Friday, 27 December 2024

21 वीं सदी की दिशा तय करने के लिए देश उनका आभारी रहेगा


यह दुखद संयोग  है कि 25 दिसंबर को देश ने भूतपूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की 100 वीं जयंती मनाई और उसकी अगली तारीख को ही पूर्व प्रधानमंत्री डाॅ. मनमोहन सिंह को खो दिया। 92 वर्षीय डाॅ. सिंह प्रख्यात अर्थशास्त्री होने के साथ ही कुशल नौकरशाह भी थे। केंब्रिज और आक्सफोर्ड जैसे विश्वप्रसिद्ध संस्थानों में शिक्षा ग्रहण करने  के बाद केंद्र सरकार के आर्थिक सलाहकार, योजना आयोग के उपाध्यक्ष और रिजर्व बैंक के गवर्नर के दायित्व का निर्वहन उन्होंने सफलतापूर्वक  किया। जब स्व. पी. वी नरसिम्हा राव ने उन्हें वित्तमंत्री बनाया तब लोगों को आश्चर्य हुआ क्योंकि वे राजनीति से दूर थे। उस दौर में देश गम्भीर आर्थिक संकट में था। यहाँ तक कि रिजर्व बैंक को सोना गिरवी रखकर विदेशी मुद्रा का प्रबन्ध करना पड़ा अन्यथा  अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर हमारी छवि को जबरदस्त झटका लगता। डाॅ. सिंह ने उस कठिन समय में आर्थिक सुधारों को लागू करने  का साहस दिखाया जिसको कांग्रेस में भी पूरा समर्थन नहीं था।  राव सरकार अल्पमत में होने से अनेक दलों का दबाव झेल रही थी किंतु वे रुके नहीं।  धीरे - धीरे  आर्थिक सुधारों को सर्वदलीय स्वीकृति प्राप्त हुई। इसका सबसे बड़ा प्रमाण ये था कि 2004 में जब डाॅ. सिंह प्रधानमंत्री बने तब उनकी अल्पमत सरकार को वामपंथी दलों ने भी समर्थन दिया। सभी पार्टियों की राज्य सरकारों ने आर्थिक सुधारों को अपनाते हुए उद्योगपतियों के सामने लाल कालीन बिछाने की जो संस्कृति अपनाई उसके प्रणेता डाॅ. सिंह ही थे। लेकिन दूसरी तरफ ये भी सही है कि वे प्रधानमंत्री पद के स्वाभाविक दावेदार नहीं थे। 2004 में आश्चर्यजनक चुनाव परिणाम आए। कांग्रेस सबसे बड़े दल के रूप में सत्ता की हकदार बनी और सोनिया गाँधी को संसदीय दल का नेता चुना गया। लेकिन उन्होंने प्रधानमंत्री बनने से इंकार कर  डाॅ. सिंह की ताजपोशी करवा दी। वह सब क्यों और कैसे हुआ ये आज भी रहस्य है। डाॅ. सिंह जिन राव साहब की पसंद थे उनसे गाँधी परिवार की चिढ़ किसी से छिपी नहीं थी। लेकिन राव साहब के  करीबी रहे मनमोहन जी को श्रीमती गाँधी ने इसलिए चुना क्योंकि वे प्रणव मुखर्जी को प्रधानमंत्री नहीं देखना चाहती थीं जो हर दृष्टि से योग्य थे। ये बात भी कुछ किताबों के जरिये प्रकाश में आई कि भाजपा द्वारा विदेशी महिला को प्रधानमंत्री बनाये जाने के विरोध  के चलते गाँधी परिवार के भीतर भी ये चर्चा चली कि सोनिया जी पीछे हट जाएं और किसी ऐसे व्यक्ति को गद्दी सौंपी जाए जो समय आने पर राहुल गाँधी के लिए सिंहासन छोड़ दे।  