Tuesday, 31 December 2024

दिल्ली चुनाव : घबराहट में है आम आदमी पार्टी

    

    चूंकि  कांग्रेस , भाजपा और क्षेत्रीय दल भी इस फार्मूले को अपनाकर चुनाव जीतने की कोशिश करते हैं इसलिए आम आदमी पार्टी दिल्ली विधानसभा चुनाव के पहले जिस तरह से सौगातें बाँटने में जुटी है उसमें कुछ भी नया  नहीं लगता। लेकिन इससे  अरविंद केजरीवाल की घबराहट जरूर सामने आ गई है। जो यू ट्यूबर पत्रकार अभी तक उनके गुणगान किया करते थे वे भी कहने लगे हैं कि आगामी चुनाव आम आदमी पार्टी के लिए बेहद कठिन है। इसका एक कारण 10 साल के बाद स्वाभाविक  रूप से उत्पन्न होने वाली सत्ता विरोधी भावना है और दूसरा श्री केजरीवाल और मनीष सिसौदिया सहित कुछ मंत्रियों के विरुद्ध  भ्रष्टाचार के प्रक्ररण दर्ज होना है। लेकिन तीसरी और सबसे बड़ी वजह है उनकी सरकार द्वारा किये गए तमाम वायदे पूरे न होना। मुफ्त बिजली और पानी  ने श्री केजरीवाल को दो बार विशाल बहुमत दिलवाया। सरकारी शालाओं के स्तर में सुधार और मोहल्ला क्लीनिक जैसे कार्यों से पहले कार्यकाल में आम आदमी पार्टी सरकार ने जो साख कमाई उसके कारण ही उसे न सिर्फ दूसरा कार्यकाल मिला बल्कि नगर निगम भी उसके कब्जे में आ गई। दिल्ली की हवा ने पंजाब में भी असर दिखाया और वहाँ भी इस पार्टी ने ऐतिहासिक बहुमत हासिल कर सरकार बना ली। लेकिन चौंकाने वाली बात ये है कि विधानसभा में मिली इकतरफा जीत के बावजूद आम आदमी पार्टी दिल्ली में लगातार दो लोकसभा चुनाव बुरी तरह हारी। 2014 में तो वह नई नवेली थी किंतु 2019 में दिल्ली की सत्ता पर काबिज होने के बावजूद उसकी लुटिया डूब गई और वह सातों सीटों पर पटकनी खा गई। 2024 में उसने कांग्रेस से समझौता करते हुए सीटों का बंटवारा किया किंतु नतीजा वही रहा। यहाँ तक कि पंजाब में भी उसे उम्मीद के मुताबिक लोकसभा सीटें नहीं मिलना ये दर्शाने के लिए पर्याप्त है कि जनता उसे राष्ट्रीय राजनीति के योग्य नहीं  मानती जो श्री केजरीवाल की महत्वाकांक्षाओं को बड़ा झटका है। उन्हें उम्मीद रही कि जेल भेजे जाने से उनके प्रति सहानुभूति का सैलाब उमड़ पड़ेगा किंतु जनता ने लोकसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी को बुरी तरह हराकर उस पर तुषारापात कर दिया। उनके पद छोड़ने और आतिशी मर्लेना को अपनी जगह बिठाने के फैसले ने स्पष्ट कर दिया कि श्री केजरीवाल का आत्मविश्वास पूरी तरह डगमगा गया है। उनके अनेक निकट साथी पार्टी छोड़ चुके हैं। उम्मीदवारों की घोषणा के बाद पार्टी के भीतर विरोध की जो आवाजें उठीं वे भी इस बात का संकेत हैं कि उनके दबदबे में कमी आई है। यद्यपि उनके समर्थक मानकर चल रहे हैं कि दिल्ली के मतदाता उन्हें तीसरी बार सत्ता सौंपेंगे किंतु  राजनीतिक विश्लेषक ये कहने में संकोच नहीं कर रहे कि इस बार कांग्रेस जिस तरह जोर आजमाइश कर रही है उससे आम आदमी पार्टी के लिए खतरा उत्पन्न हो गया है। स्मरणीय है  लोकसभा चुनाव के बाद ही पार्टी ने दिल्ली के दंगल में अकेले उतरने का ऐलान कर कांग्रेस को ठेंगा दिखा दिया था। हरियाणा चुनाव में दोनों अलग - अलग लड़े और सत्ता भाजपा के हाथ चली गई। दिल्ली में कांग्रेस उसी का बदला लेने आमादा है। ये बात किसी से छिपी नहीं है कि 2015 में आम आदमी पार्टी को मिली सफलता कांग्रेस के मतों में सेंध लगने की वजह से थी। हालांकि मध्यमवर्गीय मतदाता भाजपा के भी छिटके किंतु कांग्रेस तो शून्य की शर्मनाक स्थिति तक पहुँच गई। अल्पसंख्यकों और गऱीबों का वोट बैंक खिसक जाने से उसकी स्थिति दिल्ली में दयनीय होकर रह गई किंतु इस बार वह जो दमखम दिखा रही है उसके कारण वह जीते न जीते किंतु आम आदमी पार्टी की राह में रुकावट अवश्य पैदा कर सकती है। दूसरी ओर हरियाणा और महाराष्ट्र में जीतने के बाद भाजपा लोकसभा चुनाव के झटके से उबर चुकी है। इन्हीं सब कारणों से आम आदमी पार्टी सौगातों का पिटारा खोलने में जुट गई है। महिलाओं और बुजुर्गो के बाद उसकी ओर से मंदिरों के पुजारियों और गुरुद्वारों के ग्रंथियों को 18 हजार प्रति माह देने का वायदा कर दिया गया। लेकिन पिछले कार्यकाल में मौलवियों को स्वीकृत मासिक राशि का भुगतान 17 महीनों से नहीं होने और महिलाओं को दी जाने वाली राशि का वायदा पंजाब में पूरा न होने से पार्टी की विश्वसनीयता पर सवाल उठ रहे हैं। म.प्र और महाराष्ट्र में भाजपा ने महिलाओं को हर महीने राशि देकर मुकाबला अपने पक्ष कर लिया किंतु श्री केजरीवाल को ये सब देर से याद आया। ऊपर से दिल्ली सरकार के विभागों ने उनके वायदों के विरुद्ध विज्ञापन देकर उनकी किरकिरी करवा दी। ऐसे में आम आदमी पार्टी जिस तरह बदहवासी में नई घोषणाएं करती जा रही है वह उसकी घबराहट का संकेत है। और ये भी कि वह अपनी उपलब्धियों को लेकर खुद भी आश्वस्त नहीं है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Monday, 30 December 2024

मौत पर सियासत अशोभनीय : स्मारक संबंधी स्थायी नीति जरूरी

किसी की मृत्यु पर दलगत राजनीति से जुड़े मतभेदों  का उठना शोभा नहीं देता। दुर्भाग्य से हमारे देश की राजनीति में वह मर्यादा टूटने से सौजन्यता, सद्भावना और संवेदनशीलता जैसे शब्द अप्रासंगिक होते जा रहे हैं। यही वजह है कि शोक के अवसर पर भी राजनीतिक नफे - नुकसान का बही खाता खोल दिया जाता है। दिवंगत  हस्ती की चिता सुलगने के पहले ही नफरत की आग भड़कने लगती है। इसके लिये किसी एक व्यक्ति या दल को कसूरवार ठहराना तो अन्याय होगा क्योंकि निष्पक्ष आकलन करें तो समूची राजनीतिक बिरादरी  इसके लिए जिम्मेदार है। हाँ, किसी का दोष अधिक और किसी का कम हो सकता है। ताजा संदर्भ पूर्व प्रधानमंत्री डाॅ. मनमोहन सिंह का अंतिम संस्कार  राजघाट परिसर में करने की बजाय निगम बोध घाट में किये जाने से उत्पन्न विवाद है। अंत्येष्टि की पूर्व रात्रि कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने केंद्र सरकार को पत्र लिखकर  दाह संस्कार राजघाट में किये जाने का अनुरोध किया ताकि उनका स्मारक भी वहीं बन सके। इस पर सरकार ने  सूचित किया कि स्मारक हेतु स्थान आवंटन में समय लगेगा । साथ ही आश्वासन भी दिया गया कि शीघ्र ही इसकी प्रक्रिया पूर्ण कर न्यास गठित करने के बाद  उनका भव्य स्मारक बनवाया जाएगा। लेकिन कांग्रेस इससे संतुष्ट नहीं हुई। इसके बाद अंत्येष्टि में बदइंतजामी की शिकायतें की गईं। जवाब में भाजपा ने भी कांग्रेस पर आरोप लगाया कि उसने पूर्व प्रधानमंत्री पी. वी. नरसिम्हा राव का अंतिम संस्कार दिल्ली में नहीं होने दिया। और तो और उनके पार्थिव शरीर को  लोगों के  दर्शनार्थ कांग्रेस मुख्यालय तक में नहीं रखने दिया। आरोप तो ये भी है कि डाॅ. सिंह उनकी अंत्येष्टि में जाने के इच्छुक थे किंतु उनको रोक दिया गया। इस सबके बीच पूर्व राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी की बेटी शर्मिष्ठा मुखर्जी का एक बयान चर्चा में है जिसमें उन्होंने  अपने  पिता की मृत्यु के बाद  कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक बुलाकर श्रद्धांजलि न दिये जाने की आलोचना की थी। डाॅ. सिंह के अंतिम  संस्कार संबंधी विवाद में आम आदमी पार्टी भी कूद पड़ी और दिल्ली विधानसभा चुनाव को ध्यान में रखते हुए सिखों के अपमान का मुद्दा छेड़ दिया। इन सब विवादों का सूक्ष्म विश्लेषण करें तो ये बात सामने आये बिना नहीं रहेगी कि राजनीतिक पार्टियां किसी प्रसिद्ध व्यक्ति की मृत्यु का राजनीतिकरण करने में भी संकोच नहीं करतीं। कांग्रेस की ओर से इस बात का प्रचार किया गया कि राहुल गाँधी डाॅ. सिंह की मृत्यु पर उनके परिजनों के साथ रहे और उनके पार्थिव शरीर को कंधा भी दिया। अब भाजपा ने कटाक्ष किया है कि गत दिवस उनकी अस्थियाँ यमुना में प्रवाहित किये जाने के समय न तो श्री गाँधी तथा उनके परिवार का कोई सदस्य उपस्थित था और न ही अन्य कोई कांग्रेस जन । आज खबर आ गई कि केंद्र सरकार ने डाॅ. सिंह के स्मारक हेतु स्थान चयन हेतु कारवाई प्रारंभ कर दी है और जल्द ही उसके लिए न्यास का गठन कर दिया जाएगा। इतनी जल्दी हरकत में आने के पीछे भी राजनीति है क्योंकि भाजपा भी दिल्ली विधानसभा चुनाव को दृष्टिगत रखते हुए किसी सिख नेता की मौत पर राजनीतिक विद्वेष के आरोप से बचना चाह रही है। इन विवादों के साथ ही  राजधानी दिल्ली  में दिवंगत राष्ट्रीय नेताओं के स्मारक  हेतु स्थान की उपलब्धता का मुद्दा गर्माने लगा है। ये जानकारी भी आई है कि डाॅ. सिंह के प्रधानमंत्री काल में  ही राजघाट परिसर में नया स्मारक बनाने पर रोक लगाई गई थी। धीरे - धीरे और भी बातें सामने आयेंगी किंतु सवाल ये है कि जिन नेताओं के स्मारक दिल्ली में बने हैं उन पर उन्हीं की पार्टी के लोग कितनी बार जाते हैं ? महात्मा गाँधी की समाधि भी सरकारी कर्मकांड का अनिवार्य हिस्सा है। यदि इन स्मारकों के रखरखाव का जिम्मा उस पार्टी को दे दिया जाए जिसके लिए वे  जीवन पर भर खपते रहे तब उनकी कैसी दुर्गति होगी इसका अंदाज आसानी से लगाया जा सकता है। ये सब देखते हुए ऐसे मामलों में कोई स्थायी नीति बनना जरूरी है। देश के लिए योगदान देने वाली विभूतियों के व्यक्तित्व और कृतित्व से भावी पीढ़ी को अवगत करवाने के लिए उनसे जुड़ी स्मृतियाँ अक्षुण्ण रखना आवश्यक है किंतु कई एकड़ जमीन घेरकर ईंट - पत्थरों से बने बेजान स्मारक इस उद्देश्य की पूर्ति नहीं करते। इसी तरह जिन बंगलों में वे रहे उनको स्मारक बनाने की परिपाटी भी लोकतांत्रिक समाज में अटपटी लगती है। बेहतर हो उन विभूतियों की स्मृति को सम्मान के साथ सुरक्षित रखते हुए कुछ ऐसा किया जाए जिससे उनके प्रति श्रद्धा  का भाव किसी दल विशेष तक सीमित न रहकर पूरे समाज में  कायम  रहे। आश्चर्य है जो नेतागण भगवान राम के मंदिर निर्माण को फिजूलखर्ची बताकर उतनी राशि शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं पर खर्च करने की वकालत करते हैं वे ऐसे स्मारकों पर होने वाले खर्च पर खामोश हो जाते हैं। 


- रवीन्द्र वाजपेयी


Saturday, 28 December 2024

मनमोहन को लाने वाले राव साहब को भी भुलाया नहीं जा सकता


परसों रात जैसे ही पूर्व प्रधानमंत्री डाॅ. मनमोहन सिंह के निधन की  खबर आई उनके बारे में जो विचार सुनने और पढ़ने मिले उनमें अधिकतर उनकी प्रशंसा से भरे हुए थे। यद्यपि किसी दिवंगत व्यक्ति की आलोचना से लोग बचते हैं। लेकिन घोर विरोधी भी जब तारीफों के पुल बांधे तो फिर ये बात माननी होती है कि दुनिया से गए व्यक्ति  ने अपनी ज़िंदगी में कुछ अच्छे कार्य करने के अलावा किसी को नुकसान नहीं पहुंचाया होगा। स्व. डाॅ. सिंह  बतौर नौकरशाह ऐसे पदों पर रहे जिनमें नीतियों को बनाने और लागू करने का काम था इसलिए उनका आम जनता से प्रत्यक्ष संपर्क नहीं था। लेकिन उनके पास  देश - विदेश में कार्य करने का व्यापक अनुभव था। दूसरी तरफ  स्व. पी. वी. नरसिम्हा राव हालांकि पूरी तरह राजनेता थे किंतु वे भी काफी अध्ययनशील थे। उन्हें भी राज्य और केन्द्र सरकार में काम का पर्याप्त अनुभव हो चुका था। प्रधानमंत्री बनने के पहले तक किसी ने उनको कांग्रेस की आर्थिक नीतियों से असहमत होते हुए नहीं सुना था। जब वे प्रधानमंत्री बने उस समय गाँधी परिवार राजनीतिक तौर पर काफी कमजोर था।  सोनिया गाँधी को राजनीति में रुचि थी नहीं और राहुल - प्रियंका की उम्र भी इतनी नहीं थी कि राजनीतिक विरासत संभाल पाते। ऐसे में आर्थिक नीतियों को पं. नेहरू और इंदिरा गाँधी के समाजवादी मॉडल के बजाय दुनिया के बदलते वातावरण के अनुरूप ढालने का अवसर तो था किंतु कांग्रेस में ऐसा कोई शख्स नहीं था जो उनकी सोच को अमल में ला सके।  प्रणव मुखर्जी जैसे अनुभवी व्यक्ति को वरिष्ट होने से  निर्देशित करना कठिन था। दूसरे थे पी. चिदंबरम किन्तु उनकी अपनी महत्वाकांक्षाएँ भी आगे जाकर खतरा हो सकती थीं। लिहाजा राव साहब ने डाॅ. सिंह जैसे नौकरशाह को चुना जो सरकार के आदेश का पालन करने का अभ्यस्थ होता है। स्मरणीय है योजना आयोग के उपाध्यक्ष रहते उनके एक प्रस्तुतीकरण पर तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गाँधी ने योजना आयोग को जोकरों का समूह कह दिया था। बताते हैं डाॅ. सिंह उससे क्षुब्ध होकर त्यागपत्र देने का मन बना बैठे थे किंतु एक निकटस्थ   के समझाने पर अपमान सहकर भी शान्त रहे। उनकी वह बात राव साहब को याद रही। प्रणव दा और श्री चिदंबरम को कांग्रेस की परंपरागत आर्थिक नीतियों को पूरी तरह उलट- पुलट करने के लिए राजी करना मुश्किल होता। ये सब सोचकर ही स्व. राव ने डाॅ. सिंह को वित्त मंत्री बनाकर पर्याप्त छूट देते हुए आर्थिक सुधारों की प्रक्रिया का शुभारंभ किया जिससे पहली बार कांग्रेस नेहरू - गाँधी प्रभाव से मुक्त नजर  आई। डाॅ. सिंह चूंकि विशुद्ध नौकरशाह थे इसलिए उन्होंने पेशेवर कार्यशैली अपनाते हुए अर्थव्यवस्था को वैश्विक माहौल के अनुरूप ढालने का दुस्साहस किया। वरना उसके पूर्व तक  सरकार की आर्थिक नीतियाँ समाजवाद और साम्यवाद का मिश्रण थीं तथा  शासन के नियंत्रण वाली अर्थव्यवस्था पसंद की जाती थी। ऐसे में राव साहब और मनमोहन की जोड़ी को खुलकर खेलने का अवसर मिला । नेहरू युग में  सार्वजनिक क्षेत्र को बढ़ावा दिया गया। इंदिरा जी ने उस नीति को और सख्त किया। बैंक, बीमा, कोयला खदानों का राष्ट्रीयकरण जैसे कदम उठाये गए। ये भी  कहा जाने लगा कि भारत की आर्थिक नीतियां साम्यवाद से प्रभावित हो चली थीं।  इंदिरा जी पूरी तरह सोवियत संघ के साथ जुड़ चुकी थीं। उनके सलाहकारों में साम्यवादी मानसिकता के लोग भरे थे।  राव साहब के सामने ये चुनौती थी कि वे अपनी सरकार को उस  ढर्रे से कैसे निकालें ? और इस काम में उनको साथ मिला डाॅ. मनमोहन सिंह का जो राजनीतिक हसरतों से परे केवल अपने काम  से ही वास्ता रखते थे ।  और सिवाय प्रधानमंत्री के उनकी जवाबदेही किसी के प्रति नहीं थी। परसों रात से डाॅ. सिंह के व्यक्तित्व और कृतित्व का बखान जोर - शोर से हो रहा है। सोनिया जी ने उन्हें मार्गदर्शक और राहुल ने  अपना गुरु कहकर उनके प्रति श्रद्धा व्यक्त की किंतु उनकी पीठ पर यदि राव साहब का हाथ न होता तब ये देश उदारीकरण की बजाय राष्ट्रीयकरण के मकड़जाल से बाहर नहीं निकल पाता। उस दृष्टि से राव साहब और मनमोहन सिंह जी को उन साहसियों के रूप में याद किया जाना चाहिए जिन्होंने देश को नेहरू - इंदिरा युग की आर्थिक नीतियों से मुक्ति दिलवाकर उसमें नया आत्मविश्वास भरा। डाॅ. सिंह को तो गाँधी परिवार ने उपकृत किया जिसके वे सुपात्र थे किंतु राव साहब को मरने के बाद भी अपमानित करने का काम हुआ। उनके पार्थिव शरीर को कांग्रेस मुख्यालय तक नहीं लाने दिया गया और परिजनों को उनका अंतिम संस्कार दिल्ली की बजाय हैदराबाद में करने बाध्य किया गया। ये बात इसलिए इसलिए प्रासंगिक हो उठी क्योंकि कल रात कांग्रेस अध्यक्ष ने केंद्र सरकार से डाॅ. सिंह के अन्येष्टि स्थल पर ही उनका स्मारक बनाने की मांग कर डाली। ऐसी कोई मांग राव साहब के लिए कभी हुई हो ये शायद ही कोई बता सकेगा। आखिर वे भी तो पूर्व प्रधानमंत्री थे जिन्होंने डाॅ. मनमोहन सिंह की प्रतिभा को पहिचान दिलाई।


