Friday, 20 December 2024

राहुल की ज़िद के कारण कांग्रेस सत्र का लाभ उठाने से चूक गई


संसद में  गत दिवस जो हुआ वह शर्मनाक है। दो सांसद घायल होकर अस्पताल में भर्ती किये गये। एक महिला सांसद ने लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गाँधी पर अन्य आरोप लगाया। भाजपा की शिकायत पर पुलिस ने  उनके विरुद्ध प्रकरण दर्ज कर लिया है। दूसरी तरफ कांग्रेस के भी इसी तरह के आरोप हैं जिनमें पार्टी अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे के साथ भाजपा सांसदों द्वारा धक्का - मुक्की की शिकायत है। जो सांसद घायल हुए उनकी चोटें स्पष्ट दिखाई देती हैं। यदि श्री गाँधी ने धक्का नहीं दिया तब उनको घायल हुए सांसद से मिलकर स्थिति स्पष्ट करना चाहिए थी किंतु प्रियंका वाड्रा सहित कांग्रेस का समूचा प्रचार तंत्र उल्टे भाजपा पर आरोप लगा रहा है। और तो और सोशल मीडिया पर कांग्रेस समर्थक घायल सांसदों का मजाक उड़ाते हुए कह रहे हैं कि जरा सी धक्का -  मुक्की में आई. सी. यू में भर्ती हो गए। और भी तरह - तरह के ताने मारे जा रहे हैं। शीतकालीन सत्र का आज अवसान हो  गया ।  उद्योगपति गौतम अदाणी की गिरफ्तारी की मांग को लेकर कांग्रेस ने सदन नहीं चलने दिया। शुरू में तो अन्य विपक्षी दल उसके साथ नजर आये किंतु धीरे - धीरे उनमें फूट पड़ने लगी क्योंकि  वे अपने मुद्दे नहीं उठा पा रहे थे। बीते कुछ दिनों से संविधान पर हुई चर्चा भी व्यर्थ के विवाद में उलझती चली गई। और अदाणी से शुरू हुआ विवाद डाॅ.आंबेडकर  तक जा पहुंचा। लेकिन सत्र समाप्ति के एक दिन पहले कुछ सांसदों का खून बहने जैसी दुखद घटना के कारण यह सत्र कलंकित होकर रह गया। राहुल ने धक्का दिया या नहीं इसका पता तो पुलिस लगायेगी किंतु सांसदों को चोट आई ये तो पूरी तरह स्पष्ट है। लेकिन बजाय सहानुभूति दिखाने के अनर्गल बातें करना ये दर्शाता है कि संसदीय प्रजातंत्र के दामन पर खून के धब्बे लगने लगे हैं। कांग्रेस का कहना है उसके सांसद प्रवेश द्वार पर प्रतिदिन प्रदर्शन करते थे। भाजपा की शिकायत है कांग्रेस वाले दरवाजे से आवाजाही अवरुद्ध कर रहे थे। इस विवाद से इतर विचारणीय प्रश्न ये है कि संसद जनता और देश से जुड़े महत्वपूर्ण विषयों पर विचार कर उचित निर्णय करने के लिए बनाई गई है। सरकार बेशक बहुमत के बल पर बनती है परंतु आदर्श स्थिति तो वही है जब सत्ता और विपक्ष वैचारिक भिन्नता के बावजूद जनता और देश की बेहतरी से जुड़े मुद्दों पर एकजुट हों। उस दृष्टि से मौजूदा मुख्य विपक्षी दल  अपनी जिम्मेदारी के निर्वहन में पूरी तरह उदासीन है। ऐसा लगता है कांग्रेस लगातार तीन लोकसभा चुनाव में सत्ता से वंचित रहने से कुंठाग्रस्त हो चली है। विशेष रूप से राहुल को ये बात समझ लेनी चाहिये कि राष्ट्रीय राजनीति में कांग्रेस और नेहरू - गाँधी परिवार के प्रति पहले जैसा समर्थन नहीं रहा। अपने दम पर सत्ता हासिल करने की उसकी हैसियत  चंद राज्यों तक ही सीमित है। बड़े राज्यों में वह क्षेत्रीय दलों के सहारे रह गई है। लोकसभा चुनाव में 99 सीटें जीतने के बाद उसे लगने लगा था कि वह भाजपा का विकल्प बनने की क्षमता अर्जित कर चुकी है किंतु हरियाणा और महाराष्ट्र विधानसभा के  चुनाव परिणाम से उसकी उम्मीदों पर तुषारापात हो गया। यहाँ तक कि इंडिया गठबंधन के घटक दलों तक ने उसे आँखें दिखाना शुरू कर दिया। नेता प्रतिपक्ष बनने के बाद श्री गाँधी से अपेक्षा थी कि वे परिपक्वता दिखाएंगे किंतु वे इस सोच से बाहर नहीं निकल पा रहे कि केवल प्रधानमंत्री पर निजी हमले करने से जनता उनको सिर आँखों पर बिठा लेगी। दो राज्यों में हुई करारी पराजय के बाद बुद्धिमत्ता इसी में थी कि कांग्रेस जनता से जुड़े मुद्दे उठाकर अपनी छवि सुधारती किंतु राहुल के बचपने के कारण उसने अवसर गँवा दिया। सही बात ये है कि अदाणी मुद्दे से आम जनता को कुछ लेना - देना नहीं है। रही बात डाॅ. आंबेडकर को भुनाने तो दलित वर्ग की राजनीति करने वाले अपने प्रेरणा पुरुष को इतनी आसानी से किसी और के हाथों नहीं जाने देंगे। हालांकि शीतकालीन सत्र छोटा होता है किंतु कांग्रेस के पास सरकार को घेरने के पर्याप्त मुद्दे थे जिसमें वह एक बार फिर विफल रही। राहुल गाँधी को इस मामले में शरद पवार से सीखना चाहिए जो महाराष्ट्र चुनाव में उत्पन्न कटुता के बाद भी अपने क्षेत्र के किसानों की समस्याओं पर बात करने प्रधानमंत्री के पास जा पहुंचे। उधर मुंबई में उद्धव ठाकरे ने मुख्यमंत्री देवेंद्र फड़नवीस से भेंट करने की बुद्धिमत्ता दिखाई। बेहतर हो श्री गाँधी अतीत में विपक्ष के नेता रहे लोगों के संसदीय जीवन का अध्ययन करें जो कम संख्या में होने के बाद भी अपनी छाप छोड़ने में सफल हो जाते थे और घोर सैद्धांतिक मतभेदों के बाद भी सत्ता पक्ष के साथ निजी तौर पर मधुर सम्बन्ध बनाकर रखते थे। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

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