आगामी चुनाव हैं जिनमें वह अपना एकाधिकार बनाये रखना चाहेगी। ये भी सही है कि दिल्ली के कांग्रेस नेता आम आदमी पार्टी को फूटी आँखों नहीं देखना चाहते। जिस शराब घोटाले में अरविंद केजरीवाल और मनीष सिसौदिया को जेल जाना पड़ा और अंततः श्री केजरीवाल को मुख्यमंत्री पद छोड़ना पड़ा उसकी शिकायत कांग्रेस ने ही उपराज्यपाल से की थी। उक्त नेताओं के गिरफ्तार होने पर भी प्रदेश कांग्रेस द्वारा खुशी व्यक्त की गई। फिर भी हरियाणा विधानसभा के हालिया चुनाव में आम आदमी पार्टी ने कांग्रेस से गठजोड़ का भरसक प्रयास किया जिसे राहुल गाँधी का भी समर्थन मिला किंतु प्रादेशिक नेताओं विशेष रूप से भूपिंदर सिंह हुड्डा को चूंकि कांग्रेस की लहर का गुमान हो चला था लिहाजा उन्होंने गठबंधन से साफ इंकार कर दिया। इससे क्षुब्ध होकर श्री केजरीवाल ने 90 में से 88 सीटों पर अपने प्रत्याशी उतार दिये। उनको ये आत्मविश्वास था कि  गृह प्रदेश होने के कारण उनकी पार्टी को सम्मानजनक सीटें मिल जाएंगी। वहीं त्रिशंकु की स्थिति में सत्ता का रिमोट कंट्रोल उनके पास होगा। लेकिन परिणाम ने सबको चौंका दिया। सारी अटकलें और अनुमान धरे रह गए और भाजपा ने लगातार तीसरी बार सरकार बनाकर  रिकार्ड कायम कर दिया वहीं कांग्रेस भी 37 सीटों के साथ मजबूत विपक्ष बनने में सफल हो गई। लेकिन आम आदमी पार्टी के हिस्से में सभी उम्मीदवारों की जमानत जप्त होने की बदनामी ही आई।  हरियाणा में हुई फजीहत से भन्नाई आम आदमी पार्टी के जले पर नमक छिड़क दिया दिल्ली कांग्रेस के नेताओं ने उसका मजाक उड़ाकर। इसीलिए उसके तत्काल बाद आम आदमी पार्टी का बयान दिल्ली विधानसभा का चुनाव अकेले लड़ने के बारे में आ गया। साथ ही उसने कांग्रेस के अहंकार पर भी तंज कसा। इस प्रतिक्रिया से ये अंदाज लगने लगा कि श्री केजरीवाल अपनी पार्टी की अलग पहिचान बनाने के लिए महाराष्ट्र और झारखंड में अकेले उतरेंगे। लेकिन पार्टी की ओर से इसके विपरीत ये बयान आ गया कि वह उक्त राज्यों के चुनाव से दूर रहेगी और अपना पूरा ध्यान दिल्ली पर केंद्रित करेगी। इस प्रकार ये स्पष्ट हो गया कि हरियाणा की हार ने श्री केजरीवाल की असीमित महत्वाकांक्षाओं को धक्का पहुंचाया है। थोक के भाव हुई जमानत जप्ती के कारण वे महाराष्ट्र और झारखंड के मुकाबले में शामिल होने की हिम्मत ही नहीं कर सके। वैसे इस फैसले से  लगने लगा है कि आम आदमी पार्टी को अब जाकर ये समझ में आया कि एक दो राज्यों में मिले मतों के आधार पर भले ही  उसे राष्ट्रीय पार्टी का दर्जा मिल गया किंतु राष्ट्रीय पार्टी होना इतना आसान नहीं है। आम आदमी पार्टी यदि दिल्ली में मिली सफलता से अति उत्साहित होकर पैर फैलाने की जल्दबाजी न करती तब शायद उसका दामन दाग़दार न हुआ होता। प्रधानमंत्री और भाजपा से बेवजह टकराने की जिद में श्री केजरीवाल को उन नेताओं के साथ मंच पर खड़ा होने मजबूर होना पड़ा जिन्हें वे सबसे भ्रष्ट की सूची में रखते थे। ये देखते हुए उसके लिए यही बेहतर होगा कि वह धैर्य पूर्वक आगे बढ़े। बिना मजबूत संगठन और स्पष्ट विचारधारा के राष्ट्रीय स्तर पर फैलाव करना आसान नहीं होता। आज की स्थिति में पंजाब में आम आदमी पार्टी सरकार तेजी से अलोकप्रिय होती जा रही है वहीं दिल्ली में भी उसकी साख और धाक दोनों में कमी आई है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Friday, 18 October 2024

प्रतिमा की आँखों से पट्टी हटाने मात्र से कानून का अंधापन दूर नहीं होगा


सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश डी. वाय. चंद्रचूड़ आगामी 10 नवम्बर को सेवानिवृत होने जा रहे हैं।  उनके 2 वर्ष के कार्यकाल में सर्वोच्च न्यायालय ने अनेक महत्वपूर्ण फैसले सुनाए। गत दिवस भी बांग्ला देश से आये घुसपैठियों के सम्बन्ध में भी एक साहसिक निर्णय सुनाया गया। उल्लेखनीय है श्री चंद्रचूड़ के स्वर्गीय पिता सर्वोच्च न्यायालय में सर्वाधिक लंबे समय तक मुख्य न्यायाधीश रहे थे। ऐसे में ये कहा जा सकता है कि न्यायपालिका में वंशवाद की जो परंपरा चली आ रही है वे भी उससे लाभान्वित हुए होंगे किंतु उनकी शैक्षणिक और पेशेवर योग्यता को देखते हुए उक्त अवधारणा गलत प्रतीत होती है। श्री चंद्रचूड़ ने अपने पिता द्वारा अतीत में दिये फैसले को उलटने तक का उदाहरण पेश किया था। अनेक मामलों में उनका सरकार से टकराव भी देखने मिला। इलेक्टोरल बाँड प्रकरण इसका प्रमाण है। लेकिन उन्होंने सर्वोच्च न्यायालय की कार्य पद्धति में सुधार के जो प्रयास किये वे प्रशंसनीय हैं। हालांकि उनका कितना असर हुआ इसका आकलन तो भविष्य में ही हो सकेगा किंतु  राष्ट्रीय महत्व के  सम - सामयिक मुद्दों पर वे जिस बेबाकी से अपने विचार व्यक्त करते रहे वह प्रभावित करने वाला है। अपने कार्यकाल के अंतिम दिनों में गत दिवस उनके एक और कार्य ने लोगों का ध्यान आकर्षित किया। न्यायालयों में आँख पर पट्टी बांधे , एक हाथ में तराजू और दूसरे में तलवार लिये न्याय की देवी की जो प्रतिमा देखने मिलती है वह मिस्र और ग्रीक से होते हुए अंग्रेजों के जमाने में भारत आई और इसे जन - जन में पहचान दिलवाने में फिल्मों की भी भूमिका रही। इस प्रतिमा का प्रतीकात्मक संदेश ये है कि न्याय की अपनी आँखें नहीं होतीं वह साक्ष्य पर आधारित व्यवस्था है जो उसके समक्ष खड़े व्यक्ति को न देख पाने के कारण उससे प्रभावित नहीं होती। उसके हाथ में तराजू से आशय न्याय के समक्ष सब समान हैं और तलवार इस बात का संकेत है कि अपराधी को दंड मिलकर रहेगा। इसी प्रतिमा के कारण अंधा कानून जैसे कटाक्ष प्रचलित हुए। गत दिवस ये समाचार आया कि श्री चंद्रचूड़ ने न्याय देवी की एक नई प्रतिमा बनवाकर सर्वोच्च न्यायालय के  पुस्तकालय भवन के  सामने  रखवाई है जिसकी आँखों में पट्टी नहीं  बंधी और  हाथों में तराजू के अलावा संविधान है। वैसे  ये प्रतिमा गत वर्ष ही लगा दी गई थी किंतु  उसकी खबर अब जाकर सार्वजनिक हुई। आँखों में पट्टी बांधे हुए न्याय की देवी की प्रतिमा देखने के आदी हो चुके लोगों को श्री चंद्रचूड़ की इस परिकल्पना में निहित सदाशयता कितनी पसंद आयेगी ये फ़िलहाल कहना कठिन है । लेकिन इस समाचार के प्रसारित होते ही  टिप्पणियाँ आने लगीं कि क्या न्याय देवी की प्रतिमा की आँखों से पट्टी हटने मात्र से न्याय व्यवस्था उन तमाम आरोपों से बरी हो सकेगी जो उस पर आये दिन लगते हैं। अंधा कानून जैसा शब्द सही मायनों में समाज के उस बड़े वर्ग के गुस्से की अभिव्यक्ति  है जो न्यायपालिका की देहलीज पर बड़ी उम्मीद लिए जाता है किंतु वहाँ के क्रियाकलापों को देखकर उसका मन खिन्न हो उठता है। पेशियाँ बढ़ना  , वकीलों की मोटी फीस , प्रकरणों के विशाल ढेर के मुकाबले  न्यायाधीशों की बेहद कम संख्या और न्यायपालिका में घुस गया भ्रष्टाचार का वायरस इस पवित्र पेशे की प्रतिष्ठा को धक्का पहुंचाने वाला है। न्यायाधीशों की नियुक्ति के लिए  प्रचलित कालेजियम व्यवस्था को जारी रखने की अकड़ ने भी न्यायपालिका के प्रति सम्मान को घटाया । ये देखते हुए श्री चंद्रचूड़ यदि राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग को मान्यता देने का साहस दिखाते तब वह न्याय व्यवस्था  में सुधार की दिशा में उनका ऐतिहासिक योगदान होता। लोकतंत्र के जो तीन स्थापित स्तंभ हैं उनमें न्यायपालिका ही है जो विधायिका और कार्यपालिका दोनों के निर्णयों की समीक्षा करने का अधिकार रखती है। संसद के पास भले ही कानून बनाने का अधिकार होने से उसको सर्वोच्च माना जाता है किंतु जब बात कानून के राज की आती है तब न्यायपालिका का फैसला ही मान्य होता है। अपवादस्वरूप जब भी किसी सत्ताधीश ने न्यायपालिका से टकराने का दुस्साहस किया तो जनता ने उसे सजा दी। स्व. इंदिरा गाँधी और स्व. राजीव गाँधी इसके उदाहरण हैं। संसद के दोनों सदनों द्वारा सर्वसम्मति से पारित राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग के गठन के प्रस्ताव को रद्द किये जाने के बाद यदि संसद चाहती तो अपनी सर्वोच्चता का प्रदर्शन कर सकती थी किंतु उसने न्यायपालिका का लिहाज किया। बेहतर होता श्री चंद्रचूड़ ऐसा कुछ कर जाएं जो न्याय व्यवस्था में विश्वास को पुनर्स्थापित कर सके। न्याय की देवी की आँखों से पट्टी हटवाने की उनकी पहल निश्चित रूप से स्वागत योग्य है किंतु मात्र इतना कर देने से कानून के अंधेपन को लेकर जनमानस में व्याप्त अवधारणा दूर नहीं होगी। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Thursday, 17 October 2024