 - रवीन्द्र वाजपेयी

Friday, 27 December 2024

21 वीं सदी की दिशा तय करने के लिए देश उनका आभारी रहेगा


यह दुखद संयोग  है कि 25 दिसंबर को देश ने भूतपूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की 100 वीं जयंती मनाई और उसकी अगली तारीख को ही पूर्व प्रधानमंत्री डाॅ. मनमोहन सिंह को खो दिया। 92 वर्षीय डाॅ. सिंह प्रख्यात अर्थशास्त्री होने के साथ ही कुशल नौकरशाह भी थे। केंब्रिज और आक्सफोर्ड जैसे विश्वप्रसिद्ध संस्थानों में शिक्षा ग्रहण करने  के बाद केंद्र सरकार के आर्थिक सलाहकार, योजना आयोग के उपाध्यक्ष और रिजर्व बैंक के गवर्नर के दायित्व का निर्वहन उन्होंने सफलतापूर्वक  किया। जब स्व. पी. वी नरसिम्हा राव ने उन्हें वित्तमंत्री बनाया तब लोगों को आश्चर्य हुआ क्योंकि वे राजनीति से दूर थे। उस दौर में देश गम्भीर आर्थिक संकट में था। यहाँ तक कि रिजर्व बैंक को सोना गिरवी रखकर विदेशी मुद्रा का प्रबन्ध करना पड़ा अन्यथा  अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर हमारी छवि को जबरदस्त झटका लगता। डाॅ. सिंह ने उस कठिन समय में आर्थिक सुधारों को लागू करने  का साहस दिखाया जिसको कांग्रेस में भी पूरा समर्थन नहीं था।  राव सरकार अल्पमत में होने से अनेक दलों का दबाव झेल रही थी किंतु वे रुके नहीं।  धीरे - धीरे  आर्थिक सुधारों को सर्वदलीय स्वीकृति प्राप्त हुई। इसका सबसे बड़ा प्रमाण ये था कि 2004 में जब डाॅ. सिंह प्रधानमंत्री बने तब उनकी अल्पमत सरकार को वामपंथी दलों ने भी समर्थन दिया। सभी पार्टियों की राज्य सरकारों ने आर्थिक सुधारों को अपनाते हुए उद्योगपतियों के सामने लाल कालीन बिछाने की जो संस्कृति अपनाई उसके प्रणेता डाॅ. सिंह ही थे। लेकिन दूसरी तरफ ये भी सही है कि वे प्रधानमंत्री पद के स्वाभाविक दावेदार नहीं थे। 2004 में आश्चर्यजनक चुनाव परिणाम आए। कांग्रेस सबसे बड़े दल के रूप में सत्ता की हकदार बनी और सोनिया गाँधी को संसदीय दल का नेता चुना गया। लेकिन उन्होंने प्रधानमंत्री बनने से इंकार कर  डाॅ. सिंह की ताजपोशी करवा दी। वह सब क्यों और कैसे हुआ ये आज भी रहस्य है। डाॅ. सिंह जिन राव साहब की पसंद थे उनसे गाँधी परिवार की चिढ़ किसी से छिपी नहीं थी। लेकिन राव साहब के  करीबी रहे मनमोहन जी को श्रीमती गाँधी ने इसलिए चुना क्योंकि वे प्रणव मुखर्जी को प्रधानमंत्री नहीं देखना चाहती थीं जो हर दृष्टि से योग्य थे। ये बात भी कुछ किताबों के जरिये प्रकाश में आई कि भाजपा द्वारा विदेशी महिला को प्रधानमंत्री बनाये जाने के विरोध  के चलते गाँधी परिवार के भीतर भी ये चर्चा चली कि सोनिया जी पीछे हट जाएं और किसी ऐसे व्यक्ति को गद्दी सौंपी जाए जो समय आने पर राहुल गाँधी के लिए सिंहासन छोड़ दे।  लिहाजा डाॅ. सिंह को चुना गया। ये भी कुछ लेखकों ने लिखा कि परिवार राजीव गाँधी की मौत के सदमे से उबर नहीं पाया था। राहुल ने माँ को ये डर दिखाकर रोका कि सत्ता में बैठना उनके लिए जानलेवा हो सकता था। बहरहाल मनमोहन जी की प्रतिभा और अनुभव को देखते हुए उनके चयन को सर्वत्र सराहा गया। लेकिन जल्द ही साफ हो गया कि गाँधी परिवार ने सत्ता का नियंत्रण अपने पास ही रखा ।  पहला कार्यकाल पूरा होने के पहले अमेरिका के साथ परमाणु संधि के मुद्दे पर वामपंथियों ने सरकार से समर्थन वापस ले लिया। लेकिन 2009 के चुनाव में भाजपा द्वारा समुचित  चुनौती पेश न किये जाने के कारण कांग्रेस ज्यादा सीटें लेकर आई और मनमोहन  जी दोबारा प्रधानमंत्री बनाये गए। उनकी विद्वता, सौम्यता और  ईमानदारी पर किसी को संदेह नहीं था। उन्होंने जनहित में अनेक बड़े फैसले भी लिए किंतु दूसरी तरफ भ्रष्टाचार के आरोपों से उनकी सरकार घिरती  चली गई। घपलों - घोटालों का सिलसिला रुकने का नाम नहीं ले रहा था। यद्यपि वे निजी तौर पर बेदाग थे किंतु बतौर प्रधानमंत्री बदनामी के छींटे उनके दामन पर पड़ते गए। सही बात तो ये है कि उनको स्वतंत्र होकर काम करने का अवसर ही नहीं दिया गया। इसका सबसे बड़ा प्रमाण  था उनकी सरकार द्वारा राष्ट्रपति की स्वीकृति हेतु  भेजे गए अध्यादेश के प्रारूप को भरी पत्रकार वार्ता में राहुल द्वारा फाड़ दिया जाना। उस समय डाॅ. सिंह विदेश में थे। ऐसा लगा कि संभवतः वे लौटकर त्यागपत्र दे देंगे किंतु उस अपमान को भी वे चुपचाप सहन कर गए । 2014 आते - आते वे एक लाचार प्रधानमंत्री के रूप में रह गए थे। न सत्ता पर उनका नियंत्रण था और न ही संगठन पर। जननेता न वे पहले थे न बाद में बन सके। एक बार लोकसभा चुनाव लड़कर हारे और फिर जीवन भर राज्यसभा में रहे। प्रधानमंत्री के रूप में उनको सम्मान तो हासिल था किंतु शक्तियाँ नहीं। उनकी सरलता, सज्जनता और गैर राजनीतिक स्वभाव उनके राजनीतिक प्रभुत्व के आड़े आता गया। पूर्ववर्ती दोनों प्रधानमंत्री क्रमशः राव साहब और अटल जी भी अपनी सौम्यता, अनुभव और समावेशी स्वभाव के कारण सबसे प्रशंसा प्राप्त करते रहे किंतु उनमें जो निर्णय लेने की क्षमता और दृढ़ता थी उसके कारण वे दबावों का सामना करने में सफल रहे। डाॅ. सिंह इस मोर्चे पर कमजोर साबित हुए और उनकी यही कमी उनकी योग्यता , दक्षता और अनुभव पर भारी पड़ गई। यद्यपि उनकी व्यक्तिगत ईमानदारी पर किसी को संदेह नहीं रहा। उनके हिस्से में आई बदनामी दूसरों के काले कारनामों का परिणाम थी। दरअसल अपनी  प्रतिभा और ज्ञान के चलते वे एक विश्व धरोहर थे। आज देश की जो आर्थिक स्थिति है उसकी नींव उनके द्वारा ही रखी गई थी। 21 वीं सदी के भारत की दिशा तय करने के लिए उन्होंने जो कुछ किया उसके लिए देश उनका आभारी रहेगा।
विनम्र श्रद्धांजलि। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Thursday, 26 December 2024

बांग्लादेश की आर्थिक नाकेबंदी करना जरूरी


बांग्लादेश में मुस्लिम धर्मांधता अपने चरम पर है। शेख हसीना का तख्ता पलट किए जाने के बाद  बनी अंतरिम सरकार ने ग़ैर मुस्लिमों पर अत्याचार की छूट दे रखी है।  सबसे ज्यादा दमन हिंदुओं का किया जा रहा है। उनके अलावा जैन और ईसाई समुदाय को भी  प्रताड़ित किये जाने की खबरें लगातार आ रही हैं। ताजा घटना क्रिसमस पर ईसाइयों के घर जलाने की है। बांग्लादेश की काम चलाऊ सरकार  अल्पसंख्यकों की सुरक्षा का आश्वासन तो देती रहती है किंतु मुस्लिम समुदाय की गुंडागर्दी को  पूरी तरह संरक्षण दिया जा रहा है। हिंदुओं पर जिस तरह का अमानुषिक अत्याचार नई सत्ता आने के बाद शुरू हुए उसके अनेक वीडियो पूरी दुनिया में प्रसारित हो चुके हैं। लूटपाट, आगजनी आम हो गई है। लेकिन महिलाओं के साथ जिस तरह का राक्षसी व्यवहार देखने में आया वह इस्लामिक कट्टरता का सबसे घृणित चेहरा है। दुख की बात ये है कि भारत के मुस्लिम मुल्ला - मौलवी इस हैवानियत के विरुद्ध जुबान खोलने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहे। मुस्लिम देशों के जो संगठन कश्मीर घाटी में अल्पसंख्यकों पर कथित जुल्मों पर गला फाड़ते हैं वे भी बांग्लादेश में अल्पसंख्यकों के साथ हो रहे अत्याचार पर मौन धारण किये हुए हैं। इस बारे में सबसे चौंकाने वाली बात ये है कि बांग्लादेश की नई सरकार उस पाकिस्तान से गलबहियां करने में जुटी है जिसके जुल्मों से त्रस्त होकर इस देश का निर्माण हुआ जिसमें भारत का बड़ा योगदान  है। बांग्लादेश की सत्ता में बैठे लोगों के साथ ही जनता भी इस सच्चाई को झुठला नहीं सकती कि पाकिस्तान के 90 हजार सैनिकों का आत्मसमर्पण भारतीय सेना के युद्ध कौशल का नतीजा था वरना  ये इलाका आज भी पश्चिमी पाकिस्तान का गुलाम बना रहकर अत्याचार का ज़हर पीने को मजबूर रहता। 1971 में अस्तित्व में आने के कुछ सालों तक तो इस नये देश का व्यवहार  भारत के प्रति काफी सौजन्यता पूर्ण रहा किंतु देश के संस्थापक शेख मुजीब की हत्या के बाद उत्पन्न स्थितियों में रिश्ते खराब होते गए। शेख हसीना के कार्यकाल को उस दृष्टि से काफी अच्छा कहा जायेगा जब राजनयिक के साथ ही व्यावसायिक संबंध भी काफी अच्छे रहे। लेकिन बीते कुछ महीने कई सालों पर भारी पड़ गए। दरअसल बांग्लादेश के नये सत्ताधीश भारत से  केवल इस बात पर नाराज नहीं हैं कि उसने शेख़ हसीना को पनाह दे रखी है, बल्कि इसकी असली वजह उसका मुस्लिम कट्टरपंथी होना है। ये बात पूरी तरह सही है कि इस देश में हिंदुओं सहित अन्य अल्पसंख्यक समुदायों के साथ भेदभाव  शुरू से ही होता आया है। लेकिन सबसे बड़ा अल्पसंख्यक वर्ग हिंदुओं का है और पाकिस्तान का निर्माण भी हिंदुओं से नफरत के आधार पर हुआ था। इसलिए उससे अलग होने के बाद भी बांग्लादेश में हिन्दू विरोध की भावना को पुनः जोर पकड़ने में ज्यादा समय नहीं लगा।  इस तथ्य को भी ध्यान रखना होगा कि पाकिस्तान के निर्माण की मुहिम बंगाल से ही हुई थी। आजादी मिलने के समय  बंगाल में मुस्लिम कट्टरपंथियों द्वारा हिंदुओं का जो कत्ले आम हुआ वह भी सर्वविदित है। वर्तमान में बांग्लादेश में जो कुछ हो रहा है उसे देखकर लगता है विभाजन के समय से उत्पन्न नफरत आज भी बांग्लादेश के मुसलमानों में विद्यमान है। लेकिन क्रिसमस के दिन ईसाई समुदाय पर गुस्सा उतारकर वहाँ के मुस्लिम गुंडों ने दिखा दिया कि इस देश में मानवता पूरी तरह खत्म हो चुकी है। भारत के लिए ये चिंता का विषय है क्योंकि वहाँ हिंदुओं पर किये जा रहे जुल्मों के पीछे भारत के प्रति दुर्भावना ही है। अब तक भारत ने जो धैर्य दिखाया वह कूटनीतिक तौर पर सही है क्योंकि किसी देश के अंदरूनी मामले में सीधे हस्तक्षेप करना सही नहीं होता। शेख हसीना को लेकर भी हमारे सामने व्यवहारिक और कूटनीतिक मुश्किलें हैं । भारत ने उन्हें अब तक औपचारिक रूप से शरण भी नहीं दी । उधर बांग्लादेश उन्हें वापस करने की मांग कर चुका है। वहाँ रह रहे हिंदुओं की सुरक्षा भी नाजुक मुद्दा है। यद्यपि भारत ने अघोषित तौर पर बांग्लादेश को दी जाने बहुत सी चीजों की आपूर्ति कम करते हुए दबाव बनाया है किंतु अब समय आ गया है जब इस देश पर दबाव और बढ़ाया जाए। इसका सबसे अच्छा तरीका है आर्थिक नाकेबन्दी की जाए। कुछ वर्षों पहले नेपाल ने भी जब सीमा विवाद पैदा कर भारत विरोधी रुख दिखाया तब इसी कदम से उसकी ऐंठ कम हुई थी। उसके बाद मालदीव में आई चीन समर्थक सरकार ने भी भारत को आँखें दिखाना शुरू किया तब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के एक सांकेतिक कदम ने ही उसके पर्यटन उद्योग की कमर तोड़ दी जिससे घबराकर वहाँ के नये शासक दौड़े - दौड़े दिल्ली आये और रिश्ते सुधारने की दुहाई देने लगे। बांग्लादेश का मसला हालांकि ज्यादा पेचीदा है किंतु उसकी भौगोलिक स्थिति ऐसी है कि भारत के जरा से प्रतिरोध के सामने टिक नहीं सकेगा। अगले महीने की 20 तारीख को अमेरिका में बांग्लादेश की नई सरकार को संरक्षण देने वाले राष्ट्रपति अलग हो जाएंगे और भारत समर्थक डोनाल्ड ट्रम्प व्हाइट हाउस में पहुंचेंगे। संभवतः भारत उसी की प्रतीक्षा कर रहा है। लेकिन उसके पहले किसी बड़े कदम की तैयारी कर लेनी चाहिए । 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Wednesday, 25 December 2024

केन - बेतवा लिंक परियोजना की शुरुआत अटल जी को सार्थक श्रद्धांजलि है

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा म.प्र के खजुराहो में केन - बेतवा लिंक परियोजना का शिलान्यास किया जाना एक ऐतिहासिक अवसर है। 44 हजार करोड़ रु. की इस परियोजना का 90 फीसदी खर्च केंद्र सरकार वहन करेगी। उ.प्र और मध्यप्रदेश की दो नदियों को जोड़ने वाली इस परियोजना के पूरे होने पर 11 हजार हेक्टेयर भूमि सिंचित हो सकेगी वहीं 113 मेगावाट पन बिजली और 27 मेगावाट सौर ऊर्जा का उत्पादन होगा जिसका लाभ अकेले म.प्र के खाते में आयेगा। सबसे बड़ी बात बुंदेलखंड के बड़े इलाके में जल की किल्लत दूर होने से वहाँ आर्थिक विकास के दरवाजे खुल सकेंगे और लोगों के पलायन को भी रोका जा सकेगा। अभी हाल ही में प्रधानमंत्री की मौजूदगी में म.प्र और राजस्थान के  मुख्यमंत्रियों ने पार्वती - क़ाली सिंध और चम्बल लिंक परियोजना सम्बन्धी समझौता हस्ताक्षरित किया। नदियों को जोड़ने की कल्पना सबसे पहले पूर्व प्रधानमंत्री स्व. अटल बिहारी वाजपेयी द्वारा संजोई गई थी। देश में विश्वस्तरीय राजमार्गों के अलावा प्रधानमंत्री ग्रामीण सड़क योजना भी अटल जी की दूरदर्शिता का ही सुपरिणाम है। शुरू - शुरू में सड़कों के विकास को धन की बरबादी और ऑटोमोबाइल उद्योग को लाभ पहुंचाने वाला बताया गया। इसी तरह नदियों को आपस में जोड़ने की परिकल्पना का भी मखौल बनाया गया। दुर्भाग्य से 2004 के लोकसभा चुनाव में वाजपेयी सरकार चली गई और उसके बाद आई डाॅ. मनमोहन सिंह की सरकार ने नदियों को जोड़ने में तो कोई रुचि ही नहीं ली वहीं राजमार्गों और ग्रामीण सड़कों के विकास की गति भी बेहद धीमी कर दी। वह सरकार पूरे 10 साल चली। यदि उस दौरान उक्त दोनों प्रकल्पों पर प्राथमिकता के आधार पर काम किया गया होता तो आज देश की स्थिति कहीं बेहतर होती। ये संतोष का विषय है कि केन - बेतवा लिंक परियोजना की शुरुआत  प्रधानमंत्री श्री मोदी आज स्व. अटल जी की 100 वीं जयंती के दिन कर रहे हैं। निश्चित रूप से ये उनके प्रति  सार्थक श्रद्धांजलि है। इस संदर्भ में ये बात भी विचारणीय है कि इस तरह के महत्वपूर्ण प्रकल्पों को अमल में लाने के मामले में भी राजनीति होती है। मसलन 2004 में हुए सत्ता परिवर्तन के बाद आई केंद्र सरकार यदि नदियों को जोड़ने जैसी परियोजनाओं पर ध्यान देती तो निश्चित रूप से देश के बड़े हिस्से को सूखे और बाढ़ जैसी विपदाओं से बचाया जा सकता था। ये विडंबना ही है कि आज तक विभिन्न राज्यों के बीच नदियों के जल का बंटवारा विवाद का विषय बना हुआ है। इसके लिए हुए आंदोलनों में जन और धन दोनों की हानि हुई। दक्षिण में कावेरी और उत्तर में यमुना नदी के जल को लेकर पड़ोसी राज्यों के बीच चली आ रही खींचातानी ये दर्शाती है कि समस्याओं के समाधान  के प्रति हमारे यहाँ कितनी लापरवाही बरती जाती है। केन - बेतवा लिंक परियोजना उस दृष्टि से बहुत बड़ी सौगात है जो उ.प्र और म.प्र के अत्यंत पिछड़े इलाकों को विकास के पथ पर आगे ले जाने में सहायक होगी। केंद्र सरकार ने 44 हजार करोड़ के इस प्रकल्प में 90 प्रतिशत योगदान स्वीकृत कर निश्चित रूप से सराहनीय कदम उठाया है। दोनों राज्यों में फैला बुंदेलखंड अंचल अपने गौरवशाली इतिहास के लिए प्रसिद्ध है। यहाँ प्राकृतिक संपदा भी बेशुमार है। लेकिन आजादी के बाद इस इलाके की समुचित देखभाल नहीं होने से ये प्रगति की दौड़ में पीछे रह गया किंतु बीते कुछ वर्षों में केंद्र और राज्य सरकार के बीच बेहतर समन्वय के कारण बुंदेलखंड में भी विकास की उम्मीद नजर आने लगी है। प्रधानमंत्री चूंकि स्वयं ही देश में अधो संरचना के विकास में रुचि लेते हैं इसीलिए उनके 10 वर्षीय शासनकाल में   राज मार्गों, फ्लाई ओवर, नदियों पर पुल, सीमांत क्षेत्रों में सड़क और रेल सेवा , हवाई अड्डे, बंदरगाह आदि का निर्माण रिकार्ड संख्या में हुआ। पहले की सरकारें धन की कमी का रोना रोती रहीं जबकि मोदी सरकार ने आर्थिक संसाधन जुटाकर देश को विकसित करने का जो  बीड़ा उठाया उसका ही सुपरिणाम केन - बेतवा लिंक परियोजना के शिलान्यास के रूप में देखने मिल रहा है। इस महत्वपूर्ण प्रकल्प को मूर्त रूप देने के लिए प्रधानमंत्री श्री मोदी के साथ ही प्रदेश के मुख्यमंत्री डाॅ. मोहन यादव भी बधाई के हकदार हैं। उम्मीद की जा सकती है कि इस तरह की अन्य लंबित परियोजनाएं भी जल्द ही शुरू की जाएंगी जिससे जल संसाधनों का समुचित उपयोग हो सके। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Tuesday, 24 December 2024

