उ.प्र के झांसी शहर में दो दिन पूर्व एक मदरसा शिक्षक के यहाँ एन .आई .ए ( राष्ट्रीय जाँच एजेंसी) का दल ए. टी. एस (आतंकवाद निरोधी दस्ते) के साथ पहुंचा। मुफ्ती खालिद नदवी नामक उक्त शिक्षक विदेशी छात्रों को ऑन लाइन मदरसा शिक्षा देता है। उसे मिलने वाली विदेशी फंडिंग की जाँच की जानी थी। जाँच दल लंबी पूछताछ के बाद जब उनको हिरासत में लेकर मदरसे से बाहर निकला तो वहाँ मौजूद मुसलमानों की भीड़ ने उनको घेर लिया और गिरफ्तारी का विरोध करते हुए मुफ्ती को छुड़ाकर नजदीकी मस्जिद में ले गए। इसी दौरान मस्जिद के लाउड स्पीकर से लोगों को वहाँ आने के लिए कहा गया और देखते ही देखते सैकड़ों की संख्या में बुर्का पहनी हुई महिलाएं जाँच दल के सामने आकर जमा हो गईं। उधर कुछ युवक एन. आई. ए के लोगों से बहस कर मुफ्ती के विरुद्ध सबूत मांगते रहे। स्थिति बेकाबू होते देख स्थानीय पुलिस भी मौके पर आ गई। काफी देर तक चली बहस के बाद अंततः मुफ्ती को आगे पूछताछ हेतु झांसी पुलिस लाइन ले जाया गया। एन. आई. ए को शक है कि मुफ्ती ऑन लाइन शिक्षा के माध्यम से जो विदेशी धन प्राप्त करता है वह आतँकवादी संगठनों से आता है। इस तरह की छापेमारी देश के अनेक हिस्सों में की जा चुकी है। लेकिन झांसी की घटना ने जाँच एजेंसियों की सुरक्षा के साथ ही मुस्लिम समाज में कानून व्यवस्था की धज्जियां उड़ाने के दुस्साहस का पर्दाफाश किया है। उल्लेखनीय है कुछ दिनों पूर्व उ.प्र के ही संभल नगर में न्यायालय के निर्देश पर स्थानीय जामा मस्जिद में की जा रही खुदाई के विरोध में मुस्लिम समुदाय की भीड़ ने उपद्रव कर दिया। पुलिस बल पर पथराव भी हुआ और जब गोली चलने पर कुछ लोग मारे गए तब विपक्षी पार्टियों के नेता संभल जाकर घड़ियाली आँसू बहाने का नाटक करने में जुट गए। संसद तक में संभल प्रकरण के जरिये ये प्रचारित करने का प्रयास हुआ कि राज्य की योगी सरकार मुसलमानों के प्रति अनुदार है। लेकिन जब मुसलमानों की भीड़ द्वारा की गई पत्थरबाजी की बात की गई तो जवाब में कहा गया कि पत्थर ही तो मारे थे। गौरतलब है कश्मीर घाटी में आतंकवादियों को घेरने गए सुरक्षा बलों पर भी वहाँ के युवक और यहाँ तक कि महिलाएं भी पत्थरबाजी किया करती थीं। धीरे - धीरे ये तरीका पूरे देश के मुसलमानों ने अपना लिया। धर्मनिरपेक्षता के ठेकेदार नेता हिंदुओं से तो सहिष्णुता की अपेक्षा करते हैं किंतु मुस्लिम समाज द्वारा कानून व्यवस्था के विरुद्ध किये जाने वाले हर कृत्य को अनदेखा किया जाता है। यदि पुलिस और प्रशासन कुछ कारवाई करता भी है तो उसे कटघरे में खड़ा करने का अभियान शुरू हो जाता है। लोकसभा चुनाव में संविधान खतरे में है, का दुष्प्रचार कर जो भ्रम फैलाया गया उसकी वजह से विपक्षी दलों को कुछ सीटें ज्यादा मिल गईं। उसके बाद से मुस्लिम समुदाय की उद्दंडता कुछ ज्यादा ही बढ़ गई। देश के अनेक हिस्सों से इस आशय की खबरें आने लगीं जिनमें मुस्लिम लोग पुलिस और प्रशासन के विरुद्ध खड़े होकर कानून को चुनौती देते दिखे। संभल में जो हुआ उसमें विपक्ष के एकपक्षीय रवैये ने मुस्लिम समुदाय को कानून तोड़ने के लिए प्रोत्साहित किया जिसकी परिणिती झांसी की घटना के रूप में सामने आई। जिस मुफ्ती पर एन. आई. ए ने दबिश दी वह शहर काजी का भतीजा है। इससे यह स्पष्ट है कि जो भीड़ एकत्र हुई उसमें उनकी भूमिका भी रही होगी। जिस मामले में मुफ्ती की जाँच करने एन. आई. ए का दल पहुंचा था उसके तार अनेक आतंकवादी संगठनों से जुड़े होने का संदेह है। चूंकि मुफ्ती द्वारा ऑन लाइन शिक्षा विदेशी छात्रों को दी जाती है , इसलिये विदेशी धन का लेन - देन भी जाँच का विषय है। यदि वे पूरी तरह निर्दोष हैं तब उनको गिरफ्तारी से रोकने मस्जिदों से लाउड स्पीकर पर लोगों को बुलाकर जाँच एजेंसी के लोगों को आतंकित करने का क्या औचित्य था? विशेष रूप से बुर्का धारी महिलाओं का मुफ्ती के बचाव में दीवार बनकर खड़े हो जाना मामले को और भी रहस्यमय बना देता है। कुल मिलाकर ये एक गंभीर घटना है। संभल के बाद झांसी में मुस्लिम समुदाय का कानून के पालन में बाधा उत्पन्न करना राष्ट्रविरोधी ताकतों द्वारा किसी नये प्रयोग का हिस्सा लगता है। इसके पहले कि ये दुस्साहस आम हो जाए इसे सख्ती से कुचलना होगा। झाँसी की घटना के बाद विपक्ष के किसी भी नेता ने उन्मादी मुस्लिमों की निंदा करने का साहस नहीं दिखाया। अखिलेश यादव और राहुल गाँधी जैसे नेता संभल कांड पर तो खूब हल्ला मचाते रहे किंतु झाँसी में एन. आई. ए के दल को भीड़ द्वारा घेर लिए जाने के बारे में उनके मुँह से एक शब्द भी नहीं निकलना इस बात का प्रमाण है कि उनका संविधान प्रेम महज ढकोसला है। और धर्मनिरपेक्षता के नाम पर वे मुस्लिम तुष्टीकरण में जुटे हुए हैं।
- रवीन्द्र वाजपेयी
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