आखिरकार महाराष्ट्र में अनिश्चितता खत्म हो गई और भाजपा के देवेंद्र फड़नवीस मुख्यमंत्री बन रहे हैं। ढाई साल पहले शिवसेना टूटने पर जब उद्धव ठाकरे सरकार का पतन हुआ तब भाजपा के शीर्ष नेतृत्व ने शिवसेना छोड़कर आये एकनाथ शिंदे को मुख्यमंत्री और देवेंद्र को उपमुख्यमंत्री बनाकर सबको चौंका दिया जबकि भाजपा सबसे बड़ी पार्टी थी। और मुख्यमंत्री पद को लेकर ही उसकी उद्धव ठ से खटपट इतनी बढ़ी कि वे कांग्रेस और शरद पवार की गोद में बैठकर मुख्यमंत्री बन गए। लेकिन भाजपा शांत नहीं बैठी और उसने पहले शिवसेना में विभाजन करवाकर उद्धव को सत्ता से हटवाकर सरकार बनाई और कुछ समय बाद ही अजीत पवार को भी अपने पाले में खींचकर शरद पवार की राकांपा के भी दो टुकड़े करवा दिये। यद्यपि 2019 के चुनाव के बाद भी अजीत ने सुबह - सुबह देवेंद्र के साथ उपमुख्यमंत्री की शपथ ली किंतु शाम होते तक चाचा शरद पवार ने उनको घर लौटने बाध्य कर दिया। उस कदम से श्री फड़नवीस की काफी किरकिरी भी हुई। उनको सत्ता का लालची और अपरिपक्व तक कहा गया। हालांकि शिंदे सरकार में उनके और अजीत के उप मुख्यमंत्री होने से महायुति ने अच्छा काम कर दिखाया। लेकिन लोकसभा चुनाव में महाराष्ट्र की जनता ने एनडीए की बजाय इंडिया गठबंधन को ज्यादा सीटें देकर तगड़ा झटका दिया। अजीत गुट को सबसे ज्यादा घाटा हुआ परंतु शिंदे की शिवसेना को पर्याप्त सफलता मिली। उस परिणाम से लगा मानो शिंदे सरकार जिस प्रकार बनी उसी तरह चली भी जायेगी। अजीत की पत्नी के बारामती में शरद पवार की बेटी से बुरी तरह पराजित होने के बाद तो ये संभावना व्यक्त की जाने लगी कि पवार परिवार फिर एकजुट हो जायेगा। विधानसभा के समय अजीत के चाचा की शरण में चले जाने की खबरें लगातार आती रहीं। उनको डर था कि यदि ये चुनाव भी हारे तो भविष्य अंधकारमय हो जाएगा। भाजपा से जुड़ने के कारण उनका मुस्लिम वोट बैंक भी छिटक गया। टूट - फूट की आशंका तो शिंदे की पार्टी में भी थी किंतु वैसा कुछ नहीं हुआ। महायुति के तीनों बड़े घटक मिलकर लड़े और भावी मुख्यमंत्री के बारे में किसी भी विवाद को पैदा नहीं होने दिया। दूसरी तरफ महा विकास अगाड़ी में सीटों के बंटवारे के साथ ही मुख्यमंत्री के चेहरे पर खींचातानी बनी रही। चुनाव विश्लेषक लोकसभा चुनाव के परिणाम विधानसभा चुनाव में दोहराए जाने के प्रति आश्वस्त थे। मराठा आरक्षण के मुद्दे को शिंदे सरकार के लिए खतरा बताने के साथ ही विदर्भ में भाजपा के लिए गड्ढा होने के दावे हो रहे थे किंतु सभी आशंकाएँ हवा - हवाई होकर रह गईं। महायुति को ऐतिहासिक बहुमत हासिल होने से राष्ट्रीय राजनीति में हलचल मच गई। मुख्यमंत्री शिंदे ने उद्धव ठाकरे से शिवसेना की विरासत पूरी तरह छीन ली। वहीं अजीत ने लोकसभा चुनाव के उलट शानदार प्रदर्शन करते हुए चाचा शरद पवार की राजनीतिक पारी पर पूर्ण विराम लगा दिया। ज्यादातर लोगों ने महायुति की शानदार जीत का श्रेय लाड़की बहन नामक योजना को दिया किंतु धीमे स्वर में ही सही लेकिन शरद पवार ने बटेंगे तो कटेंगे के नारे को बाजी पलटने वाला बताते हुए हिंदू ध्रुवीकरण को स्वीकार किया। कुछ लोगों ने एक मुस्लिम धर्मगुरु द्वारा मुस्लिम मतदाताओं से किये गए वोट जिहाद के आह्वान को महा विकास अगाड़ी की दुर्गति के लिए कसूरवार ठहराया। हार - जीत के कारणों का विश्लेषण सभी अपने - अपने नजरिये से करेंगे किंतु डेढ़ हफ्ते की जद्दोजहद के बाद श्री फड़नवीस के मुख्यमंत्री और श्री शिंदे और अजीत के उपमुख्यमंत्री बनने के साथ ही महाराष्ट्र की राजनीति में शरद पवार और उद्धव ठाकरे का आभामंडल फीका पड़ने की शुरुआत हो गई है। इसका पहला कारण तो उनके उत्तराधिकारी क्रमशः सुप्रिया सुले और आदित्य ठाकरे में नेतृत्व क्षमता का अभाव है और दूसरा उन दोनों का स्वास्थ्य इस लायक नहीं है कि अब वे मैदान में उतरकर संघर्ष करते हुए पार्टी को दोबारा खड़ा कर सकें। ऐसे में बड़ी बात नहीं उनके जो विधायक और सांसद हैं , वे भी भविष्य में श्री शिंदे और अजीत के साथ जुड़ जाएं। सबसे बड़ी बात ये होगी कि भाजपा पहली बार महाराष्ट्र की राजनीति को अपनी योजना के अनुसार संचालित करने में सक्षम हुई है। श्री फड़नवीस युवा होने के बावजूद काफी अनुभवी हैं। महापौर और विधायक के बाद मुख्यमंत्री पद का उनको पर्याप्त अनुभव है। भाजपा संगठन पर अच्छी पकड़ के साथ ही रास्वसंघ का समर्थन भी उनको हासिल है। लेकिन सबसे बड़ी बात वे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की पसंद हैं। हिंदुत्व के प्रति प्रतिबद्धता होने से उन्हें भाजपा के भावी राष्ट्रीय नेतृत्व में स्थान मिलने की पूरी - पूरी संभावना है। गोवा, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, म.प्र , गुजरात, राजस्थान और हरियाणा में सरकारें होने से देश का पश्चिमी हिस्सा भाजपामय हो गया है। राष्ट्रवादी राजनीति के लिए ये बहुत ही शुभ संकेत है। कांग्रेस के लिए महाराष्ट्र में महायुति की सरकार का भारी - भरकम बहुमत के साथ सत्ता में आना खतरे का संकेत है। शरद पवार ने राँकापा बनाकर उसकी जड़ें पहले ही कमजोर कर दी थीं। रही - सही कसर उद्धव ठाकरे के साथ गठजोड़ ने पूरी कर दी।
- रवीन्द्र वाजपेयी
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