लिहाजा डाॅ. सिंह को चुना गया। ये भी कुछ लेखकों ने लिखा कि परिवार राजीव गाँधी की मौत के सदमे से उबर नहीं पाया था। राहुल ने माँ को ये डर दिखाकर रोका कि सत्ता में बैठना उनके लिए जानलेवा हो सकता था। बहरहाल मनमोहन जी की प्रतिभा और अनुभव को देखते हुए उनके चयन को सर्वत्र सराहा गया। लेकिन जल्द ही साफ हो गया कि गाँधी परिवार ने सत्ता का नियंत्रण अपने पास ही रखा ।  पहला कार्यकाल पूरा होने के पहले अमेरिका के साथ परमाणु संधि के मुद्दे पर वामपंथियों ने सरकार से समर्थन वापस ले लिया। लेकिन 2009 के चुनाव में भाजपा द्वारा समुचित  चुनौती पेश न किये जाने के कारण कांग्रेस ज्यादा सीटें लेकर आई और मनमोहन  जी दोबारा प्रधानमंत्री बनाये गए। उनकी विद्वता, सौम्यता और  ईमानदारी पर किसी को संदेह नहीं था। उन्होंने जनहित में अनेक बड़े फैसले भी लिए किंतु दूसरी तरफ भ्रष्टाचार के आरोपों से उनकी सरकार घिरती  चली गई। घपलों - घोटालों का सिलसिला रुकने का नाम नहीं ले रहा था। यद्यपि वे निजी तौर पर बेदाग थे किंतु बतौर प्रधानमंत्री बदनामी के छींटे उनके दामन पर पड़ते गए। सही बात तो ये है कि उनको स्वतंत्र होकर काम करने का अवसर ही नहीं दिया गया। इसका सबसे बड़ा प्रमाण  था उनकी सरकार द्वारा राष्ट्रपति की स्वीकृति हेतु  भेजे गए अध्यादेश के प्रारूप को भरी पत्रकार वार्ता में राहुल द्वारा फाड़ दिया जाना। उस समय डाॅ. सिंह विदेश में थे। ऐसा लगा कि संभवतः वे लौटकर त्यागपत्र दे देंगे किंतु उस अपमान को भी वे चुपचाप सहन कर गए । 2014 आते - आते वे एक लाचार प्रधानमंत्री के रूप में रह गए थे। न सत्ता पर उनका नियंत्रण था और न ही संगठन पर। जननेता न वे पहले थे न बाद में बन सके। एक बार लोकसभा चुनाव लड़कर हारे और फिर जीवन भर राज्यसभा में रहे। प्रधानमंत्री के रूप में उनको सम्मान तो हासिल था किंतु शक्तियाँ नहीं। उनकी सरलता, सज्जनता और गैर राजनीतिक स्वभाव उनके राजनीतिक प्रभुत्व के आड़े आता गया। पूर्ववर्ती दोनों प्रधानमंत्री क्रमशः राव साहब और अटल जी भी अपनी सौम्यता, अनुभव और समावेशी स्वभाव के कारण सबसे प्रशंसा प्राप्त करते रहे किंतु उनमें जो निर्णय लेने की क्षमता और दृढ़ता थी उसके कारण वे दबावों का सामना करने में सफल रहे। डाॅ. सिंह इस मोर्चे पर कमजोर साबित हुए और उनकी यही कमी उनकी योग्यता , दक्षता और अनुभव पर भारी पड़ गई। यद्यपि उनकी व्यक्तिगत ईमानदारी पर किसी को संदेह नहीं रहा। उनके हिस्से में आई बदनामी दूसरों के काले कारनामों का परिणाम थी। दरअसल अपनी  प्रतिभा और ज्ञान के चलते वे एक विश्व धरोहर थे। आज देश की जो आर्थिक स्थिति है उसकी नींव उनके द्वारा ही रखी गई थी। 21 वीं सदी के भारत की दिशा तय करने के लिए उन्होंने जो कुछ किया उसके लिए देश उनका आभारी रहेगा।
विनम्र श्रद्धांजलि। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

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