Thursday, 19 December 2024

नेहरू जी की महत्वाकांक्षा के लिए डाॅ. आंबेडकर को उपेक्षित किया गया


संसद में संविधान के 75 साल पूरे होने के उपलक्ष्य में आयोजित विशेष चर्चा  विवाद में उलझकर रह गई। लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गाँधी ने संविधान के साथ मनुस्मृति की पुस्तक सदन में लहराकर आरोप लगाया कि भाजपा संविधान की बजाय मनुस्मृति का सम्मान करती है। बीते काफी समय से वे जातिगत जनगणना की मांग करते आ रहे हैं और सरकार को ये धौंस भी देते हैं कि वे ऐसा करवाकर रहेंगे। लोकसभा चुनाव में दलित मतदाताओं को ये कहकर भाजपा से दूर करने में कुछ हद तक कांग्रेस सफल रही थी कि तीसरी बार सत्ता में आने के बाद नरेंद्र मोदी आरक्षण समाप्त कर देंगे। लेकिन हरियाणा और महाराष्ट्र के विधान सभा चुनाव में वह प्रचार बेअसर रहा । जबरदस्त पराजय के बाद जब राहुल के विरुद्ध इंडिया गठबंधन में ही आवाजें उठने लगीं तब उन्हें चिंता हुई और इसीलिए वे संविधान के साथ मनुस्मृति को मुद्दा बनाकर भाजपा को  दलित विरोधी  सिद्ध करने में जुट गए। लेकिन  लंबे समय से सांसद रहने के बावजूद भी श्री गाँधी में अपेक्षित गंभीरता का अभाव है। भाजपा पर मनुस्मृति समर्थक होने का आरोप लगाते समय वे भूल गए कि  कुछ साल पहले ही उनकी पार्टी के वरिष्ट नेता रणदीप सुरजवाला ने पत्रकार वार्ता बुलाकर ये प्रचारित किया कि राहुल सारस्वत ब्राह्मण हैं और जनेऊ  भी धारण करते हैं। उसके बाद श्री गाँधी हिन्दू मंदिरों और मठों के चक्कर भी लगाते नजर आने लगे। कैलाश - मानसरोवर की यात्रा पर भी गए। उनकी बहिन प्रियंका वाड्रा ने भी यही दिखावा किया जो  हिन्दू समुदाय में भाजपा की पैठ को कम करने करने के लिए बनाई गई रणनीति थी। विशेष रूप से जनेऊ धारी ब्राह्मण होने का दावा उच्च जातियों में भाजपा के जनाधार में सेंध लगाना था। लेकिन जब श्री गाँधी को लगा कि उनका वह दाँव भी काम नहीं आया तब  जातिगत जनगणना का बाजा बजाने लगे। लेकिन यहाँ भी वे गच्चा खा गए क्योंकि कर्नाटक में उनकी ही पार्टी की सरकार  अपने  पिछले कार्यकाल में करवाई गई जातिगत जनगणना के आंकड़े जारी करने का साहस नहीं बटोर पा रही। ऐसे में संसद में संविधान पर चर्चा के दौरान उनके मनुस्मृति लेकर खड़े होने का औचित्य उन्हीं की पार्टी के लोग समझ नहीं पा रहे। बीते दो दिनों से आंबेडकर जी को लेकर जो आरोप - प्रत्यारोप संसद में चल रहे हैं उनको लेकर भी कांग्रेस पूरी तरह घिर गई। भले ही गृहमंत्री अमित शाह के बयान को लेकर वह आक्रामक  हो लेकिन डाॅ. आंबेडकर के जीवनकाल में  उनके प्रति कांग्रेस के तत्कालीन शीर्ष नेताओं का जो उपेक्षाभाव था वह जैसे ही उजागर हुआ पार्टी को  मुँह छिपाने में दिक्कत होने लगी। संविधान के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वहन करने वाले बाबा साहब को पंडित नेहरू के मंत्रिमंडल से त्यागपत्र क्यों देना पड़ा और बाद में उनको लोकसभा चुनाव में हरवाने के लिए कांग्रेस ने क्या - क्या किया ये इतिहास में मोटे अक्षरों में लिखा हुआ है। बाबा साहेब ने आरक्षण और  धारा 370 का प्रावधान अस्थायी रखा था। हिन्दू विवाह और उत्तराधिकार अधिनियम को लेकर उनके नेहरू जी से मतभेद खुलकर सामने आ चुके थे। सही बात तो ये है कि महात्मा गाँधी के नेहरू प्रेम  ने जिन सक्षम और सुयोग्य नेताओं को उपेक्षित किया उनमें आंबेडकर जी भी थे। सही मायने में वे राजनेता न होकर समाजशास्त्री थे जिनके मन में हिन्दू समाज में व्याप्त बुराई को दूर करने की इच्छा थी। अछूतोद्धार  का जो अभियान गाँधी जी ने चलाया उसे आगे ले जाने के लिए डाॅ. आंबेडकर ही सबसे उपयुक्त व्यक्ति होते  किंतु कांग्रेस में उनको लेकर अदृश्य भय था जिसकी परिणिति उनको पहले सरकार और फिर संसद से बाहर करने के रूप में हुई। वरना अपने समकालीन नेताओं में वे सबसे अधिक शिक्षित और सुयोग्य थे। सही बात तो ये है कि नेहरू जी की महत्वाकांक्षाओं की पूर्ति के लिए नेताजी सुभाष चंद्र बोस, सरदार पटेल और डाॅ. आंबेडकर जैसी अनेक विभूतियों को दरकिनार किया गया। प्रधानमंत्री बन जाने के बाद भी पंडित नेहरू ने अपने लिए चुनौती बन सकने वाले हर शख्स के पर कतर दिये। डाॅ. राजेंद्र प्रसाद को दोबारा राष्ट्रपति बनाने मैं क्या - क्या रुकावटें आईं ये नई पीढ़ी को जानना चाहिये। जब संसद में प्रधानमंत्री श्री मोदी सहित  अन्य सांसदों ने कांग्रेस की सरकारों द्वारा बाबा साहेब के अपमान का खुलासा किया तब उसका जवाब देने के बजाय मनुस्मृति को मुद्दा बनाया जा रहा है जिसकी प्रासंगिकता समझ से परे है। आज राहुल और प्रियंका नीले कपड़ों में संसद पहुंचे ये जताने के लिए कि उनकी बाबा साहब में कितनी आस्था है। लेकिन बसपा के झंडे के रंग वाले कपड़े पहिनकर न तो भाई - बहिन दलित वर्ग को आकर्षित कर पाएंगे और न ही कांग्रेस के दामन से डाॅ. आंबेडकर के अपमान का दाग मिटेगा। कांग्रेस के पास इस बात का कोई उत्तर नहीं है कि उसकी सरकारों ने संविधान निर्माता कहे जाने वाले बाबा साहेब को भारत रत्न देने के योग्य क्यों नहीं समझा जबकि पंडित नेहरू और इंदिरा जी ने प्रधानमंत्री रहते हुए ही खुद को इस अलंकरण से अलंकृत करवा लिया। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

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