Monday, 9 December 2024

इंडिया गठबंधन में राहुल को नेता स्वीकार करने में हिचक

रियाणा की हार के बाद ही इंडिया गठबंधन के अनेक सदस्यों ने कांग्रेस पर हमला शुरू कर दिया था। शिवसेना (उद्धव ) के मुखपत्र सामना में राहुल गाँधी के नेतृत्व पर सवाल उठाये गए। सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव ने भी कांग्रेस को अकेले चुनाव जीतने में अक्षम बता डाला। दरअसल हरियाणा में उनको कांग्रेस ने एक भी सीट नहीं दी थी। उसी खुन्नस में उ.प्र के 9 विधानसभा उपचुनावों में सपा ने सीटों के बंटवारे में कांग्रेस को इतना परेशान किया कि उसने खीझकर चुनाव लड़ने से ही इंकार कर दिया। उधर महाराष्ट्र में सपा, दबाव बनाती रही लेकिन उसे इच्छानुसार सीटें नहीं मिलीं। चुनाव में शरद पवार, उद्धव ठाकरे और नाना पटोले की तिकड़ी चारों खाने चित्त हो गई। कांग्रेस ने तो इतिहास का सबसे खराब प्रदर्शन किया । चूंकि इंडिया गठबंधन के तीनों बड़े घटक बुरी तरह हारे इसलिए बलि के बकरे की तलाश शुरू हुई। इस उलझन को दूर कर दिया प. बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बेनर्जी ने ये कहते हुए कि इंडिया गठबंधन का नेतृत्व उसे ठीक से नहीं चला रहा। ये गठबंधन उन्होंने बनाया है और मौका मिले तो वे उसका नेतृत्व करने तैयार हैं।  उनके बयान का उद्धव ठाकरे के करीबी संजय राउत ने समर्थन करते हुए कोलकाता जाकर उनसे चर्चा करने की बात भी कह डाली। उधर सपा नेता उदयवीर सिंह ने भी इसी आशय का बयान देकर सनसनी मचा दी। इसी बीच राजद की ओर से बयान आया कि इंडिया का गठन तो लालू प्रसाद यादव ने किया था। विपक्षी दलों में खटास लोकसभा  के भीतर भी देखने मिली जब अखिलेश यादव की सीट राहुल गाँधी से दूर कर दी गई जिस पर तंज कसते हुए उन्होंने धन्यवाद कांग्रेस कहा। महाराष्ट्र में शरद पवार तो ज्यादा नहीं बोल रहे किंतु उद्धव ठाकरे के खेमे से कांग्रेस पर हमला जारी है। उधर सपा नेता अबू आजमी ने शिवसेना ( उद्धव ) के नेता मिलिंद नार्वेकर  द्वारा 6 दिसंबर को बाबरी ढांचा गिराए जाने की वर्षगांठ पर सोशल मीडिया में की गई पोस्ट से नाराज होकर महा विकास अगाड़ी से नाता तोड़ने की घोषणा की तो जवाब में आदित्य ठाकरे  ने सपा को भाजपा की बी टीम बताकर आग में घी डाल दिया। तमिलनाडु में सत्तासीन द्रमुक  ने  जरूर कांग्रेस के बचाव में उतरते हुए ममता के बयान पर कहा कि वे एक महज क्षेत्रीय पार्टी की नेता हैं । लेकिन शरद पवार की बेटी सांसद सुप्रिया सुले ने  ये कहकर कांग्रेस को झटका दिया कि ममता यदि बड़ी जिम्मेदारी लेती हैं तो उन्हें खुशी होगी। बंगाल की मुख्यमंत्री ने  जो हमला किया उसमें किसी का नाम तो नहीं था किंतु राजनीति की  समझ रखने वाले जानते हैं कि उनका निशाना राहुल गाँधी पर ही है , जो गठबंधन के अघोषित नेता बने हुए थे। लोकसभा  चुनाव में 99 सीटें जीतकर कांग्रेस निश्चित रूप से विपक्ष की मुखिया नजर आने लगी। और फिर राहुल के लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष बन जाने से उसकी चौधराहट ज़ाहिर तौर पर बढ़ी  जो अन्य घटक दलों को नागवार गुजर रही है। सही बात बात ये है कि इंडिया गठजोड़ में कांग्रेस के पीछे चलने पर किसी को आपत्ति नहीं है किंतु राहुल को नेता मानने  की मनःस्थिति नहीं होना विवाद की वजह है। उल्लेखनीय है ममता तो गठबंधन के अस्तित्व में  आने के पहले से ही राहुल को कमजोर नेता बताते हुए खुद को नरेंद्र मोदी का मुकाबला करने में सक्षम बताती आई हैं। इंडिया गठजोड़ में शामिल होने के बाद भी उन्होंने प. बंगाल में कांग्रेस के साथ चुनावी तालमेल नहींं किया और राहुल की भारत जोड़ो न्याय यात्रा से भी दूर रहीं।  कुल मिलाकर हरियाणा और महाराष्ट्र के चुनाव परिणाम ने राहुल गाँधी की वजनदारी  कम कर दी। अदाणी मुद्दे पर भी ममता, शरद पवार और अखिलेश ने उनका साथ नहीं दिया। असल में आने वाले ज्यादातर राज्य विधानसभा चुनावों में क्षेत्रीय दलों का बोलबाला है जो कांग्रेस को किसी भी तरह से ताकतवर होते नहीं देखना चाहेंगे। वैसे भी इंडिया गठबन्धन  लोकसभा चुनाव में नरेंद्र मोदी की वापसी रोकने बना था। सैद्धांतिक आधार न होने से इसका विधिवत ढांचा खड़ा नहीं हो पाया। हालांकि जून के बाद हुए चार राज्यों के चुनावों में भाजपा को  जम्मू - कश्मीर और झारखंड में  हार का मुँह देखना पड़ा किंतु जीत का श्रेय कांग्रेस की बजाय क्रमशः नेशनल काँफ्रेंस और झारखंड मुक्ति मोर्चा लूट ले गए। इसीलिए  राहुल को उपेक्षित करने की मुहिम शुरू हो गई। यद्यपि इसमें चौंकाने वाली कोई बात नहीं है क्योंकि विपक्षी एकता पूरी तरह कृत्रिम थी जिसमें परस्पर विश्वास का अभाव था। होना तो ये चाहिए था कि लोकसभा चुनाव के तत्काल बाद कांग्रेस द्वारा गठबंधन के सभी दलों को बुलाकर विपक्षी एकता को सुदृढ़ किया जाता। लेकिन नेता प्रतिपक्ष बनकर राहुल आत्ममुग्ध हो गए और उनकी प्राथमिकता पार्टी की बजाय प्रियंका वाड्रा को लोकसभा में लाना  हो गई। जम्मू - कश्मीर के चुनाव में उमर अब्दुल्ला तो राहुल द्वारा सही तरीके से प्रचार न किये जाने पर सार्वजनिक रूप से गुस्सा जता ही चुके थे। महाराष्ट्र में भी ये चर्चा होती रही कि वे प्रियंका के क्षेत्र वायनाड में ज्यादा घूमे। इन सब बातों से लगता है विपक्षी एकता का ये प्रयोग भी निष्फल होने जा रहा है जिसका ठीकरा राहुल के सिर फूटेगा। 


-रवीन्द्र वाजपेयी

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