लगता है राष्ट्रीय राजनीति में तीसरे मोर्चे का पुनर्गठन होने जा रहा है। भाजपा और कांग्रेस से दूरी बनाकर रखने वाली क्षेत्रीय पार्टियों द्वारा तीसरी ताकत के रूप में सत्ता का संतुलन अपने हाथ में रखने का जो प्रयोग नब्बे के दशक में शुरू हुआ उसने भारतीय राजनीति की चाल, चरित्र और चेहरे को पूरी तरह बदलकर रख दिया था। 1989 के लोकसभा चुनाव में राजीव गाँधी की सत्ता चली जाने के बाद भाजपा और वाम दलों के बाहरी समर्थन से बनी जनता दल की सरकार के प्रधानमंत्री का चयन बेहद नाटकीय तरीके से हुआ जब चौधरी देवीलाल का नाम तय होने के बाद विश्वनाथ प्रताप सिंह की ताजपोशी हो गई। राजीव सरकार पर भ्रष्टाचार का आरोप लगाकर कांग्रेस से बाहर आये श्री सिंह जल्द ही लालू प्रसाद, मुलायम सिंह और शरद यादव के शिकंजे में फंस गए । इन तीनों ने उनसे मंडल आयोग की सिफारिशें लागू करवाकर ओबीसी को 27 फीसदी आरक्षण का प्रावधान करवा दिया। उसके बाद भाजपा ने लालकृष्ण आडवाणी की रथ यात्रा के जरिये राम मंदिर आंदोलन छेड़ दिया। रथ यात्रा को बिहार में लालू प्रसाद यादव ने रोका तो भाजपा ने केंद्र सरकार से समर्थन वापस ले लिया। उसके बाद कांग्रेस के समर्थन से चंद्रशेखर प्रधानमंत्री बन बैठे किंतु उनकी गति भी चौधरी चरण सिंह जैसी हुई। लोकसभा के मध्यावधि चुनाव की नौबत आ गई किंतु उसके बीच ही राजीव गाँधी की हत्या हो गई। कांग्रेस सत्ता में तो आई किंतु उसे स्पष्ट बहुमत नहीं मिलने से बैसाखियों का सहारा लेना पड़ा। पी. वी. नरसिम्हा राव प्रधानमंत्री बने जिन्होंने मंडल और मंदिर जैसे मुद्दों की काट के तौर पर आर्थिक सुधारों को लागू कर दिया। उनकी सरकार वैसे तो पाँच साल चली किंतु 1996 में हुए लोकसभा चुनाव में भाजपा सबसे बड़ा दल बना और अटल बिहारी वाजपेयी प्रधानमंत्री बने किंतु बहुमत साबित नहीं कर पाने के कारण उन्हें 13 दिन में ही हटना पड़ा। लोकसभा त्रिशंकु थी और कांग्रेस को कोई समर्थन देने राजी न था। ऐसे में फिर एक प्रयोग हुआ संयुक्त मोर्चे के नाम पर जिसमें कांग्रेस और वाम दलों ने एच. डी. देवगौड़ा को प्रधानमंत्री बनवा दिया जो जनता दल के थे। पहली बार वामपंथी भी सरकार में शामिल हुए। लेकिन वह सरकार भी कांग्रेस ने जल्द गिरवा दी जिसके बाद उसी रचना के तहत इंदर कुमार गुजराल की ताजपोशी हुई। लेकिन कांग्रेस अध्यक्ष सीताराम केसरी ने उनको भी जल्द भूतपूर्व बना दिया। 1998 में देश को फिर लोकसभा चुनाव झेलना पड़ा किंतु इस बार भाजपा ज्यादा ताकत से लौटी और अटल जी दूसरी बार सत्ता में आये किंतु 13 माह में जयललिता ने वह सरकार गिरवा दी। 1999 में लोकसभा चुनाव होने के दौरान ही कारगिल युद्ध हो गया। उसमें भारत ने जीत हासिल की जिसका लाभ लेकर भाजपा फिर सबसे अधिक सीटें जीतने में सफल रही और अटल जी तीसरी बार प्रधानमंत्री बने। इस बार बदलाव ये हुआ कि जनता दल में टूट हुई और कुछ पुराने समाजवादियों ने एनडीए नामक मोर्चे में शामिल होकर भाजपा के साथ सत्ता में भागीदारी की। जिनमें जॉर्ज फर्नांडीज, शरद यादव, राम विलास पासवान और नीतीश कुमार