परिवहन विभाग और भ्रष्टाचार एक दूसरे के समानार्थी हैं


म.प्र में भ्रष्टाचार का बड़ा प्रकरण चर्चा में है। आधा क्विंटल सोना, करोड़ों की नगद राशि और बेनामी संपत्तियों के दस्तावेज बरामद हो चुके हैं। एक डायरी भी मिली जिसमें कतिपय नेताओं और अधिकारियों से जुड़े लेन - देन का ब्यौरा बताया जा रहा है। लोकायुक्त और आयकर के बाद अब ईडी भी उस मामले से जुड़ गई है। सबसे बड़ी बात ये है कि इतने बड़े घोटाले का कर्ताधर्ता परिवहन विभाग का एक अदना सा पूर्व आरक्षक है जिसने  अनुकंपा नियुक्ति के जरिये नौकरी प्राप्त करने के बाद बहुत ही कम समय में करोड़ों  - अरबों का वह साम्राज्य खड़ा कर  दिया जो  किसी भी शासकीय कर्मचारी के लिए सपने में भी असंभव है। सौरभ शर्मा नामक उक्त आरक्षक का  मित्र चेतन गौर भी इस कांड में शामिल है जिसके नाम से वह पूरा कारोबार करता था। फ़िलहाल सौरभ दुबई में बताया जाता है जहाँ  से उसके प्रत्यर्पण के प्रयास चल रहे हैं। जिस तरह के खुलासे  हो रहे  हैं उनके आधार पर ये कहना गलत नहीं है कि ये मामला किसी छोटे से सरकारी कर्मचारी द्वारा की गई क़ाली कमाई का सबसे बड़ा प्रकरण होगा। इसके पूर्व  भी सरकार के अनेक भृत्य और पटवारी स्तर के कर्मचारियों के यहाँ छापों में जप्त की गई धनराशि और उनकी संपत्तियों का विवरण  इस बात को प्रमाणित करता है कि यहाँ की सरकारी मशीनरी भ्रष्टाचार में आकंठ डूबी हुई है। सरकार दावा करती है कि उसके दफ्तरों में ऐसी कार्य प्रणाली लागू है जिससे आम जनता का काम बिना घूस दिये  हो। लेकिन सच्चाई इससे कोसों दूर है। सौरभ शर्मा जैसे न जाने कितने सरकारी महकमों में कुंडली जमाये बैठे हैं।  जो जानकारी आ रही है उससे तो लगता है मानों वह आरक्षक न होकर परिवहन विभाग का कोई बड़ा अधिकारी रहा हो । विपक्षी दल परिवहन मंत्री को घेर रहा है। इस मामले में सत्ता पक्ष निश्चित रूप से दबाव में है। आरोप पूर्व मुख्य सचिव पर भी लग रहे हैं जिन्होंने अपनी सफाई भी दे डाली। किंतु सौरभ के मायाजाल में अनेक अधिकारियों के फंसे होने की खबरों से पूरा प्रशासन तंत्र सहमा हुआ है। कौन किस हद तक इस कांड से जुड़ा है ये तो जांच पूरी होने के बाद भी स्पष्ट होगा किंतु इतना तो सामान्य बुद्धि वाला भी बता देगा कि बिना ऊपरी संरक्षण के एक आरक्षक स्तर का कर्मचारी इतना बड़ा खेल करने का साहस नहीं कर सकता था। अनुकंपा नियुक्ति पाकर उसने  इतनी बड़ी कमाई करने के बाद नौकरी छोड़ दी और करोड़ों का कारोबारी बन गया। एकांत स्थान पर खड़ी कार में सोने का भंडार मिलने को लेकर भी तरह - तरह की कहानियाँ सुनने मिल रही हैं। छापे से जुड़े विभागों में श्रेय लेने की होड़ मची है। आगे की कारवाई कौन करेगा इसे लेकर भी खींचतानी चल रही है। जिन नेताओं की तरफ संदेह की सुई घूम रही है वे अपनी सफाई देने में जुट गए हैं। लपेटे में आने वाले अधिकारी भी अपने संरक्षकों के चक्कर लगा रहे हैं। मुख्यमंत्री ने किसी को न बख्शने की बात कहते हुए हर संभव जाँच का आश्वासन भी दिया है। लेकिन चूंकि जप्त हुई डायरी में प्रशासनिक अधिकारियों के नाम होने की चर्चा है इसलिए ये आशंका व्यक्त की जाने लगी है कि कुछ दिनों की सनसनी के बाद मामले पर पर्दा डाला जाने लगेगा, बड़े - बड़े वकील आरोपियों के बचाव में खड़े होंगे, निचली अदालत से सर्वोच्च न्यायालय तक प्रकरण चलेगा। और क्या पता आरोपी  बाइज्जत  बरी हो जाएं। यदि इस मामले में केवल राजनीतिक हस्तियां फंसती होतीं तो अभी तक भूचाल आ चुका होता किंतु प्रशासनिक अधिकारियों के नाम डायरी में आने के बाद मामले के रफा - दफा किये जाने की संभावना व्यक्त की जाने लगी है। हनीट्रैप नामक कांड इसका उदाहरण है। लंबा समय नहीं बीता जब परिवहन विभाग के सर्वोच्च अधिकारी विभागीय कर्मचारियों से पैसे स्वीकार करते कैमरे में कैद हो गए। आनन -  फानन उनका तबादला पुलिस मुख्यालय कर दिया गया। लेकिन इतने बड़े खुलासे के बाद जैसी कारवाई उन साहेब बहादुर पर अपेक्षित थी वह नहीं हुई। सच बात तो ये है परिवहन विभाग और भ्रष्टाचार एक दूसरे के समानार्थी हैं। ये अवधारणा बेहद मजबूत है  कि इसमें भृत्य से लेकर तो शीर्ष अधिकारी तक भ्रष्टाचार में लिप्त हैं। अपवाद स्वरूप ही कोई दूध का धुला होता होगा। इस भ्रष्टाचार को राजनीतिक संरक्षण प्राप्त होता है क्योंकि रैलियों में भीड़ जुटाने के लिए वाहनों की व्यवस्था परिवहन विभाग के सौजन्य से होने के कारण इसमें जमे अधिकारी नेताओं के कृपापात्र हो जाते हैं। आज जो विपक्ष में हैं वे भी सत्ता में रहते हुए इस मुफ्त सेवा का लाभ लेते रहे। सरकार में जिन विभागों को मलाईदार कहा जाता है उनमें से परिवहन अग्रणी है। लेकिन सौरभ शर्मा ने जॊ कारनामा किया वह अभूतपूर्व है। मुख्यमंत्री डाॅ. मोहन यादव के लिए भ्रष्टाचार के विरूद्ध जंग छेड़ने का यह अच्छा अवसर है। यदि वे इस कांड के बहाने सरकारी विभागों में व्याप्त भ्रष्टाचार को दूर करने का बीड़ा उठा लें तो उन्हें अप्रत्याशित जन समर्थन हासिल होगा। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Monday, 23 December 2024

राहुल और प्रियंका पर मुस्लिम सांप्रदयिकता का सहारा लेने का आरोप

 

संसद के शीतकालीन सत्र के दौरान कांग्रेस हर मोर्चे पर असफल रही। मुख्य विपक्षी पार्टी होने के नाते उससे अपेक्षा थी कि वह जनता की समस्याओं को उठायेगी और सरकार के कमजोर पक्ष पर प्रहार करेगी। उसके पास मुद्दों और अवसरों की कमी भी नहीं थी किंतु हमेशा की तरह वह उनका लाभ उठाने से चूक गई। राहुल गाँधी के साथ ही प्रियंका वाड्रा भी उन विषयों में उलझकर रह गईं जो अब उबाऊ लगने लगे हैं। कांग्रेस के पास संसद के दोनों सदनों में कुछ सांसद ऐसे हैं जो संसदीय बहस में अनुभवी हैं और सम - सामयिक विषयों पर उनका अध्ययन भी अच्छा है। लेकिन पार्टी उन्हें अवसर न देकर उनकी योग्यता का उपयोग नहीं कर पाती।  यही कारण रहा कि सत्र के दौरान भाजपा ने जब कांग्रेस और गाँधी परिवार पर चौतरफा हमले किये तब पार्टी के सांसदों द्वारा वैसा बचाव नहीं किया गया जैसा होना चाहिए था। इसी तरह अन्य विपक्षी दलों ने भी कांग्रेस को अकेला छोड़ दिया। परिणाम ये हुआ कि लोकसभा चुनाव के उपरांत पहले कामकाजी सत्र के  दौरान  विपक्ष में जो समन्वय देखा गया वह इस सत्र में गायब रहा। लोकसभा में नई बैठक व्यवस्था किये जाने से सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव कांग्रेस से खफ़ा हो गए जो इस सत्र के पूर्व तक राहुल के बगल में बैठते थे। और तो और फैज़ाबाद से जीतकर आये अवधेश प्रसाद को भी वे अपने बगल में बिठाते थे। राजनीतिक क्षेत्रों में चल रही चर्चाओं के अनुसार उ.प्र में हुए उपचुनावों में सपा की करारी हार के बाद अखिलेश की राहुल से नाराजगी बढ़ गई है। स्मरणीय है उन उपचुनावों में सीटों के बंटवारे को लेकर दोनों के बीच मतभेद इतना बढ़ा कि कांग्रेस ने चुनाव लड़ने से ही इंकार करते हुए सपा को अकेले छोड़ दिया। सपा का कहना है कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने उसकी कोई मदद नहीं की। इसी कारण से जब राहुल के नेतृत्व में पूरी कांग्रेस अदाणी मुद्दे पर संसद चलने नहीं दे रही थी तब सपा ने सामने आकर कहा कि उसे अदाणी मुद्दे में कोई रुचि नहीं है और वह चाहती है संसद चले। ऐसा ही रुख तृणमूल कांग्रेस ने दिखाया जो राहुल के लिए किसी झटके से कम नहीं था। दरअसल महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव के बाद ही इंडिया गठबंधन में श्री गाँधी के विरुद्ध आवाजें उठने लगीं। संसद में गठबंधन के घटक दलों ने भी कांग्रेस को जिस तरह किनारे किया वह इस बात का संकेत है कि लोकसभा चुनाव के पहले अस्तित्व में आये इंडिया गठबंधन में शामिल दलों के बीच रणनीतिक एकता भले हो गई किंतु भावनात्मक तौर पर उनके मन एक दूसरे से नहीं मिल सके। इसीलिए चुनाव खत्म होते ही जब ये स्पष्ट हो गया कि गठबंधन नरेंद्र मोदी को सत्ता में आने से नहीं रोक सका तब उसके सदस्यों में कांग्रेस की क्षमताओं को लेकर अविश्वास जागने लगा। ये बात भी गलत नहीं है कि मुख्य विपक्षी दल बनते ही कांग्रेस ने भी घटक दलों को हाशिये पर रखने की नीति अपनाई। राहुल चूंकि नेता प्रतिपक्ष बन गए इसलिए सदन में उन्हें महत्व मिलने लगा जिसे अन्य किसी के साथ बांटने से वे बचने लगे। और जबसे प्रियंका का लोकसभा में प्रवेश हुआ तबसे तो अन्य दलों से दूरी और बढ़ गई। संसद सत्र के दौरान उत्पन्न दरार अब और तेज होती दिख रही है। सबसे चौंकाने वाली बात ये है कि केरल में  सरकार के सबसे बड़े घटक सीपीएम ने कांग्रेस पर अतिवादी मुस्लिम गुटों से समर्थन प्राप्त कर वायनाड लोकसभा चुनाव जीतने का आरोप लगाया जो बेहद संगीन है। पार्टी नेता विजयराघवन ने पत्रकार वार्ता में कहा कि पहले राहुल और फिर प्रियंका ने उक्त सीट से चुनाव जीतने के लिए उग्रवाद के पोषक मुस्लिम संगठनों का साथ लिया। उल्लेखनीय है चुनाव प्रचार के दौरान राहुल और प्रियंका की रैलियों में मुस्लिम लीग सहित अन्य मुस्लिम संगठनों के झंडे और कार्यकर्ता बड़ी संख्या में नजर आये थे।  अब तक भाजपा ही ये आरोप लगाती आई है किंतु उसकी घोर विरोधी सीपीएम द्वारा राहुल और प्रियंका पर मुस्लिम सांप्रदायिक शक्तियों का सहारा लेकर चुनाव जीतने का आरोप इंडिया गठबंधन में टूटन बढ़ने के अलावा कांग्रेस के धर्मनिरपेक्ष होने के दावे पर बड़ा प्रहार है।  यद्यपि केरल में इंडिया गठबंधन कारगर नहीं हो सका। लोकसभा चुनाव में वामदलों ने राहुल से अनुरोध किया था कि वे वायनाड सीट छोड़कर  उत्तर भारत में कहीं से लड़ें  वे राहुल नहीं माने। अब प्रियंका भी वहीं से संसद पहुँच गईं। ये देखते हुए अब इंडिया गठबंधन की दरारें और चौड़ी होती दिख रही हैं। अब  तक सहयोगी दल कांग्रेस पर दूसरे आरोप लगाते थे किंतु अब सीपीएम द्वारा गाँधी भाई - बहिन पर मुस्लिम सांप्रदायिकता के सहारे चुनाव जीतने का आरोप लगाकर गठबंधन के सैद्धांतिक आधार पर ही प्रहार कर दिया गया है। देखना ये है कि अपनी  मुस्लिम परस्ती के लिए बदनाम सपा इस आरोप पर क्या कहती है? अन्य दलों की प्रतिक्रिया भी मायने रखेगी क्योंकि मुस्लिम सांप्रदायिकता को लेकर भाजपा पहले से ही गठबंधन को घेरती रही है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Saturday, 21 December 2024

शीतकालीन सत्र में इंडिया गठबंधन का बिखराव साफ नजर आ गया

संसद का शीतकालीन सत्र गत दिवस समाप्त हो गया। लोकसभा और राज्यसभा दोनों में औसत 50 फीसदी कामकाज हो सका और उस दौरान भी होहल्ला जारी रहा। पूरे सत्र में एक भी विधेयक पारित नहीं हुआ। एक देश एक चुनाव के विधेयक को भी जेपीसी के हवाले कर दिया गया। कांग्रेस ने अदाणी मुद्दे पर भाजपा को घेरना चाहा तो जवाबी हमले में अमेरिकी धनकुबेर जॉर्ज सोरोस से गाँधी परिवार के रिश्ते को उजागर करते हुए भाजपा ने घेराबंदी  की कोशिश की। हालांकि सत्र का समापन संविधान पर चली चर्चा और सांसदों के बीच धक्का - मुक्की जैसी घटना से हुआ किंतु जो  सबसे महत्वपूर्ण बात देखने मिली वह थी विपक्षी दलों में एकजुटता का अभाव। महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव के बाद  इंडिया गठबंधन में जबरदस्त निराशा दिखी। हालांकि हार तो हरियाणा में भी हुई थी किंतु वहाँ कांग्रेस ने  चूंकि एकला चलो की नीति अपनाई इसलिए  ठीकरा उसी के सिर फूटा। शिवसेना और सपा सहित इंडिया गठबंधन के अन्य सदस्यों ने भी खुलकर कहा कि कांग्रेस अकेले दम पर जीतने की क्षमता गँवा चुकी है। उन बयानों का उद्देश्य महाराष्ट्र चुनाव में सीटों  के बंटवारे में कांग्रेस के वर्चस्व को कम करना था और उसका असर भी हुआ। कांग्रेस को वहाँ शरद पवार और उद्धव ठाकरे के अलावा सपा को भी उनकी मांग के मुताबिक सीटें देनी पड़ गईं। चूंकि लोकसभा चुनाव में महाराष्ट्र ने इंडिया गठबंधन को भारी सफलता प्रदान की थी इसलिए उसका हौसला काफी बुलंद था। लेकिन चुनाव परिणाम उम्मीद के पूरी तरह विपरीत आये जिनमें  कांग्रेस का प्रदर्शन अब तक का सबसे खराब रहा। लेकिन उसके साथ ही उद्धव ठाकरे और शरद पवार की लुटिया भी डूब गई। ये कहने में कुछ भी गलत नहीं है कि जम्मू - कश्मीर और झारखंड में विपक्ष की जीत पर हरियाणा और महाराष्ट्र में भाजपा को मिली कामयाबी भारी पड़ गई। हरियाणा में तो भाजपा अकेले दम पर स्पष्ट बहुमत ले आई।  महाराष्ट्र में यद्यपि उसने शिवसेना ( शिंदे) और अजीत पवार के साथ सीटों का बंटवारा किया किंतु अकेले ही 132 सीटें जीत लीं जो बहुमत से मात्र 12 कम हैं। और इसी वजनदारी के बल पर एकनाथ शिंदे को हटाकर देवेंद्र फड़नवीस को मुख्यमंत्री पद मिला। इस नतीजे से एक तरफ जहाँ एनडीए के उत्साह में वृद्धि हुई वहीं इंडिया गठबंधन में टूटन की गति और तेज़ हो गई। यद्यपि आम आदमी पार्टी ने लोकसभा चुनाव के फ़ौरन बाद ही अकेले चलने की घोषणा कर दी थी किंतु हरियाणा में उसने कांग्रेस से कुछ सीटें मांगी जिसके लिए राहुल गाँधी तो राजी हो गए परंतु भूपिंदर सिंह हुड्डा  बात नहीं माने। इससे नाराज होकर अरविंद केजरीवाल ने सभी सीटों पर प्रत्याशी उतारकर कांग्रेस के लिए गड्ढा खोद दिया। दिल्ली विधानसभा चुनाव में भी दोनों एक दूसरे के विरुद्ध ताल ठोक रहे हैं। महाराष्ट्र चुनाव के फ़ौरन बाद हुए संसद के सत्र में इंडिया में शामिल अन्य घटक दलों ने भी कांग्रेस से दूरी बनाने के संकेत दे दिये। शुरुआत की ममता बेनर्जी ने गठबंधन का नेतृत्व संभालने की इच्छा जताकर  जिसे उद्धव ठाकरे गुट के अलावा सपा और लालू का समर्थन मिलने से गठबंधन के भविष्य पर सवाल खड़े होने लगे।  राहुल गाँधी द्वारा अदाणी प्रकरण उठाये जाने से उत्पन्न विवाद के कारण जब रोजाना सदन स्थगित होने की स्थिति बनी और भाजपा ने भी सोरोस रूपी अस्त्र चला दिया तब विपक्ष के अन्य दल ये कहते हुए सामने आये कि उनकी रुचि न तो अदाणी मुद्दे में है और न ही सोरोस  से उन्हें कुछ लेना देना है। वे तो इतना ही चाहते हैं कि सदन चले। तृणमूल और सपा ने तो खुलकर कांग्रेस से दूरी बना ली। जैसे - तैसे सत्र तो समाप्त हो गया किंतु दिल्ली, बिहार और उसके बाद प. बंगाल, केरल और तमिलनाडु विधानसभा चुनाव में इंडिया गठबंधन के बिखरने के आसार साफ देखे जा सकते हैं। राहुल गाँधी की चुनाव जिताऊ क्षमता  हरियाणा और महाराष्ट्र  में फुस्स साबित होने के बाद  अब सहयोगी दल कांग्रेस के साथ जुड़े रहने से हो रहे नुकसान के बारे में सोचने लगे हैं। उन्हें लगने लगा है कि वह अपने वर्चस्व वाले राज्यों में तो किसी  अन्य को साथ रखती नहीं किंतु जहाँ उसकी जड़ें कमजोर हो चुकी हैं वहाँ राष्ट्रीय पार्टी का रुतबा झाड़कर बड़ा हिस्सा मांगती है। म.प्र और हरियाणा में सपा को  कांग्रेस की उपेक्षा का अनुभव हो चुका है। बाकी दलों को भी धीरे - धीरे कांग्रेस बोझ लगने लगी है। इन सब कारणों से नये साल में इंडिया गठबंधन में खींचातानी होने की पूरी - पूरी संभावना है।  शीतकालीन सत्र के दौरान  इंडिया गठबंधन में   साझा रणनीति का अभाव खुलकर देखने मिला। ऐसा लगता है राहुल गाँधी की आत्मकेंद्रित कार्य शैली गठबंधन की एकजुटता में सेंध लगाने का कारण बन रही है। लंबे समय से गठबंधन में शामिल पार्टियों के नेताओं की बैठक न होना भी दर्शाता है कि उनमें संवादहीनता उत्पन्न हो चुकी है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Friday, 20 December 2024

