वित्तीय वर्ष 2025 - 26 के लिए केन्द्रीय बजट की तैयारियां सरकारी स्तर पर तेजी से चल रही हैं। मोदी सरकार ने बजट फरवरी में बजट पेश करने और 31 मार्च के पहले उसे पारित करवाने की जो परंपरा शुरू की उसके कारण अब बजट प्रावधानों के अनुसार आवंटन वित्तीय वर्ष शुरू से ही होने से बजट राशि का उपयोग समय रहते होने लगता है। परिणामस्वरूप विकास कार्यों की गति बढ़ी है। अन्यथा पुरानी व्यवस्था में विभिन्न विभागों को बजट राशि का आवंटन होते - होते जून आ जाता था। प्रत्यक्ष करों का भुगतान करने वाले संस्थान या व्यक्तियों को भी बजट जल्द प्रस्तुत होने से कर संबंधी योजना बनाने में आसानी हो गई है। ये भी सही है कि आयकर विभाग की कार्यप्रणाली में उल्लेखनीय सुधार होने से करदाताओं के मन में उसके प्रति व्याप्त खौफ कम हुआ है। रिटर्न भरने और अग्रिम कर जमा करने वालों के रिफण्ड की प्रक्रिया बेहद सरल और नौकरशाही के हस्तक्षेप से मुक्त होने का ही परिणाम है कि आयकर दाताओं की संख्या में उल्लेखनीय वृद्धि प्रति वर्ष देखने मिल रही है। परिणामस्वरूप आयकर की कुल वसूली भी सरकार की उम्मीद से अधिक हुई। इसके लिए सरकार द्वारा किये गये सुधारों को श्रेय देने के साथ ही करदाताओं की प्रशंसा करनी होगी जिन्होंने एक जिम्मेदार नागरिक का फर्ज निभाते हुए अर्थव्यवस्था को मजबूती प्रदान करने में अपनी सहभागिता दी। जहाँ तक बात उद्योग - व्यवसाय की है तो उन्हें प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष दोनों तरह से अनेक प्रकार की रियायतें दी जाती हैं । लेकिन मध्यमवर्गीय करदाताओं की श्रेणी जिसमें कारोबारी और नौकरपेशा दोनों आते हैं, उन्हें आयकर की जो छूट वर्तमान में मिल रही है उसे और बढ़ाया जाना चाहिए। ये बात किसी से छिपी हुई नहीं है कि आज बाजार में जो रौनक है उसमें मध्यममवर्गीय उपभोक्ताओं का सबसे बड़ा योगदान है। बैंकों से आवास, वाहन, शिक्षा , घरेलू चीजों आदि के लिए कर्ज लेने वालों में भी इसी वर्ग की बहुतायत है। कहने का आशय ये है कि मध्यमवर्ग के बिना अर्थव्यवस्था की कल्पना नहीं की जा सकती। ऐसे में अब केंद्र सरकार को सोचना चाहिए कि आगामी बजट में इस तबके के लिए राहत का पिटारा खोले। अभी जो छूट की सीमा है वह समयानुकूल कम प्रतीत होती है। बतौर उपभोक्ता ये वर्ग सरकारी खजाने में जीएसटी के रूप में लगभग रोजाना अपना योगदान देता है। भारत का विशाल मध्यम वर्ग पूरी दुनिया के लिए आकर्षण बना हुआ है क्योंकि इसी के कारण भारत दुनिया के सबसे बड़े उपभोक्ता बाजार के रूप में स्थापित हुआ है। भारत में आकर बहुराष्ट्रीय कंपनियां अपनी उत्पादन इकाइयां भी इसी वजह से लगा रही हैं। ऑटोमोबाइल उद्योग को जो अकल्पनीय उड़ान मिली उसमें भी मध्यमवर्ग को ही श्रेय जाता है। भारतीय शेयर बाजार में जो चमक आई है उसके पीछे भी इसी की भूमिका है। बीच में जब दुनिया भर के शेयर बाजार लड़खड़ाने लगे और विदेशी निवेशकों ने अपनी पूंजी निकालना शुरू कर दिया तब भी मध्यमवर्गीय निवेशक हिम्मत के साथ डटा रहा । जिससे वैश्विक स्तर पर भारतीय अर्थव्यवस्था की धाक और साख दोनों बढी। इसलिए इस वर्ग की क्रय शक्ति बढ़ाना बुद्धिमत्ता होगी। घरेलू पर्यटन उद्योग में जो रौनक नजर आती है उसका असली कारण भी मध्यमवर्ग ही है। यदि आयकर छूट की सीमा 10 लाख कर दी जाए तो भारत के उपभोक्ता और शेयर बाजार में जबरदस्त उछाल आना तय है और उससे सरकार दूसरे रास्ते से आयकर से ज्यादा कर अर्जित कर सकेगी। कोरोना के दौरान सभी आर्थिक विशेषज्ञ जनता के हाथ में पैसा देने की वकालत कर रहे थे जिससे उद्योग - व्यापार चलते रहें। उक्त सभी बिंदुओं के मद्देनजर आयकर छूट की सीमा 10 लाख रु. करना करदाता और सरकार दोनों के हित में रहेगा।
- रवीन्द्र वाजपेयी
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