Tuesday, 3 December 2024

विपक्षी गठबंधन की गाँठें ढीली पड़ने लगीं


संसद में चल रहे गतिरोध को खत्म करने संबंधी जो सहमति गत दिवस लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला द्वारा आमंत्रित सर्वदलीय बैठक में बनी उससे एक बार फिर कांग्रेस नेता राहुल गाँधी की किरकिरी हुई जो अमेरिका में उद्योगपति गौतम अडाणी पर दर्ज प्रकरण को मुद्दा बनाकर संसद में बहस के लिए अड़े हुए थे। चूंकि कांग्रेस में उनकी बात टालना किसी के लिए भी संभव नहीं है इसलिए दोनों सदनों में उसके सांसदों ने करवाई ठप्प कर रखी थी। सरकार ने  कांग्रेस की मांग पर तनिक भी ध्यान नहीं दिया जिसके कारण बीते सप्ताह लोकसभा और राज्यसभा में कुल मिलाकर घंटे भर भी काम नहीं हो सका।  उ.प्र के संभल में मस्जिद के सर्वे  को लेकर हुए फसाद का मुद्दा संसद में  उठाने के लिए सपा उतावली थी । वहीं बांग्ला देश में हिंदुओं पर हो रहे अत्याचार पर तृणमूल कांग्रेस चर्चा चाह  रही है।कुछ अन्य दलों के सांसद मणिपुर सहित अन्य विषयों को उठाने की तैयारी किये बैठे थे किंतु शीतकालीन सत्र का प्रारंभिक सप्ताह हंगामे की भेंट चढ़ गया। गत दिवस लोकसभा अध्यक्ष की पहल पर सदन चलाने विपक्ष सहमत हो गया और आज कारवाई शुरू भी हुई किंतु कांग्रेस सांसदों ने इंडिया गठबंधन के कुछ सहयोगी दलों के साथ प्रदर्शन और नारेबाजी की। इसका नेतृत्व राहुल के साथ नवनिर्वाचित प्रियंका वाड्रा ने किया। लेकिन गठबंधन में कांग्रेस के बाद सबसे ज्यादा सांसदों वाली सपा और तृणमूल ने इस प्रदर्शन का बहिष्कार कर दिया। तृणमूल के एक सांसद ने यहाँ तक कह दिया कि अदाणी मुद्दा कांग्रेस का अपना  एजेंडा है। इस बारे में केन्द्रीय मंत्री किरण रिजजू का ये कहना काफी अर्थपूर्ण है कि सुविधाजनक बहुमत होने से सरकार सभी विधेयक बिना चर्चा के पारित करवा सकती है किंतु ऐसा करना उचित नहीं लगता। लेकिन इसे सत्ता पक्ष की सांकेतिक चेतावनी समझा जा सकता है। बहरहाल अदाणी मुद्दे पर एक बार फिर राहुल इंडिया गठबंधन में हाशिये पर जाने मजबूर हो गए हैं। चूंकि उन्होंने इसे प्रतिष्ठा का प्रश्न बना लिया इसलिए पीछे हटना उनके लिए मुश्किल हो गया है। गठबंधन के कुछ छोटे घटक दल जरूर उनके साथ नजर आ रहे हैं परंतु सपा और तृणमूल का दूर खड़ा रहना  दर्शाता है कि वे राहुल की अपरिपक्व कार्यप्रणाली से ऊबने लगे हैं। दरअसल इसके पीछे अखिलेश यादव और ममता बेनर्जी के अपने - अपने राज्यों के राजनीतिक समीकरण हैं। प. बंगाल में ममता ने एकला चलो की नीति अपना रखी है जिसकी वजह से वहाँ कांग्रेस और वामपंथी दलों की  स्थिति दयनीय हो गई है। लोकसभा चुनाव में कांग्रेस  नेता अधीर रंजन चौधरी को ममता ने गुजरात से बुलाये क्रिकेटर युसुफ पठान से हरवा दिया। 2026 में राज्य विधानसभा के चुनाव हैं इसलिए सुश्री बेनर्जी अभी से कांग्रेस को ठेंगा दिखाने में जुटी हुई हैं। यही सोच सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव की है। राहुल के साथ गठबंधन के खट्टे - मीठे अनुभवों के बाद वे इस बात को भांप गए हैं कि उ.प्र में कांग्रेस भविष्य में उनके लिए बोझ बन जायेगी। हाल ही में संपन्न 9 विधानसभा सीटों के उपचुनाव में दोनों दलों के बीच सीटों के बंटवारे पर खटास पैदा हो गई थी। कांग्रेस को जब मनमाफिक सीटें नहीं मिलीं तो उसने चुनाव लड़ने से इंकार कर दिया। मजबूरन सपा को सभी 9 सीटों पर उम्मीदवार उतारने पड़े किंतु कांग्रेस ने चूंकि सपा उम्मीदवारों का सहयोग नहीं किया इसलिए 7 सीटों पर उसे हार  झेलनी पड़ी और लोकसभा चुनाव के बाद अखिलेश का ग्राफ जिस तेजी से उठा वह नीचे आ गया। महाराष्ट्र में भी सपा की इच्छानुसार सीटें कांग्रेस ने नहीं दीं। सही बात ये है कि हरियाणा और महाराष्ट्र चुनाव के बाद ममता और अखिलेश ही नहीं उद्धव ठाकरे को भी कांग्रेस की संगत अखरने लगी है। विशेष रूप रूप से राहुल की गैर जिम्मेदार कार्यशैली से इंडिया गठबंधन के अनेक दल नाराज हैं। उद्धव के करीबी संजय राउत ने तो कहा भी कि यदि उनकी पार्टी अलग होकर लड़ती तब बेहतर प्रदर्शन कर सकती थी। इन्हीं सब बातों का असर संसद में राहुल की जिद से पैदा हुए गतिरोध से तृणमूल और सपा का पल्ला झाड़ लेने के तौर पर दिखाई दे रहा है। हालांकि इसे इंडिया गठबंधन के विघटन की शुरुआत कहना तो जल्दबाजी होगी लेकिन एक बात साफ है कि श्री गाँधी ये भूल जाते हैं कि गठबंधन चलाने के लिए समन्वय बनाकर चलना जरूरी होता है। उनके इकतरफा  निर्णय को बाकी सहयोगी दल भी आँख मूंदकर स्वीकार कर लें ये हमेशा संभव नहीं क्योंकि सब अपने प्रभाव क्षेत्र को सुरक्षित रखना चाहते हैं। भारत जोड़ो यात्रा से राहुल की जो छवि बनी उससे प्रभावित होकर विपक्षी दलों को उनमें नरेंद्र मोदी का विकल्प महसूस होने लगा था। लेकिन तीसरी बार उनके प्रधानमंत्री बन जाने से वह भरोसा कम हो गया। बाकी कसर पूरी कर दी हरियाणा और महाराष्ट्र के नतीजों ने। ये देखते हुए इतना तो कहा ही जा सकता है कि गठबंधन की गाँठें ढीली पड़नी शुरू हो गई हैं। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

No comments:

Post a Comment