राहुल की ज़िद के कारण कांग्रेस सत्र का लाभ उठाने से चूक गई


संसद में  गत दिवस जो हुआ वह शर्मनाक है। दो सांसद घायल होकर अस्पताल में भर्ती किये गये। एक महिला सांसद ने लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गाँधी पर अन्य आरोप लगाया। भाजपा की शिकायत पर पुलिस ने  उनके विरुद्ध प्रकरण दर्ज कर लिया है। दूसरी तरफ कांग्रेस के भी इसी तरह के आरोप हैं जिनमें पार्टी अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे के साथ भाजपा सांसदों द्वारा धक्का - मुक्की की शिकायत है। जो सांसद घायल हुए उनकी चोटें स्पष्ट दिखाई देती हैं। यदि श्री गाँधी ने धक्का नहीं दिया तब उनको घायल हुए सांसद से मिलकर स्थिति स्पष्ट करना चाहिए थी किंतु प्रियंका वाड्रा सहित कांग्रेस का समूचा प्रचार तंत्र उल्टे भाजपा पर आरोप लगा रहा है। और तो और सोशल मीडिया पर कांग्रेस समर्थक घायल सांसदों का मजाक उड़ाते हुए कह रहे हैं कि जरा सी धक्का -  मुक्की में आई. सी. यू में भर्ती हो गए। और भी तरह - तरह के ताने मारे जा रहे हैं। शीतकालीन सत्र का आज अवसान हो  गया ।  उद्योगपति गौतम अदाणी की गिरफ्तारी की मांग को लेकर कांग्रेस ने सदन नहीं चलने दिया। शुरू में तो अन्य विपक्षी दल उसके साथ नजर आये किंतु धीरे - धीरे उनमें फूट पड़ने लगी क्योंकि  वे अपने मुद्दे नहीं उठा पा रहे थे। बीते कुछ दिनों से संविधान पर हुई चर्चा भी व्यर्थ के विवाद में उलझती चली गई। और अदाणी से शुरू हुआ विवाद डाॅ.आंबेडकर  तक जा पहुंचा। लेकिन सत्र समाप्ति के एक दिन पहले कुछ सांसदों का खून बहने जैसी दुखद घटना के कारण यह सत्र कलंकित होकर रह गया। राहुल ने धक्का दिया या नहीं इसका पता तो पुलिस लगायेगी किंतु सांसदों को चोट आई ये तो पूरी तरह स्पष्ट है। लेकिन बजाय सहानुभूति दिखाने के अनर्गल बातें करना ये दर्शाता है कि संसदीय प्रजातंत्र के दामन पर खून के धब्बे लगने लगे हैं। कांग्रेस का कहना है उसके सांसद प्रवेश द्वार पर प्रतिदिन प्रदर्शन करते थे। भाजपा की शिकायत है कांग्रेस वाले दरवाजे से आवाजाही अवरुद्ध कर रहे थे। इस विवाद से इतर विचारणीय प्रश्न ये है कि संसद जनता और देश से जुड़े महत्वपूर्ण विषयों पर विचार कर उचित निर्णय करने के लिए बनाई गई है। सरकार बेशक बहुमत के बल पर बनती है परंतु आदर्श स्थिति तो वही है जब सत्ता और विपक्ष वैचारिक भिन्नता के बावजूद जनता और देश की बेहतरी से जुड़े मुद्दों पर एकजुट हों। उस दृष्टि से मौजूदा मुख्य विपक्षी दल  अपनी जिम्मेदारी के निर्वहन में पूरी तरह उदासीन है। ऐसा लगता है कांग्रेस लगातार तीन लोकसभा चुनाव में सत्ता से वंचित रहने से कुंठाग्रस्त हो चली है। विशेष रूप से राहुल को ये बात समझ लेनी चाहिये कि राष्ट्रीय राजनीति में कांग्रेस और नेहरू - गाँधी परिवार के प्रति पहले जैसा समर्थन नहीं रहा। अपने दम पर सत्ता हासिल करने की उसकी हैसियत  चंद राज्यों तक ही सीमित है। बड़े राज्यों में वह क्षेत्रीय दलों के सहारे रह गई है। लोकसभा चुनाव में 99 सीटें जीतने के बाद उसे लगने लगा था कि वह भाजपा का विकल्प बनने की क्षमता अर्जित कर चुकी है किंतु हरियाणा और महाराष्ट्र विधानसभा के  चुनाव परिणाम से उसकी उम्मीदों पर तुषारापात हो गया। यहाँ तक कि इंडिया गठबंधन के घटक दलों तक ने उसे आँखें दिखाना शुरू कर दिया। नेता प्रतिपक्ष बनने के बाद श्री गाँधी से अपेक्षा थी कि वे परिपक्वता दिखाएंगे किंतु वे इस सोच से बाहर नहीं निकल पा रहे कि केवल प्रधानमंत्री पर निजी हमले करने से जनता उनको सिर आँखों पर बिठा लेगी। दो राज्यों में हुई करारी पराजय के बाद बुद्धिमत्ता इसी में थी कि कांग्रेस जनता से जुड़े मुद्दे उठाकर अपनी छवि सुधारती किंतु राहुल के बचपने के कारण उसने अवसर गँवा दिया। सही बात ये है कि अदाणी मुद्दे से आम जनता को कुछ लेना - देना नहीं है। रही बात डाॅ. आंबेडकर को भुनाने तो दलित वर्ग की राजनीति करने वाले अपने प्रेरणा पुरुष को इतनी आसानी से किसी और के हाथों नहीं जाने देंगे। हालांकि शीतकालीन सत्र छोटा होता है किंतु कांग्रेस के पास सरकार को घेरने के पर्याप्त मुद्दे थे जिसमें वह एक बार फिर विफल रही। राहुल गाँधी को इस मामले में शरद पवार से सीखना चाहिए जो महाराष्ट्र चुनाव में उत्पन्न कटुता के बाद भी अपने क्षेत्र के किसानों की समस्याओं पर बात करने प्रधानमंत्री के पास जा पहुंचे। उधर मुंबई में उद्धव ठाकरे ने मुख्यमंत्री देवेंद्र फड़नवीस से भेंट करने की बुद्धिमत्ता दिखाई। बेहतर हो श्री गाँधी अतीत में विपक्ष के नेता रहे लोगों के संसदीय जीवन का अध्ययन करें जो कम संख्या में होने के बाद भी अपनी छाप छोड़ने में सफल हो जाते थे और घोर सैद्धांतिक मतभेदों के बाद भी सत्ता पक्ष के साथ निजी तौर पर मधुर सम्बन्ध बनाकर रखते थे। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Thursday, 19 December 2024

नेहरू जी की महत्वाकांक्षा के लिए डाॅ. आंबेडकर को उपेक्षित किया गया


संसद में संविधान के 75 साल पूरे होने के उपलक्ष्य में आयोजित विशेष चर्चा  विवाद में उलझकर रह गई। लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गाँधी ने संविधान के साथ मनुस्मृति की पुस्तक सदन में लहराकर आरोप लगाया कि भाजपा संविधान की बजाय मनुस्मृति का सम्मान करती है। बीते काफी समय से वे जातिगत जनगणना की मांग करते आ रहे हैं और सरकार को ये धौंस भी देते हैं कि वे ऐसा करवाकर रहेंगे। लोकसभा चुनाव में दलित मतदाताओं को ये कहकर भाजपा से दूर करने में कुछ हद तक कांग्रेस सफल रही थी कि तीसरी बार सत्ता में आने के बाद नरेंद्र मोदी आरक्षण समाप्त कर देंगे। लेकिन हरियाणा और महाराष्ट्र के विधान सभा चुनाव में वह प्रचार बेअसर रहा । जबरदस्त पराजय के बाद जब राहुल के विरुद्ध इंडिया गठबंधन में ही आवाजें उठने लगीं तब उन्हें चिंता हुई और इसीलिए वे संविधान के साथ मनुस्मृति को मुद्दा बनाकर भाजपा को  दलित विरोधी  सिद्ध करने में जुट गए। लेकिन  लंबे समय से सांसद रहने के बावजूद भी श्री गाँधी में अपेक्षित गंभीरता का अभाव है। भाजपा पर मनुस्मृति समर्थक होने का आरोप लगाते समय वे भूल गए कि  कुछ साल पहले ही उनकी पार्टी के वरिष्ट नेता रणदीप सुरजवाला ने पत्रकार वार्ता बुलाकर ये प्रचारित किया कि राहुल सारस्वत ब्राह्मण हैं और जनेऊ  भी धारण करते हैं। उसके बाद श्री गाँधी हिन्दू मंदिरों और मठों के चक्कर भी लगाते नजर आने लगे। कैलाश - मानसरोवर की यात्रा पर भी गए। उनकी बहिन प्रियंका वाड्रा ने भी यही दिखावा किया जो  हिन्दू समुदाय में भाजपा की पैठ को कम करने करने के लिए बनाई गई रणनीति थी। विशेष रूप से जनेऊ धारी ब्राह्मण होने का दावा उच्च जातियों में भाजपा के जनाधार में सेंध लगाना था। लेकिन जब श्री गाँधी को लगा कि उनका वह दाँव भी काम नहीं आया तब  जातिगत जनगणना का बाजा बजाने लगे। लेकिन यहाँ भी वे गच्चा खा गए क्योंकि कर्नाटक में उनकी ही पार्टी की सरकार  अपने  पिछले कार्यकाल में करवाई गई जातिगत जनगणना के आंकड़े जारी करने का साहस नहीं बटोर पा रही। ऐसे में संसद में संविधान पर चर्चा के दौरान उनके मनुस्मृति लेकर खड़े होने का औचित्य उन्हीं की पार्टी के लोग समझ नहीं पा रहे। बीते दो दिनों से आंबेडकर जी को लेकर जो आरोप - प्रत्यारोप संसद में चल रहे हैं उनको लेकर भी कांग्रेस पूरी तरह घिर गई। भले ही गृहमंत्री अमित शाह के बयान को लेकर वह आक्रामक  हो लेकिन डाॅ. आंबेडकर के जीवनकाल में  उनके प्रति कांग्रेस के तत्कालीन शीर्ष नेताओं का जो उपेक्षाभाव था वह जैसे ही उजागर हुआ पार्टी को  मुँह छिपाने में दिक्कत होने लगी। संविधान के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वहन करने वाले बाबा साहब को पंडित नेहरू के मंत्रिमंडल से त्यागपत्र क्यों देना पड़ा और बाद में उनको लोकसभा चुनाव में हरवाने के लिए कांग्रेस ने क्या - क्या किया ये इतिहास में मोटे अक्षरों में लिखा हुआ है। बाबा साहेब ने आरक्षण और  धारा 370 का प्रावधान अस्थायी रखा था। हिन्दू विवाह और उत्तराधिकार अधिनियम को लेकर उनके नेहरू जी से मतभेद खुलकर सामने आ चुके थे। सही बात तो ये है कि महात्मा गाँधी के नेहरू प्रेम  ने जिन सक्षम और सुयोग्य नेताओं को उपेक्षित किया उनमें आंबेडकर जी भी थे। सही मायने में वे राजनेता न होकर समाजशास्त्री थे जिनके मन में हिन्दू समाज में व्याप्त बुराई को दूर करने की इच्छा थी। अछूतोद्धार  का जो अभियान गाँधी जी ने चलाया उसे आगे ले जाने के लिए डाॅ. आंबेडकर ही सबसे उपयुक्त व्यक्ति होते  किंतु कांग्रेस में उनको लेकर अदृश्य भय था जिसकी परिणिति उनको पहले सरकार और फिर संसद से बाहर करने के रूप में हुई। वरना अपने समकालीन नेताओं में वे सबसे अधिक शिक्षित और सुयोग्य थे। सही बात तो ये है कि नेहरू जी की महत्वाकांक्षाओं की पूर्ति के लिए नेताजी सुभाष चंद्र बोस, सरदार पटेल और डाॅ. आंबेडकर जैसी अनेक विभूतियों को दरकिनार किया गया। प्रधानमंत्री बन जाने के बाद भी पंडित नेहरू ने अपने लिए चुनौती बन सकने वाले हर शख्स के पर कतर दिये। डाॅ. राजेंद्र प्रसाद को दोबारा राष्ट्रपति बनाने मैं क्या - क्या रुकावटें आईं ये नई पीढ़ी को जानना चाहिये। जब संसद में प्रधानमंत्री श्री मोदी सहित  अन्य सांसदों ने कांग्रेस की सरकारों द्वारा बाबा साहेब के अपमान का खुलासा किया तब उसका जवाब देने के बजाय मनुस्मृति को मुद्दा बनाया जा रहा है जिसकी प्रासंगिकता समझ से परे है। आज राहुल और प्रियंका नीले कपड़ों में संसद पहुंचे ये जताने के लिए कि उनकी बाबा साहब में कितनी आस्था है। लेकिन बसपा के झंडे के रंग वाले कपड़े पहिनकर न तो भाई - बहिन दलित वर्ग को आकर्षित कर पाएंगे और न ही कांग्रेस के दामन से डाॅ. आंबेडकर के अपमान का दाग मिटेगा। कांग्रेस के पास इस बात का कोई उत्तर नहीं है कि उसकी सरकारों ने संविधान निर्माता कहे जाने वाले बाबा साहेब को भारत रत्न देने के योग्य क्यों नहीं समझा जबकि पंडित नेहरू और इंदिरा जी ने प्रधानमंत्री रहते हुए ही खुद को इस अलंकरण से अलंकृत करवा लिया। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Wednesday, 18 December 2024

हरियाणा और महाराष्ट्र के चुनाव परिणाम मुसलमानों के लिए सबक हैं


उ.प्र के संभल शहर की जामा मस्ज़िद में अदालत के आदेश पर हो रहे सर्वेक्षण को रोकने  मुस्लिम समुदाय द्वारा पत्थरबाजी  के बाद पुलिस द्वारा आत्मरक्षार्थ  किये गोली चालन में कुछ मुस्लिमों की मौत को कांग्रेस और सपा ने राष्ट्रीय मुद्दा बनाने की भरपूर कोशिश की। नेताओं में संभल जाकर घड़ियाली आँसू बहाने की होड़ भी लगी। संसद में भी संभल कांड को उठाते हुए केंद्र और उ.प्र सरकार को मुस्लिम विरोधी साबित करने का दांव चला गया। लेकिन  मस्ज़िद के पास कुछ ऐसे हिन्दू मंदिर मिल गए जिनको इस तरह से छिपा दिया गया कि किसी को  वे नजर नहीं आयें। संभल के जिलाधिकारियों ने उनकी साफ - सफाई करवाकर पूजा शुरू करवाई। जो जानकारियां आ रही हैं उनके अनुसार उन मंदिरों के इलाके में कभी हिन्दू आबादी भी रहा करती थी किंतु सांप्रदायिक दंगों के बाद असुरक्षा के चलते उन्होंने अन्यत्र ठिकाने बना लिए और उन मंदिरों तक उनका आना - जाना बन्द हो गया। संभल के मुस्लिम सांसद सपा के हैं। उनके पिता भी लम्बे समय तक लोकसभा सदस्य रहे।  जिस मंदिर को प्रशासन द्वारा खोजा गया वह सांसद निवास से बेहद करीब है किंतु बात - बात में धर्मनिरपेक्षता और गंगा - जमुनी संस्कृति की दुहाई देने वाले सांसद और और उनके मरहूम अब्बा ने कभी भी उस मंदिर के बारे में किसी को मालूम नहीं होने दिया। कहते हैं मस्ज़िद में  बिजली चोरी रोकने गए दस्ते की कारवाई के दौरान मंदिर का पता चला। मुस्लिम तुष्टीकरण की दुकान चलाने वाले इस बात को प्रचारित करने में जुटे हैं कि उक्त मंदिर कई दशकों से हिंदुओं की अनदेखी के कारण उपेक्षित थे। लेकिन जैसा देखने में आया मंदिरों को चारों तरफ से अतिक्रमणों  से घेरने के साथ ही उन पर  मिट्टी डालकर पूरी तरह नजरों से दूर कर दिया गया। अपने धर्म स्थल के प्रति लापरवाह हो जाने के लिए संभल के हिन्दू भी कम दोषी नहीं हैं किंतु वहाँ के दिवंगत सांसद सहित अन्य प्रमुख मुस्लिमों का क्या ये फर्ज नहीं था कि वे हिंदुओं की आस्था के उस स्थान को घेरने के बजाय उसके मूल स्वरूप को बना रहने देते और खुद होकर उसके रखरखाव पर ध्यान देते।  उल्लेखनीय है देश में सैकड़ों ऐसी दरगाह और मजारें हैं जहाँ हिन्दू बड़ी संख्या में न सिर्फ जाते अपितु उनकी देखरेख में भी सक्रिय भूमिका निभाते हैं। मोहर्रम में सवारी रखने वाले हिंदुओं की भी बड़ी संख्या है किंतु इस सौजन्यता के प्रत्युत्तर में मुस्लिम समाज का रवैया बेहद निराशाजनक है।  मुल्ला - मौलवी अपने समुदाय को इस हेतु प्रेरित करने के बजाय निरुत्साहित करते हैं। और यही समस्या की जड़ है। भारत धर्मनिरपेक्ष देश है जहाँ सभी को अपने धर्म का पालन करने की सुविधा है। मुसलमानों के अलावा भी अन्य अल्पसंख्यक समुदाय हैं लेकिन उनका हिंदुओं के साथ उस तरह का विवाद नहीं होता जैसा मुस्लिमों के साथ आम है। संभल प्रकरण पर उ.प्र के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने विधानसभा में पूछा कि वहाँ अब तक जितने दंगे हुए उनमें  मारे गए सैकड़ों हिंदुओं के घावों पर मरहम लगाने कितने लोग गए ? संभल के बड़े उद्योगपति हिन्दू परिवार के कई सदस्यों की दंगों में हत्या के बाद बचे हुए लोग शहर छोड़कर जाने मजबूर हो गए। ऐसी स्थितियाँ देश के अनेक हिस्सों में निर्मित हुई । इससे ये सवाल उठ खड़ा होता है कि किसी इलाके के मुस्लिम बहुल होते ही वहाँ हिंदुओं के पलायन की परिस्थितियाँ क्यों बन जाती हैं जबकि हिन्दू बहुमत वाले क्षेत्र में मुस्लिम बेखौफ रहते हैं। दरअसल मुस्लिम समाज को मुख्य धारा से अलग करने में मुल्ला - मौलवियों  का  जितना हाथ है उतना ही वोट बैंक के सौदागर राजनेताओं का भी है। मुसलमान अपने आर्थिक और शैक्षणिक पिछ्डेपन का रोना तो रोते हैं किंतु उससे बाहर निकलने का साहस भी उनमें नहीं है। वरना संभल में हिन्दू मंदिरों को इस तरह से छिपाने का और क्या उद्देश्य हो सकता था? 2024 के लोकसभा चुनाव के बाद मुस्लिम समुदाय में कानून तोड़ने के प्रति जरूरत से ज्यादा उत्साह आ गया है। संभल के बाद झाँसी में एन.आई.ए के दल को घेरकर मुसलमान मुफ्ती को छुड़ाने की घटना इसका उदाहरण है। हिंदुओं के धार्मिक जुलूसों पर पथराव की वारदातें भी बढ़ी हैं। लेकिन हिंदुओं की कट्टरता पर छाती पीटने वाले मुसलमानों की धर्मांधता पर आँखें मूँदकर संभल और झाँसी जैसी स्थिति पैदा करने में सहायक बनते हैं। दुर्भाग्य से मुस्लिम युवा भी कठमुल्लेपन के शिकंजे से बाहर आने तैयार नहीं दिखते। हरियाणा और महाराष्ट्र विधानसभा के चुनाव परिणाम मुस्लिम समुदाय के लिए ये सबक है कि टकराव और अलगाव उनके लिए नुकसानदेह है। मुसलमान जब तक कुछ दलों के बंधुआ बने रहेंगे तब तक उनकी तरक्की की कोई संभावना नहीं है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी


