Monday, 9 December 2024

सीरिया के कई हिस्सों में बंटने का अंदेशा : विद्रोही गुट आपस में लड़ते रहेंगे

      सीरिया में बशर असद की सत्ता का पतन होना अरब जगत में एक नये संकट का कारण बनेगा। बीते एक दशक से चल रहे गृहयुद्ध में लाखों लोगों की जान चली गई। साथ ही लाखों को भागकर दूसरे देशों में पनाह लेने लगी। ये कहने में कुछ भी गलत नहीं है कि सीरिया के गृहयुद्ध ने जो शरणार्थी समस्या पैदा की उसने यूरोप के अनेक देशों में इस्लामिक कट्टरता के पाँव जमा दिये। फ्रांस, जर्मनी, स्वीडन, डेनमार्क और ब्रिटेन इसका दंश भोग रहे हैं। ये बात पूरी तरह सही है कि राष्ट्रपति असद एक क्रूर तानाशाह बन चुके थे। उनके पिता ने भी इस देश पर लम्बे समय तक राज किया। इस प्रकार दुनिया के प्राचीनतम देशों में शुमार सीरिया आधी सदी से एक ही परिवार के शिकंजे में था।

       हालांकि असद की सत्ता के विरुद्ध विद्रोह 13 साल पहले शुरू हुआ किंतु रूस और ईरान ने हर प्रकार से उसकी सहायता की। रूसी सैनिकों के साथ ही वायुसेना भी खुलकर असद की रक्षा करती रही। ऐसी ही भूमिका ईरान की भी रही। दरअसल रूस को डर था कि असद के हटते ही सीरिया के अमेरिकी प्रभाव में चले जाने से पश्चिम  एशिया का शक्ति संतुलन बिगड़ने का खतरा उत्पन्न हो जाएगा। उसका सोचना गलत भी नहीं था।

   गत दिवस राजधानी दमिश्क में विद्रोहियों के घुसते ही असद देश छोड़कर मास्को रवाना हो गए। रूस ने भी उन्हें शरण देना स्वीकार किया है। अमेरिका , फ्रांस, जर्मनी, ब्रिटेन और तुर्किये आदि ने बिना देर लगाए जिस तरह से सीरिया में सत्ता परिवर्तन का स्वागत किया । उससे स्पष्ट है कि इसके पीछे अमेरिकी लॉबी का हाथ है। इसका समय भी बहुत ही सोच समझकर तय किया गया। चूंकि रूस लंबे समय से यूक्रेन के साथ युद्ध में उलझा हुआ है इसलिए वह पहले की तरह असद के बचाव में सामने नहीं आ सका। हालांकि उसके सैनिक दस्ते अभी भी सीरिया में बने हैं जिनकी सुरक्षित वापसी हेतु उसने विद्रोही नेताओँ से आश्वासन ले लिया है। दूसरी तरफ ईरान भी इसराइल के साथ जंग की दहशत में डूबा हुआ है। लिहाजा  वह भी असद की सहायता करने का साहस न दिखा सका। यदि इनमें से कोई एक देश भी असद की पीठ पर हाथ रखे रहता तो बरसों से चला आ रहा गृहयुद्ध कुछ दिनों में ही अंजाम तक न पहुँचता।

    लेकिन विद्रोहियों के राजधानी दमिश्क  पर काबिज होने और राष्ट्रपति असद के देश छोड़कर रूस में शरण लेने मात्र से सीरिया का संकट हल हो जाएगा, ये मान लेना जल्दबाजी होगी क्योंकि जिस गुट ने कुछ दिनों के भीतर ही असद को भागने मजबूर कर दिया उसका भी पूरे देश पर आधिपत्य नहीं है। सीरिया के बड़े हिस्से पर दूसरे गुटों का कब्जा है। वहीं आई.एस.आई.एस नामक संगठन भी कुछ जगहों में जमा बैठा है।

    जो जानकारी आ रही है उसके अनुसार अमेरिका के राष्ट्रपति जो बाइडेन का उद्देश्य सीरिया को असद के शासन से मुक्त करवाना था। उसके लिए उसने जिस विद्रोही गुट को सहायता दी उसका नेता अल कायदा जैसे अमेरिका विरोधी आतंकवादी संगठन से जुड़ा रहा। ऐसे में  कहा जा सकता है कि असद का तख्ता पलट होने के बाद सीरिया के कई टुकड़े हो सकते हैं और यही अमेरिका और उसके समर्थक पश्चिमी देश चाहते हैं।

    अमेरिका जानता है कि सीरिया को यदि टुकड़ों में नहीं बांटा गया तब वहाँ दोबारा उसकी विरोधी ताकतें सत्ता पर हावी हो जाएंगी। इसलिए असद के देश छोड़कर भागने के बाद अब यह देश अनेक विद्रोही गुटों की आपसी लड़ाई में फंसकर रह जाएगा। अरब जगत में युद्ध के हालात बनाये रखना अमेरिका के हित में होने से वह अपनी पसंद के विद्रोही समूह को पालता रहेगा। सीरिया से इसराइल की सीमा भी मिलती है। गोलन हाइट्स नामक इलाके में उसने अपने कदम बढ़ा दिये हैं। गत रात्रि सीरिया में अनेक इस्लामिक कट्टरपंथियों के केंद्रों पर हवाई हमले हुए। उनके पीछे इसराइल ही बताया जा रहा है।

     सच बात ये है कि इसराइल सीरिया में हुए सत्ता परिवर्तन से आशंकित है क्योंकि जिस विद्रोही गुट ने दमिश्क पर अपना परचम फहराया उसकी पृष्ठभूमि  इसराइल विरोधी रही है। अन्य अरबी देश भी ये तय नहीं कर पा रहे हैं कि वे सीरिया में अचानक हुए तख्ता पलट पर क्या रुख अख्तियार करें , क्योंकि जिन देशों में राजशाही या लम्बे समय से परिवार की सत्ता चली आ रही है वहाँ के सत्ताधीशों को भी सीरिया के हालातों ने डरा दिया है।

     आने वाले कुछ दिन इस क्षेत्र के लिए काफी संगीन होंगे क्योंकि फिलहाल तो सीरिया आसमान से टपकने के बाद खजूर पर अटेकने वाली स्थिति में फंस गया है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

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