जैसे चेहरे थे। वह सरकार पूरे समय चली। बीच में गुजरात दंगों के कारण पासवान अलग हो गए। लेकिन बाकी भाजपा के साथ बने रहे। वाजपेयी जी एक सफल प्रधानमंत्री के रूप में स्थापित हो चुके थे किंतु 2004 के चुनाव में कांग्रेस बड़ी पार्टी बनी और डाॅ. मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री बने । भाजपा को रोकने के लिए वामपंथियों ने भी उनकी सरकार को टेका लगा दिया। अनेक गैर कांग्रेसी नेता उस सरकार से जुड़कर सत्ता सुख लूटने लगे। संयुक्त मोर्चा , यूपीए बन गया। कुछ विपक्षी एनडीए में ही रहे। पुराने समाजवादियों के बिखराव ने तीसरे मोर्चे को अप्रासंगिक बना दिया। लालू, शरद, नीतीश, पासवान, देवगौड़ा सभी ने पार्टियां बना लीं। 2009 में मनमोहन सरकार फिर बनी और कांग्रेस के सांसद भी बढ़े। सरकार ने कार्यकाल पूरा भी किया किंतु गाँधी परिवार के हस्तक्षेप ने मनमोहन की छवि कमजोर प्रधानमंत्री की बना दी। ऊपर से भ्रष्टाचार के मामलों ने सरकार को बदनाम कर दिया। 2014 में नरेंद्र मोदी के नाम पर भाजपा ने स्पष्ट बहुमत प्राप्त किया। यूपीए में शामिल कुछ नेता भाजपा के साथ आ गए जिनमें पासवान प्रमुख थे। लेकिन तीसरा मोर्चा की राजनीति की बजाय एनडीए और यूपीए ही छाए रहे। 2019 में मोदी ने पहले से ज्यादा सफलता हासिल की। 2024 के चुनाव के पहले यूपीए का नया नामकरण इंडिया किया गया जो भाजपा विरोधी तमाम दलों का गठजोड़ था। उसने जोर तो बहुत लगाया किंतु भाजपा को बहुमत की देहलीज पर रोकने के बाद भी वह मोदी को नहीं रोक पाया। हालांकि कांग्रेस 99 सीटों के साथ मुख्य विपक्षी दल हो गई और राहुल बड़े नेता के रूप में उभरे। लेकिन बीते छह माह में हुए विधानसभा चुनावों में हरियाणा और महाराष्ट्र में भाजपा की प्रचण्ड जीत ने इंडिया गठबंधन में दरारें पैदा कर दीं। राहुल के नेतृत्व को अन्य घटक दलों से चुनौती मिलने लगी। उसके बाद अडाणी मुद्दे पर कांग्रेस अलग - थलग पड़ी और अब ईवीएम के विरोध पर उमर अब्दुल्ला के बाद ममता बेनर्जी के भतीजे अभिषेक ने कांग्रेस को कटघरे में खड़ा कर दिया। अचानक ये महसूस होने लगा कि इंडिया में शामिल अनेक पार्टियां कांग्रेस का साथ छोड़ने की फिराक में हैं। ममता, उद्धव, लालू, उमर, अखिलेश आदि जो तेवर दिखा रहे हैं उनसे लगता है वे संसद में कांग्रेस की ताकत बढ़ने से चिंतित हैं और खुद को उपेक्षित महसूस कर रहे हैं। जो संकेत हैं उनके मुताबिक संसद के शीतकालीन सत्र के बाद इंडिया गठबंधन में विभाजन होगा तथा कुछ क्षेत्रीय पार्टियां तीसरे मोर्चे का गठन करेंगी जिसमें नवीन पटनायक , जगन मोहन रेड्डी और के. चंद्र शेखर राव भी शामिल हो सकते हैं। कांग्रेस द्वारा राहुल के विरुद्ध बने माहौल पर जिस तरह का ठंडा रुख दिखाया उससे भी सहयोगी नाराज हैं। उन्हें लग रहा है कि राहुल अपनी नेतागिरी चमकाने में लगे हैं और घटक दलों से संवाद ही नहीं होता। ऐसे में 2025 की शुरुआत में विपक्षी राजनीति में बड़ा धमाका होने की संभावना दिन ब दिन मजबूत होती जा रही है।
- रवीन्द्र वाजपेयी
No comments:
Post a Comment