धारा 370 बहाल करने की मांग से दूर भाग रही कांग्रेस



जम्मू - कश्मीर में सरकार का गठन हो गया। मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने जम्मू क्षेत्र से सुरेंद्र चौधरी  को उपमुख्यमंत्री बनाये जाने के साथ ही निर्दलीय रमेश शर्मा को भी मंत्री बनाया  है। तीन मुस्लिम विधायक भी मंत्री बने। 90 सदस्यों वाली विधानसभा में  10 मंत्री बनाये जा सकते हैं। अभी 4 स्थान रिक्त हैं।   हालांकि राहुल गाँधी और प्रियंका वाड्रा भी उमर की ताजपोशी में शामिल हुए किंतु सरकार में कांग्रेस की गैर मौजूदगी ने राजनीतिक चर्चाओं को जन्म दे दिया। विधानसभा चुनाव के पूर्व हुए  गठबंधन में नेशनल काँफ्रेंस को 51 और काँग्रेस को 32 सीटें मिली थीं। नतीजों में नेशनल काँफ्रेंस ने तो 42 सीटें जीतकर अपना वर्चस्व दिखा दिया जबकि कांग्रेस केवल 6 सीटें जीत पाई। उसमें भी 5 कश्मीर घाटी में थीं ।  जम्मू क्षेत्र में उसे नेशनल काँफ्रेंस ने भाजपा के हिन्दू वोट बैंक में सेंध लगाने का जिम्मा सौंपा किंतु उसे मात्र एक सीट मिली। बाकी की 5 नेशनल काँफ्रेंस के प्रभाव क्षेत्र में  मिलीं। इस कारण कांग्रेस की वजनदारी गठबंधन में कम हो गई। यदि वह 10 सीटें जीत लेती तब  उपमुख्यमंत्री पद उसकी झोली में आता। उमर अब्दुल्ला को कुछ निर्दलीय और आम आदमी पार्टी के अकेले विधायक का समर्थन मिलने से उनके सामने बहुमत की समस्या नहीं रही । लेकिन इसके अलावा भी कांग्रेस के सरकार से बाहर रहने का एक अन्य कारण राजनीतिक जगत में चर्चा का विषय बना हुआ है। दरअसल हरियाणा के चुनाव परिणाम ने कांग्रेस को दहशत में डाल दिया है। लोकसभा चुनाव में हिन्दू मतों के बिखराव ने उसका हौसला मजबूत कर दिया था। फ़ैज़ाबाद सीट पर भाजपा की हार को वह जरूरत से ज्यादा प्रचारित कर रही थी। लेकिन हरियाणा में भाजपा ने जिस तरह से समीकरण अपने पक्ष में किये उसके बाद कांग्रेस को महाराष्ट्र में  खतरा नजर आने लगा। उसके रणनीतिकारों को ये लगने लगा कि मुस्लिम तुष्टीकरण के आरोप से उसे बचना होगा वरना वहाँ हिंदुओं का ध्रुवीकरण भाजपा के पक्ष में  होते देर नहीं लगेगी। ऐसे में जम्मू कश्मीर सरकार का हिस्सा बनने पर वह धारा 370 की वापसी जैसे मुद्दे पर अपनी सहमति देने मजबूर हो जाती। उल्लेखनीय है विधानसभा चुनाव के दौरान नेशनल कांफ्रेंस ने तो धारा 370 की बहाली के साथ ही जम्मू - कश्मीर को पूर्ण राज्य बनाये जाने का मुद्दा अपने घोषणापत्र में शामिल किया और उस पर ही पूरे अभियान को केंद्रित रखा। वहीं  कांग्रेस ने पूर्ण राज्य के दर्जे की बात तो उठाई  किंतु 370 की बहाली पर मौन साधे रही। यदि  हरियाणा में वह सरकार बना ले जाती तब शायद इस विषय पर कांग्रेस भी नेशनल काँफ्रेंस के सुर में सुर मिलाती नजर आती किंतु नतीजा उल्टा आने के बाद लोकसभा चुनाव के बाद पैदा हुआ उत्साह हवा -  हवाई हो गया। नेशनल काँफ्रेंस तो ये कहती फिर रही है कि जम्मू कश्मीर के मतदाताओं ने केंद्र सरकार द्वारा धारा 370 हटाये जाने के विरुद्ध जनादेश दिया है। लेकिन कांग्रेस केवल इस बात की खुशी जताकर चुप हो गई राज्य की जनता ने भाजपा को पराजित कर दिया। पार्टी के रुख में आया यह बदलाव उसके मन में उत्पन्न डर का परिचायक है। बरखा दत्त जैसी भाजपा विरोधी पत्रकार भी ये लिखने में संकोच नहीं कर रहीं कि जम्मू कश्मीर और हरियाणा में भले स्कोर 1- 1 रहा किंतु हारी तो कांग्रेस ही। यू ट्यूब पर राहुल गाँधी के पक्ष में माहौल बनाने में जुटे पत्रकार भी हरियाणा की हार और जम्मू  -  कश्मीर में शर्मनाक प्रदर्शन के लिए जिस प्रकार से कांग्रेस नेतृत्व को भला - बुरा कह रहे हैं वह अप्रत्यक्ष तौर पर राहुल की ही आलोचना है। लोकसभा में मिलीं 99 सीटों का पूरा श्रेय कांग्रेस समर्थक प्रचारतंत्र ने चूंकि श्री गाँधी को दे दिया था इसलिए हरियाणा की पराजय को राज्य स्तर पर भले ही भूपिंदर हुड्डा के माथे मढ़ दिया गया किंतु राष्ट्रीय स्तर पर तो उसके लिये राहुल को ही जिम्मेदार माना जा रहा है। ऐसे में महाराष्ट्र में पार्टी किसी भी प्रकार का जोखिम उठाने तैयार नहीं दिखती।  उल्लेखनीय है इस मुद्दे पर ठाकरे परिवार भी प्रारंभ से ही भाजपा के साथ खड़ा रहा है।


-रवीन्द्र वाजपेयी

Wednesday, 16 October 2024

महाराष्ट्र : भाजपा - कांग्रेस दोनों के लिए बड़ी चुनौती


चुनाव आयोग ने आखिरकार महाराष्ट्र और  झारखण्ड विधानसभा के साथ ही लोकसभा और विधानसभा की कुछ सीटों हेतु उपचुनावों की तारीख घोषित कर दी। जम्मू - कश्मीर और हरियाणा विधान सभा के चुनाव संपन्न होने के बाद से ही उक्त दोनों राज्यों के चुनाव पर पूरे देश की नजरें लगी हुई हैं। लोकसभा चुनाव के बाद से विपक्ष काफी उत्साहित था । उ.प्र के बाद महाराष्ट्र वह राज्य है जिसमें सत्ता होने के बाद भी भाजपा को जबरदस्त झटका लगा। राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार झारखंड में तो भाजपा के लिए अनुकूल परिस्थितियाँ निर्मित होती दिख रही हैं। चंपई सोरेन के भाजपा में आने से सत्ताधारी झामुमो को जबरदस्त झटका लगा है। जानकार मान रहे हैं कि उनके प्रभाव वाली 14 सीटों  पर भाजपा को लाभ मिल जाएगा । लेकिन महाराष्ट्र में  भाजपा - शिवसेना - एनसीपी गठबंधन को अपनी सरकार बचाने के लिए जबरदस्त संघर्ष करना पड़ेगा। इसकी वजह साफ है। झारखंड में झामुमो केवल हेमंत सोरेन और उनके परिवार पर निर्भर है। चंपई उनके बेहद भरोसेमंद थे तभी जेल जाने के समय उन्होंने तमाम अटकलों के विपरीत अपनी पत्नी की बजाय  उनको मुख्यमंत्री बनाया। जबकि भाजपा के पास वहाँ राज्य स्तरीय मजबूत नेतृत्व है और लोकसभा चुनाव में भी वह 14 में से 8 सीटों पर विजयी हुई। हरियाणा जीतने के बाद उसका हौसला और बुलंद हुआ है। झारखंड के पड़ोसी बिहार, छत्तीसगढ़ और उड़ीसा में भी भाजपा सत्ता में है, ऐसे में उसके लिए इस आदिवासी राज्य में मुकाबला आसान है। लेकिन महाराष्ट्र में भाजपा को विपक्ष से पहले  अपने सहयोगी दलों से निपटना होगा। राजनीतिक जगत में चल रही चर्चाओं के मुताबिक मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे और उपमुख्यमंत्री अजीत पवार क्रमशः अपनी पार्टी शिवसेना और एनसीपी के लिए ज्यादा से ज्यादा सीटें मांगकर उस पर दबाव बना रहे हैं। पार्टी की मजबूरी ये है कि उसे उनके समर्थन की कीमत चुकानी पड़ेगी। लोकसभा चुनाव में भाजपा ने 9 , शिवसेना ने 8 , एनसीपी ने 1 एक सीट जीती थी। ऐसे में मुख्यमंत्री शिंदे भाजपा पर ज्यादा से ज्यादा सीटों का दबाव बनाएंगे तो उसे ठुकरा देना उसके लिए आसान नहीं होगा। इसी तरह अजीत पवार की एनसीपी का भले ही एक सांसद जीता लेकिन शरद पवार के असर वाले इलाकों में वे ही बराबरी से मुकाबला कर सकेंगे। लिहाजा भाजपा को उनके नखरे भी उठाने होंगे। अजीत के कुछ हालिया बयानों से भाजपा आशंकित है कि कहीं चुनाव के समय वे वापस चाचा के चरणों में न गिर जाएं। बारामती सीट पर उनकी बेटी सुप्रिया सुले के विरुद्ध अपनी पत्नी को लड़वाने पर वे खेद व्यक्त कर ही चुके हैं। अजीत के लिए ये चुनाव अस्तित्व की रक्षा करने का अंतिम अवसर है। अपने साथ आये विधायकों को अगर वे टिकिट न दिलवा सके तो वे वापस शरद पवार के पास लौट सकते हैं । भाजपा को उन्हें साथ   रखना जरूरी है क्योंकि उनके महायुति छोड़ देने से भाजपा को मनोवैज्ञानिक तौर पर बड़ा झटका लगेगा। ये भी गौरतलब है कि विपक्ष के पास शरद पवार, उद्धव ठाकरे जैसे बड़े चेहरे हैं। कांग्रेस का भी महाराष्ट्र पुराना गढ़ रहा है। ऐसे में देवेंद्र फड़नवीस, एकनाथ शिंदे और अजीत पवार के बल पर सरकार बनाने के लिए जरूरी 145 सीटों से अधिक जीतना आसान नहीं होगा। महिलाओं को 1500 रु. प्रति माह देने की योजना जरूर असर दिखा सकती है। इसके अलावा देश भर से आ रही खबरों से  हिन्दू मतदाताओं के एक बार फिर भाजपा के पाले में जाने की संभावना भी बढ़ी है। जहाँ तक बात महा विकास आगाड़ी की है तो हरियाणा चुनाव के बाद कांग्रेस अब दबाव बनाने की स्थिति में नहीं है। नतीजे आते ही शिवसेना उद्धव गुट ने कांग्रेस पर हमला बोलते हुए उससे पूछा कि यदि वह अकेले लड़ना चाहती है तो बताये। पार्टी के मुखपत्र सामना में तो यहाँ तक लिखा गया कि जीती हुई बाजी कैसे हारी जाती है ये कांग्रेस से सीखा जा सकता है। उद्धव गुट के साथ ही शरद पवार भी कांग्रेस के सामने कड़ी शर्तें रखने से बाज नहीं आयेंगे क्योंकि उनके लिए ये चुनाव साख बचाने का अवसर है। अगाड़ी में कांग्रेस की वही स्थिति है जो महायुति में भाजपा की है। हरियाणा हारने के बाद कांग्रेस के लिए महाराष्ट्र जीतना नितांत आवश्यक हो गया है। दूसरी तरफ भाजपा के लिए भी इस बड़े राज्य में सरकार की वापसी के जरिये लोकसभा चुनाव की हार से उबरने का मौका है। यदि वह ऐसा कर सकी तब वह शरद पवार और उद्धव ठाकरे के राजनीतिक भविष्य को अंधकारमय बना सकेगी। साथ ही शिवसेना और एनसीपी में असली नकली का फैसला भी हो जाएगा। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Tuesday, 15 October 2024

