देश की राजधानी दिल्ली में एक मुस्लिम संस्था के प्रतिनिधिमंडल ने उपराज्यपाल से मिलकर अवैध रूप से रह रहे रोहिंग्या और बांग्लादेशी घुसपैठियों के विरुद्ध कारवाई करने की मांग की। उसका संज्ञान लेते हुए उपराज्यपाल ने प्रशासन और पुलिस को जरूरी कदम उठाने का निर्देश दिया। उसके बाद से राजधानी के विभिन्न इलाकों में घुसपैठियों की पतासाजी शुरू हुई। जो जानकारी मिल रही है उसके अनुसार ये घुसपैठिये फर्जी दस्तावेज बनवाकर देश के विभिन्न स्थानों में फ़ैल गए हैं। ज्यादातर ये मुस्लिम बस्तियों में रहना पसंद करते हैं क्योंकि वहाँ इन्हें संरक्षण और सहायता मिल जाती है। छोटे शहरों में तो इनकी पहिचान उजागर हो भी जाती है किंतु बड़े शहरों विशेष रूप से महानगरों में ये आसानी से डेरा जमा लेते हैं। फुटपाथों के अलावा खाली पड़ी जगहों पर अवैध कब्जा कर रहने वाले इन घुसपैठियों में से अनेक किराये का मकान भी ले लेते हैं। आजकल मध्यमवर्गीय परिवारों में भी घरेलू कार्यों हेतु नौकर / नौकरानी रखने का चलन बढ़ता जा रहा है। बांग्लादेशी महिलाओं और पुरुषों के लिए ये रोजगार का बड़ा जरिया है। उनके बच्चे भी घरों में काम पा जाते हैं। इसके अलावा निर्माण कार्यों में भी बांग्ला देशी श्रमिकों का उपयोग होता है। आपराधिक गतिविधियों में भी इनकी संलग्नता साबित होती रही है। विशेष रूप से रोहिंग्या घुसपैठिये तो अपनी आपराधिक प्रवृत्ति के लिए कुख्यात हैं और इसी वजह से उनको म्यांमार से खदेड़ा गया। ये समस्या इतनी गंभीर इसलिए हुई क्योंकि हमारे देश की राजनीति में चुनावी जीत के लिए देशहित को उपेक्षित करने में संकोच नहीं किया जाता। ये चिंता का विषय है कि देश के अनेक सीमावर्ती इलाकों में बांग्ला देशी और रोहिंग्या घुसपैठियों की बस्तियाँ हैं। इनके आधार और राशन कार्ड बनवाने में कतिपय राजनीतिक पार्टियों के साथ ही भ्रष्ट प्रशासनिक अमले की भी भूमिका रहती है। देश के अनेक निर्वाचन क्षेत्रों में ये घुसपैठिये जीत - हार का फैसला करने में सक्षम हो गए हैं। इसका परिणाम ये है कि वहाँ से कोई गैर मुस्लिम प्रत्याशी चुनाव जीत ही नहीं सकता। 1971 में बांग्ला देश से आये शरणार्थियों को वापस भेजने का समझौता तत्कालीन शेख मुजीब सरकार के साथ हुआ था किंतु उस पर अमल नहीं हो सका। इसका कारण वोट बैंक की राजनीति और प्रशासनिक भ्रष्टाचार ही रहा। सीमा पर तैनात सुरक्षा बल के लोगों पर भी घुसपैठ करवाने के आरोप लगते रहे हैं। हालांकि इन घुसपैठियों की पहिचान कर इनको वापस भेजे जाने की कार्य योजना कई बार बनी किंतु परिणाम शून्य ही रहा। बांग्ला देश में बीते कुछ महीनों से हिंदुओं के साथ जो अमानुषिक व्यवहार हो रहा है उससे भारत में काफी नाराजगी है और लोग घुसपैठियों को वापस भेजने के लिए जरूरी कदम उठाने की मांग कर रहे हैं। असम और त्रिपुरा की राज्य सरकारों ने तो बांग्लादेशियों पर तमाम प्रतिबंध लगा दिये हैं। देश की राजधानी में भी ऐसी ही पहल हुई किंतु हमेशा की तरह इसमें भी राजनीति शुरू हो गई। दिल्ली के पूर्व उपमुख्यमंत्री और आम आदमी पार्टी में अरविंद केजरीवाल के बाद दूसरे सबसे बड़े नेता मनीष सिसौदिया ने उपराज्यपाल के निर्देश पर अवैध बांग्ला देशी और रोहिंग्या घुसपैठियों की जांच तथा धरपकड़ का विरोध शुरू कर दिया। लेकिन इस कार्रवाई से ये बात उजागर हो गई कि दिल्ली पुलिस के पास इस बात की कोई पुख्ता जानकारी नहीं है कि देश की राजधानी में कितने घुसपैठिये अवैध रूप से रह रहे हैं। अतीत में एक - दो बार ऐसी ही मुहिम चलाकर तकरीबन 50 हजार बांग्ला देशी उनके देश भेजे गए थे। लेकिन वह अभियान क्यों रुक गया इसका उत्तर किसी के पास नहीं है। बहरहाल नये सिरे से शुरुआत हो ही गई है तब केंद्र सरकार को चाहिए वह सभी राज्यों को दिल्ली जैसी कार्रवाई करने का निर्देश दे। यदि युद्धस्तर पर इसकी मुहिम छेड़ी जाए तो जनता भी इसमें खुलकर सहयोग देगी, इसमें कोई संदेह नहीं है। बांग्ला देश में हिंदुओं पर जो अत्याचार हो रहे हैं उन्हें वहाँ की अंतरिम सरकार अपना आंतरिक मसला बताकर भारत की आपत्तियों को नजरंदाज कर देती है। ये देखते हुए हमें भी बांग्ला देशी और रोहिंग्या घुसपैठियों की पहचान करते हुए उन्हें निकाल बाहर करने के लिए हरसंभव कदम उठाने चाहिए। इस बारे में ये अच्छा संकेत है कि प. बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बेनर्जी जो बांग्ला देशी घुसपैठियों को वापस भेजने का विरोध करती आई हैं, वे भी इन दिनों केंद्र सरकार के निर्णयों के साथ खड़े रहने जैसे बयान दे रही हैं। ऐसे में यदि सभी राज्य दिल्ली जैसी मुहिम छेड़ दें तो उसका असर बांग्ला देश पर पड़े बिना नहीं रहेगा।
- रवीन्द्र वाजपेयी
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