Monday, 2 December 2024

जीएसटी की बढ़ती वसूली के बाद भी जनता को राहत नहीं


बीते नवम्बर माह में जीएसटी वसूली 1.82 लाख करोड़ पहुँच जाना अर्थव्यवस्था के नजरिये से बेहद उत्साहजनक है। ये आंकड़ा गत वर्ष इसी माह हुए संग्रह से 8.5 प्रतिशत ज्यादा है। इससे स्पष्ट होता है कि उपभोक्ता बाजार , वार्षिक विकास दर की अपेक्षा ज्यादा तेजी से बढ़ रहा है। यद्यपि दीपावली अक्टूबर माह में पड़ने के कारण बाजारों में जमकर खरीदी होने से भी इस माह का आंकड़ा अधिक रहा।  इस वर्ष  अब तक 19.74 लाख करोड़ रु. का जीएसटी वसूल होना उत्पादन और खफत दोनों के लिहाज से सुखद संकेत है। विश्व की  प्रामाणिक वित्तीय एजेंसियों द्वारा 2024 - 25 में  भारत की वार्षिक विकास दर का जो अनुमान लगाया जा रहा है उसके अनुसार वह 7 फीसदी से अधिक भी रह सकती है। और यदि ऐसा हो सका तब यह दुनिया भर में सबसे ज्यादा होगी। जीएसटी के अलावा प्रत्यक्ष करों की वसूली में भी जबरदस्त वृद्धि होने का अर्थ है कि लोगों का विश्वास सरकार में बढ़ा है । आयकर विभाग की कार्यप्रणाली में सुधार  से भी लोगों में विवरणी भरने के प्रति उत्साह जाग्रत हुआ है। आयकर रिफंड विवरणी भरने के  बाद बहुत ही कम समय में आयकर दाता तक पहुँचने लगे हैं । उस वजह से लोगों की अग्रिम कर जमा करने के प्रति नाराजगी कम हुई है।  इसी तरह राजमार्गों पर प्रतिदिन वसूल होने वाले टोल टैक्स के आंकड़े भी इस तथ्य की पुष्टि करते हैं कि अर्थव्यवस्था के पहिये तेज रफ्तार से दौड़ रहे हैं।   लेकिन इतनी आशाजनक स्थिति के बावजूद भी आम जनता को राहत देने के बारे में जीएसटी काउंसिल बेहद कंजूस  है। छोटा सा उदाहरण स्वास्थ्य बीमा पॉलिसियों पर लगने वाले जीएसटी का है। बढ़ते चिकित्सा खर्च के कारण लोगों में स्वास्थ्य बीमा कराने का चलन बढ़ा है किंतु उस पर 18 फीसदी की दर से जीएसटी लगाना अमानवीय है। केन्द्रीय मंत्री नितिन गड़करी ने  पत्र लिखकर इसे घटाने कहा। जिस पर  काउंसिल ने सैद्धांतिक सहमति तो दे दी जिसका कारण केंद्र सरकार के एक वरिष्ट मंत्री द्वारा लिखा पत्र था किंतु उसे भी टाला जाता रहा। खबर है दिसंबर की बैठक में 5 लाख तक के स्वास्थ्य और जीवन बीमा पर जीएसटी की दर कम करने का निर्णय काउंसिल करेगी किँतु इससे अधिक राशि के बीमा पर वह 18 फीसदी ही रहेगी जो कि पूर्णतः अनुचित है। 5 लाख से कम की बीमा पाॅलिसी पर यदि जीएसटी पूरी तरह खत्म कर दिया जाए तब भी ये लगेगा कि काउंसिल में बैठे वित्त मंत्रियों में जनता के प्रति कुछ संवेदनशीलता  है। आश्चर्य इस बात का है कि जो विपक्षी दल जीएसटी को लेकर केंद्र सरकार पर आक्रामक बने रहते हैं उनके शासित राज्यों के वित्त मंत्री भी जब काउंसिल की बैठक में आते हैं तब जनता को लूटने में वे भी अन्य पार्टियों के नुमाइंदों की तरह पेश आते हैं। बीमा के अलावा भी अनेक सेवाएं और वस्तुएँ हैं जिन पर जीएसटी की दरें घटनी चाहिए। काउंसिल को ये बात  समझनी होगी कि जीएसटी की अधिक दरें कर चोरी को प्रोत्साहित करती हैं।  जब जीएसटी लागू हुआ तब ये आश्वासन दिया गया था कि भविष्य में पेट्रोल, डीजल और रसोई गैस भी इसके दायरे में लाये जाएंगे किंतु आज तक वह हवा में टँगा हुआ है।   इसी तरह जीएसटी की  एक या अधिकतम दो दरें रखने पर भी सहमति के स्वर सुनाई देते थे। लेकिन उसकी चर्चा तक अब सुनाई नहीं देती। मुद्दे और भी हैं किंतु जिस पैमाने पर जीएसटी की वसूली हर माह बढ़ती जा रही है उसे देखते हुए करों की दरें कम होने के साथ ही पेट्रोल - डीजल को भी उसके अन्तर्गत लाना अपेक्षित है जो अभी सरकारी मुनाफाखोरी का शिकार हैं। काउंसिल के सदस्यों को ये बात मालूम होना चाहिए कि करों की दरों को कम रखने के अलावा उसके ढांचे में जटिलता न होने से उद्योग - व्यवसाय और उपभोक्ता सभी कर देने प्रोत्साहित होते हैं। इसीलिए विकसित देशों में जीएसटी की एक या दो दरें ही हैं। जिस दिन हमारे हुक्मरान इस सच्चाई को स्वीकार कर लेंगे , कर वसूली का आंकड़ा उनकी कल्पना से भी ज्यादा हो जाएगा। 


- रवीन्द्र वाजपेयी


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