बहराइच के दंगे में छिपे हैं भविष्य के खतरे


उ.प्र का बहराइच जिला सांप्रदायिक दंगे की आग में झुलस रहा है। देवी प्रतिमा विसर्जन जुलूस के समय एक मुस्लिम युवक द्वारा माइक का तार निकालने से विवाद शुरू हुआ।  जुलूस पर पथराव होने से प्रतिमा  खंडित हो गई। इससे विवाद और बढ़ा। इसके बाद एक हिन्दू युवक को घर के भीतर ले जाकर गोली मार दी गई। गोली मारने वाले मुस्लिम युवक सहित अन्य उपद्रवियों को गिरफ्तार कर लिया गया किंतु दंगे की आग पूरे जिले में फैल गई। दोनों तरफ से आरोप - प्रत्यारोप चल रहे हैं। राजनीति भी अपनी चिर - परिचित शैली में शुरू हो गई है। दोषियों को दंडित करवाने की कोशिशों के बजाय वोट बैंक की फिक्र में सपा प्रमुख अखिलेश यादव सरकार पर हमला करने में जुट गए हैं। उनके मुँह से
हत्या करने वालों की निंदा का एक शब्द भी नहीं निकला। उल्टे वे भाजपा पर आरोप लगा रहे हैं। उल्लेखनीय है उ.प्र की 10 विधानसभा सीटों के उपचुनाव होने वाले हैं। उनमें से कुछ में मुस्लिम मतदाताओं की अच्छी खासी संख्या है। सपा द्वारा घोषित उम्मीदवारों में दो मुस्लिम भी हैं। हालांकि सपा अध्यक्ष द्वारा उक्त घटना को लेकर जो रवैया प्रदर्शित किया जा रहा है वह नया नहीं है क्योंकि श्री यादव के पिता स्व. मुलायम सिंह यादव ने मुस्लिम तुष्टीकरण में कांग्रेस को भी पीछे छोड़ दिया था।  माय (मुस्लिम - यादव ) नामक गठजोड़  बिहार में भी बना जिसके चलते मुलायम सिंह और लालू प्रसाद यादव की दूसरी पीढ़ी भी सत्ता का स्वाद चख सकी। राम मंदिर आंदोलन के कारण मुस्लिम समाज कांग्रेस से दूर होने लगा। इसका फ़ायदा उठाकर सपा ने मुस्लिम वोट बैंक पर नजर जमाई और उसे अपने पाले में खींचने के लिए मुलायम सिंह राम भक्तों पर गोली चलवाने तक में नहीं हिचके। उधर बिहार में लालू ने लालकृष्ण आडवाणी की रथ यात्रा रोककर खुद को मुस्लिम हितैषी साबित करने का दाँव खेला। इसके जवाब में हिंदुओं का झुकाव भाजपा की तरफ हुआ। इस खेल में सबसे अधिक नुकसान हुआ कांग्रेस का जिसके हाथ से हिन्दू और मुसलमान दोनों खिसक गए। दलित वोट बसपा ने समेट लिए। लंबे समय तक मुस्लिम मतदाता सपा और राजद का  साथ देते रहे। लेकिन बीते लोकसभा चुनाव में अपने धर्मगुरुओं के निर्देशानुसार मुस्लिम उन्होंने  भाजपा को हराने में सक्षम प्रत्याशी को मत देने की रणनीति अपनाई जो उ.प्र में सर्वाधिक कारगर साबित हुई। महाराष्ट्र सहित कुछ और राज्यों में भी इसका असर हुआ जिससे भाजपा लोकसभा में स्पष्ट बहुमत से वंचित रह गई। सबसे बड़ा झटका उसे उ.प्र में ही लगा जहां मोदी - योगी की जुगलबंदी को मुस्लिम गोलबंदी ने ध्वस्त कर दिया। यहाँ तक कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी वाराणसी में भी बहुत कम मतों से जीते। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह भी लखनऊ में 70 हजार के मामूली अंतर से जीत सके। कई दशक बाद उ.प्र में भाजपा सपा से पीछे रह गई। हालांकि इसके पीछे दलितों की भूमिका भी रही किंतु मुस्लिम समुदाय के मन में इस बात का एहसास पैदा हो गया कि  भाजपा को 240 सीटों पर रोकने का पराक्रम उसी ने किया। जाहिर है इससे उसका हौसला बुलंद हुआ जिसकी परिणिति देश में हिंदुओं के धार्मिक आयोजनों पर पथराव के रूप में हुई। सांप्रदायिक विवाद देश में पहले भी होते आये हैं किंतु इस वर्ष गणेशोत्सव और दुर्गा पूजा पर जिस तरह का उत्पात देखने मिला वह खतरनाक संकेत है। हिन्दू देवी - देवताओं की प्रतिमाओं को ले जाने से रोकना और उन पर पत्थर फेंककर खंडित करने जैसी घटनाएं बड़ी  संख्या में होना ये दर्शाता है कि इसके पीछे शातिर दिमाग काम कर रहे हैं। मुसलमानों की ये शिकायत जायज है कि मस्जिद के सामने जान - बूझकर उत्तेजित करने वाली गतिविधियां होने से विवाद पैदा होते हैं किंतु देवी प्रतिमा के जुलूस को मार्ग बदलने बाध्य करने की जिद करने वालों को रोकने उस समाज के जिम्मेदार लोग सामने क्यों नहीं आते ये बड़ा सवाल है। बहराइच में जिस हिन्दू युवक को मुस्लिमों द्वारा गोली मार दी गई यदि उसने कुछ गलत किया था तो उसे पकड़कर कानून के हवाले करना चाहिए था। लेकिन जैसा कि पिछली पंक्तियों में लिखा गया है लोकसभा चुनाव के बाद बनी राजनीतिक परिस्थितियों में मुस्लिम समाज में जो विजयोन्माद उत्पन्न हुआ उसके कारण अनेक शहरों में सांप्रदायिक तनाव देखने मिल रहा है। विजयादशमी पर रास्वसंघ के पथ संचलन पर पथराव की घटनाएं भी पहली बार हुईं। इस सबके पीछे राजनीतिक दलों की भूमिका भी है जो मुस्लिम समाज को समझाने के बजाय उल्टा भड़काते हैं। उ.प्र से आ रही खबरें निश्चित रूप से चिंतित करने वाली हैं। योगी सरकार के राज में कानून व्यवस्था काफी सुधर गई है। अपराधियों के विरुद्ध सख्ती बरती जाने से जनता राहत महसूस कर रही है। लेकिन वोट बैंक की लालच में अपराधियों को संरक्षण देने की जिस नीति पर सपा जैसे दल चल रहे हैं वह समाज विरोधी है। अशांति फैलाने वाला चाहे हिन्दू हो या  मुसलमान , उसके विरुद्ध कड़ी  कार्रवाई होनी चाहिए। धर्म  के नाम पर किसी को कानून अपने हाथ में लेने का अधिकार नहीं है। उ.प्र सरकार को हालात पर पैनी निगाह रखनी होगी क्योंकि जल्द ही वहाँ 10 विधानसभा सीटों पर उपचुनाव होने जा रहे हैं। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Monday, 14 October 2024

जातीय जनगणना और मुस्लिम तुष्टीकरण से कांग्रेस को नुकसान होने लगा



 जम्मू - कश्मीर और हरियाणा के चुनाव नतीजों का तरह- तरह से विश्लेषण हो रहा है। पहले राज्य में तो   कश्मीर घाटी के अलावा जम्मू अंचल की भी कुछ सीटें मुस्लिम बाहुल्य होने से नेशनल काँफ्रेंस और कांग्रेस गठबंधन की बढ़त साफ  दिखाई दे रही थी।  नेशनल काँफ्रेंस द्वारा धारा 370 की बहाली का जो मुद्दा उठाया गया उसका लाभ उसे मिला। पीडीपी के अलावा जमायत ए इस्लामी, राशिद इंजीनियर और उन जैसे कुछ अन्य अलगाववादी गुटों के उम्मीदवारों  के सफाये से स्पष्ट हो गया कि मुस्लिम  मतदाताओं ने रणनीतिक मतदान किया। उनको डर था कि त्रिशंकु विधानसभा बनने पर भाजपा उसका लाभ उठा लेगी । दूसरी तरफ जम्मू की हिन्दू बहुल सीटों पर भाजपा के पक्ष में जमकर ध्रुवीकरण हुआ। हालांकि कुछ सीटों पर बागियों ने  खेल बिगाड़ा जिससे  प्रदेश  अध्यक्ष रवीन्द्र रैना चुनाव हार गए। यदि भाजपा 35 सीटें जीत जाती तब सत्ता की चाभी उसके पास होती किंतु घाटी में मुस्लिम मतदाताओं का ध्रुवीकरण इतना जबरदस्त था कि उसने भाजपा की उम्मीदों को पूरा होने से रोक दिया। लेकिन ये भी सही है कि घाटी से आ रही खबरों के कारण ही जम्मू के हिन्दू बहुल क्षेत्रों में भाजपा 29 सीटें जीतकर मजबूत विपक्ष के तौर पर उभरी। जहाँ तक बात हरियाणा की है तो वहाँ मुस्लिम आबादी कुछ सीटों पर निर्णायक स्थिति में होने से  भाजपा के लिए कोई गुंजाइश नहीं थी। चुनाव परिणाम ने इस बात को साबित भी कर दिया। पाँच मुस्लिम बहुल सीटों पर कांग्रेस की इकतरफा जीत हुई। लेकिन उन सीटों से आ रहे संकेतों ने प्रदेश में कांग्रेस के समीकरण बिगाड़ दिये जो जाट, दलित और मुस्लिम मतदाताओं के एकमुश्त समर्थन की उम्मीद पर सवार होकर अपनी जीत को निश्चित मानकर चल रही थी। लोकसभा चुनाव के बाद से देश भर से आ रही खबरों ने गैर मुस्लिम मतदाताओं को भी भाजपा के पक्ष में खड़ा किया। नूह में हुए दंगों में हिंदुओं की जो पिटाई हुई थी उसकी यादों ने विधानसभा चुनाव में हिन्दू मतदाताओं को भावी खतरों के प्रति आगाह कर दिया। यही वजह रही कि ओबीसी , ब्राह्मण और वैश्य मतदाताओं के अलावा दलितों और जाटों के मत भी भाजपा की तरफ लुढ़क गए। ये बदलाव इतनी खामोशी से हुआ कि चुनाव विश्लेषक और सर्वेक्षण एजेंसियां तक नहीं भांप सकीं। चुनाव परिणाम से भौंचक कांग्रेस पहले तो ईवीएम और चुनाव आयोग पर उंगलियाँ उठाती रही लेकिन धीरे - धीरे उसे समझ में आ गया कि बाजी हाथ से निकल चुकी है। पार्टी के भीतर आरोप - प्रत्यारोप का सिलसिला भी शुरू हो गया। दलित चेहरे के रूप में मुख्यमंत्री पद की दावेदार कु. शैलजा की नाराजगी को भी वजह माना गया किंतु स्वतंत्र विश्लेषकों ने जम्मू - कश्मीर और हरियाणा के चुनाव परिणामों से  निष्कर्ष निकाला कि कांग्रेस द्वारा जातीय जनगणना और मुस्लिम तुष्टीकरण पर जिस तरह जोर दिया उसने एक बार फिर हिन्दू मतदाताओं के ध्रुवीकरण की स्थितियाँ उत्पन्न कर दीं। कश्मीर घाटी में मुस्लिमों के गोलबंद होने की प्रतिक्रिया स्वरूप जम्मू में गैर मुस्लिम मत भाजपा के पक्ष में एकजुट हुए। इसी तरह हरियाणा में भी कांग्रेस द्वारा बनाई गई रणनीति इसलिए विफल साबित हुई क्योंकि उसने जाटों के साथ दलितों और मुस्लिमों के बल पर चुनाव जीतने का ख्वाब देखा। लेकिन यहाँ भी जाति के ऊपर हिंदुत्व भारी पड़ा जिसका प्रमाण जाट बाहुल्य अनेक सीटों पर भाजपा की विजय है। ये भी तब हुआ जब भाजपा ने गैर जाट नायब सिंह सैनी को मुख्यमंत्री के तौर पर प्रस्तुत किया । जबकि कांग्रेस में भूपिंदर सिंह हुड्डा ही चेहरे थे। इससे मुख्यमंत्री पद के अन्य दावेदार कोप भवन में चले गए वहीं गैर जाट मतदाताओं में भी कांग्रेस के प्रति असंतोष बढ़ा। भाजपा को मुख्यमंत्री बदले जाने का लाभ लोकसभा चुनाव में भले न मिला हो किंतु विधानसभा चुनाव में श्री हुड्डा के मुकाबले नायब सिंह को लोगों ने पसंद किया। जम्मू - कश्मीर के  चुनाव का राष्ट्रीय राजनीति पर उतना असर नहीं पड़ता किंतु हरियाणा  ने पूरा राजनीतिक परिदृश्य बदल दिया। 4 जून के बाद से जो कांग्रेस हवा में उड़ रही थी वह जमीन पर आ गई। राहुल गाँधी द्वारा जाति के मुद्दे को ज्यादा हवा दिये जाने पर भी सवाल उठे। ये भी कहा गया कि वक़्फ़ संशोधन पर कांग्रेस का विरोध हिंदुओं को रास नहीं आ रहा। बीते कुछ महीनों में हिंदुओं के धर्म स्थलों और धार्मिक जुलूसों पर हुए हमलों ने लोकसभा चुनाव में भाजपा से नाराज जातीय समूहों को उसके तरफ लौटने के लिए प्रेरित किया। इसका संकेत हरियाणा से मिल गया है। इससे महाराष्ट्र और झारखंड विधानसभा के चुनाव में भाजपा का हौसला जहाँ मजबूत हुआ वहीं कांग्रेस विशेष रूप से राहुल गाँधी का दबदबा कम हुआ है। इंडिया गठबंधन के सहयोगी भी अब ऊँची आवाज में बोलने लगे हैं। मोदी - योगी द्वारा बंटोगे तो कटोगे का जो नारा लगाया जा रहा है उसकी चर्चा  हिन्दू समाज में होने लगी है। 