Tuesday, 17 December 2024

राष्ट्रीय राजनीति में तीसरे मोर्चे के लौटने की संभावना बन रही


लगता है राष्ट्रीय राजनीति में तीसरे मोर्चे का पुनर्गठन होने जा रहा है। भाजपा और कांग्रेस  से दूरी बनाकर रखने वाली क्षेत्रीय पार्टियों द्वारा तीसरी ताकत के रूप में सत्ता का संतुलन अपने हाथ में रखने का जो प्रयोग नब्बे के दशक में शुरू हुआ उसने भारतीय राजनीति की चाल, चरित्र और चेहरे को पूरी तरह बदलकर रख दिया था। 1989 के लोकसभा चुनाव में राजीव गाँधी की सत्ता चली जाने के बाद भाजपा और वाम दलों के बाहरी समर्थन से बनी जनता दल की  सरकार के प्रधानमंत्री का चयन बेहद नाटकीय तरीके से हुआ जब चौधरी देवीलाल का नाम तय होने के बाद  विश्वनाथ प्रताप सिंह की ताजपोशी हो गई। राजीव सरकार पर भ्रष्टाचार का आरोप लगाकर कांग्रेस से बाहर आये श्री सिंह जल्द ही लालू प्रसाद, मुलायम सिंह और शरद यादव के शिकंजे में फंस गए । इन तीनों ने उनसे मंडल आयोग की सिफारिशें लागू करवाकर  ओबीसी  को 27 फीसदी आरक्षण का प्रावधान करवा दिया। उसके बाद भाजपा ने लालकृष्ण आडवाणी की रथ यात्रा के जरिये  राम मंदिर आंदोलन छेड़ दिया। रथ यात्रा को बिहार में लालू प्रसाद यादव ने रोका तो भाजपा ने केंद्र सरकार से समर्थन वापस ले लिया। उसके बाद कांग्रेस के समर्थन से चंद्रशेखर प्रधानमंत्री बन बैठे किंतु उनकी गति भी चौधरी चरण सिंह जैसी हुई। लोकसभा के मध्यावधि चुनाव की नौबत आ गई किंतु उसके बीच ही राजीव गाँधी की हत्या हो गई। कांग्रेस सत्ता में तो आई किंतु उसे स्पष्ट बहुमत नहीं मिलने से बैसाखियों का सहारा लेना पड़ा। पी. वी. नरसिम्हा राव  प्रधानमंत्री बने जिन्होंने मंडल और मंदिर जैसे मुद्दों की काट के तौर पर आर्थिक सुधारों को लागू कर दिया। उनकी सरकार वैसे तो पाँच साल चली किंतु 1996 में हुए लोकसभा चुनाव में भाजपा सबसे बड़ा दल बना और अटल बिहारी वाजपेयी प्रधानमंत्री बने किंतु बहुमत साबित नहीं कर पाने के कारण उन्हें 13 दिन में ही हटना पड़ा। लोकसभा त्रिशंकु थी और कांग्रेस को कोई समर्थन देने राजी न था। ऐसे में फिर एक प्रयोग हुआ संयुक्त मोर्चे के नाम पर जिसमें कांग्रेस और वाम दलों ने एच. डी. देवगौड़ा को प्रधानमंत्री बनवा दिया जो जनता दल के थे। पहली बार वामपंथी भी सरकार में शामिल हुए। लेकिन वह सरकार भी कांग्रेस ने जल्द गिरवा दी जिसके बाद उसी रचना के तहत इंदर कुमार गुजराल की ताजपोशी हुई। लेकिन कांग्रेस अध्यक्ष  सीताराम केसरी ने उनको भी जल्द भूतपूर्व बना दिया। 1998 में देश को फिर लोकसभा चुनाव झेलना पड़ा किंतु इस बार भाजपा ज्यादा ताकत से लौटी और अटल जी दूसरी बार सत्ता में आये किंतु 13 माह में जयललिता ने वह सरकार गिरवा दी। 1999 में लोकसभा चुनाव होने के दौरान ही कारगिल युद्ध हो गया। उसमें भारत ने जीत हासिल की जिसका लाभ लेकर भाजपा फिर सबसे अधिक सीटें जीतने में सफल रही और अटल जी तीसरी बार प्रधानमंत्री बने। इस बार बदलाव ये हुआ कि जनता दल में टूट हुई और कुछ पुराने समाजवादियों ने एनडीए नामक मोर्चे में शामिल होकर भाजपा के साथ सत्ता में भागीदारी की। जिनमें जॉर्ज फर्नांडीज, शरद यादव,  राम विलास पासवान और नीतीश कुमार जैसे चेहरे थे। वह सरकार पूरे समय चली। बीच में गुजरात दंगों के कारण पासवान अलग हो गए। लेकिन बाकी भाजपा के साथ बने रहे। वाजपेयी जी एक सफल प्रधानमंत्री के रूप में स्थापित हो चुके थे किंतु 2004 के चुनाव में कांग्रेस बड़ी पार्टी बनी और डाॅ. मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री बने । भाजपा को रोकने के लिए वामपंथियों ने भी उनकी सरकार को टेका लगा दिया। अनेक गैर कांग्रेसी नेता उस सरकार से जुड़कर सत्ता सुख लूटने लगे। संयुक्त मोर्चा , यूपीए बन गया। कुछ विपक्षी एनडीए में ही रहे। पुराने समाजवादियों के बिखराव ने तीसरे मोर्चे को अप्रासंगिक बना दिया। लालू, शरद, नीतीश, पासवान, देवगौड़ा सभी ने पार्टियां बना लीं। 2009 में मनमोहन सरकार फिर बनी और कांग्रेस के सांसद भी बढ़े। सरकार ने कार्यकाल पूरा भी किया किंतु गाँधी परिवार के हस्तक्षेप ने मनमोहन की छवि कमजोर प्रधानमंत्री की बना दी। ऊपर से भ्रष्टाचार के मामलों ने सरकार को बदनाम कर दिया। 2014 में नरेंद्र मोदी के नाम पर भाजपा ने स्पष्ट बहुमत प्राप्त किया। यूपीए में शामिल कुछ नेता भाजपा के साथ आ गए जिनमें पासवान प्रमुख थे। लेकिन तीसरा मोर्चा की राजनीति की बजाय एनडीए और यूपीए ही छाए रहे।  2019 में मोदी ने पहले से ज्यादा  सफलता हासिल की। 2024 के चुनाव के पहले यूपीए का नया नामकरण इंडिया किया गया जो भाजपा विरोधी तमाम दलों का गठजोड़ था। उसने जोर तो बहुत लगाया किंतु भाजपा को बहुमत की देहलीज पर रोकने के बाद भी वह मोदी को नहीं रोक पाया। हालांकि कांग्रेस 99 सीटों के साथ मुख्य विपक्षी दल हो गई और राहुल बड़े नेता के रूप में उभरे। लेकिन बीते छह माह में हुए विधानसभा चुनावों में हरियाणा और महाराष्ट्र में भाजपा की प्रचण्ड जीत ने इंडिया गठबंधन में दरारें पैदा कर दीं। राहुल के नेतृत्व को अन्य घटक दलों से चुनौती मिलने लगी। उसके बाद अडाणी मुद्दे पर कांग्रेस अलग - थलग पड़ी और अब ईवीएम के विरोध  पर उमर अब्दुल्ला के बाद ममता बेनर्जी के भतीजे अभिषेक ने कांग्रेस को कटघरे में खड़ा कर दिया। अचानक ये महसूस होने लगा कि इंडिया में शामिल अनेक पार्टियां कांग्रेस का साथ छोड़ने की फिराक में हैं। ममता, उद्धव, लालू, उमर, अखिलेश आदि जो तेवर दिखा रहे हैं उनसे लगता है वे संसद में कांग्रेस की ताकत बढ़ने से चिंतित हैं और खुद को उपेक्षित महसूस कर रहे हैं। जो संकेत हैं उनके मुताबिक संसद के शीतकालीन सत्र के बाद इंडिया गठबंधन में विभाजन होगा तथा कुछ क्षेत्रीय पार्टियां तीसरे मोर्चे का गठन करेंगी जिसमें नवीन पटनायक , जगन मोहन रेड्डी और के. चंद्र शेखर राव भी शामिल हो सकते हैं। कांग्रेस द्वारा राहुल के विरुद्ध बने माहौल पर जिस तरह का ठंडा रुख दिखाया उससे भी सहयोगी नाराज हैं। उन्हें लग रहा है कि राहुल अपनी नेतागिरी चमकाने में लगे हैं और  घटक दलों से संवाद ही नहीं होता।  ऐसे में 2025 की शुरुआत में विपक्षी राजनीति में बड़ा धमाका होने की संभावना दिन ब दिन मजबूत होती जा रही है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Monday, 16 December 2024

ईवीएम पर कांग्रेस की बखिया उधेड़ दी उमर ने


विगत सप्ताह संविधान पर हुई चर्चा के दौरान लोकसभा में  कांग्रेस सांसद प्रियंका वाड्रा ने वैसे तो काफी बातें कहीं किंतु उन्होंने ईवीएम का विरोध करते हुए चुनौती भरे लहजे में कहा कि मतपत्रों से चुनाव करवा लें तो दूध का दूध पानी का पानी हो जाएगा। अन्य विपक्षी दल भी ईवीएम का उपयोग बन्द करने की मांग करते रहे हैं। लेकिन चुनाव आयोग और सर्वोच्च न्यायालय ने उक्त आपत्तियों को निराधार मानते हुए ईवीएम में गड़बड़ी की किसी भी संभावना से इंकार कर दिया। असल में विपक्ष द्वारा ईवीएम पर किया जाने वाला दोषारोपण पूरी तरह विरोधाभासी है। उदाहरण के लिए जम्मू - कश्मीर और झारखंड में  विपक्ष की जीत उसकी नीतियों में जनता के विश्वास की अभिव्यक्ति है किंतु हरियाणा और महाराष्ट्र में हार होने पर उसका ठीकरा ईवीएम पर फोड़ने की प्रतिस्पर्धा चल पड़ती है। महाराष्ट्र में चारों खाने चित्त हुई शिवसेना ( उद्धव ) विधायक  दल के नेता  आदित्य ठाकरे ने अपने विधायकों को शपथ लेने से रोक लिया क्योंकि उन्हें चुनाव परिणाम अविश्वसनीय लग रहे थे लेकिन अगले दिन ही उनकी अकड़ निकल गई और उन्होंने सभी विधायकों सहित शपथ ले ली। राज्य के वरिष्ट नेता शरद पवार को भी इस चुनाव में अकल्पनीय पराजय का सामना करना पड़ा। लेकिन बजाय ईवीएम पर दोष मढ़ने के उन्होंने शिंदे सरकार द्वारा शुरू की गई लाड़की बहन योजना  के साथ - साथ भाजपा के  बटेंगे तो कटेंगे वाले नारे को सत्ता पक्ष की जीत में सहायक बताया। महाराष्ट्र के साथ ही झारखंड में भी चुनाव हुए जहाँ सत्तारूढ़ झामुमो की वापसी हुई जिसका श्रेय मुख्य रूप से महिलाओं को प्रतिमाह दी जाने लाड़ली बहना जैसी योजना को मिला। उसी दौरान हुए उपचुनावों में प्रियंका वायनाड सीट से जीतकर लोकसभा में आईं। उन्होंने अपने प्रतिद्वंदियों को बड़े अंतर से हराया परंतु  हारे हुए किसी भी प्रत्याशी ने ईवीएम पर संदेह नहीं जताया। इसी तरह जम्मू - कश्मीर और  झारखंड में सरकार बनाने वालों को ईवीएम में कोई गड़बड़ी नजर नहीं आई। हरियाणा और महाराष्ट्र की हार के बाद कांग्रेस  प्रवक्ता ने परिणाम को पूरी तरह अस्वीकार्य बताया था किंतु  जम्मू - कश्मीर और झारखंड के नतीजों में  उसे भाजपा और नरेंद्र मोदी के प्रभाव में गिरावट नजर आई। कांग्रेस के इसी दोहरे रवैये की जम्मू - कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने तीखी आलोचना करते हुए कहा कि जब इसी ईवीएम के इस्तेमाल से संसद में आपके सौ  सदस्य पहुंच जाते हैं और आप  अपनी पार्टी के लिए जीत का जश्न मनाते हैं, तो कुछ महीने बाद पलटकर यह नहीं कह सकते कि हमें ये ईवीएम पसंद नहीं हैं क्योंकि अब चुनाव के परिणाम उस तरह नहीं आ रहे हैं जैसा हम चाहते हैं। उमर ने ये भी कहा कि अगर पार्टियों को मतदान तंत्र पर भरोसा नहीं है तो उन्हें चुनाव नहीं लड़ना चाहिए और  ईवीएम से दिक्कत है, तो उसे लेकर आपका रुख एक समान रहना चाहिए । उल्लेखनीय है उमर की पार्टी का कांग्रेस से चुनावी गठबंधन था। यद्यपि कांग्रेस उनके मंत्रीमंडल में शामिल नहीं हुई लेकिन सरकार को उसका समर्थन जारी है। ऐसे में उनके द्वारा कांग्रेस के ईवीएम विरोध की खुली आलोचना करना साधारण बात नहीं है। इससे ये बात साबित होने लगी है कि कांग्रेस जनता की निगाह में तो गिर ही चुकी है लेकिन अब तो उसके सहयोगी दल भी उसकी रीति - नीति से त्रस्त होकर उससे कन्नी काटने लगे हैं। ममता बेनर्जी द्वारा इंडिया गठबंधन के नेतृत्व में परिवर्तन और खुद उसकी बागडोर संभालने की पेशकश को जिस प्रकार समर्थन मिला उससे राहुल गाँधी की जबरदस्त किरकिरी हुई। अडानी के मुद्दे पर तो वे अलग - थलग पड़े ही किंतु लोकसभा में प्रियंका द्वारा ईवीएम का विरोध किये जाने के बाद बाकी विपक्षी दल तो चुप रहे किंतु उमर अब्दुल्ला ने जिस तरह से कांग्रेस को आईना दिखाया उससे यही लगता है कि सहयोगी दल अब कांग्रेस से पिंड छुड़ाने की तैयारी कर रहे हैं। अब्दुल्ला और गाँधी परिवार के नजदीकी रिश्ते पीढ़ियों से चले आ रहे हैं। उमर और राहुल में दोस्ती भी है किंतु  उन्होंने ईवीएम को लेकर जिस प्रकार से कांग्रेस की बखिया उधेड़ी उससे लगता है जम्मू - कश्मीर विधानसभा चुनाव में राहुल के रवैये से उपजी नाराजगी कम होने के बजाय और बढ़ गई है। उमर के बयान में वैसे तो ईवीएम का विरोध करने वाले सभी दलों को लपेटा गया है किंतु मुख्य निशाना कांग्रेस ही है। देखना है कांग्रेस उनकी आलोचना पर क्या प्रतिक्रिया देती है? 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Saturday, 14 December 2024

संविधान का सबसे ज्यादा अपमान तो संसद में होता है


संविधान पर संसद में चल रही बहस के दौरान पक्ष विपक्ष से जो भाषण गत दिवस हुए उनमें ज्यादातर  आरोप - प्रत्यारोप ही सुनने मिले। सत्ता में बैठे लोग कांग्रेस पर संविधान की धज्जियां उड़ाने की तोहमत लगाते रहे वहीं विपक्ष ने मौजूदा सरकार की संविधान में आस्था पर सवालिया निशान लगाते हुए कहा कि वह उसकी मूल भावना को नष्ट करने पर आमादा है। लोकसभा चुनाव में संविधान को मुद्दा बनाते हुए विपक्ष ने जो आरोप लगाए थे कमोबेश उनको ही दोहराया गया। दूसरी तरफ सत्ता पक्ष ने भी ये कहते हुए बचाव किया कि आपातकाल  लगाने और संविधान में मनमाफिक संशोधन करने वाली कांग्रेस के पास उसकी रक्षा करने की बात कहने का नैतिक अधिकार नहीं है। जातिगत जनगणना और मतपत्रों से चुनाव करवाने जैसे मुद्दे भी विपक्ष ने उठाये।  आज  प्रधानमंत्री बहस का उत्तर देंगे और उसके बाद संविधान पर चर्चा रूपी कर्मकांड की इतिश्री हो जाएगी। हमेशा की तरह ये बहस भी संसद की कार्यवाही में दर्ज होकर ऐसा इतिहास बन जाएगी जिसे राजनीति शास्त्र के विद्यार्थी तो क्या खुद सांसद भी पढ़ने में रुचि नहीं लेंगे। संविधान लोकतंत्र की आत्मा होती है जो शासक और नागरिकों को उनके अधिकारों की जानकारी के अलावा कर्तव्यों का भी बोध करवाता है। इसे विडंबना ही कहेंगे कि हमारे देश में अधिकारों के प्रति तो जरूरत से ज्यादा ही जागरूकता है किंतु जहाँ जिम्मेदार होने की आवश्यकता होती है वहाँ वे लोग भी बेपरवाह नजर आते हैं जो संविधान की शपथ लेकर लोकतंत्र की रक्षा करने का वचन देते हैं। जो सांसद संविधान को लेकर चिंतित नजर आ रहे हैं वे ही जब सदन को चलने नहीं देते तब वह संविधान का सबसे बड़ा अपमान होता है । जिस संसद ने संविधान बनाया और जिसके पास उसमें परिवर्तन या संशोधन का अधिकार है जब उसी के भीतर संविधान प्रदत्त संसदीय प्रक्रिया बाधित की जाती है तब वह संविधान का सबसे बड़ा अनादर है।  संसदीय लोकतंत्र में परंपराओं का भी महत्वपूर्ण स्थान होता है। आजादी के बाद के  20 - 25 वर्षों तक तो संसद में अच्छी परंपराएं बनीं  और उनका पालन भी ईमानदारी से हुआ। लेकिन धीरे - धीरे संसद की गरिमा के साथ जो खिलवाड़ शुरू हुआ वह रुकने का नाम नहीं ले रहा। संसद के इस सत्र में जो सांसद संविधान की शान में कसीदे पढ़ते देखे गये वे ही सदन को नहीं चलने देने में आगे - आगे रहे। सोचने वाली बात ये है कि संसद की बैठकें आखिर होती किसलिए हैं ?   सत्र की शुरुआत में ही लोकसभाध्यक्ष सर्वदलीय बैठक आमंत्रित कर सत्ता और विपक्ष दोनों के विचार जान लेते हैं जिससे सदन सुचारु रूप से संचालित हो किंतु  सत्र शुरू होते ही हंगामा देखने मिलता है। विपक्ष के एक - दो नेता मेरी मुर्गी की डेढ़ टांग वाली कहावत चरितार्थ करते हुए समूची प्रक्रिया पर हावी हो जाते हैं। मुट्ठी भर सांसद  गर्भगृह में आकर जनता के धन से चलने वाली कार्यवाही को रोके रहते हैं और  पूरा का पूरा दिन होहल्ले की बलि चढ़ जाता है। सदन में कुछ देर आने मात्र से सांसद हजारों रुपये के भत्ते के  हकदार बन जाते हैं। आज तक एक भी सांसद ऐसा नहीं हुआ जिसने सदन नहीं चलने पर अपना दैनिक बैठक भत्ता लेने से इंकार किया हो। ये कहने में कुछ भी अनुचित नहीं है कि बिना काम किये भरपूर पारिश्रमिक लेने की जो परिपाटी हमारे सांसदों द्वारा  स्थापित कर दी गई  अब वही जनता में भी देखने मिलती है। संविधान सभा में शामिल विभूतियों ने जो संविधान हमें सौंपा उसके प्रति आज के सांसदों में ही जब आदर भाव नहीं है तब आम जनता से उनके द्वारा उसकी अपेक्षा करने  का कोई औचित्य नहीं रह जाता। यही कारण है कि देश भर में कानून की धज्जियां उड़ाने का दुस्साहस तेजी से होने लगा है। यहाँ तक कि सर्वोच्च न्यायालय के निर्देशों की अवहेलना करने में लोग नहीं हिचकिचाते। आज लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गाँधी भी संविधान पर चल रही चर्चा में भाग ले रहे हैं किंतु उनके पास इस बात का क्या जवाब है कि इस सत्र का अधिकांश समय अडाणी मुद्दे पर बहस की बेतुकी मांग को लेकर नष्ट करने के बाद वे किस मुँह से संविधान की रक्षा पर बोलेंगे?  सवाल सत्ता पक्ष से भी कम नहीं हैं लेकिन विपक्ष के  लिए तो संसद सबसे सशक्त माध्यम होता है अपनी बात रखने का। ऐसे में सदन को बाधित कर वह अपने संवैधानिक दायित्व से ही मुँह चुराता है। भारत में लोकतंत्र की जड़ें निःसंदेह बहुत गहरी हैं किंतु संसद और सांसदों  के प्रति जनता के मन में सम्मान क्यों घटता जा रहा है इस पर भी सांसदों को विचार करना चाहिए । 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Friday, 13 December 2024

