Tuesday, 10 December 2024

एक ही मुद्दे से चिपके रहना राहुल के लिए नुकसानदेह


राजनीति में कब कौन किसके साथ हो जाए और कौन साथ छोड़ दे कहना मुश्किल है। लोकसभा चुनाव मिलकर लड़े इंडिया गठबंधन में नजर आ रही  दरारें इसकी पुष्टि करती हैं। संसद का शीत कालीन सत्र शुरू होने के पहले महाराष्ट्र और झारखंड विधानसभा चुनाव के परिणाम आने के बाद विपक्षी गठजोड़ में जो  टूटन शुरू हुई वह बढ़ती ही जा रही है। गठबंधन के अनेक नेता खुलकर कांग्रेस पर हमले कर रहे हैं। नेतृत्व बदलने की मांग को मिल रहे समर्थन से ये बात साबित हो रही है। इसके पीछे एक तरफ तो हरियाणा और महाराष्ट्र में हुई हार है किंतु दूसरी तरफ अदाणी समूह को लेकर राहुल गाँधी का बचकाना रवैया भी है। अमेरिका से हुए कुछ खुलासों के आधार पर वे अदाणी पर चौतरफा हमला कर रहे हैं किंतु अभी तक उनके हाथ ऐसा कुछ भी नहीं लग सका जिसके बल पर वे उक्त समूह को अपराधी साबित कर सकें। और उसी की खीझ में वे अब जो तरीके अपना रहे हैं वे सतही सोच का प्रतीक हैं । प्रधानमंत्री के साथ अदाणी की भागीदारी का आरोप लगाते हुए चोर शब्द का इस्तेमाल कर श्री गाँधी ने दिखा दिया कि उनमें गलतियों से सीखने की बुद्धिमत्ता का अभाव है। स्मरणीय है 2019 के लोकसभा चुनाव में  उन्होंने चौकीदार चोर के नारे अपनी सभाओं में लगवाए थे किंतु जनता ने नरेंद्र मोदी को और भी ज्यादा सीटें देकर दोबारा सत्ता में बिठा दिया। पिछले कुछ सालों से वे अदाणी समूह की आड़ लेकर  प्रधानमंत्री की घेराबंदी करने में  जुटे हैं किंतु 2024 के लोकसभा चुनाव में भी ये मुद्दा बेअसर रहा। हालांकि श्री मोदी स्पष्ट बहुमत से चूक गए लेकिन उसका कारण अदाणी मुद्दा न होकर अन्य बातें रहीं। उनके इस अड़ियलपन से इंडिया गठजोड़ के अन्य दलों में भी नाराजगी है। कुछ तो खुलकर उसे जाहिर भी कर चुके हैं। संसद में गत सप्ताह कांग्रेस द्वारा अदाणी के विरोध में हुए प्रदर्शन से सपा, तृणमूल और एनसीपी ( शरद) द्वारा दूरी बनाया जाना इसका प्रमाण है। गठबंधन के अनेक साथी दलों द्वारा कांग्रेस से दूर रहने का जो संकेत दिया जा रहा है उसके पीछे अदाणी मुद्दे पर श्री गाँधी की हठधर्मिता के अलावा गाँधी परिवार का संबंध उन विदेशी संस्थानों के साथ जुड़ने का आरोप  है जो भारत में राजनीतिक अस्थिरता फैलाने में जुटे  हैं। जिस दिन से राहुल की अगुआई में प्रधानमंत्री को चोर कहा गया उसी के बाद से भाजपा  सांसदों ने संसद में सोनिया गाँधी और उनके परिवार pr भारत विरोधी विदेशी संस्थानों से निकटता का आरोप लगाना शुरू कर दिया। जिसका कांग्रेस तो ये कहकर खंडन कर रही है कि सत्ता पक्ष अदाणी विवाद से लोगों का ध्यान हटाने ये आरोप लगा रहा है। लेकिन गाँधी परिवार ने उक्त आरोपों पर मुँह नहीं खोला। इंडिया गठबंधन के साथी भी इस बात से भयभीत हैं कि कहीं  वे  गाँधी परिवार पर भाजपा द्वारा किये जा रहे हमले की लपेट में न आ जाएं। यही कारण है कि अदाणी मुद्दे पर जहाँ राहुल अकेले नजर आ रहे हैं वहीं भाजपा द्वारा लगाए गए आरोपों से बचाव में भी गठबंधन के सहयोगी पूरी तरह उदासीन हैं।  विपक्ष में होने के नाते श्री गाँधी सरकार को घेरने के लिए आगे आएं ये स्वाभाविक है किंतु एक ही मुद्दे में उलझे रहने से ऐसा लगता है जैसे वे पूर्वाग्रह से ग्रसित हों। और ये भी कि जब देश और दुनिया के सामने बड़ी - बड़ी समस्याएं सिर उठा रही हों तब बतौर नेता प्रतिपक्ष श्री गाँधी का कर्तव्य है कि वे संसद और उसके बाहर उन विषयों पर अपना और कांग्रेस का रुख स्पष्ट करें। लेकिन वे अदाणी से चिपककर खुद को कुए का मेढ़क साबित कर रहे हैं।   इस बारे में रोचक बात ये है कि भाजपा विरोधी कुछ यू ट्यूबर पत्रकार ये शिगूफा छोड़ने लगे हैं कि इंडिया  गठबंधन के कुछ दलों ने हरियाणा और महाराष्ट्र के चुनाव परिणाम के बहाने कांग्रेस पर जो हमला बोला है उसके पीछे गौतम अदाणी ही हैं। सही बात तो ये है कि अदाणी कभी भी गठबंधन का साझा मुद्दा रहा ही नहीं। शरद पवार और ममता बेनर्जी तो हिँडनबर्ग खुलासे के समय ही राहुल द्वारा जेपीसी जांच की मांग के विरोध में खड़े हो गए थे। श्री पवार  ने तो गौतम अदाणी से निजी बातचीत के बाद उनके पाक - साफ होने का दावा भी कर दिया। लेकिन श्री गाँधी  लगातार अदाणी और श्री मोदी की निकटता के नाम पर राजनीति करते आ रहे हैं। लेकिन जब ये आरोप लगता है कि अशोक गहलोत और भूपेश बघेल ने मुख्यमंत्री रहते हुए क्रमशः राजस्थान और छत्तीसगढ़ में अदाणी समूह की कंपनियों को बड़े - बड़े ठेके दिये तब श्री गाँधी जवाब देने से बचते हैं। गत दिवस उनके बहनोई रॉबर्ट वाड्रा के साथ भी गौतम अदाणी का चित्र भाजपा ने जारी कर राहुल से उन दोनों के रिश्तों पर स्पष्टीकरण मांगा है। कुल मिलाकर ये लगता है कि अदाणी मुद्दे पर प्रधानमंत्री को घेरने का दांव उल्टे श्री गाँधी के लिए मुसीबत बन गया है। चूंकि अभी तक इस बारे में वे कुछ भी ठोस तथ्य सामने नहीं रख सके इसलिए उनकी विश्वसनीयता भी दिनों -  दिन कम हो रही है। और जब उनके सहयोगी दल ही उनसे सहमत नहीं हैं तब जनता उनकी बात को सच मानेगी इसमें संदेह ही है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी


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