- रवीन्द्र वाजपेयी


Saturday, 12 October 2024

सनातन , हिंदुत्व और हिन्दू राष्ट्र के प्रति बढ़ता समर्थन संघ की उपलब्धि





राष्ट्रवाद और हिंदुत्व की अलख जगाने के लिए 1925 में विजयादशमी के दिन नागपुर में स्व. डाॅ. केशव बलीराम हेडगेवार ने मुट्ठी भर लोगों के साथ जिस राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ नामक संगठन की स्थापना की थी वह शताब्दी वर्ष में प्रविष्ट हो गया। स्वाधीनता के 22 वर्ष पूर्व अस्तित्व में आये इस संगठन का उद्देश्य जाति, भाषा और सांस्कृतिक विविधता के कारण बिखरे हुए हिंदू समाज को संगठित कर एक ऐसा सामाजिक ढांचा खड़ा करना था जिससे जुड़े व्यक्ति के मन में भारत की एकता और इसके प्राचीन गौरव को पुनर्स्थापित करने का भाव हो और निजी स्वार्थों से ऊपर उठकर देश हमें देता है सब कुछ हम भी तो कुछ देना सीखें का विचार जिनकी प्रेरणा का स्रोत हो। ये प्रश्न संघ के प्रारम्भ से ही  उठता रहा है कि वह केवल हिंदुओं की ही बात क्यों करता है और जब इस देश में हिंदुओं के अलावा मुस्लिम, ईसाई, बौद्ध, जैन तथा पारसी आदि धर्मों के अनुयायी भी रहते हैं तब वह भारत को हिन्दू राष्ट्र क्यों कहता है ? यद्यपि भारत का विभाजन धर्म के आधार पर हुआ था और पाकिस्तान ने अलग होते ही खुद को इस्लामिक देश घोषित कर लिया किंतु भारत ने ऐसा करने के बजाय  सर्व धर्म समभाव के पुरातन विचार को अपनाया और सभी को अपनी आस्था और पूजा पद्धति के अनुरूप धार्मिक क्रिया हेतु स्वतंत्रता प्रदान की।  लेकिन रास्वसंघ द्वारा भारत को हिन्दू राष्ट्र कहने के पीछे उसकी भौगोलिक रचना है जो हिमालय से सिंधु ( समुद्र) फैली है। और इसी आधार पर  इसके दायरे में रहने वाले सभी लोग चाहे वे किसी भी धर्म या संप्रदाय के हों, उनकी राष्ट्रीयता हिमालय और सिंधु के संक्षिप्तीकरण के रूप में हिन्दू ही  है। यहाँ यह स्पष्ट करना जरूरी है कि भारत के बहुसंख्यक निवासियों द्वारा हजारों वर्ष से जिस धर्म का पालन किया जाता रहा उसका नाम हिन्दू न होकर सनातन है। हिन्दू शब्द तो जैसा ऊपर बताया गया भौगोलिक रचना पर आधारित है और विदेशी आक्रांताओं ने भी  इसी नाम का उपयोग किया । आजादी के दौरान भी ज्यादातर लोग इसे हिंदुस्तान ही कहते थे। और अभिवादन के लिए जय हिन्द ही कहा जाता था। आजादी के बाद 15 अगस्त 1947 को लालकिले की प्राचीर से प्रथम प्रधानमंत्री पं. जवाहर लाल नेहरू ने अपने भाषण की समाप्ति के बाद तीन बार जय हिन्द बोलने की जो परंपरा स्थापित की उसका पालन अब तक के सभी प्रधानमंत्री करते आ रहे हैं। इकबाल ने भी सारे जहाँ से अच्छा हिंदोस्ताँ हमारा लिखा।  लेकिन भारत के संविधान की प्रस्तावना में इंडिया जो कि भारत है लिखे जाने के बाद से देश का अधिकारिक नाम भारत हो गया किंतु हिंदुस्तान भी आज तक बोलचाल में है और जय हिन्द भी। संघ का हिन्दू राष्ट्र वस्तुतः धर्म के बजाय राष्ट्रीयता पर आधारित विचार है जिसे वामपंथियों ने मुस्लिम विरोधी प्रचारित करना शुरू कर दिया क्योंकि उन्हें संघ से अपने लिए खतरा नजर आने लगा था। चूँकि पं. नेहरू भी साम्यवादी विचारधारा के प्रति  आकर्षित थे अतः उनका सहारा लेकर कांग्रेस में अनेक वामपंथी घुस आये। धीरे - धीरे वे सत्ता तथा और संगठन के साथ ही शिक्षा और संस्कृति जैसे क्षेत्रों में भी काबिज होते गए। प्रशासन में भी साम्यवादी चेहरे भरे जाते रहे। इंदिरा गाँधी की सत्ता रहते तक तो कांग्रेस पूरी तरह वामपंथियों की चारागाह बन चुकी थी। इनके कारण ही संघ जैसे देशभक्त संगठन पर प्रतिबंध लगाए गए। गाँधी जी की हत्या से इसका सिलसिला शुरू हुआ जो 1992 में बाबरी ढांचा गिरने तक जारी रहा। हालांकि हर प्रतिबंध के बाद वह और शक्तिशाली होकर उभरा क्योंकि उस पर लगे आरोप साबित नहीं हो सके। संघ ने अपने को राजनीति से दूर रखा किंतु जब भी देश और लोकतंत्र पर खतरा आया उसने आगे आकर संघर्ष किया जिसके परिणाम बेहद सकारात्मक निकले। जब संघ की विचारधारा और हिंदुत्व का भाव समाज में तेजी से फैलने लगे तो वे राजनीतिक शक्तियाँ एकजुट होने लगीं जिन्हें हिंदुत्व और हिन्दू राष्ट्र से नफरत है। संघ का अंधा विरोध करने के लिए इन्होंने मुस्लिम परस्ती का दामन थामा। जिसका लाभ लेकर आतंकवाद देश की  एकता और अखंडता के लिए खतरा बन गया। बीते कुछ वर्षों में हिन्दू , हिंदुत्व और राष्ट्रवाद के विरुद्ध एक सुनियोजित षडयंत्र रचा जा रहा है जिसे विदेशी शक्तियों का समर्थन प्राप्त है। देश के अनेक सीमावर्ती राज्यों में देश विरोधी ताकतों का उभार इसका प्रमाण है। संघ द्वारा सनातन धर्म के अनुयायियों के बीच सामाजिक समरसता कायम करने के जो प्रयास किये गये उनके अनुकूल  परिणाम निकलने से विरोधी ताकतें बौखलाकर बहुसंख्यक समाज में जाति आधारित विभाजन करने का खतरनाक खेल खेलने में जुटी हैं। लोकसभा चुनाव में इसका असर देखने मिल चुका है। उसके बाद से देश में मुस्लिम कट्टरपंथी जिस तेजी से आक्रामक हुए वह भारत में बांग्ला देश जैसे हालात उत्पन्न करने का प्रयास है। ऐसी स्थितियों में हिन्दू संस्कृति और हिन्दू राष्ट्र की अवधारणा को मजबूत करना सर्वोच्च प्राथमिकता है जिसे रास्वसंघ ही अमली जामा पहना सकता है। यही कारण है कि ज्यादातर राजनीतिक दल संघ को लेकर विष वमन किया करते हैं। लेकिन अपनी देशभक्ति , अनुशासन और सेवाभाव के कारण उसका विस्तार पूरे देश में हो चुका है। समाज के जिम्मेदार वर्ग  में ये विश्वास तेजी से मजबूत होता जा रहा है कि संघ की शक्ति ही विघटनकारी ताकतों का सामना कर सकती है। संघ का शताब्दि वर्ष में प्रवेश उम्मीदें जगाने वाला है। 99 वर्षों की उसकी गौरवशाली यात्रा विश्व इतिहास में अनोखी है। देश के बाहर भी संघ के स्वयंसेवक देश की साख और धाक जमाने में जुटे हुए हैं। सामाजिक जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में संघ की प्रभावशाली उपस्थिति उसकी सफलता और स्वीकार्यता का प्रमाण है। महर्षि अरविंद और स्वामी विवेकानंद ने 21 सदी भारत की होने की जो भविष्यवाणी की थी , रास्वसंघ उसे  सही साबित करने में जुटा हुआ है। सनातन , हिंदुत्व और हिन्दू राष्ट्र के प्रति बढ़ता समर्थन संघ की बड़ी उपलब्धि है। शताब्दि वर्ष में उसकी भूमिका पर देश ही नहीं समूचे विश्व की निग़ाह रहेगी। 

आलेख :- रवीन्द्र वाजपेयी


Friday, 11 October 2024

उमर को समझ में आ गया कि 370 की वापसी नामुमकिन है

भा चुनाव के दौरान नेशनल काँफ्रेंस के नेता डाॅ.फारुख अब्दुल्ला और उनके बेटे उमर  जम्मू - कश्मीर को पूर्ण राज्य का दर्जा दिलाने के साथ  धारा 370 की बहाली का मुद्दा गर्माये रहे। घाटी के मतदाताओं पर  इसका असर  नेशनल काँफ्रेंस को वहाँ भारी सफलता मिलने के रूप में  देखने मिला। महबूबा मुफ्ती की पार्टी पीडीपी को घाटी के मतदाताओं ने इसलिए ठुकरा दिया क्योंकि  उसने भाजपा के साथ मिलकर सरकार बनाई थी।  जमायत ए इस्लामी सहित अन्य छोटे दलों और अलगाववाद समर्थक उम्मीदवारों को भी घाटी के लोगों ने समर्थन नहीं दिया जिससे कि ऐसी सरकार बने जो  पूर्ण राज्य और 370 की बहली जैसी मांगें मंजूर करवा सके। हालांकि नेशनल काँफ्रेंस को स्पष्ट बहुमत नहीं मिला किंतु उसकी  सहयोगी कांग्रेस को 6 सीटें मिलने से कमी पूरी हो गई। 4 निर्दलीय  भी सरकार के साथ आ गए। भाजपा चूंकि काफी पीछे रह गई इसलिए सरकार को कोई खतरा नहीं है। ऐसे में आशंका होने लगी कि उमर अब्दुल्ला और उनके पिता पूर्ण राज्य और 370 के मुद्दे पर केंद्र के साथ टकराव के रास्ते पर बढ़ेंगे जिससे घाटी में अलगाववाद समर्थक ताकतें  सिर उठाने लगेंगी। उल्लेखनीय है 1990 में फारूख सरकार के कार्यकाल में ही कश्मीरी पंडितों को घाटी छोड़ने मजबूर होना पड़ा था। गनीमत ये थी कि स्व.जगमोहन राज्यपाल थे वरना एक भी हिन्दू  जीवित न लौटता। हालात को संभालने के बजाय फारुख अपनी ससुराल लंदन चले गए। इस परिवार की खासियत ये है कि ये श्रीनगर में तो अलगाववाद की भाषा  बोलता है वहीं दिल्ली आकर खुद को सबसे बड़ा राष्ट्रवादी बताने का नाटक करता है। विधानसभा चुनाव के दौरान पिता - पुत्र पूर्ण राज्य और 370 पर जिस ऊँची आवाज में बोल रहे थे वह परिणाम के बाद धीमी होने लगी। घाटी के मतदाताओं का भावनात्मक दोहन करने के बाद सरकार बनाने के पहले ही उमर अब्दुल्ला ने कहना शुरू कर दिया कि वे लोगों को मूर्ख नहीं बनाएंगे। पूर्ण राज्य का प्रस्ताव तो नये मंत्रीमंडल की पहली बैठक में ही पारित कर उपराज्यपाल के पास भेज दिया जाएगा ताकि वे उसे केंद्र को भेज सकें। लेकिन 370 की बहाली पर  ये कहते हुए कदम पीछे खींच लिए कि जिस भाजपा ने उसे हटाया उससे इस बारे में कोई भी उम्मीद रखना मूर्खता है। इसलिए जब केंद्र में सत्ता परिवर्तन होगा तब इस दिशा में आगे बढ़ेंगे।   वे यह भी बोल गए कि  370 के मुद्दे को राजनीतिक तौर पर जिंदा रखा जाएगा किंतु  जम्मू -  कश्मीर के हितों के लिए  केंद्र से टकराव मोल नहीं लेंगे। दरअसल अब्दुल्ला परिवार समझ चुका है कि 370 की वापसी असंभव है। ऐसे में उसके लिए केंद्र सरकार से पंगा लेना  नुकसान का सौदा होगा। राजनीतिक विश्लेषक तो ये तक कहने लगे कि निर्दलीय विधायकों को खींचकर उमर ने कांग्रेस को झटका दे  दिया। चुनाव के दौरान ही दोनों के बीच खटास आ गई थी। जम्मू क्षेत्र में कांग्रेस को सबसे ज्यादा सीटें नेशनल कांफ्रेंस ने इस उम्मीद से दी थीं कि वह हिन्दू मतों में सेंध लगाकर भाजपा को नुकसान पहुंचाएगी। लेकिन राहुल गाँधी  घाटी में ज्यादा प्रचार करते रहे। इससे नाराज होकर  उमर ने उनको जम्मू में सक्रियता बढ़ाने की सलाह के साथ ही ये ताना भी मारा कि मतदान की तारीख़ बेहद नजदीक आने पर भी कांग्रेस मैदान में नजर नहीं आ रही थी। उनकी आशंका सही साबित हुई। कांग्रेस के 6 विधायक घाटी से ही जीतकर आये। जम्मू में वह एक भी सीट हासिल न कर सकी। यदि नेशनल काँफ्रेंस 42 सीटें  नहीं जीतती तो राज्य एक बार फिर राजनीतिक अनिश्चितता में फंस सकता था। असल में हरियाणा के नतीजे देखकर अब्दुल्ला परिवार को ये भी लगने लगा है कि कांग्रेस के साथ रहने से केंद्र सरकार से रिश्ते हमेशा खराब रहेंगे। विधानसभा में 29 निर्वाचित और 5 मनोनीत सदस्यों के साथ भाजपा मजबूत विपक्ष के तौर पर होगी। पूर्ण राज्य बनने तक राज्य सरकार के अधिकार भी सीमित रहेंगे। और बन जाने पर भी राज्यपाल तो केंद्र द्वारा ही नियुक्त होगा जो राज्य सरकार की हर बात माने जरूरी नहीं। इसीलिए उमर अब्दुल्ला ने 370 की बहाली के लिए केंद्र से दो - दो हाथ करने का इरादा डल झील में डुबो दिया। हालांकि उनका ऐसा करना उनके चुनावी दावों के विपरीत है किंतु वे  370 के मुद्दे पर केंद्र से टकराने के बजाय देश में सत्ता बदलने तक प्रतीक्षा करने की बात कर रहे हैं तो ये उनकी  समझदारी ही कही जाएगी क्योंकि नरेंद्र मोदी सरकार से इस मुद्दे पर किसी रियायत की उम्मीद वे नहीं कर सकते । वहीं कांग्रेस भी  370  हटाने की बात से  दूर ही रहेगी। ये घाटी से आया पहला सकारतमक संकेत है कि वहाँ की नई सरकार के मुखिया समझ गए हैं कि 370 को बहाल करवाना दिन में सपने देखने जैसा है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी


Thursday, 10 October 2024

रतन टाटा :भारतीय उद्यमशीलता के महान प्रतीक थे


दुर्घटना ग्रसित होने के बाद मैं मुंबई स्थित घर पर आराम कर रहा था। अचानक मोबाइल की घंटी बजी तो स्क्रीन पर रतन टाटा का नाम देखकर चौंका। हैलो कहकर नमस्कार किया तो उधर से आवाज आई मैं तुम्हें देखने आ रहा हूँ  ,  लेकिन तुम्हारा घर ढूढ़ने में परेशानी हो रही है। मुझे अपना पता बताओ। मैंने कहा आप फोन अपने ड्रायवर को दें , मैं उसे समझा देता हूँ। मेरे इतना कहने पर जवाब मिला, ड्रायवर नहीं है कार मैं स्वयं चला रहा हूँ। मेरे लिए ये सुनना कल्पनातीत था। मैंने उन्हें पता समझाया और कुछ देर बाद वे मेरे घर पधारे। और  बताया कि वे अक्सर यूँ ही अकेले निकल जाते हैं। उनकी वह  सरलता मुझे भीतर तक छू गई। उस वाकये का जिक्र मैं हर जगह करता हूँ ताकि लोग सीख सकें कि इंसान सिर्फ दौलत से नहीं बल्कि अपने आचरण  से बड़ा कहलाता  है। उक्त वृतांत केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी की जुबानी लाखों लोगों ने सुना होगा। इसी तरह का एक और उदाहरण कुछ साल पहले सुर्खियों में आया जब ये जानकारी मिलने पर कि उनका एक कर्मचारी दो साल से बीमार है स्व. टाटा उसे देखने मुंबई से पुणे गए। ऐसे अनगिनत  प्रेरणादायी प्रसंगों के मुख्य पात्र रतन टाटा कल रात चल बसे। 86 वर्ष की आयु में किसी का जाना अस्वाभाविक नहीं लगता किंतु उन जैसे व्यक्ति का अवसान ऐसा खालीपन छोड़ जाता है जिसको भरना आसान नहीं है। रतन जी देश के सबसे पुराने औद्योगिक घराने के वारिस थे। आजादी के पहले ही टाटा समूह ने भारत के औद्योगिकीकरण की  बुनियाद रख दी थी। उसके अलावा  और भी उद्योगपति थे । कालांतर में  कुछ टाटा से आगे भी निकल गये। लेकिन निःसंकोच कहा जा सकता है कि टाटा समूह ने जो प्रतिष्ठा अर्जित की वह अन्य औद्योगिक घरानों को  नहीं मिल  सकी।  इसका कारण   उसका सामाजिक सरोकारों से जुड़े रहना है। वैसे तो सभी उद्योगपति  परोपकार के कार्यों हेतु योगदान देते हैं।लेकिन टाटा समूह ने सामाजिक कल्याण के लिए आर्थिक सहयोग देने की जो संस्थागत व्यवस्था की वह सभी के लिए उदाहरण है। जमशेद जी टाटा (जे.आर.डी) के बाद रतन जी  के कंधों पर इस समूह की जिम्मेदारी आई जिसे उन्होंने जिस कुशलता से निभाया वह पूरे विश्व के लिए प्रेरणा का स्रोत बन गई। आज 121 देशों में टाटा का कारोबार फैला है।  लम्बे समय तक  समूह के मुखिया रहने के बाद 75 वर्ष के होते ही उन्होंने  अलग होने का फैसला किया और बतौर कार्यकारी अध्यक्ष मार्गदर्शन करने लगे। उनके कार्यकाल में समूह ने वैश्विक प्रतिस्पर्धा में भारत को ला खड़ा किया। वे बहुत ही साहसी इंसान थे और इसी के चलते उन्होंने दुनिया की बड़ी - बड़ी कंपनियां खरीदकर समृद्ध भारत की कल्पना को साकार किया।  विवादों से सदैव उन्होंने खुद को दूर रखा। इसीलिए न सिर्फ उद्योग जगत अपितु प्रत्येक क्षेत्र के लोग उनसे मार्गदर्शन लेते थे। देश में स्वरोजगार को विकसित करने हेतु हजारों युवा उद्यमियों को उन्होंने सहायता प्रदान की। भारत विकास की जिस राह पर तेजी से बढ़ रहा है उसमें उनका योगदान अविस्मरणीय रहेगा। भारत सरकार ने उन्हें पद्म विभूषण से अलंकृत किया था ।  राजनीति से वे हमेशा  दूर रहे। बावजूद इसके उनका नाम राष्ट्रपति पद के लिए अनेक बार चर्चा में आया। रतन जी के बारे में ये विख्यात था कि  वे  समूह की किसी भी बैठक में जाते तो  सबसे ज्यादा रुचि इस बात में लेते कि वह कंपनी उस वित्तीय वर्ष में कितना दान करेगी ? दरअसल उनके नेतृत्व में टाटा समूह ने दान को संस्थागत रूप देकर संस्कार बना दिया। साधारण व्यक्ति से मिलते समय भी वे अहंकार शून्य रहते। यही कारण है  उनके निधन  से  सभी वर्गों के लोग दुखी हैं। टाटा समूह ने  नैतिक मूल्यों  और सामाजिक सरोकारों के प्रति जिस  निःस्वार्थ प्रतिबद्धता को स्थापित किया वह रतन जी के मानवीय दृष्टिकोण का प्रमाण  है। वे उस दौर में जन्मे और बड़े हुए जब पूंजीवाद और समाजवाद के बीच वैचारिक संघर्ष चरम पर था। वहीं  जीवन के उत्तरार्ध में उन्होंने उदारवाद और वैश्वीकरण भी देखा।  व्यवसाय में  अनेक उतार चढ़ाव भी आये।  बहुराष्ट्रीय  कंपनियों  ने भारतीय उद्योगों के लिए संकट भी पैदा किया किंतु स्व. टाटा ने अवसरों के अनुरूप नीति बनाकर  बजाय भयभीत होने के अपने कारोबार को दुनिया भर में फैलाकर भारतीय उद्यमशीलता की धाक जमाई। उन जैसे प्रतिभाशाली और शानदार इंसान सदियों में जन्म लेते हैं। उनकी सफलता और संपन्नता का इससे बड़ा प्रमाण क्या होगा कि उनका कोई विरोधी नहीं था। और ये भी कि 86 वर्ष का वह व्यक्ति देश के करोड़ों युवाओं का प्रिय और प्रेरणास्रोत रहा। उनके बारे में  विख्यात उद्योगपति आनन्द महिंद्रा का ये कहना पूरी तरह सही है कि रतन टाटा को कभी भुलाया नहीं जा सकेगा क्योंकि महापुरुष कभी नहीं मरते।
विनम्र श्रद्धांजलि। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Wednesday, 9 October 2024

