प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा म.प्र के खजुराहो में केन - बेतवा लिंक परियोजना का शिलान्यास किया जाना एक ऐतिहासिक अवसर है। 44 हजार करोड़ रु. की इस परियोजना का 90 फीसदी खर्च केंद्र सरकार वहन करेगी। उ.प्र और मध्यप्रदेश की दो नदियों को जोड़ने वाली इस परियोजना के पूरे होने पर 11 हजार हेक्टेयर भूमि सिंचित हो सकेगी वहीं 113 मेगावाट पन बिजली और 27 मेगावाट सौर ऊर्जा का उत्पादन होगा जिसका लाभ अकेले म.प्र के खाते में आयेगा। सबसे बड़ी बात बुंदेलखंड के बड़े इलाके में जल की किल्लत दूर होने से वहाँ आर्थिक विकास के दरवाजे खुल सकेंगे और लोगों के पलायन को भी रोका जा सकेगा। अभी हाल ही में प्रधानमंत्री की मौजूदगी में म.प्र और राजस्थान के मुख्यमंत्रियों ने पार्वती - क़ाली सिंध और चम्बल लिंक परियोजना सम्बन्धी समझौता हस्ताक्षरित किया। नदियों को जोड़ने की कल्पना सबसे पहले पूर्व प्रधानमंत्री स्व. अटल बिहारी वाजपेयी द्वारा संजोई गई थी। देश में विश्वस्तरीय राजमार्गों के अलावा प्रधानमंत्री ग्रामीण सड़क योजना भी अटल जी की दूरदर्शिता का ही सुपरिणाम है। शुरू - शुरू में सड़कों के विकास को धन की बरबादी और ऑटोमोबाइल उद्योग को लाभ पहुंचाने वाला बताया गया। इसी तरह नदियों को आपस में जोड़ने की परिकल्पना का भी मखौल बनाया गया। दुर्भाग्य से 2004 के लोकसभा चुनाव में वाजपेयी सरकार चली गई और उसके बाद आई डाॅ. मनमोहन सिंह की सरकार ने नदियों को जोड़ने में तो कोई रुचि ही नहीं ली वहीं राजमार्गों और ग्रामीण सड़कों के विकास की गति भी बेहद धीमी कर दी। वह सरकार पूरे 10 साल चली। यदि उस दौरान उक्त दोनों प्रकल्पों पर प्राथमिकता के आधार पर काम किया गया होता तो आज देश की स्थिति कहीं बेहतर होती। ये संतोष का विषय है कि केन - बेतवा लिंक परियोजना की शुरुआत प्रधानमंत्री श्री मोदी आज स्व. अटल जी की 100 वीं जयंती के दिन कर रहे हैं। निश्चित रूप से ये उनके प्रति सार्थक श्रद्धांजलि है। इस संदर्भ में ये बात भी विचारणीय है कि इस तरह के महत्वपूर्ण प्रकल्पों को अमल में लाने के मामले में भी राजनीति होती है। मसलन 2004 में हुए सत्ता परिवर्तन के बाद आई केंद्र सरकार यदि नदियों को जोड़ने जैसी परियोजनाओं पर ध्यान देती तो निश्चित रूप से देश के बड़े हिस्से को सूखे और बाढ़ जैसी विपदाओं से बचाया जा सकता था। ये विडंबना ही है कि आज तक विभिन्न राज्यों के बीच नदियों के जल का बंटवारा विवाद का विषय बना हुआ है। इसके लिए हुए आंदोलनों में जन और धन दोनों की हानि हुई। दक्षिण में कावेरी और उत्तर में यमुना नदी के जल को लेकर पड़ोसी राज्यों के बीच चली आ रही खींचातानी ये दर्शाती है कि समस्याओं के समाधान के प्रति हमारे यहाँ कितनी लापरवाही बरती जाती है। केन - बेतवा लिंक परियोजना उस दृष्टि से बहुत बड़ी सौगात है जो उ.प्र और म.प्र के अत्यंत पिछड़े इलाकों को विकास के पथ पर आगे ले जाने में सहायक होगी। केंद्र सरकार ने 44 हजार करोड़ के इस प्रकल्प में 90 प्रतिशत योगदान स्वीकृत कर निश्चित रूप से सराहनीय कदम उठाया है। दोनों राज्यों में फैला बुंदेलखंड अंचल अपने गौरवशाली इतिहास के लिए प्रसिद्ध है। यहाँ प्राकृतिक संपदा भी बेशुमार है। लेकिन आजादी के बाद इस इलाके की समुचित देखभाल नहीं होने से ये प्रगति की दौड़ में पीछे रह गया किंतु बीते कुछ वर्षों में केंद्र और राज्य सरकार के बीच बेहतर समन्वय के कारण बुंदेलखंड में भी विकास की उम्मीद नजर आने लगी है। प्रधानमंत्री चूंकि स्वयं ही देश में अधो संरचना के विकास में रुचि लेते हैं इसीलिए उनके 10 वर्षीय शासनकाल में राज मार्गों, फ्लाई ओवर, नदियों पर पुल, सीमांत क्षेत्रों में सड़क और रेल सेवा , हवाई अड्डे, बंदरगाह आदि का निर्माण रिकार्ड संख्या में हुआ। पहले की सरकारें धन की कमी का रोना रोती रहीं जबकि मोदी सरकार ने आर्थिक संसाधन जुटाकर देश को विकसित करने का जो बीड़ा उठाया उसका ही सुपरिणाम केन - बेतवा लिंक परियोजना के शिलान्यास के रूप में देखने मिल रहा है। इस महत्वपूर्ण प्रकल्प को मूर्त रूप देने के लिए प्रधानमंत्री श्री मोदी के साथ ही प्रदेश के मुख्यमंत्री डाॅ. मोहन यादव भी बधाई के हकदार हैं। उम्मीद की जा सकती है कि इस तरह की अन्य लंबित परियोजनाएं भी जल्द ही शुरू की जाएंगी जिससे जल संसाधनों का समुचित उपयोग हो सके।
- रवीन्द्र वाजपेयी
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