संभल पर छाती पीटने वाले झाँसी की घटना पर मुंह में दही जमाए बैठे हैं

उ.प्र के झांसी शहर में दो दिन पूर्व एक मदरसा शिक्षक के यहाँ एन .आई .ए ( राष्ट्रीय जाँच एजेंसी) का दल  ए. टी. एस (आतंकवाद निरोधी दस्ते)  के साथ  पहुंचा। मुफ्ती खालिद नदवी नामक उक्त शिक्षक विदेशी छात्रों को ऑन लाइन मदरसा शिक्षा देता है। उसे मिलने वाली विदेशी फंडिंग की जाँच की जानी थी। जाँच दल लंबी पूछताछ के बाद जब उनको हिरासत में  लेकर मदरसे से बाहर निकला तो वहाँ मौजूद मुसलमानों की भीड़ ने उनको घेर लिया और गिरफ्तारी का विरोध करते हुए मुफ्ती को छुड़ाकर नजदीकी मस्जिद में ले गए। इसी दौरान मस्जिद के लाउड स्पीकर से लोगों को वहाँ आने के लिए कहा गया और देखते ही देखते सैकड़ों की संख्या में बुर्का पहनी हुई महिलाएं जाँच दल के सामने आकर जमा हो गईं। उधर कुछ युवक एन. आई. ए के लोगों से बहस कर मुफ्ती के विरुद्ध सबूत मांगते रहे। स्थिति बेकाबू होते देख स्थानीय पुलिस भी मौके पर आ गई। काफी देर तक चली बहस के बाद अंततः मुफ्ती को आगे पूछताछ हेतु झांसी पुलिस लाइन ले जाया गया। एन. आई. ए को शक है कि मुफ्ती ऑन लाइन शिक्षा के माध्यम से जो विदेशी धन प्राप्त करता है वह आतँकवादी संगठनों से आता है। इस तरह की छापेमारी देश के अनेक हिस्सों में की जा चुकी है। लेकिन झांसी की घटना ने जाँच एजेंसियों की सुरक्षा के साथ ही मुस्लिम समाज में कानून व्यवस्था की धज्जियां उड़ाने के दुस्साहस  का पर्दाफाश किया है। उल्लेखनीय है कुछ दिनों पूर्व उ.प्र के ही संभल नगर में न्यायालय के निर्देश पर स्थानीय जामा मस्जिद में की जा रही खुदाई के विरोध में मुस्लिम समुदाय की भीड़ ने उपद्रव कर दिया। पुलिस बल पर पथराव भी हुआ और जब गोली चलने पर कुछ लोग मारे गए तब विपक्षी पार्टियों के नेता संभल जाकर घड़ियाली  आँसू बहाने का नाटक करने में जुट गए। संसद तक में संभल प्रकरण के जरिये ये प्रचारित करने का प्रयास हुआ कि राज्य की योगी सरकार मुसलमानों के प्रति अनुदार है। लेकिन जब मुसलमानों की भीड़ द्वारा की गई पत्थरबाजी की बात की गई तो  जवाब में कहा गया कि पत्थर ही तो मारे थे। गौरतलब है कश्मीर घाटी में आतंकवादियों को घेरने गए सुरक्षा बलों पर भी वहाँ के युवक और यहाँ तक कि महिलाएं भी पत्थरबाजी किया करती थीं। धीरे - धीरे ये तरीका पूरे देश के मुसलमानों ने अपना लिया। धर्मनिरपेक्षता के ठेकेदार नेता हिंदुओं से तो सहिष्णुता की अपेक्षा करते हैं किंतु मुस्लिम समाज द्वारा कानून व्यवस्था के विरुद्ध किये जाने वाले हर कृत्य को अनदेखा किया जाता है। यदि पुलिस और प्रशासन  कुछ कारवाई करता भी है तो उसे कटघरे में खड़ा करने का अभियान शुरू हो जाता है। लोकसभा चुनाव में संविधान खतरे में है, का दुष्प्रचार कर जो भ्रम फैलाया गया उसकी वजह से विपक्षी दलों को कुछ सीटें ज्यादा मिल गईं। उसके बाद से मुस्लिम समुदाय की उद्दंडता कुछ ज्यादा ही बढ़ गई। देश के अनेक हिस्सों से इस आशय की खबरें आने लगीं जिनमें मुस्लिम लोग  पुलिस और प्रशासन के विरुद्ध  खड़े होकर कानून को चुनौती देते दिखे। संभल में जो हुआ उसमें विपक्ष के एकपक्षीय रवैये ने मुस्लिम समुदाय को कानून तोड़ने के लिए प्रोत्साहित किया जिसकी परिणिती झांसी की घटना के रूप में सामने आई। जिस मुफ्ती पर एन. आई. ए ने  दबिश दी वह शहर काजी का भतीजा है। इससे यह स्पष्ट है कि जो भीड़ एकत्र हुई उसमें उनकी भूमिका भी रही होगी। जिस मामले में मुफ्ती की जाँच करने  एन. आई. ए का दल पहुंचा था उसके तार अनेक आतंकवादी संगठनों से जुड़े होने का संदेह है। चूंकि मुफ्ती द्वारा ऑन लाइन  शिक्षा विदेशी छात्रों को दी जाती है , इसलिये विदेशी धन का लेन - देन भी जाँच का विषय है। यदि वे पूरी तरह निर्दोष हैं तब उनको गिरफ्तारी से रोकने मस्जिदों से लाउड स्पीकर पर लोगों को बुलाकर जाँच एजेंसी के लोगों को आतंकित करने का क्या औचित्य था? विशेष रूप से बुर्का धारी महिलाओं का मुफ्ती के बचाव में दीवार बनकर खड़े हो जाना मामले को और भी रहस्यमय बना देता है। कुल मिलाकर ये एक गंभीर घटना है। संभल के बाद झांसी में मुस्लिम समुदाय का कानून के पालन में बाधा उत्पन्न करना राष्ट्रविरोधी ताकतों द्वारा किसी नये प्रयोग का हिस्सा लगता है। इसके पहले कि ये दुस्साहस आम हो जाए इसे सख्ती से कुचलना होगा। झाँसी की घटना के बाद विपक्ष के किसी भी नेता ने उन्मादी मुस्लिमों की निंदा करने का साहस नहीं दिखाया। अखिलेश यादव और राहुल गाँधी जैसे नेता संभल कांड पर तो खूब हल्ला मचाते रहे किंतु झाँसी में एन. आई. ए के दल को भीड़ द्वारा घेर लिए जाने के बारे में उनके मुँह से एक शब्द भी नहीं निकलना इस बात का प्रमाण है कि उनका संविधान प्रेम महज ढकोसला है। और धर्मनिरपेक्षता के नाम पर वे मुस्लिम तुष्टीकरण में जुटे हुए हैं। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Thursday, 12 December 2024

घुसपैठियों के विरुद्ध दिल्ली जैसी मुहिम पूरे देश में चलाई जाए


देश की राजधानी दिल्ली में एक मुस्लिम संस्था के प्रतिनिधिमंडल ने उपराज्यपाल से मिलकर अवैध रूप से रह रहे रोहिंग्या और बांग्लादेशी घुसपैठियों के विरुद्ध कारवाई करने की मांग की। उसका संज्ञान लेते हुए उपराज्यपाल ने प्रशासन और पुलिस को जरूरी कदम उठाने का निर्देश दिया। उसके बाद से राजधानी के विभिन्न इलाकों में घुसपैठियों की पतासाजी शुरू हुई। जो जानकारी मिल रही है उसके अनुसार ये घुसपैठिये फर्जी दस्तावेज बनवाकर देश के विभिन्न स्थानों में फ़ैल गए हैं। ज्यादातर ये मुस्लिम बस्तियों में रहना पसंद करते हैं क्योंकि वहाँ इन्हें संरक्षण और सहायता मिल जाती है। छोटे शहरों में तो इनकी पहिचान उजागर हो भी जाती है किंतु बड़े शहरों विशेष रूप से महानगरों में ये आसानी से डेरा जमा लेते हैं। फुटपाथों के अलावा खाली पड़ी जगहों पर अवैध कब्जा कर रहने वाले इन घुसपैठियों में से अनेक किराये का मकान भी ले लेते हैं। आजकल मध्यमवर्गीय  परिवारों में भी घरेलू कार्यों हेतु नौकर / नौकरानी रखने का चलन बढ़ता जा रहा है। बांग्लादेशी महिलाओं और पुरुषों के लिए ये रोजगार का बड़ा जरिया है। उनके बच्चे भी घरों में काम पा जाते हैं। इसके अलावा निर्माण कार्यों में भी बांग्ला देशी श्रमिकों का उपयोग होता है।  आपराधिक गतिविधियों में भी इनकी संलग्नता साबित होती रही है। विशेष रूप से रोहिंग्या घुसपैठिये तो अपनी आपराधिक  प्रवृत्ति के लिए कुख्यात हैं और इसी वजह से उनको म्यांमार से खदेड़ा गया। ये समस्या इतनी गंभीर इसलिए हुई क्योंकि हमारे देश की राजनीति में चुनावी जीत के लिए देशहित को उपेक्षित करने में संकोच नहीं किया जाता। ये चिंता का विषय है कि देश के अनेक सीमावर्ती इलाकों में बांग्ला देशी और रोहिंग्या घुसपैठियों की बस्तियाँ हैं। इनके आधार और राशन कार्ड बनवाने में कतिपय राजनीतिक पार्टियों के साथ ही भ्रष्ट प्रशासनिक अमले की भी भूमिका रहती है। देश के अनेक निर्वाचन क्षेत्रों में ये घुसपैठिये जीत - हार का फैसला करने में सक्षम हो गए हैं। इसका परिणाम ये है कि वहाँ से कोई गैर मुस्लिम प्रत्याशी चुनाव जीत ही नहीं सकता। 1971 में बांग्ला देश से आये शरणार्थियों को वापस भेजने का समझौता तत्कालीन शेख मुजीब सरकार के साथ हुआ था किंतु उस पर अमल नहीं हो सका। इसका कारण वोट बैंक की राजनीति और प्रशासनिक भ्रष्टाचार ही रहा। सीमा पर तैनात सुरक्षा बल के लोगों पर भी घुसपैठ करवाने के आरोप लगते रहे हैं। हालांकि इन घुसपैठियों की पहिचान कर इनको वापस भेजे जाने की कार्य योजना कई बार बनी किंतु परिणाम शून्य ही रहा। बांग्ला देश में  बीते कुछ महीनों से हिंदुओं के साथ जो अमानुषिक  व्यवहार हो रहा है उससे भारत में काफी नाराजगी है    और लोग घुसपैठियों को वापस भेजने के लिए जरूरी कदम उठाने की मांग कर रहे हैं।  असम और त्रिपुरा की राज्य सरकारों ने तो बांग्लादेशियों पर तमाम प्रतिबंध लगा दिये हैं। देश की राजधानी में भी ऐसी ही पहल हुई किंतु हमेशा की तरह इसमें भी राजनीति शुरू हो गई। दिल्ली के पूर्व उपमुख्यमंत्री और आम आदमी पार्टी में अरविंद केजरीवाल के बाद दूसरे सबसे बड़े नेता मनीष सिसौदिया ने उपराज्यपाल के निर्देश पर अवैध बांग्ला देशी और रोहिंग्या घुसपैठियों की जांच तथा धरपकड़  का विरोध शुरू कर दिया। लेकिन इस कार्रवाई से ये बात उजागर हो गई कि दिल्ली पुलिस के पास इस बात की कोई पुख्ता जानकारी नहीं है कि देश की राजधानी में कितने घुसपैठिये अवैध रूप से रह रहे हैं। अतीत में एक - दो बार ऐसी ही मुहिम चलाकर तकरीबन 50 हजार बांग्ला देशी उनके देश भेजे गए थे। लेकिन वह अभियान क्यों रुक गया इसका उत्तर किसी के पास नहीं है। बहरहाल  नये सिरे से शुरुआत हो ही गई है तब केंद्र सरकार को चाहिए वह सभी राज्यों को दिल्ली जैसी कार्रवाई करने का निर्देश दे। यदि युद्धस्तर पर इसकी मुहिम छेड़ी जाए तो जनता भी इसमें खुलकर सहयोग देगी, इसमें कोई संदेह नहीं है। बांग्ला देश में हिंदुओं पर जो अत्याचार हो रहे हैं उन्हें वहाँ की अंतरिम सरकार अपना आंतरिक मसला बताकर भारत की आपत्तियों को नजरंदाज कर देती है। ये देखते हुए हमें भी बांग्ला देशी और रोहिंग्या घुसपैठियों की पहचान करते हुए उन्हें निकाल बाहर करने के लिए हरसंभव कदम उठाने चाहिए। इस बारे में ये अच्छा संकेत है कि प. बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बेनर्जी जो बांग्ला देशी घुसपैठियों को वापस भेजने का विरोध करती आई हैं, वे भी इन दिनों केंद्र सरकार के निर्णयों के साथ खड़े रहने जैसे बयान दे रही हैं। ऐसे में  यदि सभी राज्य दिल्ली जैसी मुहिम छेड़ दें तो उसका असर बांग्ला देश पर पड़े बिना नहीं रहेगा। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Wednesday, 11 December 2024

संसद नहीं चलने से विपक्ष नुकसान में रहता है


संसद का शीतकालीन सत्र 20 दिसंबर तक चलेगा। अब तक इसमें किसी भी दिन पूरे समय  एक भी सदन में कामकाज नहीं हुआ। सत्र के पहले लोकसभाध्यक्ष सर्वदलीय बैठक बुलाकर सत्र को सुचारु रूप से चलाने के लिए सहयोग मांगते हैं। जिसमें सभी दलों के नेता आश्वासन देते हैं कि वे जो भी कार्यसूची संसदीय कार्य मंत्रालय तैयार करता है उस पर बहस करेंगे। सरकार कुछ विधेयक भी हर सत्र मे पेश करती है। इन सबके अलावा देश और दुनिया में हो रही घटनाओं पर भी  चर्चा की जाती है। इस सत्र के पूर्व भी  सर्वदलीय बैठक में  सत्र के विधिवत संचालन  हेतु विभिन्न दलों  ने सहमति व्यक्त की थी। लेकिन  पहले दिन ही हमेशा की तरह हंगामा शुरू हो गया । पहला सप्ताह बेकार चले जाने के बाद लोकसभाध्यक्ष के साथ दोबारा हुई बैठक में सभी दलों के प्रतिनिधियों ने एक बार फिर सदन को बिना रुकावट के चलाने का वायदा किया किंतु कार्यवाही शुरू होते ही होहल्ले की वजह से सदन स्थगित किया जाता रहा।  विपक्ष कुछ मुद्दों को लेकर आक्रामक है। शुरुआत में  सत्ता पक्ष रक्षात्मक प्रतीत हुआ किंतु बाद में उसकी ओर से भी जवाबी हमला होने लगा। राहुल गाँधी के पास अदाणी नामक एकमात्र मुद्दा है जिससे विपक्ष की अनेक पार्टियां दूरी बनाये हुए हैं। इसी बीच महाराष्ट्र में हुई करारी हार को लेकर इंडिया गठबंधन में खींचातानी शुरू हो गई जब ममता बेनर्जी ने गठबंधन का नेतृत्व ग्रहण करने की पेशकश करते हुए राहुल गाँधी को निशाना बनाया। आश्चर्य तब हुआ जब उनके बयान को गठबंधन के अनेक बड़े नेताओं का समर्थन मिलने लगा। अदाणी का विरोध करने से भी अनेक विपक्षी पार्टियों ने इंकार कर दिया जिससे राहुल अकेले नजर आने लगे। इस सबसे भाजपा को हमलावर होने का अवसर मिल गया और उसकी तरफ से राहुल और उनकी माँ सोनिया गाँधी पर भारत विरोधी विदेशी संगठनों के साथ संगामित्ति का आरोप लगाया गया जिसके कारण सदन का वातावरण और तनावपूर्ण हो गया। उधर राज्यसभा में सभापति जगदीप धनखड़ के विरुद्ध अविश्वास पेश के जरिये विपक्ष सरकार पर दबाव बनाने का दाँव चल रहा है। स्मरणीय है उपराष्ट्रपति ही उच्च सदन के सभापति होते हैं। यद्यपि उस प्रस्ताव के पारित होने की संभावना न के बराबर है किंतु ऐसा करके विपक्ष अपने भीतर आने लगे बिखराव को रोकने का प्रयास करेगा। कुल मिलाकर जो लग रहा है उसके अनुसार ये  सत्र भी  हंगामे के बीच खत्म हो जाएगा। पिछले सत्र में सरकार ने जो वक्फ संशोधन विधेयक  जेपीसी के पास भेजा था उसकी रिपोर्ट इस सत्र में प्रतीक्षित थी किंतु सरकार ने उसे आगामी सत्र के लिए टाल दिया। अब वह एक देश एक चुनाव संबंधी विधेयक लाने जा रही है और उसे भी जेपीसी  गठित कर उसके जिम्मे कर दिया जाएगा। इन दोनों विषयों पर सत्ता पक्ष पूरे देश में विमर्श के जरिये जनता का समर्थन हासिल करने में लगा हुआ है। वक्फ द्वारा नई संपत्तियों पर दावा करने सम्बन्धी विवादों की खबरों के कारण उस विधेयक के पक्ष में जन समर्थन जुटाने में सरकार सफल लग रही है। ऐसी ही रणनीति एक देश एक चुनाव के बारे में भी  है। दुर्भाग्य से विपक्ष इसे  समझ नहीं पा रहा । फिलहाल संसद के दोनों सदनों में विपक्ष की अच्छी खासी संख्या है। ऐसे में उसे सदन के संचालन में ज्यादा रुचि लेना चाहिए। लेकिन राहुल गाँधी अपनी जिद पूरे विपक्ष पर लादकर खुद को आकर्षण का केंद्र बनाना चाहते हैं। वहीं  लोकसभा में  नेता प्रतिपक्ष होने के बावजूद  पूरे विपक्ष का विश्वास अर्जित करने में उनकी विफलता का लाभ उठाकर सत्ता पक्ष भी सदन को चलाने के प्रति अपेक्षित रुचि नहीं दिखाता। हालांकि हंगामे के बीच सरकार जरूरी विधायी कार्य पूरे करवा लेती है। ये भी देखने आया है कि सदन यदि  कुछ समय चलता भी है तो दोनों पक्षों के बीच आरोपों और प्रत्यारोपों में ही पूरा समय नष्ट हो जाता है। लोकतंत्र में  आस्था रखने वाले जिम्मेदार किस्म के लोग तो संसद की ये दशा देखकर दुखी होते हैं किंतु संसदीय प्रजातंत्र की रक्षा का दायित्व जिन सांसदों पर है उन्हें लोकतंत्र के मंदिर की गरिमा की लेश मात्र भी फिक्र नहीं है। संसद का बहुमूल्य समय नष्ट करने के लिए सत्ता और विपक्ष दोनों एक दूसरे पर आरोप मढ़ते हैं किंतु कमोबेश दोनों ही इसके दोषी हैं। लेकिन विपक्ष के लिए संसद ही वह मंच है जिसके जरिये वह पूरे देश तक अपनी बात पहुँचा सकता है। इसलिए बजाय सरकार और सभापति पर आरोप लगाते रहने के विपक्ष को सदन सुचारु रूप से चलाने की पहल करना चाहिए क्योंकि इसी में उसका फायदा है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Tuesday, 10 December 2024

