Monday, 16 December 2024

ईवीएम पर कांग्रेस की बखिया उधेड़ दी उमर ने


विगत सप्ताह संविधान पर हुई चर्चा के दौरान लोकसभा में  कांग्रेस सांसद प्रियंका वाड्रा ने वैसे तो काफी बातें कहीं किंतु उन्होंने ईवीएम का विरोध करते हुए चुनौती भरे लहजे में कहा कि मतपत्रों से चुनाव करवा लें तो दूध का दूध पानी का पानी हो जाएगा। अन्य विपक्षी दल भी ईवीएम का उपयोग बन्द करने की मांग करते रहे हैं। लेकिन चुनाव आयोग और सर्वोच्च न्यायालय ने उक्त आपत्तियों को निराधार मानते हुए ईवीएम में गड़बड़ी की किसी भी संभावना से इंकार कर दिया। असल में विपक्ष द्वारा ईवीएम पर किया जाने वाला दोषारोपण पूरी तरह विरोधाभासी है। उदाहरण के लिए जम्मू - कश्मीर और झारखंड में  विपक्ष की जीत उसकी नीतियों में जनता के विश्वास की अभिव्यक्ति है किंतु हरियाणा और महाराष्ट्र में हार होने पर उसका ठीकरा ईवीएम पर फोड़ने की प्रतिस्पर्धा चल पड़ती है। महाराष्ट्र में चारों खाने चित्त हुई शिवसेना ( उद्धव ) विधायक  दल के नेता  आदित्य ठाकरे ने अपने विधायकों को शपथ लेने से रोक लिया क्योंकि उन्हें चुनाव परिणाम अविश्वसनीय लग रहे थे लेकिन अगले दिन ही उनकी अकड़ निकल गई और उन्होंने सभी विधायकों सहित शपथ ले ली। राज्य के वरिष्ट नेता शरद पवार को भी इस चुनाव में अकल्पनीय पराजय का सामना करना पड़ा। लेकिन बजाय ईवीएम पर दोष मढ़ने के उन्होंने शिंदे सरकार द्वारा शुरू की गई लाड़की बहन योजना  के साथ - साथ भाजपा के  बटेंगे तो कटेंगे वाले नारे को सत्ता पक्ष की जीत में सहायक बताया। महाराष्ट्र के साथ ही झारखंड में भी चुनाव हुए जहाँ सत्तारूढ़ झामुमो की वापसी हुई जिसका श्रेय मुख्य रूप से महिलाओं को प्रतिमाह दी जाने लाड़ली बहना जैसी योजना को मिला। उसी दौरान हुए उपचुनावों में प्रियंका वायनाड सीट से जीतकर लोकसभा में आईं। उन्होंने अपने प्रतिद्वंदियों को बड़े अंतर से हराया परंतु  हारे हुए किसी भी प्रत्याशी ने ईवीएम पर संदेह नहीं जताया। इसी तरह जम्मू - कश्मीर और  झारखंड में सरकार बनाने वालों को ईवीएम में कोई गड़बड़ी नजर नहीं आई। हरियाणा और महाराष्ट्र की हार के बाद कांग्रेस  प्रवक्ता ने परिणाम को पूरी तरह अस्वीकार्य बताया था किंतु  जम्मू - कश्मीर और झारखंड के नतीजों में  उसे भाजपा और नरेंद्र मोदी के प्रभाव में गिरावट नजर आई। कांग्रेस के इसी दोहरे रवैये की जम्मू - कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने तीखी आलोचना करते हुए कहा कि जब इसी ईवीएम के इस्तेमाल से संसद में आपके सौ  सदस्य पहुंच जाते हैं और आप  अपनी पार्टी के लिए जीत का जश्न मनाते हैं, तो कुछ महीने बाद पलटकर यह नहीं कह सकते कि हमें ये ईवीएम पसंद नहीं हैं क्योंकि अब चुनाव के परिणाम उस तरह नहीं आ रहे हैं जैसा हम चाहते हैं। उमर ने ये भी कहा कि अगर पार्टियों को मतदान तंत्र पर भरोसा नहीं है तो उन्हें चुनाव नहीं लड़ना चाहिए और  ईवीएम से दिक्कत है, तो उसे लेकर आपका रुख एक समान रहना चाहिए । उल्लेखनीय है उमर की पार्टी का कांग्रेस से चुनावी गठबंधन था। यद्यपि कांग्रेस उनके मंत्रीमंडल में शामिल नहीं हुई लेकिन सरकार को उसका समर्थन जारी है। ऐसे में उनके द्वारा कांग्रेस के ईवीएम विरोध की खुली आलोचना करना साधारण बात नहीं है। इससे ये बात साबित होने लगी है कि कांग्रेस जनता की निगाह में तो गिर ही चुकी है लेकिन अब तो उसके सहयोगी दल भी उसकी रीति - नीति से त्रस्त होकर उससे कन्नी काटने लगे हैं। ममता बेनर्जी द्वारा इंडिया गठबंधन के नेतृत्व में परिवर्तन और खुद उसकी बागडोर संभालने की पेशकश को जिस प्रकार समर्थन मिला उससे राहुल गाँधी की जबरदस्त किरकिरी हुई। अडानी के मुद्दे पर तो वे अलग - थलग पड़े ही किंतु लोकसभा में प्रियंका द्वारा ईवीएम का विरोध किये जाने के बाद बाकी विपक्षी दल तो चुप रहे किंतु उमर अब्दुल्ला ने जिस तरह से कांग्रेस को आईना दिखाया उससे यही लगता है कि सहयोगी दल अब कांग्रेस से पिंड छुड़ाने की तैयारी कर रहे हैं। अब्दुल्ला और गाँधी परिवार के नजदीकी रिश्ते पीढ़ियों से चले आ रहे हैं। उमर और राहुल में दोस्ती भी है किंतु  उन्होंने ईवीएम को लेकर जिस प्रकार से कांग्रेस की बखिया उधेड़ी उससे लगता है जम्मू - कश्मीर विधानसभा चुनाव में राहुल के रवैये से उपजी नाराजगी कम होने के बजाय और बढ़ गई है। उमर के बयान में वैसे तो ईवीएम का विरोध करने वाले सभी दलों को लपेटा गया है किंतु मुख्य निशाना कांग्रेस ही है। देखना है कांग्रेस उनकी आलोचना पर क्या प्रतिक्रिया देती है? 


- रवीन्द्र वाजपेयी

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