चूंकि कांग्रेस , भाजपा और क्षेत्रीय दल भी इस फार्मूले को अपनाकर चुनाव जीतने की कोशिश करते हैं इसलिए आम आदमी पार्टी दिल्ली विधानसभा चुनाव के पहले जिस तरह से सौगातें बाँटने में जुटी है उसमें कुछ भी नया नहीं लगता। लेकिन इससे अरविंद केजरीवाल की घबराहट जरूर सामने आ गई है। जो यू ट्यूबर पत्रकार अभी तक उनके गुणगान किया करते थे वे भी कहने लगे हैं कि आगामी चुनाव आम आदमी पार्टी के लिए बेहद कठिन है। इसका एक कारण 10 साल के बाद स्वाभाविक रूप से उत्पन्न होने वाली सत्ता विरोधी भावना है और दूसरा श्री केजरीवाल और मनीष सिसौदिया सहित कुछ मंत्रियों के विरुद्ध भ्रष्टाचार के प्रक्ररण दर्ज होना है। लेकिन तीसरी और सबसे बड़ी वजह है उनकी सरकार द्वारा किये गए तमाम वायदे पूरे न होना। मुफ्त बिजली और पानी ने श्री केजरीवाल को दो बार विशाल बहुमत दिलवाया। सरकारी शालाओं के स्तर में सुधार और मोहल्ला क्लीनिक जैसे कार्यों से पहले कार्यकाल में आम आदमी पार्टी सरकार ने जो साख कमाई उसके कारण ही उसे न सिर्फ दूसरा कार्यकाल मिला बल्कि नगर निगम भी उसके कब्जे में आ गई। दिल्ली की हवा ने पंजाब में भी असर दिखाया और वहाँ भी इस पार्टी ने ऐतिहासिक बहुमत हासिल कर सरकार बना ली। लेकिन चौंकाने वाली बात ये है कि विधानसभा में मिली इकतरफा जीत के बावजूद आम आदमी पार्टी दिल्ली में लगातार दो लोकसभा चुनाव बुरी तरह हारी। 2014 में तो वह नई नवेली थी किंतु 2019 में दिल्ली की सत्ता पर काबिज होने के बावजूद उसकी लुटिया डूब गई और वह सातों सीटों पर पटकनी खा गई। 2024 में उसने कांग्रेस से समझौता करते हुए सीटों का बंटवारा किया किंतु नतीजा वही रहा। यहाँ तक कि पंजाब में भी उसे उम्मीद के मुताबिक लोकसभा सीटें नहीं मिलना ये दर्शाने के लिए पर्याप्त है कि जनता उसे राष्ट्रीय राजनीति के योग्य नहीं मानती जो श्री केजरीवाल की महत्वाकांक्षाओं को बड़ा झटका है। उन्हें उम्मीद रही कि जेल भेजे जाने से उनके प्रति सहानुभूति का सैलाब उमड़ पड़ेगा किंतु जनता ने लोकसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी को बुरी तरह हराकर उस पर तुषारापात कर दिया। उनके पद छोड़ने और आतिशी मर्लेना को अपनी जगह बिठाने के फैसले ने स्पष्ट कर दिया कि श्री केजरीवाल का आत्मविश्वास पूरी तरह डगमगा गया है। उनके अनेक निकट साथी पार्टी छोड़ चुके हैं। उम्मीदवारों की घोषणा के बाद पार्टी के भीतर विरोध की जो आवाजें उठीं वे भी इस बात का संकेत हैं कि उनके दबदबे में कमी आई है। यद्यपि उनके समर्थक मानकर चल रहे हैं कि दिल्ली के मतदाता उन्हें तीसरी बार सत्ता सौंपेंगे किंतु राजनीतिक विश्लेषक ये कहने में संकोच नहीं कर रहे कि इस बार कांग्रेस जिस तरह जोर आजमाइश कर रही है उससे आम आदमी पार्टी के लिए खतरा उत्पन्न हो गया है। स्मरणीय है लोकसभा चुनाव के बाद ही पार्टी ने दिल्ली के दंगल में अकेले उतरने का ऐलान कर कांग्रेस को ठेंगा दिखा दिया था। हरियाणा चुनाव में दोनों अलग - अलग लड़े और सत्ता भाजपा के हाथ चली गई। दिल्ली में कांग्रेस उसी का बदला लेने आमादा है। ये बात किसी से छिपी नहीं है कि 2015 में आम आदमी पार्टी को मिली सफलता कांग्रेस के मतों में सेंध लगने की वजह से थी। हालांकि मध्यमवर्गीय मतदाता भाजपा के भी छिटके किंतु कांग्रेस तो शून्य की शर्मनाक स्थिति तक पहुँच गई। अल्पसंख्यकों और गऱीबों का वोट बैंक खिसक जाने से उसकी स्थिति दिल्ली में दयनीय होकर रह गई किंतु इस बार वह जो दमखम दिखा रही है उसके कारण वह जीते न जीते किंतु आम आदमी पार्टी की राह में रुकावट अवश्य पैदा कर सकती है। दूसरी ओर हरियाणा और महाराष्ट्र में जीतने के बाद भाजपा लोकसभा चुनाव के झटके से उबर चुकी है। इन्हीं सब कारणों से आम आदमी पार्टी सौगातों का पिटारा खोलने में जुट गई है। महिलाओं और बुजुर्गो के बाद उसकी ओर से मंदिरों के पुजारियों और गुरुद्वारों के ग्रंथियों को 18 हजार प्रति माह देने का वायदा कर दिया गया। लेकिन पिछले कार्यकाल में मौलवियों को स्वीकृत मासिक राशि का भुगतान 17 महीनों से नहीं होने और महिलाओं को दी जाने वाली राशि का वायदा पंजाब में पूरा न होने से पार्टी की विश्वसनीयता पर सवाल उठ रहे हैं। म.प्र और महाराष्ट्र में भाजपा ने महिलाओं को हर महीने राशि देकर मुकाबला अपने पक्ष कर लिया किंतु श्री केजरीवाल को ये सब देर से याद आया। ऊपर से दिल्ली सरकार के विभागों ने उनके वायदों के विरुद्ध विज्ञापन देकर उनकी किरकिरी करवा दी। ऐसे में आम आदमी पार्टी जिस तरह बदहवासी में नई घोषणाएं करती जा रही है वह उसकी घबराहट का संकेत है। और ये भी कि वह अपनी उपलब्धियों को लेकर खुद भी आश्वस्त नहीं है।
- रवीन्द्र वाजपेयी