एक ही मुद्दे से चिपके रहना राहुल के लिए नुकसानदेह


राजनीति में कब कौन किसके साथ हो जाए और कौन साथ छोड़ दे कहना मुश्किल है। लोकसभा चुनाव मिलकर लड़े इंडिया गठबंधन में नजर आ रही  दरारें इसकी पुष्टि करती हैं। संसद का शीत कालीन सत्र शुरू होने के पहले महाराष्ट्र और झारखंड विधानसभा चुनाव के परिणाम आने के बाद विपक्षी गठजोड़ में जो  टूटन शुरू हुई वह बढ़ती ही जा रही है। गठबंधन के अनेक नेता खुलकर कांग्रेस पर हमले कर रहे हैं। नेतृत्व बदलने की मांग को मिल रहे समर्थन से ये बात साबित हो रही है। इसके पीछे एक तरफ तो हरियाणा और महाराष्ट्र में हुई हार है किंतु दूसरी तरफ अदाणी समूह को लेकर राहुल गाँधी का बचकाना रवैया भी है। अमेरिका से हुए कुछ खुलासों के आधार पर वे अदाणी पर चौतरफा हमला कर रहे हैं किंतु अभी तक उनके हाथ ऐसा कुछ भी नहीं लग सका जिसके बल पर वे उक्त समूह को अपराधी साबित कर सकें। और उसी की खीझ में वे अब जो तरीके अपना रहे हैं वे सतही सोच का प्रतीक हैं । प्रधानमंत्री के साथ अदाणी की भागीदारी का आरोप लगाते हुए चोर शब्द का इस्तेमाल कर श्री गाँधी ने दिखा दिया कि उनमें गलतियों से सीखने की बुद्धिमत्ता का अभाव है। स्मरणीय है 2019 के लोकसभा चुनाव में  उन्होंने चौकीदार चोर के नारे अपनी सभाओं में लगवाए थे किंतु जनता ने नरेंद्र मोदी को और भी ज्यादा सीटें देकर दोबारा सत्ता में बिठा दिया। पिछले कुछ सालों से वे अदाणी समूह की आड़ लेकर  प्रधानमंत्री की घेराबंदी करने में  जुटे हैं किंतु 2024 के लोकसभा चुनाव में भी ये मुद्दा बेअसर रहा। हालांकि श्री मोदी स्पष्ट बहुमत से चूक गए लेकिन उसका कारण अदाणी मुद्दा न होकर अन्य बातें रहीं। उनके इस अड़ियलपन से इंडिया गठजोड़ के अन्य दलों में भी नाराजगी है। कुछ तो खुलकर उसे जाहिर भी कर चुके हैं। संसद में गत सप्ताह कांग्रेस द्वारा अदाणी के विरोध में हुए प्रदर्शन से सपा, तृणमूल और एनसीपी ( शरद) द्वारा दूरी बनाया जाना इसका प्रमाण है। गठबंधन के अनेक साथी दलों द्वारा कांग्रेस से दूर रहने का जो संकेत दिया जा रहा है उसके पीछे अदाणी मुद्दे पर श्री गाँधी की हठधर्मिता के अलावा गाँधी परिवार का संबंध उन विदेशी संस्थानों के साथ जुड़ने का आरोप  है जो भारत में राजनीतिक अस्थिरता फैलाने में जुटे  हैं। जिस दिन से राहुल की अगुआई में प्रधानमंत्री को चोर कहा गया उसी के बाद से भाजपा  सांसदों ने संसद में सोनिया गाँधी और उनके परिवार pr भारत विरोधी विदेशी संस्थानों से निकटता का आरोप लगाना शुरू कर दिया। जिसका कांग्रेस तो ये कहकर खंडन कर रही है कि सत्ता पक्ष अदाणी विवाद से लोगों का ध्यान हटाने ये आरोप लगा रहा है। लेकिन गाँधी परिवार ने उक्त आरोपों पर मुँह नहीं खोला। इंडिया गठबंधन के साथी भी इस बात से भयभीत हैं कि कहीं  वे  गाँधी परिवार पर भाजपा द्वारा किये जा रहे हमले की लपेट में न आ जाएं। यही कारण है कि अदाणी मुद्दे पर जहाँ राहुल अकेले नजर आ रहे हैं वहीं भाजपा द्वारा लगाए गए आरोपों से बचाव में भी गठबंधन के सहयोगी पूरी तरह उदासीन हैं।  विपक्ष में होने के नाते श्री गाँधी सरकार को घेरने के लिए आगे आएं ये स्वाभाविक है किंतु एक ही मुद्दे में उलझे रहने से ऐसा लगता है जैसे वे पूर्वाग्रह से ग्रसित हों। और ये भी कि जब देश और दुनिया के सामने बड़ी - बड़ी समस्याएं सिर उठा रही हों तब बतौर नेता प्रतिपक्ष श्री गाँधी का कर्तव्य है कि वे संसद और उसके बाहर उन विषयों पर अपना और कांग्रेस का रुख स्पष्ट करें। लेकिन वे अदाणी से चिपककर खुद को कुए का मेढ़क साबित कर रहे हैं।   इस बारे में रोचक बात ये है कि भाजपा विरोधी कुछ यू ट्यूबर पत्रकार ये शिगूफा छोड़ने लगे हैं कि इंडिया  गठबंधन के कुछ दलों ने हरियाणा और महाराष्ट्र के चुनाव परिणाम के बहाने कांग्रेस पर जो हमला बोला है उसके पीछे गौतम अदाणी ही हैं। सही बात तो ये है कि अदाणी कभी भी गठबंधन का साझा मुद्दा रहा ही नहीं। शरद पवार और ममता बेनर्जी तो हिँडनबर्ग खुलासे के समय ही राहुल द्वारा जेपीसी जांच की मांग के विरोध में खड़े हो गए थे। श्री पवार  ने तो गौतम अदाणी से निजी बातचीत के बाद उनके पाक - साफ होने का दावा भी कर दिया। लेकिन श्री गाँधी  लगातार अदाणी और श्री मोदी की निकटता के नाम पर राजनीति करते आ रहे हैं। लेकिन जब ये आरोप लगता है कि अशोक गहलोत और भूपेश बघेल ने मुख्यमंत्री रहते हुए क्रमशः राजस्थान और छत्तीसगढ़ में अदाणी समूह की कंपनियों को बड़े - बड़े ठेके दिये तब श्री गाँधी जवाब देने से बचते हैं। गत दिवस उनके बहनोई रॉबर्ट वाड्रा के साथ भी गौतम अदाणी का चित्र भाजपा ने जारी कर राहुल से उन दोनों के रिश्तों पर स्पष्टीकरण मांगा है। कुल मिलाकर ये लगता है कि अदाणी मुद्दे पर प्रधानमंत्री को घेरने का दांव उल्टे श्री गाँधी के लिए मुसीबत बन गया है। चूंकि अभी तक इस बारे में वे कुछ भी ठोस तथ्य सामने नहीं रख सके इसलिए उनकी विश्वसनीयता भी दिनों -  दिन कम हो रही है। और जब उनके सहयोगी दल ही उनसे सहमत नहीं हैं तब जनता उनकी बात को सच मानेगी इसमें संदेह ही है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी


Monday, 9 December 2024

इंडिया गठबंधन में राहुल को नेता स्वीकार करने में हिचक

रियाणा की हार के बाद ही इंडिया गठबंधन के अनेक सदस्यों ने कांग्रेस पर हमला शुरू कर दिया था। शिवसेना (उद्धव ) के मुखपत्र सामना में राहुल गाँधी के नेतृत्व पर सवाल उठाये गए। सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव ने भी कांग्रेस को अकेले चुनाव जीतने में अक्षम बता डाला। दरअसल हरियाणा में उनको कांग्रेस ने एक भी सीट नहीं दी थी। उसी खुन्नस में उ.प्र के 9 विधानसभा उपचुनावों में सपा ने सीटों के बंटवारे में कांग्रेस को इतना परेशान किया कि उसने खीझकर चुनाव लड़ने से ही इंकार कर दिया। उधर महाराष्ट्र में सपा, दबाव बनाती रही लेकिन उसे इच्छानुसार सीटें नहीं मिलीं। चुनाव में शरद पवार, उद्धव ठाकरे और नाना पटोले की तिकड़ी चारों खाने चित्त हो गई। कांग्रेस ने तो इतिहास का सबसे खराब प्रदर्शन किया । चूंकि इंडिया गठबंधन के तीनों बड़े घटक बुरी तरह हारे इसलिए बलि के बकरे की तलाश शुरू हुई। इस उलझन को दूर कर दिया प. बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बेनर्जी ने ये कहते हुए कि इंडिया गठबंधन का नेतृत्व उसे ठीक से नहीं चला रहा। ये गठबंधन उन्होंने बनाया है और मौका मिले तो वे उसका नेतृत्व करने तैयार हैं।  उनके बयान का उद्धव ठाकरे के करीबी संजय राउत ने समर्थन करते हुए कोलकाता जाकर उनसे चर्चा करने की बात भी कह डाली। उधर सपा नेता उदयवीर सिंह ने भी इसी आशय का बयान देकर सनसनी मचा दी। इसी बीच राजद की ओर से बयान आया कि इंडिया का गठन तो लालू प्रसाद यादव ने किया था। विपक्षी दलों में खटास लोकसभा  के भीतर भी देखने मिली जब अखिलेश यादव की सीट राहुल गाँधी से दूर कर दी गई जिस पर तंज कसते हुए उन्होंने धन्यवाद कांग्रेस कहा। महाराष्ट्र में शरद पवार तो ज्यादा नहीं बोल रहे किंतु उद्धव ठाकरे के खेमे से कांग्रेस पर हमला जारी है। उधर सपा नेता अबू आजमी ने शिवसेना ( उद्धव ) के नेता मिलिंद नार्वेकर  द्वारा 6 दिसंबर को बाबरी ढांचा गिराए जाने की वर्षगांठ पर सोशल मीडिया में की गई पोस्ट से नाराज होकर महा विकास अगाड़ी से नाता तोड़ने की घोषणा की तो जवाब में आदित्य ठाकरे  ने सपा को भाजपा की बी टीम बताकर आग में घी डाल दिया। तमिलनाडु में सत्तासीन द्रमुक  ने  जरूर कांग्रेस के बचाव में उतरते हुए ममता के बयान पर कहा कि वे एक महज क्षेत्रीय पार्टी की नेता हैं । लेकिन शरद पवार की बेटी सांसद सुप्रिया सुले ने  ये कहकर कांग्रेस को झटका दिया कि ममता यदि बड़ी जिम्मेदारी लेती हैं तो उन्हें खुशी होगी। बंगाल की मुख्यमंत्री ने  जो हमला किया उसमें किसी का नाम तो नहीं था किंतु राजनीति की  समझ रखने वाले जानते हैं कि उनका निशाना राहुल गाँधी पर ही है , जो गठबंधन के अघोषित नेता बने हुए थे। लोकसभा  चुनाव में 99 सीटें जीतकर कांग्रेस निश्चित रूप से विपक्ष की मुखिया नजर आने लगी। और फिर राहुल के लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष बन जाने से उसकी चौधराहट ज़ाहिर तौर पर बढ़ी  जो अन्य घटक दलों को नागवार गुजर रही है। सही बात बात ये है कि इंडिया गठजोड़ में कांग्रेस के पीछे चलने पर किसी को आपत्ति नहीं है किंतु राहुल को नेता मानने  की मनःस्थिति नहीं होना विवाद की वजह है। उल्लेखनीय है ममता तो गठबंधन के अस्तित्व में  आने के पहले से ही राहुल को कमजोर नेता बताते हुए खुद को नरेंद्र मोदी का मुकाबला करने में सक्षम बताती आई हैं। इंडिया गठजोड़ में शामिल होने के बाद भी उन्होंने प. बंगाल में कांग्रेस के साथ चुनावी तालमेल नहींं किया और राहुल की भारत जोड़ो न्याय यात्रा से भी दूर रहीं।  कुल मिलाकर हरियाणा और महाराष्ट्र के चुनाव परिणाम ने राहुल गाँधी की वजनदारी  कम कर दी। अदाणी मुद्दे पर भी ममता, शरद पवार और अखिलेश ने उनका साथ नहीं दिया। असल में आने वाले ज्यादातर राज्य विधानसभा चुनावों में क्षेत्रीय दलों का बोलबाला है जो कांग्रेस को किसी भी तरह से ताकतवर होते नहीं देखना चाहेंगे। वैसे भी इंडिया गठबन्धन  लोकसभा चुनाव में नरेंद्र मोदी की वापसी रोकने बना था। सैद्धांतिक आधार न होने से इसका विधिवत ढांचा खड़ा नहीं हो पाया। हालांकि जून के बाद हुए चार राज्यों के चुनावों में भाजपा को  जम्मू - कश्मीर और झारखंड में  हार का मुँह देखना पड़ा किंतु जीत का श्रेय कांग्रेस की बजाय क्रमशः नेशनल काँफ्रेंस और झारखंड मुक्ति मोर्चा लूट ले गए। इसीलिए  राहुल को उपेक्षित करने की मुहिम शुरू हो गई। यद्यपि इसमें चौंकाने वाली कोई बात नहीं है क्योंकि विपक्षी एकता पूरी तरह कृत्रिम थी जिसमें परस्पर विश्वास का अभाव था। होना तो ये चाहिए था कि लोकसभा चुनाव के तत्काल बाद कांग्रेस द्वारा गठबंधन के सभी दलों को बुलाकर विपक्षी एकता को सुदृढ़ किया जाता। लेकिन नेता प्रतिपक्ष बनकर राहुल आत्ममुग्ध हो गए और उनकी प्राथमिकता पार्टी की बजाय प्रियंका वाड्रा को लोकसभा में लाना  हो गई। जम्मू - कश्मीर के चुनाव में उमर अब्दुल्ला तो राहुल द्वारा सही तरीके से प्रचार न किये जाने पर सार्वजनिक रूप से गुस्सा जता ही चुके थे। महाराष्ट्र में भी ये चर्चा होती रही कि वे प्रियंका के क्षेत्र वायनाड में ज्यादा घूमे। इन सब बातों से लगता है विपक्षी एकता का ये प्रयोग भी निष्फल होने जा रहा है जिसका ठीकरा राहुल के सिर फूटेगा। 


-रवीन्द्र वाजपेयी

सीरिया के कई हिस्सों में बंटने का अंदेशा : विद्रोही गुट आपस में लड़ते रहेंगे

      सीरिया में बशर असद की सत्ता का पतन होना अरब जगत में एक नये संकट का कारण बनेगा। बीते एक दशक से चल रहे गृहयुद्ध में लाखों लोगों की जान चली गई। साथ ही लाखों को भागकर दूसरे देशों में पनाह लेने लगी। ये कहने में कुछ भी गलत नहीं है कि सीरिया के गृहयुद्ध ने जो शरणार्थी समस्या पैदा की उसने यूरोप के अनेक देशों में इस्लामिक कट्टरता के पाँव जमा दिये। फ्रांस, जर्मनी, स्वीडन, डेनमार्क और ब्रिटेन इसका दंश भोग रहे हैं। ये बात पूरी तरह सही है कि राष्ट्रपति असद एक क्रूर तानाशाह बन चुके थे। उनके पिता ने भी इस देश पर लम्बे समय तक राज किया। इस प्रकार दुनिया के प्राचीनतम देशों में शुमार सीरिया आधी सदी से एक ही परिवार के शिकंजे में था।

       हालांकि असद की सत्ता के विरुद्ध विद्रोह 13 साल पहले शुरू हुआ किंतु रूस और ईरान ने हर प्रकार से उसकी सहायता की। रूसी सैनिकों के साथ ही वायुसेना भी खुलकर असद की रक्षा करती रही। ऐसी ही भूमिका ईरान की भी रही। दरअसल रूस को डर था कि असद के हटते ही सीरिया के अमेरिकी प्रभाव में चले जाने से पश्चिम  एशिया का शक्ति संतुलन बिगड़ने का खतरा उत्पन्न हो जाएगा। उसका सोचना गलत भी नहीं था।

   गत दिवस राजधानी दमिश्क में विद्रोहियों के घुसते ही असद देश छोड़कर मास्को रवाना हो गए। रूस ने भी उन्हें शरण देना स्वीकार किया है। अमेरिका , फ्रांस, जर्मनी, ब्रिटेन और तुर्किये आदि ने बिना देर लगाए जिस तरह से सीरिया में सत्ता परिवर्तन का स्वागत किया । उससे स्पष्ट है कि इसके पीछे अमेरिकी लॉबी का हाथ है। इसका समय भी बहुत ही सोच समझकर तय किया गया। चूंकि रूस लंबे समय से यूक्रेन के साथ युद्ध में उलझा हुआ है इसलिए वह पहले की तरह असद के बचाव में सामने नहीं आ सका। हालांकि उसके सैनिक दस्ते अभी भी सीरिया में बने हैं जिनकी सुरक्षित वापसी हेतु उसने विद्रोही नेताओँ से आश्वासन ले लिया है। दूसरी तरफ ईरान भी इसराइल के साथ जंग की दहशत में डूबा हुआ है। लिहाजा  वह भी असद की सहायता करने का साहस न दिखा सका। यदि इनमें से कोई एक देश भी असद की पीठ पर हाथ रखे रहता तो बरसों से चला आ रहा गृहयुद्ध कुछ दिनों में ही अंजाम तक न पहुँचता।

    लेकिन विद्रोहियों के राजधानी दमिश्क  पर काबिज होने और राष्ट्रपति असद के देश छोड़कर रूस में शरण लेने मात्र से सीरिया का संकट हल हो जाएगा, ये मान लेना जल्दबाजी होगी क्योंकि जिस गुट ने कुछ दिनों के भीतर ही असद को भागने मजबूर कर दिया उसका भी पूरे देश पर आधिपत्य नहीं है। सीरिया के बड़े हिस्से पर दूसरे गुटों का कब्जा है। वहीं आई.एस.आई.एस नामक संगठन भी कुछ जगहों में जमा बैठा है।

    जो जानकारी आ रही है उसके अनुसार अमेरिका के राष्ट्रपति जो बाइडेन का उद्देश्य सीरिया को असद के शासन से मुक्त करवाना था। उसके लिए उसने जिस विद्रोही गुट को सहायता दी उसका नेता अल कायदा जैसे अमेरिका विरोधी आतंकवादी संगठन से जुड़ा रहा। ऐसे में  कहा जा सकता है कि असद का तख्ता पलट होने के बाद सीरिया के कई टुकड़े हो सकते हैं और यही अमेरिका और उसके समर्थक पश्चिमी देश चाहते हैं।

    अमेरिका जानता है कि सीरिया को यदि टुकड़ों में नहीं बांटा गया तब वहाँ दोबारा उसकी विरोधी ताकतें सत्ता पर हावी हो जाएंगी। इसलिए असद के देश छोड़कर भागने के बाद अब यह देश अनेक विद्रोही गुटों की आपसी लड़ाई में फंसकर रह जाएगा। अरब जगत में युद्ध के हालात बनाये रखना अमेरिका के हित में होने से वह अपनी पसंद के विद्रोही समूह को पालता रहेगा। सीरिया से इसराइल की सीमा भी मिलती है। गोलन हाइट्स नामक इलाके में उसने अपने कदम बढ़ा दिये हैं। गत रात्रि सीरिया में अनेक इस्लामिक कट्टरपंथियों के केंद्रों पर हवाई हमले हुए। उनके पीछे इसराइल ही बताया जा रहा है।

     सच बात ये है कि इसराइल सीरिया में हुए सत्ता परिवर्तन से आशंकित है क्योंकि जिस विद्रोही गुट ने दमिश्क पर अपना परचम फहराया उसकी पृष्ठभूमि  इसराइल विरोधी रही है। अन्य अरबी देश भी ये तय नहीं कर पा रहे हैं कि वे सीरिया में अचानक हुए तख्ता पलट पर क्या रुख अख्तियार करें , क्योंकि जिन देशों में राजशाही या लम्बे समय से परिवार की सत्ता चली आ रही है वहाँ के सत्ताधीशों को भी सीरिया के हालातों ने डरा दिया है।

     आने वाले कुछ दिन इस क्षेत्र के लिए काफी संगीन होंगे क्योंकि फिलहाल तो सीरिया आसमान से टपकने के बाद खजूर पर अटेकने वाली स्थिति में फंस गया है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Saturday, 7 December 2024

बांग्ला देश के हालात पर भारत के मुस्लिम धर्मगुरु खामोश क्यों हैं


बांग्ला देश में रह रहे अल्पसंख्यक जबरदस्त तनाव में हैं। कुछ समय पूर्व सत्ता परिवर्तन के बाद से वहाँ भारत विरोधी भावनाएं उफान पर हैं जिनके चलते हिंदुओं के साथ अमानवीय व्यवहार हो रहा है। मुस्लिम कट्टरपंथी संगठन उनके धार्मिक स्थलों को नष्ट करने पर आमादा हैं। घरों और व्यवसायिक प्रतिष्ठानों में लूट और आगजनी आम बात है। महिलाओं का अपहरण और बलात्कार बेरोकटोक जारी है। जैन और ईसाई समुदाय भी मुस्लिम गुंडागर्दी का शिकार हो रहा है। सं.रा.संघ ने भी इस पर चिंता व्यक्त की  है। यहाँ तक कि अमेरिका के राष्ट्रपति जो बाइडेन ने भी बांग्ला देश सरकार को इसे रोकने कहा है । उल्लेखनीय है शेख हसीना की सरकार का तख्ता पलटने के पीछे बाइडेन का ही हाथ बताया जाता है।  भारत में बांग्ला देश के हिंदुओं के साथ हो रहे अमानुषिक अत्याचारों को लेकर काफी गुस्सा है। हाल ही में हिन्दू संगठनों के आह्वान पर अनेक शहरों में जुलूस निकालकर केंद्र सरकार से प्रभावी कदम उठाने का अनुरोध किया गया। संसद में भी इस मामले में आवाजें उठीं।  लेकिन इस सबके बीच  सबसे चौंकाने वाली बात है भारत में रहने वाले मुसलमानों  की खामोशी। वक्फ संशोधन और संभल की जामा मस्ज़िद में सर्वे के दौरान हुए उपद्रव पर तो पूरे देश के मुस्लिम संगठन और मुल्ला - मौलवीआक्रोशित हैं । लेकिन गंगा - जमुनी संस्कृति और धर्मनिरपेक्षता का ढोल पीटने वाले मुस्लिम नेताओं ने बांग्ला देश में हिंदुओं सहित अन्य अल्पसंख्यक समुदायों के साथ मुस्लिम गुंडों द्वारा की जा रही हैवानियत पर अपने होंठ सिल रखे हैं। पूरे देश में हिन्दू संगठनों द्वारा निकाली गई रैलियों के समर्थन में शीर्ष मुस्लिम धर्मगुरुओं द्वारा बयान देने तक की औपचारिकता का निर्वहन नहीं किया गया। मुस्लिम देशों का जो संगठन भारत में मुस्लिमों की स्थिति पर समय - समय पर चिंता जताता है उसने भी बांग्ला देश में चल रही मुस्लिम धर्मांधता पर टिप्पणी करने से परहेज किया। इन सबकी वजह से ही ये कहने के लिए बाध्य हो जाना पड़ता है भारत के मुस्लिम समुदाय को धर्मनिरपेक्षता केवल अपनी सुरक्षा के लिए जरूरी लगती है। हमारे पड़ोसी पाकिस्तान में हिंदुओं के साथ जो कुछ होता आया है उसकी किसी मुस्लिम नेता या धर्मगुरु ने निंदा की हो , ये शायद ही किसी ने सुना होगा। ऐसे में यदि राजनीतिक तौर पर हिन्दू ध्रुवीकरण होने लगा तब धर्मनिरपेक्षता पर खतरे की बात बेमानी हो जाती है। महाराष्ट्र विधानसभा के हालिया चुनाव में बंटेंगे तो कटेंगे और एक हैं तो सेफ हैं के नारे पर तो खूब नाक  सिकोड़ी गई किंतु लोकसभा चुनाव से प्रचलित वोट जिहाद की अपील को अनुचित बताने का साहस सेकुलर जमात नहीं दिखा सकी। भारत में रहने वाले मुसलमान और उनके धर्मगुरुओं को ये नहीं भूलना चाहिये कि 1971 में तत्कालीन पूर्वी पाकिस्तान के मुस्लिमों पर पश्चिमी पाकिस्तान के मुस्लिम फौजियों ने वही अत्याचार किये थे जो आज बांग्ला देश में हिंदुओं पर मुस्लिम कट्टरपंथी कर रहे हैं। उस समय भारतीय सेना ने वहाँ घुसकर पाकिस्तानी फौज को घुटनाटेक करवाया और पाकिस्तान के चंगुल से निकलकर बांग्ला देश अस्तित्व में आया। और कोई देश होता तो उस एहसान को कभी नहीं भुलाता ।  लेकिन मुस्लिम कट्टरता के चलते वहाँ भारत विरोधी बीज अंकुरित होने लगे। वर्तमान स्थिति ये है कि जिस पाकिस्तान ने बांग्ला देश पर अत्याचार की पराकाष्ठा की थी वहाँ के मुस्लिम संगठनों द्वारा उसके साथ मिलकर हिंदुओं का दमन किया जा रहा है।  1971 के संकट के दौरान बांग्ला देश के करोड़ों लोग भारत में बतौर शरणार्थी आये और यहीं के होकर रह गए। उनकी तीसरी पीढ़ी यहाँ बसी हुई है जिनके साथ किसी प्रकार का भेदभाव नहीं होता। यदि बांग्ला देश में हिंदुओं पर हो  रहे अत्याचार की प्रतिक्रियास्वरूप बांग्ला देशी मुसलमानों के विरुद्ध आक्रोश भड़क जाए तब भी क्या हमारे यहाँ के मुस्लिम संगठन मौन साधे रहेंगे ? आश्चर्य इस बात का है कि शरणार्थी बनकर आये बांग्ला देशियों की औलादें भी उनके मूल देश में हिंदुओं के साथ हो रही हैवानियत पर निर्विकार बनी हुई  हैं जबकि उनके माता - पिता भी ऐसी ही प्रताड़ना के कारण अपना वतन छोड़ने मजबूर हुए थे। बांग्ला देश में चल रही भारत विरोधी मुहिम का उद्देश्य  दरअसल हिंदुओं को देश छोड़ने के लिए मजबूर करना है। ऐसे में बांग्ला देशी शरणार्थियों के नाम मतदाता सूचियों से हटाकर सरकारी योजनाओं  के लाभ से वंचित करने का फैसला सरकार करे तब मुसलमानों को उसका विरोध नहीं करना चाहिये। लोकसभा चुनाव में वोट जिहाद का नारा उछालकर  भाजपा को स्पष्ट बहुमत से वंचित कर फूले नहीं समा रहे मुस्लिम  धर्मगुरुओं को समझ में आ जाना चाहिए कि बंटेंगे तो कटेंगे का भाव वोट जिहाद की ही प्रतिक्रिया है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Friday, 6 December 2024

बैंकों द्वारा शुल्कों के रूप में लूट पर लगाम लगाए रिजर्व बैंक

किंग आधुनिक अर्थव्यवस्था की जान है। इसके बिना लेन - देन की कल्पना नहीं की जा सकती। पहले बैंकों का काम केवल जमा राशि पर ब्याज देना और व्यवसायिक ऋणों पर ब्याज वसूलना होता था किंतु 1969 में श्रीमती इंदिरा गाँधी द्वारा राष्ट्रीयकरण किये जाने के बाद से उनकी भूमिका बदल गई और वे  सामाजिक दायित्वों से भी जुड़ गए । इसमें दो मत नहीं है कि  उस कदम से बैंकों और आम जनता के बीच की दूरी कम हुई। गरीबों के लिए अनुदान प्राप्त ऋण व्यवस्था निश्चित तौर पर क्रांतिकारी सोच थी। इसके अलावा छोटे - छोटे कस्बों तक में बैंक की शाखाएं खोली गईं। यद्यपि इन योजनाओं के कारण बैंकिंग क्षेत्र में भ्रष्टाचार के बीज भी अंकुरित होने लगे। लेकिन कोई भी सरकार इस बारे में कदम पीछे खींचने का साहस नहीं कर सकी और इस तरह राष्ट्रीयकृत बैंक सरकारी नीतियों को लागू करने के माध्यम बनते चले गए। इसके बाद जब पी. वी. नरसिम्हा राव की सत्ता आई और डाॅ. मनमोहन सिंह वित्त मंत्री बनाये गए तब देश में आर्थिक सुधारों की जो बयार बही उसने बैंकिंग क्षेत्र की तस्वीर बदलकर रख दी। राष्ट्रीयकरण की अवधारणा को किनारे रखते हुए निजी क्षेत्र के बैंकों को लाइसेंस दिये जाने लगे। इसका प्रभाव ऋण वितरण में सरलता के रूप में सामने आया। बैंक और बाजार एक दूसरे की जरूरतों को पूरा करने में जुट गए। निजी आवश्यकताओं के लिए ऋण की उपलब्धता ने उपभोक्तावाद को जन्म  दिया। लेकिन इसका दूसरा पहलू ये भी है कि व्यवसायिक ऋणों के अलावा वाहन, गृह निर्माण, शिक्षा आदि के लिए भी ऋण सुलभता से मिलने से समाज के मध्यमवर्ग का जीवन स्तर  भी उठने लगा। 10 साल पहले नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनते ही गरीबों के जनधन खाते खोलने की योजना शुरू हुई तब उसे व्यर्थ की उठापटक माना गया क्योंकि बिना एक भी रुपया जमा किये खाता खोलने का औचित्य समझ से परे था । लेकिन जल्द ही जनधन खातों का उद्देश्य स्पष्ट हो गया क्योंकि सरकारी योजनाओं से गरीबों को मिलने वाली आर्थिक सहायता इन खातों में जमा की जाने लगी। डायरेक्ट ट्रांसफर नामक इस प्रणाली ने भ्रष्टाचार को रोकने का चमत्कारिक काम किया। कोरोना काल में ये तरीका बेहद कारगर साबित हुआ। इसमें दो मत नहीं है कि आज भारत का बैंकिंग ढांचा वैश्विक प्रतिस्पर्धा में मजबूती से खड़ा हुआ है और ये भी कि अब वह शहरों और कस्बों से निकलकर ग्रामीण अंचलों तक फैल चुका है। सबसे बड़ी बात हुई तकनीक का उपयोग करते हुए बैंकिंग को आसान बनाने का। एटीएम से शुरू होकर बात नेट बैंकिंग तक आ चुकी है। लेकिन इसकी आड़ में बैंकों ने ग्राहकों पर विभिन्न सेवाओं के लिए जो शुल्क थोपना शुरू किया वह अनुचित और असहनीय है। आज ही रिजर्व बैंक ने घोषणा की कि 6.5  फीसदी ब्याज दर जारी रहेगी। इससे ऋणों का  भुगतान करने वालों को मासिक किश्त में वृद्धि नहीं होगी। उद्योग - व्यवसाय भी इससे राहत अनुभव करेंगे। जिसका तत्काल प्रभाव शेयर बाजार में आई उछाल से मिल गया। हालांकि कुछ अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय एजेंसियों का अनुमान था कि लोगों की क्रय शक्ति बढ़ाने के लिए रिजर्व बैंक ब्याज दरों में कमी करेगा किंतु उसने उसे यथावत ही रखा। लेकिन देश के केन्द्रीय बैंक को ये भी देखना चाहिए कि बैंकों का मुनाफा जिस मात्रा में बढ़ता जा रहा है उसके मद्देनजर उन्हें सेवा एवं अन्य कार्यों हेतु लिए जाने वाले शुल्कों में यथोचित कमी करनी चाहिए। निजी क्षेत्र के बैंक यदि ग्राहकों से अनाप - शनाप शुल्क वसूलते हैं तो बात इसलिए समझ में आती है क्योंकि उनका उद्देश्य किसी भी तरह से लाभ बटोरना है किंतु सरकारी बैंक मुनाफा बढ़ाने के फेर में ग्राहकों पर जबरन का भार बढ़ाएं उसका औचित्य किसी भी दृष्टि  से सिद्ध नहीं किया जा सकता। ये बात गले से नहीं उतरती कि एक तरफ तो सरकार आम आदमी की बेहतरी के लिए बैंकों को माध्यम बना रही है किंतु वे ग्राहकों के साथ निजी सूदखोरों की तरह पेश आते हैं। आश्चर्य इस बात का है कि संसद और उसके बाहर जनता के हितों  का ढोल पीटने वाले राजनीतिक नेता भी बैंकों द्वारा थोपे जाने वाले जबरिया शुल्कों के बारे में कुछ नहीं बोलते। इसी तरह उपभोक्ताओं के अधिकारों के लिए लड़ने वाले संगठन भी  उदासीन हैं। सरकार बैंकों में जो निजी डायरेक्टर नियुक्त करती है उनका दायित्व बैंक के साथ ही ग्राहकों के हितों का संरक्षण भी है किंतु वे उन्हें मिलने वाली सुविधाओं के वजन से दबे रहते हैं। ये सब देखते हुए बैंकों द्वारा लगाए जाने वाले शुल्कों के विरुद्ध भी आंदोलन होना चाहिए। अन्यथा ग्राहकों से की जाने वाली लूट बढ़ती ही जाएगी। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Thursday, 5 December 2024

देश का पश्चिमी हिस्सा भाजपा का गढ़ बना


आखिरकार महाराष्ट्र में अनिश्चितता खत्म हो गई और भाजपा के देवेंद्र फड़नवीस मुख्यमंत्री बन रहे हैं। ढाई साल पहले शिवसेना टूटने पर जब उद्धव ठाकरे सरकार का पतन हुआ तब भाजपा के शीर्ष नेतृत्व ने  शिवसेना छोड़कर आये एकनाथ शिंदे को मुख्यमंत्री और देवेंद्र को उपमुख्यमंत्री बनाकर सबको चौंका दिया जबकि भाजपा सबसे बड़ी पार्टी थी। और मुख्यमंत्री पद को लेकर ही उसकी उद्धव ठ से खटपट इतनी बढ़ी कि वे  कांग्रेस और शरद पवार की गोद में बैठकर मुख्यमंत्री बन गए। लेकिन भाजपा शांत नहीं बैठी और उसने पहले शिवसेना में विभाजन करवाकर उद्धव को सत्ता से हटवाकर सरकार बनाई और कुछ समय बाद ही अजीत पवार को भी अपने पाले में खींचकर शरद पवार की राकांपा के भी दो टुकड़े करवा दिये। यद्यपि 2019 के चुनाव के बाद भी अजीत ने सुबह - सुबह देवेंद्र के साथ उपमुख्यमंत्री की शपथ ली किंतु शाम होते तक चाचा शरद पवार ने उनको घर लौटने बाध्य कर दिया। उस कदम से श्री फड़नवीस की काफी किरकिरी भी हुई। उनको सत्ता का लालची और अपरिपक्व तक कहा गया। हालांकि शिंदे सरकार में  उनके और अजीत के उप मुख्यमंत्री होने से महायुति  ने अच्छा काम कर दिखाया। लेकिन लोकसभा  चुनाव में महाराष्ट्र की जनता ने एनडीए की बजाय इंडिया गठबंधन को ज्यादा सीटें देकर  तगड़ा झटका दिया। अजीत  गुट को सबसे  ज्यादा घाटा हुआ परंतु शिंदे की शिवसेना को पर्याप्त सफलता मिली। उस परिणाम से लगा मानो शिंदे सरकार जिस प्रकार बनी उसी तरह चली भी जायेगी। अजीत की पत्नी के बारामती में शरद पवार की बेटी से बुरी तरह पराजित होने के बाद तो ये संभावना व्यक्त की जाने लगी कि पवार परिवार फिर एकजुट हो जायेगा। विधानसभा  के समय अजीत के चाचा की शरण में चले जाने की खबरें लगातार आती रहीं। उनको डर था कि यदि ये चुनाव भी हारे तो  भविष्य अंधकारमय हो जाएगा। भाजपा से जुड़ने के कारण उनका मुस्लिम वोट बैंक भी छिटक गया। टूट - फूट की आशंका तो शिंदे की पार्टी में भी थी किंतु वैसा कुछ नहीं हुआ। महायुति के तीनों बड़े घटक मिलकर लड़े और भावी मुख्यमंत्री के बारे में किसी भी विवाद को पैदा नहीं होने दिया। दूसरी तरफ महा विकास अगाड़ी में सीटों के बंटवारे के साथ ही मुख्यमंत्री के चेहरे पर खींचातानी बनी रही। चुनाव विश्लेषक लोकसभा चुनाव के परिणाम विधानसभा चुनाव में दोहराए जाने के प्रति आश्वस्त थे। मराठा आरक्षण के मुद्दे को शिंदे सरकार के लिए खतरा बताने के साथ ही विदर्भ में भाजपा के लिए गड्ढा होने के दावे हो रहे थे किंतु सभी आशंकाएँ हवा  - हवाई होकर रह गईं। महायुति को ऐतिहासिक बहुमत हासिल होने से राष्ट्रीय राजनीति में हलचल मच गई। मुख्यमंत्री शिंदे ने उद्धव ठाकरे से शिवसेना की विरासत पूरी तरह छीन ली। वहीं अजीत ने लोकसभा चुनाव के उलट शानदार प्रदर्शन करते हुए चाचा शरद पवार की राजनीतिक पारी पर पूर्ण विराम लगा दिया। ज्यादातर लोगों ने महायुति की शानदार जीत का श्रेय  लाड़की बहन नामक योजना को दिया किंतु  धीमे स्वर में ही सही लेकिन शरद पवार ने बटेंगे तो कटेंगे के नारे को बाजी पलटने वाला बताते हुए हिंदू ध्रुवीकरण को स्वीकार किया। कुछ लोगों ने एक मुस्लिम धर्मगुरु द्वारा मुस्लिम मतदाताओं से किये गए  वोट जिहाद के आह्वान को महा विकास अगाड़ी की दुर्गति के लिए कसूरवार ठहराया। हार - जीत के कारणों का विश्लेषण सभी अपने - अपने नजरिये से करेंगे किंतु डेढ़ हफ्ते की जद्दोजहद के बाद श्री फड़नवीस के मुख्यमंत्री  और श्री शिंदे और अजीत के उपमुख्यमंत्री बनने के साथ ही महाराष्ट्र की राजनीति में शरद पवार और उद्धव ठाकरे का आभामंडल फीका पड़ने की शुरुआत हो गई है। इसका पहला कारण तो उनके उत्तराधिकारी क्रमशः  सुप्रिया सुले और आदित्य ठाकरे में नेतृत्व क्षमता का अभाव  है और दूसरा उन दोनों का स्वास्थ्य इस लायक नहीं है कि अब वे मैदान में उतरकर संघर्ष करते हुए पार्टी को दोबारा खड़ा कर सकें। ऐसे में बड़ी बात नहीं उनके जो विधायक और सांसद हैं , वे भी भविष्य में श्री शिंदे और अजीत के साथ जुड़ जाएं। सबसे बड़ी बात ये होगी कि भाजपा पहली बार महाराष्ट्र की राजनीति को अपनी योजना के अनुसार संचालित करने में सक्षम हुई है। श्री फड़नवीस युवा होने के बावजूद काफी अनुभवी हैं। महापौर और विधायक के बाद मुख्यमंत्री पद का उनको पर्याप्त अनुभव है। भाजपा संगठन पर अच्छी पकड़ के साथ ही रास्वसंघ का समर्थन भी उनको हासिल है। लेकिन सबसे बड़ी बात वे  प्रधानमंत्री  नरेंद्र मोदी की पसंद हैं। हिंदुत्व के प्रति प्रतिबद्धता होने से उन्हें भाजपा के भावी राष्ट्रीय नेतृत्व में स्थान मिलने की पूरी - पूरी संभावना है। गोवा, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, म.प्र , गुजरात, राजस्थान और हरियाणा में  सरकारें होने से देश का पश्चिमी हिस्सा भाजपामय हो गया है। राष्ट्रवादी राजनीति के लिए ये बहुत ही शुभ संकेत है। कांग्रेस के लिए महाराष्ट्र में महायुति की सरकार का भारी -  भरकम बहुमत के साथ सत्ता में आना खतरे का संकेत है। शरद पवार ने राँकापा बनाकर उसकी जड़ें पहले ही कमजोर कर दी थीं। रही - सही  कसर उद्धव ठाकरे के साथ गठजोड़ ने पूरी कर दी। 


- रवीन्द्र वाजपेयी