बांग्ला देश में रह रहे अल्पसंख्यक जबरदस्त तनाव में हैं। कुछ समय पूर्व सत्ता परिवर्तन के बाद से वहाँ भारत विरोधी भावनाएं उफान पर हैं जिनके चलते हिंदुओं के साथ अमानवीय व्यवहार हो रहा है। मुस्लिम कट्टरपंथी संगठन उनके धार्मिक स्थलों को नष्ट करने पर आमादा हैं। घरों और व्यवसायिक प्रतिष्ठानों में लूट और आगजनी आम बात है। महिलाओं का अपहरण और बलात्कार बेरोकटोक जारी है। जैन और ईसाई समुदाय भी मुस्लिम गुंडागर्दी का शिकार हो रहा है। सं.रा.संघ ने भी इस पर चिंता व्यक्त की है। यहाँ तक कि अमेरिका के राष्ट्रपति जो बाइडेन ने भी बांग्ला देश सरकार को इसे रोकने कहा है । उल्लेखनीय है शेख हसीना की सरकार का तख्ता पलटने के पीछे बाइडेन का ही हाथ बताया जाता है। भारत में बांग्ला देश के हिंदुओं के साथ हो रहे अमानुषिक अत्याचारों को लेकर काफी गुस्सा है। हाल ही में हिन्दू संगठनों के आह्वान पर अनेक शहरों में जुलूस निकालकर केंद्र सरकार से प्रभावी कदम उठाने का अनुरोध किया गया। संसद में भी इस मामले में आवाजें उठीं। लेकिन इस सबके बीच सबसे चौंकाने वाली बात है भारत में रहने वाले मुसलमानों की खामोशी। वक्फ संशोधन और संभल की जामा मस्ज़िद में सर्वे के दौरान हुए उपद्रव पर तो पूरे देश के मुस्लिम संगठन और मुल्ला - मौलवीआक्रोशित हैं । लेकिन गंगा - जमुनी संस्कृति और धर्मनिरपेक्षता का ढोल पीटने वाले मुस्लिम नेताओं ने बांग्ला देश में हिंदुओं सहित अन्य अल्पसंख्यक समुदायों के साथ मुस्लिम गुंडों द्वारा की जा रही हैवानियत पर अपने होंठ सिल रखे हैं। पूरे देश में हिन्दू संगठनों द्वारा निकाली गई रैलियों के समर्थन में शीर्ष मुस्लिम धर्मगुरुओं द्वारा बयान देने तक की औपचारिकता का निर्वहन नहीं किया गया। मुस्लिम देशों का जो संगठन भारत में मुस्लिमों की स्थिति पर समय - समय पर चिंता जताता है उसने भी बांग्ला देश में चल रही मुस्लिम धर्मांधता पर टिप्पणी करने से परहेज किया। इन सबकी वजह से ही ये कहने के लिए बाध्य हो जाना पड़ता है भारत के मुस्लिम समुदाय को धर्मनिरपेक्षता केवल अपनी सुरक्षा के लिए जरूरी लगती है। हमारे पड़ोसी पाकिस्तान में हिंदुओं के साथ जो कुछ होता आया है उसकी किसी मुस्लिम नेता या धर्मगुरु ने निंदा की हो , ये शायद ही किसी ने सुना होगा। ऐसे में यदि राजनीतिक तौर पर हिन्दू ध्रुवीकरण होने लगा तब धर्मनिरपेक्षता पर खतरे की बात बेमानी हो जाती है। महाराष्ट्र विधानसभा के हालिया चुनाव में बंटेंगे तो कटेंगे और एक हैं तो सेफ हैं के नारे पर तो खूब नाक सिकोड़ी गई किंतु लोकसभा चुनाव से प्रचलित वोट जिहाद की अपील को अनुचित बताने का साहस सेकुलर जमात नहीं दिखा सकी। भारत में रहने वाले मुसलमान और उनके धर्मगुरुओं को ये नहीं भूलना चाहिये कि 1971 में तत्कालीन पूर्वी पाकिस्तान के मुस्लिमों पर पश्चिमी पाकिस्तान के मुस्लिम फौजियों ने वही अत्याचार किये थे जो आज बांग्ला देश में हिंदुओं पर मुस्लिम कट्टरपंथी कर रहे हैं। उस समय भारतीय सेना ने वहाँ घुसकर पाकिस्तानी फौज को घुटनाटेक करवाया और पाकिस्तान के चंगुल से निकलकर बांग्ला देश अस्तित्व में आया। और कोई देश होता तो उस एहसान को कभी नहीं भुलाता । लेकिन मुस्लिम कट्टरता के चलते वहाँ भारत विरोधी बीज अंकुरित होने लगे। वर्तमान स्थिति ये है कि जिस पाकिस्तान ने बांग्ला देश पर अत्याचार की पराकाष्ठा की थी वहाँ के मुस्लिम संगठनों द्वारा उसके साथ मिलकर हिंदुओं का दमन किया जा रहा है। 1971 के संकट के दौरान बांग्ला देश के करोड़ों लोग भारत में बतौर शरणार्थी आये और यहीं के होकर रह गए। उनकी तीसरी पीढ़ी यहाँ बसी हुई है जिनके साथ किसी प्रकार का भेदभाव नहीं होता। यदि बांग्ला देश में हिंदुओं पर हो रहे अत्याचार की प्रतिक्रियास्वरूप बांग्ला देशी मुसलमानों के विरुद्ध आक्रोश भड़क जाए तब भी क्या हमारे यहाँ के मुस्लिम संगठन मौन साधे रहेंगे ? आश्चर्य इस बात का है कि शरणार्थी बनकर आये बांग्ला देशियों की औलादें भी उनके मूल देश में हिंदुओं के साथ हो रही हैवानियत पर निर्विकार बनी हुई हैं जबकि उनके माता - पिता भी ऐसी ही प्रताड़ना के कारण अपना वतन छोड़ने मजबूर हुए थे। बांग्ला देश में चल रही भारत विरोधी मुहिम का उद्देश्य दरअसल हिंदुओं को देश छोड़ने के लिए मजबूर करना है। ऐसे में बांग्ला देशी शरणार्थियों के नाम मतदाता सूचियों से हटाकर सरकारी योजनाओं के लाभ से वंचित करने का फैसला सरकार करे तब मुसलमानों को उसका विरोध नहीं करना चाहिये। लोकसभा चुनाव में वोट जिहाद का नारा उछालकर भाजपा को स्पष्ट बहुमत से वंचित कर फूले नहीं समा रहे मुस्लिम धर्मगुरुओं को समझ में आ जाना चाहिए कि बंटेंगे तो कटेंगे का भाव वोट जिहाद की ही प्रतिक्रिया है।
- रवीन्द्र वाजपेयी
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