राहुल की राजनीतिक समझ और नेतृत्व क्षमता फिर सवालों के घेरे में


लोकसभा चुनाव में 99 सीटें जीतने के बाद कांग्रेस नेता राहुल गाँधी का हौसला  सातवें आसमान पर चढ़ गया था। लोकसभा में दिये भाषणों के आधार पर  प्रशंसक उन्हें नरेंद्र मोदी का विकल्प बताने लगे। खुद श्री गाँधी  प्रधानमंत्री पर जिस तरह से कटाक्ष करने लगे उससे ऐसा लगने लगा जैसे नेता प्रतिपक्ष बनने के बाद देश वे ही चलाएंगे। मोदी जी का सीना अब 56 इंच का नहीं रहा, वे  मुझसे नजर नहीं मिला सकते, भाजपा के हिंदुत्व को जनता ने नकार दिया, आप हिन्दू नहीं हो, हम जातिगत जन गणना करवाकर रहेंगे जैसी टिप्पणियों से राहुल ये साबित करने में जुटे हुए थे कि अब वे पप्पू वाली छवि से बाहर निकलकर एक परिपक्व  व्यक्ति बन गए हैं। लेकिन उनके कतिपय बयानों से स्पष्ट हो गया कि उनमें गंभीरता नहीं आई। बजट बनाने वाले अधिकारियों के अलावा किसी मिस इंडिया के दलित या ओबीसी न होने जैसे बयान देकर उन्होंने  प्रमाणित कर दिया कि वे रट्टू तोते जैसे हैं जो कुछ बातों को ही दोहराया करते हैं। अपनी पिछली अमेरिका यात्रा के दौरान भी वे जातिगत आरक्षण का मुद्दा उठाकर मजाक का पात्र बन गए ।  गत दिवस जम्मू - कश्मीर और हरियाणा विधानसभा के जो चुनाव परिणाम आये उनमें कांग्रेस का प्रदर्शन इस बात का प्रमाण  है कि राहुल को लेकर कांग्रेस ने जो उम्मीदें पाल रखी हैं वे पूरी नहीं हो सकेंगी। जम्मू - कश्मीर में पार्टी की सीटें पिछले चुनाव की तुलना में आधी रह गईं। मतदान के कुछ दिन पहले ही उमर अब्दुल्ला ने श्री गाँधी को इस बात के लिए लताड़ा कि उनको बजाय घाटी के जम्मू  के हिन्दू बहुल क्षेत्रों में सक्रिय होना चाहिए , जहाँ कांग्रेस का काम ही शुरू नहीं हुआ।   उनकी बात सही निकली क्योंकि पार्टी दहाई का आंकड़ा भी नहीं छू सकी। यदि नेशनल कांफ्रेंस से गठबंधन नहीं हुआ होता तब शायद उसकी दशा पीडीपी से भी बदतर हो सकती थी। हरियाणा में तो कांग्रेस की जीत का अनुमान हर कोई लगा रहा था। चुनाव पूर्व सर्वेक्षण से लेकर एग्जिट पोल तक भाजपा के प्रति मतदाताओं की नाराजगी बताते हुए कांग्रेस की बड़ी जीत की भविष्यवाणी कर रहे थे। लोकसभा चुनाव का शानदार प्रदर्शन पार्टी की उम्मीदों का आधार था। लेकिन नतीजे पूरी तरह उलट गए। सीटें और मत प्रतिशत बढ़ने के बाद भी कांग्रेस बहुमत से दूर रह गई। राहुल ने हरियाणा में भी प्रचार किया किंतु वहाँ भी बचकानेपन से बाज नहीं आये । जलेबी की फैक्ट्री वाला बयान देकर खुद की तो हंसी उड़वाई ही, पार्टी का भी नुकसान किया। पार्टी के सबसे बड़े नेता होने के नाते उनका दायित्व था कि इस राज्य के जमीनी हालात का अध्ययन करते लेकिन वे भाजपा और प्रधानमंत्री का मजाक उड़ाने में लगे रहे और अंत में खुद मजाक का पात्र बन बैठे। दूसरी तरफ भाजपा ने लोकसभा चुनाव में आशाजनक सफलता नहीं मिलने के बाद बिना निराश हुए अगले मोर्चों पर तैयारी शुरू कर दी। वह जानती थी कि जम्मू - कश्मीर में उसको बहुमत नहीं मिलेगा किंतु उसने 2014 की अपेक्षा अपनी सीटें भी बढ़ाईं  और मत प्रतिशत में भी सबसे आगे रही। हरियाणा में लोकसभा की 5 सीटें गंवाने के बाद भी पार्टी ने बेहतर संगठन क्षमता का प्रदर्शन किया। कांग्रेस हवा में उड़ती रही जबकि भाजपा ने जमीन पर रहकर मतदाता के साथ संवाद कायम किया जिसका लाभ उसे मिला।  चुनाव परिणाम के बाद कांग्रेस की प्रतिक्रिया में न गंभीरता नजर आई और न ही गरिमा। जम्मू  - कश्मीर में भाजपा को पटकने की शेखी बघारने वाले पार्टी प्रवक्ता ये बताने से बचते रहे  कि वहाँ कांग्रेस का प्रदर्शन इतना दयनीय क्यों रहा? हरियाणा की हार को अप्रत्याशित और अस्वीकार्य बताकर पार्टी ने जो खिसियाहट दिखाई गई उससे ये साफ हो गया कि लोकसभा चुनाव में मिली 99 सीटों का खुमार अभी तक बना हुआ है। ईवीएम पर हार का ठीकरा फोड़ने के साथ ही चुनाव आयोग पर आरोप लगाने का घिसा - पिटा तरीका अपनाकर कांग्रेस ने साबित किया कि उसे जनादेश  का सम्मान करना नहीं आता। लोकसभा चुनाव के बाद उसके जो प्रवक्ता एग्जिट पोल करने वालों पर आग बबूला हो रहे थे वे ही कल उनके गलत होने पर आंसू बहाते दिखे। हरियाणा  की हार ने कांग्रेस  में आये अहंकार को जमीन दिखा दी। महाराष्ट्र में शिवसेना (उद्धव) की प्रवक्ता ने उसको नसीहत देते हुए कहा कि वह सीधे मुकाबले में भाजपा के सामने नहीं टिकती। संजय राउत ने तो यहाँ तक कह दिया कि कांग्रेस महाराष्ट्र में अकेले लड़ने की इच्छुक हो तो स्पष्ट करे। उ.प्र में होने जा रहे 10 विधानसभा उपचुनावों में सपा से आधी टिकिटें मांगने का उसका दबाव भी कमजोर पड़ जायेगा। कुल मिलाकर ये कह सकते हैं कि इन चुनावों ने लोकसभा चुनाव में लगे झटके से भाजपा को उबार दिया। मोदी मैजिक का असर भी दो राज्यों  में साफ नजर आया । लेकिन दूसरी तरफ राहुल गाँधी की राजनीतिक समझ और नेतृत्व क्षमता एक बार फिर सवालों के घेरे में आ गई है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Tuesday, 8 October 2024

जम्मू - कश्मीर में अपेक्षित नतीजे किंतु हरियाणा ने पूरे देश को चौंका दिया


हरियाणा और जम्मू - कश्मीर विधानसभा चुनाव की मतगणना में दोपहर 1.30 बजे तक आये रुझानों से स्पष्ट हो गया है कि जम्मू कश्मीर में नेशनल कांफ्रेंस और कांग्रेस आसानी से बहुमत हासिल करने जा रहे हैं। इससे किसी को आश्चर्य भी नहीं हुआ क्योंकि वहाँ भाजपा केवल जम्मू क्षेत्र में प्रभावशाली है । कश्मीर घाटी में उसे एक भी सीट भी मिल गई तो वह असंभव के संभव होने जैसा होगा। लेकिन जम्मू की 43 सीटों में उसे अपेक्षा से कम सीटें मिलना  उसके लिए  झटका है।  बहरहाल ये शुभ संकेत है कि अलगाववाद से प्रभावित इस राज्य की राजनीति  में अब्दुल्ला परिवार की सियासी जमींदारी पहले जैसी नहीं रही। नेशनल कांफ्रेंस अपने बलबूते स्पष्ट बहुमत नहीं लाती दिख रही। उसकी  सहयोगी कांग्रेस भी दहाई का आंकड़ा छूने के लिए संघर्ष कर रही है। चुनाव प्रचार में फारुख अब्दुल्ला ने धारा 370 की वापसी का मुद्दा जमकर उछाला था। वहीं कांग्रेस  इस सम्बन्ध में कुछ भी कहने से बचती रही। सरकार बनाने के बाद  नेशनल कांफ्रेंस के लिए इस संवेदनशील विषय को उठाना कठिन होगा क्योंकि देश के बाकी हिस्सों की जनभावनाओं का ध्यान रखते हुए कांग्रेस  अलगाववाद समर्थक किसी भी नीति से बचने का रास्ता अखत्यार करेगी जो अब्दुल्ला परिवार की साख को नुकसान पहुंचाने वाला होगा। भाजपा लगभग 30 सीटें जीतने के कगार पर है। नियमानुसार 5 विधायक मनोनीत होंगे जिनको सदन में मताधिकार प्राप्त होगा। जाहिर है वे भाजपा समर्थक रहेंगे। वही। वहीं 8 निर्दलीय जीत रहे हैं।  पीडीपी मात्र 2 सीटों पर आगे है। इस प्रकार भाजपा प्रमुख विपक्षी दल के रूप में स्थापित हो गई जो राज्य की राजनीति में दूरगामी असर डालने वाला होगा। जाहिर है मुख्यमंत्री तो उमर अब्दुल्ला ही बनेंगे किंतु  उनके लिए केंद्र सरकार से टकराव लेना नुकसान का कारण बन सकता है। ये देखते हुए फारुख, भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व से निकटता स्थापित कर नया खेल रच सकते हैं। यदि ये नहीं होता तब भी विधानसभा और उसके बाहर सरकार को विपक्ष के कड़े प्रतिरोध का सामना करना पड़ेगा।  कश्मीर घाटी की राजनीतिक वजनदारी घटाने में भी भाजपा निश्चित रूप से सफल होती दिख रही है।
       दूसरे जिस राज्य के परिणाम आ रहे हैं वह है हरियाणा। यहाँ सारे विश्लेषक और एग्जिट पोल कांग्रेस की इकतरफा जीत की भविष्यवाणी कर चुके थे। चुनाव के पहले ही भाजपा विरोधी पूरा तबका ये महौल बनाने में जुटा था कि कांग्रेस की लहर चलेगी। पूर्व चुनाव विश्लेषक योगेंद्र यादव को तो  कांग्रेस की सुनामी नजर आ रही थी। परिणाम आने के पहले ही भूपिंदर हुड्डा,  शैलजा और रणदीप सुरुजेवाला मुख्यमंत्री बनने की कवायद में जुट गए। उनकी उम्मीदों के पीछे बेशक चुनाव पूर्व सर्वे और  एग्जिट पोल के निष्कर्ष थे। किसान आंदोलन, अग्निवीर और पहलवानों के मुद्दे पर भाजपा विरोधी मतदाता जिस तरह आक्रामकता के साथ मुखर था उससे भी ये एहसास मजबूत हुआ कि भाजपा तिकड़ी नहीं बना सकेगी।। लोकसभा चुनाव में उसके हाथ से आधी सीटें ही नहीं खिसकीं बल्कि मत प्रतिशत में भी भारी गिरावट आई। इन सब कारणों से उसके समर्थक मतदाता भी निराश थे। तमाम नेता पार्टी छोड़ गए। अशोक तंवर ने तो मतदान के ठीक पहले कांग्रेस का दामन थाम लिया। राहुल गाँधी पूरे आत्मविश्वास से प्रधानमंत्री पर हमला करते रहे। मतदाताओं को जी भरकर प्रलोभन दिये गए। राज्य में सबसे प्रभावशाली जाट समुदाय की भाजपा से नाराजगी को भी बढ़ा - चढ़ाकर पेश किया जाता रहा। आज सुबह मतों  की गिनती शुरू होते ही कांग्रेस तेजी से बहुमत हासिल करती दिखी किंतु कुछ देर बाद ही देखते - देखते भाजपा बहुमत के आंकड़े से आगे निकल गई । इन पंक्तियों के लिखे जाने तक उसकी सरकार आसानी से लौट रही है। पिछली सरकार को टेका लगाने वाले दुष्यंत चौटाला बुरी तरह परास्त हो चुके हैं। चौटाला परिवार के अन्य  छत्रप भी धराशायी होते दिख रहे हैं। सबसे बड़ी बात जाट समुदाय के राजनीतिक प्रभुत्व को इस चुनाव में चोट पहुंची। 2019 के विधानसभा चुनाव में 40 सीटों पर सिमट गई भाजपा इस बार अपने दम पर 50 के करीब है। वह भी बिना जाट नेतृत्व के और लोकसभा चुनाव में खराब प्रदर्शन के बावजूद। हालांकि कांग्रेस भी पिछले चुनाव की तुलना में आगे बढ़ी है किंतु  उसके हिस्से में विपक्ष की जिम्मेदारी ही आई है। निर्दलीय बड़ी संख्या में खड़े हुए किंतु जनता ने उन्हें नकार दिया। आम आदमी पार्टी भी कुछ हासिल न कर सकी जबकि यह अरविंद केजरीवाल का गृहराज्य है। सही बात ये है कि गैर जाट जातियों के ध्रुवीकरण ने भाजपा का काम आसान कर दिया। हरियाणा के नतीजों से  लोकसभा चुनाव में  कांग्रेस को मिले आत्मविश्वास में कमी आयेगी। वहीं ये अवधारणा कमजोर होगी कि मोदी कार्ड राज्यों में नहीं चलता। महाराष्ट्र में अब उद्धव ठाकरे और शरद पवार कांग्रेस पर हावी होंगे । वहीं झारखण्ड में भाजपा की संभावना बढ़ गई हैं। हिंदुत्व के विरुद्ध किये जा रहे दुष्प्रचार को भी हरियाणा के मतदाताओं ने ठेंगा दिखा दिया। इंडिया गठबंधन में भी टूटन बढ़ सकती है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Monday, 7 October 2024

