Monday, 23 December 2024

राहुल और प्रियंका पर मुस्लिम सांप्रदयिकता का सहारा लेने का आरोप

 

संसद के शीतकालीन सत्र के दौरान कांग्रेस हर मोर्चे पर असफल रही। मुख्य विपक्षी पार्टी होने के नाते उससे अपेक्षा थी कि वह जनता की समस्याओं को उठायेगी और सरकार के कमजोर पक्ष पर प्रहार करेगी। उसके पास मुद्दों और अवसरों की कमी भी नहीं थी किंतु हमेशा की तरह वह उनका लाभ उठाने से चूक गई। राहुल गाँधी के साथ ही प्रियंका वाड्रा भी उन विषयों में उलझकर रह गईं जो अब उबाऊ लगने लगे हैं। कांग्रेस के पास संसद के दोनों सदनों में कुछ सांसद ऐसे हैं जो संसदीय बहस में अनुभवी हैं और सम - सामयिक विषयों पर उनका अध्ययन भी अच्छा है। लेकिन पार्टी उन्हें अवसर न देकर उनकी योग्यता का उपयोग नहीं कर पाती।  यही कारण रहा कि सत्र के दौरान भाजपा ने जब कांग्रेस और गाँधी परिवार पर चौतरफा हमले किये तब पार्टी के सांसदों द्वारा वैसा बचाव नहीं किया गया जैसा होना चाहिए था। इसी तरह अन्य विपक्षी दलों ने भी कांग्रेस को अकेला छोड़ दिया। परिणाम ये हुआ कि लोकसभा चुनाव के उपरांत पहले कामकाजी सत्र के  दौरान  विपक्ष में जो समन्वय देखा गया वह इस सत्र में गायब रहा। लोकसभा में नई बैठक व्यवस्था किये जाने से सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव कांग्रेस से खफ़ा हो गए जो इस सत्र के पूर्व तक राहुल के बगल में बैठते थे। और तो और फैज़ाबाद से जीतकर आये अवधेश प्रसाद को भी वे अपने बगल में बिठाते थे। राजनीतिक क्षेत्रों में चल रही चर्चाओं के अनुसार उ.प्र में हुए उपचुनावों में सपा की करारी हार के बाद अखिलेश की राहुल से नाराजगी बढ़ गई है। स्मरणीय है उन उपचुनावों में सीटों के बंटवारे को लेकर दोनों के बीच मतभेद इतना बढ़ा कि कांग्रेस ने चुनाव लड़ने से ही इंकार करते हुए सपा को अकेले छोड़ दिया। सपा का कहना है कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने उसकी कोई मदद नहीं की। इसी कारण से जब राहुल के नेतृत्व में पूरी कांग्रेस अदाणी मुद्दे पर संसद चलने नहीं दे रही थी तब सपा ने सामने आकर कहा कि उसे अदाणी मुद्दे में कोई रुचि नहीं है और वह चाहती है संसद चले। ऐसा ही रुख तृणमूल कांग्रेस ने दिखाया जो राहुल के लिए किसी झटके से कम नहीं था। दरअसल महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव के बाद ही इंडिया गठबंधन में श्री गाँधी के विरुद्ध आवाजें उठने लगीं। संसद में गठबंधन के घटक दलों ने भी कांग्रेस को जिस तरह किनारे किया वह इस बात का संकेत है कि लोकसभा चुनाव के पहले अस्तित्व में आये इंडिया गठबंधन में शामिल दलों के बीच रणनीतिक एकता भले हो गई किंतु भावनात्मक तौर पर उनके मन एक दूसरे से नहीं मिल सके। इसीलिए चुनाव खत्म होते ही जब ये स्पष्ट हो गया कि गठबंधन नरेंद्र मोदी को सत्ता में आने से नहीं रोक सका तब उसके सदस्यों में कांग्रेस की क्षमताओं को लेकर अविश्वास जागने लगा। ये बात भी गलत नहीं है कि मुख्य विपक्षी दल बनते ही कांग्रेस ने भी घटक दलों को हाशिये पर रखने की नीति अपनाई। राहुल चूंकि नेता प्रतिपक्ष बन गए इसलिए सदन में उन्हें महत्व मिलने लगा जिसे अन्य किसी के साथ बांटने से वे बचने लगे। और जबसे प्रियंका का लोकसभा में प्रवेश हुआ तबसे तो अन्य दलों से दूरी और बढ़ गई। संसद सत्र के दौरान उत्पन्न दरार अब और तेज होती दिख रही है। सबसे चौंकाने वाली बात ये है कि केरल में  सरकार के सबसे बड़े घटक सीपीएम ने कांग्रेस पर अतिवादी मुस्लिम गुटों से समर्थन प्राप्त कर वायनाड लोकसभा चुनाव जीतने का आरोप लगाया जो बेहद संगीन है। पार्टी नेता विजयराघवन ने पत्रकार वार्ता में कहा कि पहले राहुल और फिर प्रियंका ने उक्त सीट से चुनाव जीतने के लिए उग्रवाद के पोषक मुस्लिम संगठनों का साथ लिया। उल्लेखनीय है चुनाव प्रचार के दौरान राहुल और प्रियंका की रैलियों में मुस्लिम लीग सहित अन्य मुस्लिम संगठनों के झंडे और कार्यकर्ता बड़ी संख्या में नजर आये थे।  अब तक भाजपा ही ये आरोप लगाती आई है किंतु उसकी घोर विरोधी सीपीएम द्वारा राहुल और प्रियंका पर मुस्लिम सांप्रदायिक शक्तियों का सहारा लेकर चुनाव जीतने का आरोप इंडिया गठबंधन में टूटन बढ़ने के अलावा कांग्रेस के धर्मनिरपेक्ष होने के दावे पर बड़ा प्रहार है।  यद्यपि केरल में इंडिया गठबंधन कारगर नहीं हो सका। लोकसभा चुनाव में वामदलों ने राहुल से अनुरोध किया था कि वे वायनाड सीट छोड़कर  उत्तर भारत में कहीं से लड़ें  वे राहुल नहीं माने। अब प्रियंका भी वहीं से संसद पहुँच गईं। ये देखते हुए अब इंडिया गठबंधन की दरारें और चौड़ी होती दिख रही हैं। अब  तक सहयोगी दल कांग्रेस पर दूसरे आरोप लगाते थे किंतु अब सीपीएम द्वारा गाँधी भाई - बहिन पर मुस्लिम सांप्रदायिकता के सहारे चुनाव जीतने का आरोप लगाकर गठबंधन के सैद्धांतिक आधार पर ही प्रहार कर दिया गया है। देखना ये है कि अपनी  मुस्लिम परस्ती के लिए बदनाम सपा इस आरोप पर क्या कहती है? अन्य दलों की प्रतिक्रिया भी मायने रखेगी क्योंकि मुस्लिम सांप्रदायिकता को लेकर भाजपा पहले से ही गठबंधन को घेरती रही है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

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