संसद का शीतकालीन सत्र गत दिवस समाप्त हो गया। लोकसभा और राज्यसभा दोनों में औसत 50 फीसदी कामकाज हो सका और उस दौरान भी होहल्ला जारी रहा। पूरे सत्र में एक भी विधेयक पारित नहीं हुआ। एक देश एक चुनाव के विधेयक को भी जेपीसी के हवाले कर दिया गया। कांग्रेस ने अदाणी मुद्दे पर भाजपा को घेरना चाहा तो जवाबी हमले में अमेरिकी धनकुबेर जॉर्ज सोरोस से गाँधी परिवार के रिश्ते को उजागर करते हुए भाजपा ने घेराबंदी की कोशिश की। हालांकि सत्र का समापन संविधान पर चली चर्चा और सांसदों के बीच धक्का - मुक्की जैसी घटना से हुआ किंतु जो सबसे महत्वपूर्ण बात देखने मिली वह थी विपक्षी दलों में एकजुटता का अभाव। महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव के बाद इंडिया गठबंधन में जबरदस्त निराशा दिखी। हालांकि हार तो हरियाणा में भी हुई थी किंतु वहाँ कांग्रेस ने चूंकि एकला चलो की नीति अपनाई इसलिए ठीकरा उसी के सिर फूटा। शिवसेना और सपा सहित इंडिया गठबंधन के अन्य सदस्यों ने भी खुलकर कहा कि कांग्रेस अकेले दम पर जीतने की क्षमता गँवा चुकी है। उन बयानों का उद्देश्य महाराष्ट्र चुनाव में सीटों के बंटवारे में कांग्रेस के वर्चस्व को कम करना था और उसका असर भी हुआ। कांग्रेस को वहाँ शरद पवार और उद्धव ठाकरे के अलावा सपा को भी उनकी मांग के मुताबिक सीटें देनी पड़ गईं। चूंकि लोकसभा चुनाव में महाराष्ट्र ने इंडिया गठबंधन को भारी सफलता प्रदान की थी इसलिए उसका हौसला काफी बुलंद था। लेकिन चुनाव परिणाम उम्मीद के पूरी तरह विपरीत आये जिनमें कांग्रेस का प्रदर्शन अब तक का सबसे खराब रहा। लेकिन उसके साथ ही उद्धव ठाकरे और शरद पवार की लुटिया भी डूब गई। ये कहने में कुछ भी गलत नहीं है कि जम्मू - कश्मीर और झारखंड में विपक्ष की जीत पर हरियाणा और महाराष्ट्र में भाजपा को मिली कामयाबी भारी पड़ गई। हरियाणा में तो भाजपा अकेले दम पर स्पष्ट बहुमत ले आई। महाराष्ट्र में यद्यपि उसने शिवसेना ( शिंदे) और अजीत पवार के साथ सीटों का बंटवारा किया किंतु अकेले ही 132 सीटें जीत लीं जो बहुमत से मात्र 12 कम हैं। और इसी वजनदारी के बल पर एकनाथ शिंदे को हटाकर देवेंद्र फड़नवीस को मुख्यमंत्री पद मिला। इस नतीजे से एक तरफ जहाँ एनडीए के उत्साह में वृद्धि हुई वहीं इंडिया गठबंधन में टूटन की गति और तेज़ हो गई। यद्यपि आम आदमी पार्टी ने लोकसभा चुनाव के फ़ौरन बाद ही अकेले चलने की घोषणा कर दी थी किंतु हरियाणा में उसने कांग्रेस से कुछ सीटें मांगी जिसके लिए राहुल गाँधी तो राजी हो गए परंतु भूपिंदर सिंह हुड्डा बात नहीं माने। इससे नाराज होकर अरविंद केजरीवाल ने सभी सीटों पर प्रत्याशी उतारकर कांग्रेस के लिए गड्ढा खोद दिया। दिल्ली विधानसभा चुनाव में भी दोनों एक दूसरे के विरुद्ध ताल ठोक रहे हैं। महाराष्ट्र चुनाव के फ़ौरन बाद हुए संसद के सत्र में इंडिया में शामिल अन्य घटक दलों ने भी कांग्रेस से दूरी बनाने के संकेत दे दिये। शुरुआत की ममता बेनर्जी ने गठबंधन का नेतृत्व संभालने की इच्छा जताकर जिसे उद्धव ठाकरे गुट के अलावा सपा और लालू का समर्थन मिलने से गठबंधन के भविष्य पर सवाल खड़े होने लगे। राहुल गाँधी द्वारा अदाणी प्रकरण उठाये जाने से उत्पन्न विवाद के कारण जब रोजाना सदन स्थगित होने की स्थिति बनी और भाजपा ने भी सोरोस रूपी अस्त्र चला दिया तब विपक्ष के अन्य दल ये कहते हुए सामने आये कि उनकी रुचि न तो अदाणी मुद्दे में है और न ही सोरोस से उन्हें कुछ लेना देना है। वे तो इतना ही चाहते हैं कि सदन चले। तृणमूल और सपा ने तो खुलकर कांग्रेस से दूरी बना ली। जैसे - तैसे सत्र तो समाप्त हो गया किंतु दिल्ली, बिहार और उसके बाद प. बंगाल, केरल और तमिलनाडु विधानसभा चुनाव में इंडिया गठबंधन के बिखरने के आसार साफ देखे जा सकते हैं। राहुल गाँधी की चुनाव जिताऊ क्षमता हरियाणा और महाराष्ट्र में फुस्स साबित होने के बाद अब सहयोगी दल कांग्रेस के साथ जुड़े रहने से हो रहे नुकसान के बारे में सोचने लगे हैं। उन्हें लगने लगा है कि वह अपने वर्चस्व वाले राज्यों में तो किसी अन्य को साथ रखती नहीं किंतु जहाँ उसकी जड़ें कमजोर हो चुकी हैं वहाँ राष्ट्रीय पार्टी का रुतबा झाड़कर बड़ा हिस्सा मांगती है। म.प्र और हरियाणा में सपा को कांग्रेस की उपेक्षा का अनुभव हो चुका है। बाकी दलों को भी धीरे - धीरे कांग्रेस बोझ लगने लगी है। इन सब कारणों से नये साल में इंडिया गठबंधन में खींचातानी होने की पूरी - पूरी संभावना है। शीतकालीन सत्र के दौरान इंडिया गठबंधन में साझा रणनीति का अभाव खुलकर देखने मिला। ऐसा लगता है राहुल गाँधी की आत्मकेंद्रित कार्य शैली गठबंधन की एकजुटता में सेंध लगाने का कारण बन रही है। लंबे समय से गठबंधन में शामिल पार्टियों के नेताओं की बैठक न होना भी दर्शाता है कि उनमें संवादहीनता उत्पन्न हो चुकी है।
- रवीन्द्र वाजपेयी
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