एग्जिट पोल के आंकड़े भाजपा के लिए चिंता का विषय

लोकसभा चुनाव में एग्जिट पोल के निष्कर्ष गलत निकलने के बाद सर्वे करने वाली एजेंसियों के साथ - साथ उनके प्रायोजक टीवी चैनलों की भी जबरदस्त किरकिरी हुई थी।  400 पार के नारे को सही बताने वाले एग्जिट पोल विपक्ष के निशाने पर आ गए। उन पर आरोप लगा कि उन्होंने शेयर बाजार को उठाने के लिए भ्रामक आंकड़े पेश किये जिनमें मोदी सरकार प्रचंड बहुमत के साथ  लौटती दिखाई गई। उससे उत्साहित होकर निवेशकों ने जमकर शेयरोंं की खरीदी कर डाली । हालांकि सरकार तो वापस आई किंतु  भाजपा के स्पष्ट बहुमत से पीछे रहने की वजह से वह सहयोगी दलों का सहारा लेने मजबूर हो गई। नतीजा शेयर बाजार के धड़ाम से गिरने के रूप में सामने आया। इसके चलते उसमें  पूंजी लगाने वालों को भारी नुकसान हुआ जिसका ठीकरा विपक्ष ने एग्जिट पोल करने वाली एजेंसियों के साथ ही टीवी चैनलों पर फोड़ा। चुनाव पूर्व सर्वेक्षणों और एग्जिट पोल  पर प्रतिबंध लगाए जाने की माँग भी उठी। यद्यपि सरकार का गठन होते ही शेयर बाजार चढ़ने लगा और बीते सप्ताह अपने सर्वोच्च स्तर तक जा पहुंचा।  इसी दौरान जम्मू कश्मीर और हरियाणा विधान सभा के चुनाव संपन्न हुए जिनके एग्जिट पोल 5 अक्टूबर की शाम जारी किये गये । लोकसभा चुनाव में भद्द पिटने के बाद भी टीवी चैनलों ने हमेशा की तरह न सिर्फ एग्जिट पोल के निष्कर्ष दिखाये बल्कि राजनीतिक दलों के प्रतिनिधियों को बिठाकर चर्चा भी करवाई। चूंकि नतीजे दोनों राज्यों में भाजपा को पिछड़ते बता रहे थे लिहाजा जो विपक्ष लोकसभा चुनाव के बाद एग्जिट पोल के परिणामों को सिरे से नकार रहा था वही इन निष्कर्षों को पूरी तरह प्रामाणिक मानकर खुश नजर आया। वहीं दूसरी तरफ भाजपा वालों को ये  जमीनी सच्चाई से कोसों दूर प्रतीत हुए। भले ही  सभी पोल सीटों की संख्या को लेकर एकमत नहीं हों लेकिन सब का ये जरूर कहना था कि भाजपा दोनों राज्यों में सत्ता से बाहर रहेगी। जम्मू कश्मीर में  नेशनल काँफ्रेंस और कांग्रेस गठबंधन की  सरकार बनने की संभावना प्रबल है वहीं हरियाणा में कांग्रेस स्पष्ट बहुमत हासिल करने जा रही है। राजनीतिक विश्लेषक भी उक्त एग्जिट पोल को मान्य कर रहे हैं। हालांकि भाजपा को लगता है कि हरियाणा के परिणाम गत वर्ष संपन्न छत्तीसगढ़ विधानसभा चुनाव की कहानी दोहरायेंगे । जहाँ सभी सर्वेक्षण कांग्रेस सरकार के दोबारा सत्ता में आने की भविष्यवाणी कर रहे थे किंतु जब परिणाम आये तो भाजपा को स्पष्ट बहुमत  मिला। जहाँ तक बात जम्मू कश्मीर की है तो वहाँ जम्मू और कश्मीर घाटी में अलग - अलग माहौल है। जम्मू अंचल की 43 सीटों  में से भाजपा को यदि कम से कम  35  नहीं मिलतीं तब वह सत्ता की दौड़ से बाहर हो जाएंगी क्योंकि घाटी में उसका कोई वजूद नहीं है। उसकी उम्मीद केवल इस बात पर टिकी है कि घाटी में नेशनल काँफ्रेंस और पीडीपी को कम सीटें मिलें। कुछ एग्जिट पोल में भी  निर्दलीयों के बड़ी संख्या में जीतने का अनुमान लगाया गया है। उल्लेखनीय है लोकसभा चुनाव में उमर अब्दुल्ला और महबूबा मुफ्ती दोनों हार गए थे। उसके बाद घाटी में कुछ नये चेहरे उभरकर सामने आये। देखने वाली बात ये होगी कि त्रिशंकु की स्थिति में ये किसके साथ जायेंगे क्योंकि घाटी में धारा 370 की वापसी पर सभी एकमत हैं। वहाँ सारी 47 सीटें नेशनल काँफ्रेंस  जीत जाए ये नामुमकिन है। इसी तरह जम्मू की अधिकांश सीटों पर लड़ने के बावजूद कांग्रेस का प्रदर्शन बहुत अच्छा होने की उम्मीद नहीं है। मतदान के कुछ दिन पूर्व ही उमर अब्दुल्ला ने कांग्रेस की इस बात के लिए आलोचना भी की थी कि उसने जम्मू क्षेत्र में काम ही शुरू नहीं किया। इस राज्य में राजनीतिक अनिश्चितता बने रहने की संभावना अभी भी है। लेकिन हरियाणा में माहौल भाजपा विरोधी बनाने में विपक्ष काफी हद तक सफल हो गया था। लोकसभा चुनाव के पूर्व मुख्यमंत्री बदलने का दांव भी कारगर नहीं रहा और  कांग्रेस आधी सीटें जीत गई। हालांकि इस बार  भाजपा ने आखिर तक काफी जोर लगाया किंतु  जिस तरह उ.प्र में यादव, दलित और मुस्लिम मतों के ध्रुवीकरण ने उसको लोकसभा में स्पष्ट बहुमत से वंचित कर दिया ठीक वैसे ही समीकरण हरियाणा में जाट, दलित और मुस्लिम बनाते दिखे। यदि भाजपा सवर्ण और ओबीसी मतों को थोक के भाव अपने झोली में डालने के साथ ही जाट समुदाय  की एकजुटता में सेंध  लगाने में सफल नहीं हो सकी तो फिर उसकी तिकड़ी बनना नामुमकिन होगा। कल दोपहर तक दोनों राज्यों की तस्वीर स्पष्ट हो जाएगी। यदि एग्जिट पोल सही साबित हुए तब भाजपा के लिए महाराष्ट्र और झारखण्ड की लड़ाई बेहद कठिन हो जाएगी। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Saturday, 5 October 2024

भारत में भी नेपाल जैसा गृहयुद्ध छेड़ना चाहते हैं नक्सली मानसिकता के पोषक


छत्तीसगढ़ वह राज्य  है जिसकी सीमाएं  म.प्र , उ.प्र, महाराष्ट्र, झारखंड, उड़ीसा, तेलंगाना और आंध्रप्रदेश से मिलती हैं। ये भी संयोग है कि इन सीमावर्ती इलाकों में भी आदिवासी बाहुल्य है और इसीलिए ये नक्सली आतंक के गढ़  हैं। एक जमाने में म.प्र के चंबल और बुंदेलखंड अंचल में सक्रिय डाकू बड़ी वारदात करने के बाद उ.प्र और राजस्थान भाग जाते थे। उसी रणनीति को नक्सलियों ने अपनाया । उक्त किसी भी राज्य में हिंसक घटना को अंजाम देने के बाद वे पड़ोसी राज्य में जाकर छिप जाते हैं। उनके कार्यक्षेत्र का ज्यादातर हिस्सा घने वनों से घिरा होने से  छिपने में सहूलियत होती है। ये बात भी सही है कि जिस तरह से डाकुओं को समाज के एक वर्ग के साथ ही पुलिस में बैठे कतिपय लोगों का संरक्षण मिलता था ठीक वही स्थिति नक्सलियों के साथ भी है। कुछ लोग भयवश भी उनका साथ देते हैं वहीं पुलिस और प्रशासन में बैठे लोगों के अपने स्वार्थ हैं।  ये बात भी गौरतलब है कि नक्सलियों के कार्यक्षेत्र का अधिकांश इलाका खनन गतिविधियों वाला है । खनन व्यवसायियों से जबरिया वसूली उनकी आय का स्रोत माना जाता है। उसके अतिरिक्त अनेक बड़े कारोबारी अपनी सुरक्षा के लिये नक्सलियों को धन देते हैं। उनकी कार्यप्रणाली चूंकि हिंसा से प्रेरित है इसलिए माओवादी विचारधारा  के नाम पर  नृशंस हत्याएँ कर वे अपने आतंक का साम्राज्य कायम कर सके । लेकिन केंद्र में नरेंद्र मोदी की सत्ता आने के बाद नक्सलियों के सफाये का जो अभियान शुरू किया गया उसके परिणामस्वरूप वे पहले जैसे ताकतवर नहीं रहे। उनके सशस्त्र गिरोहों का खात्मा किये जाने के साथ ही शहरी क्षेत्रों में बैठे  सरपरस्तों पर नकेल कसे जाने के कारण उनकी जबरदस्त घेराबंदी संभव हो सकी। उन्हीं की भाषा में जवाब देने की शैली अपनाये जाने के अच्छे परिणाम देखने मिल रहे हैं। गत दिवस छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा में सुरक्षा बलों ने 30 से अधिक नक्सलियों को मार गिराया और बड़ी मात्रा में  हथियार तथा गोला - बारूद भी बरामद किया। कुछ माह पहले भी लगभग दो दर्जन मार गिराए गए थे। छत्तीसगढ़ में कांग्रेस सरकार के राज में नक्सलियों को प्रश्रय मिलने के आरोप लगा करते थे। कांग्रेस नेता विद्याचरण शुक्ल सहित पार्टी के अनेक नेताओं की नक्सलियों द्वारा हत्या किये जाने में भी एक पूर्व मुख्यमंत्री का हाथ बताया जाता था जो अब दुनिया में नहीं हैं। अन्य पड़ोसी राज्यों में भी कुछ राजनीतिक दल चुनाव के दौरान नक्सलियों की मदद लेते रहे हैं। वामपंथी पार्टियों को तो उनका खुला समर्थन रहता ही है। लेकिन जैसे - जैसे वामपंथी राजनीति का प्रभाव कम होता जा रहा है वैसे - वैसे नक्सलियों का ढांचा भी कमजोर पड़ने लगा। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने 2026 तक भारत को नक्सली आतंक से मुक्त करने का जो संकल्प लिया वह सत्य प्रतीत होने लगा है। सुरक्षा बलों के प्रयासों से नक्सल प्रभावित इलाकों के  निवासियों में भी साहस का संचार होने लगा है जो अपनी और परिवार की प्राण रक्षा के लिए उनके इशारों पर नाचते थे। बड़ी संख्या में नक्सलियों के चंगुल में फंसे युवाओं ने आत्म समर्पण कर मुख्य धारा में शामिल होने की बुद्धिमत्ता भी दिखाई। वर्तमान में झारखंड और तेलंगाना छोड़कर छत्तीसगढ़ और उसके पड़ोसी राज्य उ.प्र , म.प्र , महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश और उड़ीसा में भाजपा अथवा उसके सहयोगियों की सरकारों से नक्सलियों को  समर्थन और सहानुभूति प्राप्त नहीं होने से भी उनकी पकड़ कमजोर हो रही है। लेकिन जंगलों से सफाया होने के बाद समाज के भीतर घुसे बैठे नक्सली मानसिकता के सफ़ेदपोशों का पर्दाफाश होना भी जरूरी है। ये लोग प्रशासन, शिक्षा, कला, साहित्य और पत्रकारिता जैसे क्षेत्रों में  बैठकर नक्सली विचारधारा  का प्रचार - प्रसार करते हैं। इनकी कार्यशैली व्यवस्था के प्रति विद्रोह की भावना भड़काने पर केंद्रित है। स्वयंसेवी संगठनों के जरिये भी ये अपनी गतिविधियां संचालित करते हैं। इनके विरुद्ध जाँच एजेंसियां कारवाई करती तो हैं किंतु साक्ष्य नहीं मिलने से वे बच जाते हैं। सरकार को इस ओर भी ध्यान देना चाहिए। नक्सलवादी कहने को सामाजिक विषमता और शोषण के विरुद्ध संघर्ष के लिए हथियार उठाते हैं लेकिन उनका असली उद्देश्य  भारत में खूनी क्रांति के रास्ते पर चलकर नेपाल जैसी चीन समर्थित माओवादी सरकार बनाना है । इसके लिए ये देश हित के विरुद्ध कार्य करने वाली हर ताकत के साथ हाथ मिलाने तैयार रहते हैं। नेपाल की तरह ही भारत में गृहयुद्ध भड़काने की साजिश  भी नक्सली विचारधारा का पोषण करने वाले रचते रहते हैं। बीते कुछ वर्षों में जे .एन .यू जैसे कुछ शिक्षण संस्थानों सहित सरकार विरोधी आंदोलनों में नक्सली मानसिकता वाले  चेहरे नजर आना उसी साजिश का हिस्सा है। सरकार को आस्तीन में छिपे इन सांपों का विष दंत तोड़ना होगा। समाज में जो राष्ट्रवादी बुद्धिजीवी वर्ग है उसे भी इन तत्वों से वैचारिक स्तर पर निपटना चाहिए। भारतीय समाज में रक्तरंजित क्रांति को सामाजिक स्वीकृति कभी नहीं मिली। यही वजह है कि लेनिन और माओ के विचार तमाम प्रयासों के बाद भी मुख्यधारा में समाहित नहीं हो सके।


- रवीन्द्र वाजपेयी

Friday, 4 October 2024

इजरायल और ईरान सीधे भिड़े तो पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था गड़बड़ा जायेगी


पश्चिम एशिया में एक बार फिर महायुद्ध की आशंका  बढ़ने लगी है। जब तक बात इजरायल और गाज़ा पर काबिज हमास के बीच विवाद की थी तब तक तो गनीमत रही किंतु धीरे - धीरे लड़ाई का दायरा लेबनान और यमन तक बढ़ने के बाद  अब ईरान तक फैलने के कगार पर है । सर्वविदित है कि हमास और हिज़बुल्लाह जैसे इस्लामिक कट्टरपंथी संगठनों को अस्त्र, शस्त्र और धन ईरान ही उपलब्ध करवाता है।  अरब देशों के बीच अमेरिका का खुलकर विरोध करने वाला ईरान ही है। उसके पास परमाणु बम होने के कारण ही अमेरिका उसके प्रति द्वेष भाव रखता है। शाह पहलवी के हटने के बाद जब अयातुल्ला खोमैनी ईरान की सत्ता पर काबिज हुए तो पूरा माहौल बदल गया। शाह के दौर की आधुनिकता  पलक झपकते लुप्त होने लगी । खोमैनी के शासन में ईरान पूरी तरह कट्टर इस्लामिक देश बन गया। अपार तेल संपदा के बल पर वह अमेरिका को चुनौती देने का दुस्साहस करने से भी बाज नहीं आता जिनके कारण उसने ईरान पर जबरदस्त आर्थिक प्रतिबंध लगा दिये। परिणास्वरूप वह रूस की तरफ झुक गया। गत वर्ष हमास द्वारा इजरायल पर अचानक किये गए हमले के पीछे भी ईरान ही था। बीच - बीच में उसके और इजरायल के बीच भी मिसाइलों का आदान - प्रदान होता रहा किंतु सीधे युद्ध की स्थिति नहीं बनी। लेकिन बीते कुछ दिनों में हालात उसी ओर बढ़ रहे हैं।  गत सप्ताह ईरान ने सैकड़ों मिसाइलें इजरायल पर बरसाकर आग में घी डाल दिया जिससे  इजरायल को भी ईरान पर आक्रमण का वाजिब बहाना मिल गया। वह जिस तरह से आक्रामक है उससे लगता है अमेरिका ने उसे पूरी शह दे रखी है। लेकिन इस समूचे घटनाक्रम में दो सबसे महत्वपूर्ण बातें हैं। पहली तो ये कि ईरान का सरपरस्त रूस खुद यूक्रेन के साथ ऐसे युद्ध में फंसा हुआ है जिसका अंत समझ में नहीं आ रहा। यूक्रेन की पीठ पर  अमेरिका का पूरा - पूरा हाथ होने से वह रूस जैसी महाशक्ति का मुकाबला कर रहा है। दूसरी उल्लेखनीय बात ये है कि अरब के इस्लामिक देशों के बीच पहले जैसी एकता नहीं रही। ईरान और ईराक के बीच  एक दशक तक चले युद्ध ने इसकी शुरुआत की थी। फिर ईराक द्वारा कुवैत पर कब्जा किये जाने के बाद अमेरिका ने जो सैन्य कारवाई की उसने भी इस अंचल के शक्ति संतुलन को उलट -  पुलट दिया। सद्दाम हुसैन और कर्नल गद्दाफ़ी जैसे जो  घोर अमेरिका विरोधी राष्ट्राध्यक्ष  थे उन दोनों को अमेरिका ने दुनिया से ही हटा दिया। एक और बात जो इस दौरान देखने मिल रही है वह है सऊदी अरब और इजरायल में बढ़ती नजदीकी। भले ही पश्चिम एशिया के इस्लामिक देशों पर  सऊदी अरब की चौधराहट पहले जैसी नहीं रही किंतु अपनी बेशुमार तेल संपदा और संपन्नता के कारण वही ऐसा देश है जो अमेरिका के साथ बराबरी से बैठता है। चूंकि उसने भी इजरायल का विरोध बंद कर दिया वहीं  अन्य अरबी देशों में एक भी कद्दावर नेता नहीं बचा जो सबको इजरायल के विरुद्ध लामबंद कर सके। जहाँ तक बात फिलीस्तीनियों की है तो यासर अराफात के बाद  उनका कोई प्रभावशाली नेतृत्व है नहीं। हमास और हिजबुल्लाह जैसे आतँकवादी संगठनों ने उनकी लड़ाई अपने हाथ में लेकर उसकी गंभीरता खत्म कर दी। अराफात की छवि भी  शुरू में तो आतँकवादी की ही थी किंतु जीवन के उत्तरार्ध में वे वैश्विक स्तर के नेता बनकर उभरे जिसे तीसरे विश्व के देशों का समर्थन और सहयोग मिला। इजरायल के साथ हुए ऐतिहासिक शांति समझौते के बाद तो उनकी प्रशंसा होने लगी थी। ऐसा लगने लगा कि पश्चिम एशिया में शान्ति का सूर्योदय हो चुका है लेकिन उनके निधन के बाद स्थितियाँ कुत्ते की पूँछ की तरह फिर से पुराने स्वरूप में लौट आईं। इजरायल पूरी तरह सही है और उसका हर कदम न्यायोचित है यह मान लेना अनुचित होगा किंतु वर्तमान तनाव हमास के हमले से शुरू हुआ और हिजबुल्लाह के कूदने से उसमें और वृद्धि हो गई। रही - सही कसर ईरान पूरी किये दे रहा है। ये बात पूर्णतः सत्य है कि जिस तरह हमास और हिजबुल्लाह बिना ईरान के संरक्षण के इजरायल से नहीं टकरा सकते वैसे ही इजरायल भी बिना अमेरिका की सहमति और सहयोग से एक साथ कई मोर्चे नहीं खोल सकता। इजरायल के जो तेवर हैं वे किसी बड़ी घटना का संकेत जरूर दे रहे हैं। अमेरिका ईरान को झुकाने का जो अवसर बरसों से तलाश रहा था वह उसे अनायास मिल गया है साथ ही रूस के यूक्रेन में उलझे रहने से फिलहाल किसी बड़े प्रतिरोध की संभावना भी नहीं है। लेकिन  इजरायल और ईरान सीधे भिड़े तो इससे पूरी दुनिया हिल उठेगी। कोरोना के बाद यूक्रेन संकट ने वैश्विक अर्थव्यवस्था को जो नुकसान पहुंचाया उससे वह धीरे - धीरे उबरने की स्थिति में आ ही रही थी की ये संकट आ गया। चिंता का विषय ये है कि जिनको इसे रोकना चाहिए वे ही उसे भड़का रहे हैं। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Thursday, 3 October 2024

धर्मनिरपेक्षता का पालन केवल हिंदुओं की जिम्मेदारी नहीं


म.प्र के बागेश्वर धाम के प्रमुख धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री अपने बेबाक बयानों के लिए चर्चित रहते हैं। भारत को हिन्दू राष्ट्र घोषित करने में वे लेशमात्र भी संकोच नहीं करते। बिहार के बोधगया में दिया उनका वह ताजा  बयान चर्चा के साथ ही विवाद में भी घिर गया जिसमें उन्होंने कहा था कि हिन्दू अपने धर्मगुरुओं को अपमानित करने में आगे - आगे रहते हैं जबकि मुसलमान कभी मौलवियों के विरुद्ध कुछ नहीं बोलते। उन्होंने इस बात पर भी ऐतराज जताया कि  हवस के पुजारी जैसी टिप्पणी आम तौर पर सुनाई देती है लेकिन हवस का मौलवी या पादरी नहीं कहा जाता। उनका कहना है कि हिंदुओं के दिमाग में इस तरह के शब्द प्रायोजित तरीके से भरे गए हैं। उनके इस बयान पर मुस्लिम धर्मगुरुओं की आपत्ति आने पर उनका कहना है कि पुजारी हिन्दू धर्म में अत्यंत सम्मानित होता है और उनके बयान का उद्देश्य हिंदुओं को जगाना था। उनकी उक्त  टिप्पणियों से राजनीतिक हल्कों में भी  हलचल है। लेकिन बिना पूर्वाग्रह के सोचा जाए तो श्री शास्त्री की बातों में काफी वजनदारी है। उनमें सांप्रदायिकता खोजने वाले निश्चित रूप से बिलबिला रहे होंगे किंतु यक्ष प्रश्न ये है कि इस तरह की टिप्पणियों का केंद्र  सनातन धर्म और उससे जुड़े चरित्र ही क्यों होते हैं? भारतीय फिल्मों में भी पंडित और पुजारी सामान्यतः  उपहास का पात्र होता है या उसे चरित्रहीन बताया जाता है। इसके विपरीत मौलवी और पादरियों को ज्यादातर दयावान , परोपकारी और सहृदय दिखाने का चलन है। बागेश्वर धाम प्रमुख का ये कहना बिल्कुल सही है कि हिंदुओं में अपने धर्म से जुड़े सम्माननीय व्यक्तित्वों के अपमान को चुपचाप देखने की प्रवृत्ति है जबकि मुस्लिम समाज अपने धर्म गुरुओं के विरुद्ध एक बात भी न कहता और न सुनता है। ये आरोप भी सच्चाई के काफी करीब है कि हमारे देश में धर्मनिरपेक्षता को ढोने का दायित्व केवल हिंदुओं के कंधों पर है। सहिष्णुता और सर्व धर्म सद्भाव की भावना भी उन्हीं से अपेक्षित है। वैसे ये बात बिल्कुल जायज है कि बहुसंख्यक होने से हिंदुओं का फर्ज है कि वे  अल्पसंख्यक समुदाय पर अपनी मर्जी न थोपें परंतु उसी के साथ  ही अल्पसंख्यकों को भी चाहिए कि वे हिंदुओं की  भावनाओं का सम्मान करें और बजाय  टकराव के रास्ते पर चलने के उनके साथ समन्वय स्थापित करें। हमारा देश  बहुधर्मी है जिसमें हिन्दू, मुस्लिम, सिख, जैन, बौद्ध , पारसी और ईसाई सभी  रहते हैं। इनमें हिंदुओं की संख्या 82 प्रतिशत है। ऐसे में इसे भले ही सरकारी तौर पर  हिन्दू राष्ट्र घोषित न किया गया हो किंतु बागेश्वर धाम प्रमुख द्वारा भारत को हिन्दू राष्ट्र कहे जाने पर कांग्रेस के वरिष्ट नेता कमलनाथ ने भी ये कहकर उनका समर्थन किया था कि 80 फीसदी से ज्यादा हिन्दू जिस देश में रहते हों उसे हिन्दू राष्ट्र नहीं तो और क्या कहेंगे ? रही बात धर्मनिरपेक्षता की तो वामपंथी विचारधारा से ओतप्रोत सुप्रसिद्ध शायर जावेद अख्तर को दिये एक साक्षात्कार में स्व. अटल बिहारी वाजपेयी ने दो टूक कहा था कि भारत संविधान के कारण धर्म निरपेक्ष नहीं है बल्कि इसलिए क्योंकि यहाँ हिंदू बहुसंख्यक हैं। वे एक पुस्तक या ईश्वर से बंधे नहीं हैं। हिन्दू धर्म की सोच इतनी उदार है कि वह नास्तिक व्यक्ति को भी अपने भीतर समाहित कर लेती है। इसके उलट मुस्लिम बहुल देशों में धर्मनिरपेक्षता के लिए कोई गुंजाइश नहीं है। ज्यादा दूर क्यों जाएं हमारे पड़ोसी पाकिस्तान और बांग्ला देश को ही देखें तो वहाँ रहने वाले हिंदुओं और ईसाइयों  की  दयनीय स्थिति किसी से छिपी नहीं है। इंडोनेशिया ही संभवतः अपवाद होगा जो मुस्लिम बहुल होने के बावजूद भारतीय संस्कृति से अपना जुड़ाव बनाये हुए है। समूचे अरब जगत में एक भी मुस्लिम बहुल देश सिवाय इस्लाम के अन्य किसी धर्म को प्रोत्साहित नहीं करता। हमारे देश में रहने वाले गैर हिंदुओं को प्राप्त धार्मिक आजादी पर किसी को आपत्ति नहीं है किंतु इसके चलते हिंदुओं के धार्मिक रीति रिवाजों और  व्यक्तित्वों का अपमान किया जाना धर्मनिरपेक्षता के खोखलेपन को उजागर करता है। ये बात पूरी तरह सच है कि सैकड़ों वर्षों की गुलामी ने हिंदुओं के संगठनात्मक ढांचे को कमजोर किया है। आजादी के बाद गंगा - जमुनी संस्कृति का जो स्वांग रचा गया उसने भी बहुत नुकसान पहुंचाया। ऐसे में धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री ने जो मुद्दा छेड़ा उस पर हिन्दू समाज  तो मंथन करे ही  किंतु उनकी बात का विरोध कर रहे लोगों को भी इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि धर्मनिरपेक्षता का पालन अकेले  बहुसंख्यक समुदाय की जिम्मेदारी ही नहीं है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी